Saturday, June 28, 2008

केजी, केजीबी और केजीबीवी

चौं रे चम्पू!

चौं रे चम्पू! हंफहंफी चौं छूट रई ?

क्या बताऊं चचा, पल्लेदारी करके रहा हूं।

कैसी पल्लेदारी रे?

अरे एक रिक्शे में बीस बच्चे भरे हुए थे। छोटे-छोटे बच्चे, केजी में पढ़ने वाले। सबके बस्ते रिक्शे में पीछे टंगे हुए थे। रिक्शे की टूट गई चेन। स्कूल था थोड़ी दूर। बच्चे रोने लगे। मैम का डर। घंटी बजने से पहले नहीं पहुंचे तो सज़ा मिलेगी। रिक्शे वाले से मैंन कहाभैया! तू बिना चेन के चला ले, मैं पीछे से धक्का लगाता हूं, पर वो माना नहीं। फिर मैंने कहा कि चल रिक्शा एक तरफ़ खड़ा कर ले। आधे बस्ते तू टांग ले आधे मैं उठा लेता हूं, छोड़ के आते हैं स्कूल तक। इस पर वो राज़ी हो गया। ओहो! इतना वज़न लाद देते हैं बच्चों के कंधों पर, हैरानी होती है चचा। प्रदीप चौबे कहा करते हैं— ‘टू केजी का बच्चा था, दस केजी का बस्ता था।अब दस बच्चों के बस्तों का वज़न कितना हो गया होगा, लगा लो चचा।

फिर तौ सच्चेई पल्लेदारी है गई।

पता नहीं क्यों इतनी किताब-कापियां छोटे बच्चों को थम देते है? एक कॉपी एक पेंसिल काफी होनी चाहिए। बाकी सामान स्कूल में दो। तो सबके बस्ते उठाए, बच्चों को समेटा और स्कूल तक छोड़ कर आए। वहां मैडम से भी गरमा-गरमी हो गई।

गरमा-गरमी चौं भई रे?

अरे मैंने कहाबस्ते में कॉपियां इतनी सारी क्यों हैं? अंग्रेज़ी की अलग, गणित की अलग, हिन्दी की अलग। एक ही कॉपी में तीनों का काम कराओ ! थ्री इन वन कॉपी बनाओ। मैडम बोलीआप कौन होते हैं पूछने वाले? जैसा ऑर्डर है वैसा ही करेंगे ! पेरैंट्स फीस देते हैं, उन्हें पता लगना चाहिए कि हमार बच्चा पढ़ रहा है। ठीक है जी! केजी के बच्चों को बाई-बाई करके स्कूल की बाई को नमस्ते की। फिर ध्यान में आई केजीबी।

रूस की केजीबी?

हां, जासूसी करने वाली केजीबी। सोवियत संघ के ज़माने में उसने एक रिपोर्ट दी थी कि अमरीक के बच्चों को ज़्यादा बस्ते लादने नहीं पड़ते। हम अपने देश में बच्चों पर बहुत सामान लाद देते हैं। उस रिपोर्ट के आधार पर सोवियत संघ में बस्तों का वज़न एकदम कम कर दिया गया। स्कूल में ही उनके लिए तरह-तरह के उपकरण सजाए गए। शारीरिक विकास और खेल-कूद पर ज़्यादा ध्यान दिया गया। हमारे यहां तो स्कूल वाले अभिभावकों से पैसा ऐंठने के चक्कर में बस्ते को बच्चों के लिए एक आतंक बना देते हैं। चचा तुम जब स्कूल जाते थे तो कितना वज़न होता था?

देख रे अपने पास तौ होती एक तख्ती, तख्ती कौ घोटा और एक बुदक्का। तख्ती पै करौ सारे काम। तख्ती पै ओलम, तख्ती पै गणित-पहाड़े। लोटा ते पानी के छींटा मारौ फिर घोटा मारौ। एक अदद तख्ती और मास्साब की सख्ती। स्कूल के बाद वो तख्ती युद्ध के काम आवती। मूंठ पकड़ के करौ तलवारबाजी। व्यायाम कौ व्यायाम, पढ़ाई की पढ़ाई।

चचा, केजी और केजीबी चर्चा के बाद चिंता का मुख्य विषय है केजीबीवी।

जे केजीबीवी का रे?

केजीबीवी यानी कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय। केजीबीवी उन पिछड़े और दलित क्षेत्रों में खोले जाने वाले बालिका विद्यालय हैं जहां साक्षरता राष्ट्रीय औसत से भी कम है। हमारे देश में लड़कियां पढ़ जाए तो जनतंत्र मज़बूत हो जाए। वंचितों, शोषितों, दलितों के लिए ये बालिका विद्यालय फौरन खुलने चाहिए थे। सारी की सारी राज्य सरकारें प्रदेश के ऊपरी सौन्दर्य पर तो जुट गई हैं, पार्क बन रहे हैं हज़ारों करोड़ के बजट के। शिक्षा है डार्क में। राजकेश्वर सिं ने एक रिपोर्ट में बताया है कि दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की मसीह मायावती के राज्य में सवा तीन सौ केजीबीवी खुलने थे और खुले हैं केवल पंद्रह। बिहार के नीतीश भी पिछड़ों के ईश कहलाते हैं वहां खुलने थे साढ़े तीन सौ और खुले हैं सिर्फ़ तिरेपन। झारखंड में सौ छियासी खुलने थे और अब तक खुले हैं केवल दस। गुजरात में बावन का प्रावधान रखा लेकिन अस्तित्व में हैं केवल ग्यारह। सभी राज्यों का कमोबेश एक जैसा हाल है। जम्मू-कश्मीर में पचास खुलने थे खुला एक भी नहीं। अब बताओ चचा। सिम्पैथी के स्वांग के आगे क्या बचा। शहरों लिए मॉल और फ्लाईओवर, ग़रीब बालिकाओं के लिए गाय और गोबर अपनी दिल्ली इस मामले में गे है चचा। दस साल पहले सरकारी स्कूलों में सिर्फ़ बत्तीस प्रतिशत बच्चे पास होते थे इस बार हुए हैं छियासी प्रतिशत।

चल जाई बात पै खुस है लै चम्पू!

Tuesday, May 27, 2008

नीति बाग में अनीति

चौं रे चम्पू!

—चौं रे चम्पू! अब आयौ ऐ जब हमारे जाइबे कौ टैम है गयौ!

—अरे चचा! तुम्हारे जाने का टाइम अभी कहां आया है। टाइम तो आ गया हमारे नामराशि का।

—का भयौ?

—अनीति हो गई नीति बाग में। अशोक गोयल और लता गोयल, परिचित थे अपने। उन्नीस सौ चौरानवे में अपनी भतीजी की शादी उनके भतीजे से कराई थी। सगाई का बायना ले के गए थे सी-61 में। मेरे घर के दरवाज़े पर वो बरात ले के आए थे। नाम अशोक था तो अशोक ही थे। हंसमुख, खुशमिजाज़।

—अच्छा वोई जिनके बारे में हल्ला है रयौ ऐ कै बुजुर्ग दम्पति कूं नौकर मार गयौ?

—हां चचा! ज़माना बदल गया। आजकल नौकर वो जो नोंक मारे चाकू की। चाकर वो जो चाक-चाक कर दे कलेजा। तीमारदार वो जो एक नहीं तीन बार मारे। टहलदार वो जो वारदात करके टहल जाए। नाचीज़ वो जो घर की एक चीज़ न छोड़े। ख़ाकसार वो जो ख़ाक में मिला दे। बंदगी वो जो बंद करके भग जाए। ज़रख़रीद वो जो सारा ज़र बेच खाए। दास वो जो दशा बिगाड़ दे। अनुचर वो जो अणु-अणु चर जाए। सेवक वो जो खुद के लिए सेव करे। चेट वो जो अचेत कर दे। ख़िदमती वो जो जिसकी मति खुदगर्ज़ी की हो। घरजाया वो जो घर से सारा माल लेकर जाया हो जाए। मुलाज़िम वो जो मुल्ज़िम हो।

—बुरौ भयौ। पर जेऊ बुरौ भय कै नौकर-चाकरन के प्रति तेरी सहानुभूति खतम है गई रे!

—मुझे तो रह-रह कर उन अशो जी की बातें याद आ रही हैं चचा। कितने हंसमुख और मिलनसार थे। दो योग्य बेटियों के पिता। राखी और पूजा का रुदन नहीं देखा जा रहा था। जुल्म हो गया चचा।

—तसल्ली रख चम्पू! हैरानी की बात जे ऐ कै जब तेरे खुद के ऊपर आ पड़ी तौ तेरी विचारधारा ई बदल गई।

—माफ करना चचा, आप ठीक कहते हैं। जब खुद पर आ पड़ती है तो विचारधारा बदल जाती है। लोग अब विचारधारा को अपने अनुभव से ऊपर नहीं मानते। धन्यवाद आपका जो आपने मुझे दुरुस्त किया। मीडिया भी अति कर देता है मेरी तरह। हम अपने समाज के दोष नहीं देखते जो इन अपराधों के मूल में होते हैं। जो नौकर आपके घर में

आता

है वो टीवी पर वही देखता है जो आप देख रहे होते हैं। वही.... जुर्म, वारदात, सनसनी। इन कार्यक्रमों में सनी-सनी चेतना की गिरफ़्त में वो भी आ सकता है, पर कुल मिला कर आंकड़े इतने भयावह नहीं हैं। अकेली दिल्ली में पूर्णकालिक और पार्ट-टाइम नौकर आठ लाख से ज़्यादा हैं। कोई संगठन नहीं है उनका, कोई यूनियन नहीं है। न कोई बीमा, न पैंशन.... भाड़े के टट्टू। पुराने ज़माने में जब कोई दास खरीदा जाता था तो उसके कान में कौड़ी डालते थे।

—तभी तौ कहावत बनी-- दो कौड़ी कौ आदमी।

—चुटिया काट देते थे ताकि भरी भीड़ में पहचान लिया जाए। सभ्य समाज में यही ऐसे मानव हैं जिसके पास मानवीय अधिकार नहीं हैं। पुराने ज़माने में दास होते थे, उन्हें महज़ बोलने वाला औज़ार माना जाता था। किसके दिल में दर्द है उनके लिए? आठ-दस लाख में से अगर पंद्रह-बीस वारदात हो गईं तो सचमुच कोई बड़ा आंकड़ा नहीं बनता। अफसोस कि इस आंकड़े में हमारे निहायत शरीफ़ मित्र आ गए।

—सारे मालिक सरीफ नांय होयं चम्पू!

—हां, नौकर भी देखते हैं कि हमारा मालिक कितना बड़ा चोर है। बहुत ही सभ्य मालिक अपने नौकर से बिजली की चोरी कराते हैं। मेरे एक पड़ौसी बिना इस बात की फिक्र किए कि नीचे भी लोग रहते हैं, अपनी नौकरानी से डण्डे से कपड़े कुटवाते हैं। वाशिंग मशीन सजावट के लिए घर पर रखी है।

नौकर है तो क्यों बिजली फूंकी जाए। चोरियों के शिक्षा-केन्द्र तो घरों में ही खुले हुए हैं। मुकेश का मासूम चेहरा देख कर लगता नहीं है कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम दे सकता है। इसके पीछे रहा होगा कोई गिरोह। और जरायमपेशा लोगों ने मार दिए हमारे दोस्त। पर चचा तुम ठीक कहते हो अपने निजी अनुभव से विचारधारा नहीं बदलनी चाहिए। ये भी सोचें कि दिल्ली के आठ लाख घरेलू नौकरों पर क्या बीत रही होगी। चचा, तुमने कभी नौकर रखा?

—वैसौ मिलौ ई नांय जैसौ चहियै!

—कैसा चाहिए?

—नौकर ऐसौ चाहिए, ना मांगै ना खाय।

चार पहर हाज़िर रहै, घर भी कभी न जाय।

Friday, May 23, 2008

बदले पुलिस बयान

चक्र सुदर्शन

बदले पुलिस बयान
हो कैसे विश्वास अब, सच क्या था श्रीमान,
दुहरे हत्याकांड में बदले पुलिस बयान।
बदले पुलिस बयान, मची है आपा धापी,
साक्ष्य मिटाती बेदर्दी वर्दी है पापी।
चक्र सुदर्शन कहे तरीका यही बैस्ट हो,
पुलिस कर्मियों का पहले नारको टैस्ट हो।


Thursday, May 22, 2008

डर-डर के मरो

चौं रे चम्पू!

--चौं रे चम्पू! तेरी बंडरफुल खोपड़ी में का चल रयौ ऐ रे? भौत दे ते गुम्म ऐ!

--खोपड़ी वंडरफुल नहीं है चचा, बवंडरफुल है। चीज़ें गड्डमड्ड हैं। समझ में नहीं आ रहा कुछ।

--का समझ में नांय़ आय रौ चम्पू?

--कि मर-मर के डरो या डर-डर के मरो। पहले डर फिर मर। आगे मर और पीछे डर हो तो डर किस बात का रह गया? ‘मरडर’ तो हो ही गया न! मरडर का सिरा पकड़ में आ नहीं रहा। शक के घेरे में मर भी है और डर भी है।

--चम्पू। शक कौ घेरा बड़ौ अदृस्य घेरा ऐ।

--शक धरती के दूसरे छोर तक जाता है। जितना बड़ा डर ह, उतना ही बड़ा घेरा। शक आगे-आगे भागता है, घेरा पीछे-पीछे दौड़ता है। पता नहीं शक कब घेरे से बाहर निकल जाता है और घेरे में दूसरा शक आ जाता है। किसने मारा? किसको मारा? नौकर ने नौकर को मारा? मालिक ने नौकर को मारा? ज़माने ने नौकर को मारा? मरा तो अपने नौ करों से काम करने वाला नौकर ही न! बच्ची मरी। क्यों मरी? क्या उसकी इज़्ज़त गई या घर वालों को लगा कि इज़्ज़त चली जाएगी, सो गई। चचा कहते हैं कि झगड़ की वजह होती हैं तीन-- जर, जोरू और ज़मीन।

--नौएडा में तौ बच्ची चली गई बिचारी। जोरू कहां बन पाई?

--ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे पर आजकल की बच्चियां भी बच्चियां कहां रह गई हैं? मोबाइल हो गई हैं। बतियाना हो गया है सुपर आसान। पहले मोहल्ले-पड़ोस के छोरे की एक झलक पाने के लिए कई-कई दिन इंतज़ार करना पड़ता था। मुलाक़ात होती थी साल छ: महीने में। किसी मेले-ठेले में। बात हुई भी तो कितनी— ‘कैसा है रे तू?’ –‘तू कैसी है? झुमका बड़ा अच्छा है तेरा।‘ –‘तेरी नेकर भी तो अच्छी है।‘ बस खत्म हो गई बात। अब माता-पिता ने दे दिए मोबाइल। करो प्यारे, घंटों बात करो।

--जे बता चम्पू कि जे छोरा-छोरी का बात करत होंगे?

--चचा देखो! बात करेंगे— ‘देख एक नई मॉल खुली है।‘ –‘वहां सीढ़ियां कितना ऊपर ले जाती हैं?’ –‘एक सीढ़ी तो वहां भी जाती है, जहां अक्सर कोई नहीं जाता।‘ –‘जहां बेसमेंट होता है?’ –‘हाँ, चल तो उस सीढ़ी पर उतरेंगे। बोल कब आ रही है?’ –‘मम्मी-डैडी जब क्लीनिक पर जाएंगे तब आऊंगी।‘ –‘अभी आ जा।‘ –‘अभी सीढ़ी कहां शुरू हुई होगी!‘ –‘अरे हम कर लेंगे न! मुझे मालूम है कि जैनरेटर कहां है।‘ –‘तो वहां शोर नहीं हो जाएगा?’ –‘अरे शोर हो जाएगा तो क्या? दुनिया से नहीं डरेगा, हम तो मुहब्बत करेगा।‘ –‘हे! देख तू मुझसे ऐसी बातें मत किया कर। मम्मी पापा को बता दूंगी।‘ –‘अच्छा! तेरे मम्मी-पापा तो मुहब्बत करते ही नहीं हैं जैसे।‘ –‘हां मैंने देखा था कल।‘ –‘क्या देखा था? बता न!‘ –‘मैं नहीं बता सकती।‘ बस इसी तरह के डॉयलॉग होते हैं चचा, और क्या। जब बात करने का मिले मौका, तो कैसा ड्राइंग रूम और कैसा चौका। बच्चे लोग चौका-छक्का लगाने की फिराक में रहते हैं। कुछ ऊंच-नीच हो जाए या ज़्यादा ही ऊंच क़िस्म की नीच हो जाए तो गुत्थी सुलझाना पुलिस के लिए भारी पड़ जाता है। विष्णु ने लड़की को चालीस बार फोन क्यों किया? छत पर किसके पंजों के निशान थे। सोचो कुछ लेकिन सच्चाई निकलेगी कुछ और..।

--तोए का पतौ कै सच्चाई का ऐ?

--चचा इस धरती पर कुछ भी ऐसा नहीं जिसे कहें अनहोनी। मेरे दिमाग में एक बात आती है कि दोनों की हत्या एक तरीके से हुई। हत्यारा डॉक्टरी औज़ारों का इस्तेमाल करना जानता है। पता चलेगा कि न तो दोषी बालिका और न दोषी नौकर। उनका दोष ये था कि उन्होंने कोई सच्चाई देख ली। मुक्तिबोध की लाइन है— ‘मैंने उन्हें नंगा देख लिया, इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।‘ पता नहीं बेचारों ने क्या देख लिया कि ज़िंदगी ने उन्हें फ़ाइनली देख लिया।

--चम्पू अगर मेरौ मरडर है जाऐ तौ सक के घेरा में कौन आयगौ?

--वैसे तो चचा तुम्हें मारेगा कौन? न तुम्हारे पास न जर न जोरू न ज़मीन। पर शक आएगा मेरे ऊपर। ज़रूर इसी चम्पू ने सुना-सुना के मार डाला है, इसलिए ख़बरदार, जो अपना मर्डर करवाया।

Saturday, May 10, 2008

जायज़ नाराज़ी

चक्र सुदर्शन
जायज़ नाराज़ी
बाजी पल्टी कोर्ट में, लौटे वेणु गुपाल,
एम हुआ पूरा, उधर, एम्स बजे घड़ियाल।
एम्स बजे घड़ियाल, मरीज़ों की क्या चिन्ता,
अहंकार का युद्ध, कराहें कोइ न गिन्ता।
चक्र सुदर्शन, जायज़ है उनकी नाराज़ी,
क्यों होने दी, अस्पताल में आतिशबाज़ी?
-अशोक चक्रधर

Tuesday, April 29, 2008

भज्जी की गांधीवादी संतई

चौं रे चम्पू! कोई हल्लेदार बात बता?

चचा गांधी के देश में लोग गांधीवादी सिद्धांतों को भूल गए आम आदमी गलत करे तो कोई बात नहीं अब तो संत लोग भी गलती करन लगे।

--खुलासा बताऔ, कौन से संत की बात है रई ऐ?

--श्रीसंत की। गाल पर एक थप्पड़ खाने के बाद दूसरा आगे कर देना चाहिए था। मार ले। पर चूक गया। गांधीवाद आहत हुआ। उससे बड़ा गांधीवादी तो हरभजन सिंह है। माना कि उसने थप्पड़ मारा पर वो ज़्यादा बड़ा गांधीवादी है। मैं तो कहूंगा कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म का अनुयायी।

--सो कैसे?

--चचा, वो क्षमा मांगना जानता है। जैसे ही उसे पता चलता है कि गलती हो गई। माफी मांग लेता है। गांधी जी ने ये नहीं कहा कि गलती मत करो, करो, जानबूझ कर मत करो। हो जाए तो चरण पकड़ लो। चचा हरभजन हरि का भजन करने वाला शांतिप्रिय प्राणी है। क्रोध तो उसका आभूषण है। ज़रा देर के लिए आता है और चला जाता है। माफी उसका औज़ार है।

--यानी के वाके पास हर बार गलती करिबे कौ लैसंस ऐ। बहुत खूब भईया। तौ माफी कब-कब मांगी वाने?

--दारू कम्पनी रॉयल स्टैग के एक विज्ञापन में भज्जी ने बाल खोल के फोटो खिंचवा लिया। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने विरोध जताया। कहा कि सिखों की भावनाएं आहत हो रही हैं। भज्जी बोला अपना पुत्तर मानते हो तो सीधे बताते कमेटी तक क्यों गए। पट्ठे ने माफी मांग ली।

--ठीक कियौ।

--गुरु चैपल के ख़िलाफ़ गांगुली के फेवर में कुछ ऐसी कह दी कि गुरु हो गए गरम। भज्जी पैंतरा बदल के नरम। माफ कर दो गुरु। बात खतम। फिर आस्ट्रेलिया में साइमंड्स को बिग मंकी बोल दिया। हालांकि ये गाली नहीं है, पर कंगारूओं को लग गई। भज्जी फौरन माफी मांगने को तैयार, पर मामला देश की इज्जत का था। हमारी टीम ने कहा, भज्जी माफी नहीं मांगेगा। कंगारू भी अड़ गए। तीन मैच के लिए पाबंदी लगा दी। माफी मांगने देते तो मामला दब जाता, पर बेचारे गांधीवादी की सौम्यता को सामने नहीं आने दिया। उल्टे उन्हीं को धमकी दे दी- साइंमड्स को निकालो, वरना हम वापस जाते हैं। कंगारूओं ने हथियार डाल दिए। पैसा तो विज्ञापनों के ज़रिए हिन्दुस्तान से ही आता है, सो लगाया बैन उठा लिया। चचा अगर याद हो तो गांधी जी ने भी साइमन कमीशन के समय ‘निकालो’ का नारा दिया था। इससे पता चलता है कि हमारा भज्जी तो गांधी जी से भी ज़्यादा बड़ा गांधीवादी है। उसने ऐसा कहा ही नहीं। अब हल्ला हो रहा है श्रीसंत के मामले का।

--जे सिरीसंत कहां के संत ऐं?

--काहे के संत हैं? रो दिए। कबड्डी में खो-खो में गुल्ली-डंडा में कितनी ही बार हम भी पिटे हैं। खेल के मैदान की मारा-मारी तो खेल का हिस्सा है। पर मीडिया अपना घिस्सा लगाए बिना थोड़े ही मानेगी। भज्जी ने संत से माफी मांग ली। संत ने भी आंसू पोंछ के कहा कि भज्जी मेरे ‘पा’ यानी बड़े भाई। बात हो जाती आई-जाई पर मीडिया ने नहीं पचाई। नौबत ये कि भज्जी पा फिर से बाहर हो सकते हैं। माफी नहीं है काफी। खेलते तुम ज़रूर हो लेकिन मैदान हमारा है। मार-पिटाई अगर कैमरा के सामने आई तो खेल में पड़ जाएगी खटाई।

--खेल में खटाई पडैगी कै खेल खटाई में पड़ जांगे?

--एक ही बात है चचा।

Friday, March 28, 2008

दूध का पानी और पानी का दूध



--चौं रे चम्पू! नास्ता-पानी है गयौ?
--हां चचा, नाश्‍ता-पानी हो गया।
--पानी तौ ठीक ऐ, नास्ता में का पायौ?
--चचा, तुम्‍हारी तरह जलेबी कचौड़ी तो दबा नहीं सकते। तुम तो इस उमर में भी चकाचक गुंजिया-पेड़े पचाते हो, अपन ठहरे नए ज़माने के अधेड़। बीमारियों के पुलिंदे। ये खाओ तो ये बीमारी वो खाओ तो वो बीमारी। पानी के अलावा थोड़ा सा दूध पिया, कटोरी भर अंकुरित चने, और बस तुम्‍हारे पास आ गए।
--तौ दूध पियौ और पानी पियौ! नास्ता में दूध कौ दूध कियौ और पानी कौ पानी! वाह राजा जानी!
--चचा दूध का दूध और पानी का पानी तो पाकिस्‍तान में हुआ है। अब बताओ, न्‍याय देने वालों को भी अगर तुम बंद कर दोगे तो इस राजसत्ता में कैसा जनतंत्र? तानाशाही इंसाफ से डरती है चचा! पर वाह रे गिलानी, तूने आते ही खुश कर दिए पाकिस्‍तानी।
--लल्ला, बात खुलासा करौ।
--चचा प्रधान मंत्री बनते ही यूसुफ रज़ा गिलानी ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी और साठ अन्य जजों को तत्‍काल आदेश से बरी करा दिया। इसको कहते हैं दूध का दूध और पानी का पानी।
--सब कहिबे की बात ऐ। दूध चौबीस घंटा में खराब है जायौ करै। पहलै ऐसौ होतौ ओ, भोर में कोई अपराध भयौ, सांझ ढले पंचायत बैठी। बताय दियौ कित्तौ दूध, कित्तौ पानी।
--क्या बात कह दी चचा! देर हो जाए तो दूध फट जाता है या जम जाता है। जनतंत्र की न्यायपालिका मठा से न्याय का मक्खन निकालती हैं। दूध का पानी कर देती हैं और पानी का दूध बना देती हैं। विलंब से मिला न्याय अन्याय के बराबर है। न्‍यायालयों में सालों तक मुकदमे घिसटते रहते हैं लेकिन इन्‍हें तो चार महीने ही हुए थे। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चौधरी साहब बाल्कनी से जनता को दर्शन दे रहे हैं। समर्थन के लिए धन्यवाद दे रहे हैं। अरे न्यायाधीश कभी जनता से मिलते हैं? अकेले रहते हैं। न्‍यायाधीश न धन्‍यवाद दे सकता है और न किसी का धन्‍यवाद ले सकता है। समर्थन के लिए धन्‍यवाद देगा तो फिर न्‍याय कैसे कर पाएगा। न्‍याय एकांत में हृदय से होता है और विचारक का काम करती है आत्‍मा। चचा, पास्कल ने कहा था कि बलरहित न्‍याय असमर्थ होता है और न्यायरहित बल अत्याचार होता है। क्‍या किया मुशर्रफ ने? अब मुशर्रफ मियां अपनी खैर मनाएं उनका दूध फटने वाला है।
--चम्पू! न्याय तौ जनता करै है। पाकिस्तान की जनता नै न्‍याय कर दियौ, अब न्यायाधीस कानून की लकीर पीटौ करें, वाते का?।
--चचा! न्‍याय बड़ी पेचीदा चीज़ है। मेरे नाना कहा करते थे कि तुम उसको क्‍या सज़ा दोगे जो ऊपर से देखने में तो ईमानदार है लेकिन मन का चोर है, तुम उसे क्‍या सज़ा दोगे, जो बाहर सिर्फ एक हत्‍या करके रोज़ अपनी आत्‍मा को मारता है। तुम उसे क्‍या सज़ा दोगे जिसके अपराध कम और पश्‍चाताप ज़्यादा हैं। चचा, कानून लकीर का फकीर है और लकीर न तो पानी पर टिकती है न दूध पर। कैसे करोगे दूध का दूध और पानी का पानी। कैसे करोगे दूध पानी के बीच में लकीर। जनता का समर्थन पाए हुए जज अब जीती हुई जनता का पक्ष लेंगे, न्याय का पक्ष न भी लें तो चलेगा। लो एक ताजा कवित्त सुन लो--
ओ रे मुश अभिमानी, तूने करी मनमानी,
अब याद कर नानी, तेरा सिर है दुनाली पे।
दांव पे है ज़िन्दगानी, बुश करे आनाकानी,
तेरी कुर्सी चूहेदानी, लात लगी तेरी थाली पे।
उठ चुका दाना-पानी, ख़त्म होगी सुल्तानी,
आरी जिसपे फिरानी, तू तो बैठा उस डाली पे।
वाह रे गिलानी, तेरा काम है तूफ़ानी
खुश हुए पाकिस्‍तानी, साठ जजों की बहाली पे।

Monday, March 10, 2008

औरों को भी बुद्धि आनी चाहिए

--चौं रे चंपू! जमाने में आजकल्ल अच्‍छे काम जादा है रए ऐं कै बुरे?
--चचा, काम तो अच्छे ही ज़्यादा होते हैं, पर नज़र में आने की बात है। अच्‍छे कामों पर लोगों की नज़र कम जाती है बुरे कामों पर ज़्यादा जाती है, इसलिए ऐसा लगता है कि बुरे काम ही ज़्यादा हो रहे होंगे। और चचा, बुरी चीज़ देखने में, बुरी बात सुनने में बड़ा मज़ा आता है। अच्‍छी बात एक कान में घुसकर दूसरे कान से निकल जाती है। बुरी बात कान में जाने के बाद किसी दूसरे के सामने मुंह से निकलती है। दूसरे के मुंह से तीसरे के कान में, तीसरे के मुंह से चौथे के कान में... एंड सो ऑन। बात चौथे से चार हज़ार चार सौ चौथे कान तक चली जाती है।
ग़ैरों की बुराई जो करे सामने तेरे,
तेरी भी बुराई वो सरेआम करेगा।
बुराई में बड़ा मज़ा आता है चचा। अच्‍छाई की चर्चा में क्‍या रक्खा है? बताओ किसकी बुराई करूं?
--छोड़ बुराई। कोई ऐसी अच्‍छी बात सुना, जाय सुनिबे में मज़ा आवै।
--चचा, दिल्ली में आर. के. पुरम के सैक्‍टर पाँच में एक पार्क है, उसका नाम रख दिया गया है— 'काका हाथरसी उद्यान', ये एक बढ़िया काम हुआ है।
--अरे जि तौ सच्ची भौत भड़िया काम भयौ।
--हां चचा, पार्क में जाओ। घुसते ही जब काले संगमरमर पर काका हाथरसी का नाम खुदा हुआ देखोगे तुम्‍हारे चेहरे पर मुस्‍कान खिल जाएगी। क्‍या जलवे हुआ करते थे काका हाथरसी के। जिधर से निकलते थे काई-सी फट जाती थी। दूर से देखते ही लोग चिल्लाने लगते थे-- वो देखो काका। देखो, वो जा रहे काका। बहुत सारे लोग काका को पहचानते थे। वो भी चचा उस ज़माने में जब टेलीविज़न नहीं आया था। आवाज़ रेडियो से पहचानते थे और पत्र-पत्रिकाओं में छपे फोटो से चेहरा। 'धर्मयुग' 'साप्‍ताहिक हिन्दुस्‍तान' जैसी पत्रिकाएं जनसंचार का सबसे बड़ा माध्‍यम होती थीं। आज एक चौखटा टी.वी. पर सौ बार भी आ जाए तब भी न पहचानें।
--मोऊऐ लै चल काऊ दिना वा उद्यान में।
--क्‍यों नहीं चचा। पर वहां भाँग घोटने का जुगाड़ नहीं होगा, सिलबट्टा नहीं मिलेगा तुमको। महानगर का पार्क है चचा।
--कबितन कौ नसा का कम होय। नांय पींगे भाँग। काका की कबिता सुनइयो और संग टहलियो।
--पार्क में एक नज़ारा देख कर डर मत जाना चचा। आजकल लाफ्टर क्‍लब खुल गए हैं। लोग झुंड के झुंड हंसते हैं और बावले से दिखाई देते हैं।
--अरे तौ हम उनैं देखि-देखि कै हंस लिंगे। ऐसौ नजारौ देखिबे कूं मिलै कै लोग बिनाई बात के हंस रए ऐं तौ जाते भड़िया हंसी और का बात पै आयगी रे? और काका के नाम कौ उद्यान! फिर तौ और जादा आयगी।
--बिलकुल ठीक चचा! होना ये चाहिए कि वहां के लोग हर दिन बारी-बारी से काका की कोई कविता सुनाएं और नकली हंसी हंसने की बजाय असली का आनन्द लें।
--पर जे भयौ कैसै? हमारे देस में तौ महात्‍मा गांधी पार्क, अंबेडकर पार्क और नेतान के नाम के पार्कन कौ चलन ऐ?
--चचा, ये बहुत ही अच्‍छा हुआ है। नाम रखने का काम सरकारों का होता है। सरकार में कोई एक आदमी भी साहित्यिक रुचि वाला हो और लग जाय इस काम के पीछे, तो बात बन जाती है। दिल्ली की एक विधायिका बरखा सिंह स्वयं कवयित्री हैं, लग गईं इस अभियान पर। अपने क्षेत्र की एक सड़क का नाम 'कैफ़ी आज़मी मार्ग' रखवा दिया और पार्क का नाम रखवा दिया 'काका हाथरसी उद्यान'। अगल-बगल के विधायकों को भी बुद्धि आनी चाहिए कि वे भारतेन्‍दु हरिश्चंद्र उद्यान, निराला उद्यान, हरिशंकर परसाई मार्ग, शरद जोशी उद्यान, रमई काका उद्यान, साहिर लुधियानवी मार्ग और ऐसे लोगों के नाम पर सड़कों और पार्कों के नाम रखवाएं जिनकी स्‍मृति से ही जीवन खिल उठे। हजारी प्रसाद द्विवेदी पार्क बने तो चित्त में हजारी गुलदस्‍ता खिल जाए और पार्क में हर ऋतु में बसंत रहे। दक्षिण भारत के राज-नेताओं ने इस दिशा में पहल की थी पर हिन्दी के साहित्यकारों को कौन पूछता है?--ठीक कही लल्‍ला! बरखा सिंह तक हमारौ असीस पहुंचाय दइयो।






Wednesday, January 23, 2008

भारत-रत्न कबीर को दो



भारत-रत्न कबीर को दो


--चौं रे चम्पू! दुनिया जहान की का खबर ऐ रे?
--ख़बर ये है चचा कि बाज़ार में अचानक भारत-रत्न के शेयर बहुत नीचे आ गए। बुरी तरह लुढ़क गए। ऐसी गिरावट अभी तक देखी नहीं गई। रिकार्ड गिरावट, कोई दो टके नहीं पूछ रहा इस शेयर को। दिल्ली की दल-दल दलाल-स्ट्रीट में मायूसी का माहौल है। इतना सस्ता हो गया शेयर कि चतुर लोग इस उम्मीद के साथ ख़रीदारी में लग गए, शायद आगे चल कर मंहगा बिके। चित्रकार हुसैन के साथ बाबा रामदेव भी लाइन में आ गए हैं। खरीद लो, खरीद लो। भारत-रत्न खरीदने का यही गोल्डन चांस है। लोकप्रियता का सिक्का चलाओ और भारत-रत्न पाओ। पांचजन्य अख़बार कहता है कि शहीद भगत सिंह को मरणोपरांत भारत-रत्न दिया जाए। अब अटल जी का नाम लेना बन्द कर दिया उन्होंने। जैसे ही देखा कि शेयर बाज़ार बहुत नीचे आ गया है तो सोचा कि अपने प्रोडक्ट की रक्षा करो। ऐसा नाम लाओ जो चल जाए। लाइन बहुत लम्बी होती जा रही है। चचा, बाइ द वे तुम क्यों नहीं ले लेते भारत-रत्न?
-- अरे चम्पू हमें भारत-रतन ते का लैनों-दैनों? सेरो-साइरी के सौकीन ऐं। लै दै कै अपने पास एक इज्जत ऐ, वाऊऐ सेअर बजार में दाव पै लगाय दैं, ऐसी मति नांय फिरी रे। मगन मन भांग घोटौ, आँख मूंद खटिया पै लोटौ। चकाचक पियौ, चकाचक जियौ।
-- अरे नहीं चचा! तुमने जो महान काम किए हैं इतिहास ने उनकी अनदेखी करी है। रामदेई का जापा हुआ तो आधी रात में उसे कंधे पर उठा कर अस्पताल कौन ले गया? हमारा चाचा। जब कबड्डी में भोलू की टाँग टूटी तो मौके पर पलस्तर किसने चढ़ाया? चाचा ने। जमुना में बाढ़ आई तो किसने दो दिन तक, अपनी जान जोखिम में डाल कर, घाट पर लगाया लोगों को? हमारे चाचा ने। चौरासी के दंगे में सरदार रतन सिंह की ट्यूब-टायर की दुकान किसने बचाई? हमारे चाचा ने। अपनी पैंशन के पैसे से गंगाराम का इलाज किसने कराया? स्कूल से भागे बच्चों की बगीची पे क्लास किसने लगाई। तुम्हें भारत-रत्न ज़रूर मिलना चाहिए, चचा।
-- चौं रे चम्पू! तैंनै तौ हमारे निरे कारनामे गिनाय दिए लल्ला। पर अबी तौ भौत काम कन्ने ऐं रे। भारत कौ कछू ऐसौ उद्धार होय कै न कोई बच्चा अनपढ़ रहै, न कोई बीमार। सब सुखी हों, सब सुन्दर हों। भारत-रतन में का धरौ ऐ? जे भारत ई रतन की तरियां चमकै, तब ऐ असली मजा चम्पू!
-- अरे परसों के सैंसैक्स जितने ऊंचे विचार और ऐसी बिन्दास सादगी। अब तो मेरा विश्वास प्रगाढ़ होता जा रहा है चचा कि तुम्हें तो भारतरत्न मिलना ही चाहिए। चचा, अपने चरण दिखाओ। मैं उन्हें फ़ौरन छूना चाहता हूं। बस इतना सा निवेदन मेरा भी मान लेना कि जब तुम्हें भारत-रत्न मिले तो अपने इस चम्पू को कम से कम पद्मश्री तो दिलवा ही देना। तुम्हारे इस चम्पू ने भी कम काम नहीं किए हैं। लगा हुआ है चालीस बरस से। कभी फिल्म बनाता है, कभी कविताएं लिखता है, कभी कम्प्यूटर के विकास पर काम करता है। चचा ध्यान रखोगे न?
-- अरे धत्त! जहां स्वारथ आयौ वहीं सब गलत। हमें नाएं चइयै भारत-रतन और चम्पू तौउऐ नाएं लैन दिंगे पदमसिरी। बजार में सेयर के भाव गिर गए तू मत गिर। भगत सिंह के तांई शहीद ते बड़ी कोई उपाधि नाएं है सकै। मरणोपरांत दैनौ ऐ तौ भारतरतन देऔ कबीरदास कूं जानैं भेद-भाव भुलाय कै इंसान की खोपड़ी पै अक्कल कौ ढक्कन लगायौ। जो कुप्रबृत्ति कूं कोसै वाऐ देओ। जो बुद्धी कूं परोसै वाऐ देओ। जो माल ढकोसै वाते का मतलब!
-- चचा ये आइडिया भी ख़ूब लाए तुम। बाज़ार में उछालने के लिए ये नाम भी चमकदार है। कबीर का नाम, वाट ऐन आइडिया सर जी।
-- पर चम्पू कैसौ लगैगौ— भारत-रतन कबीर। वाके नाम के अगाड़ी तौ ‘अनपढ़’ लगायौ करें-- अनपढ़ कबीर। जो बात अनपढ़ कबीर में हतै, सो भारत-रतन कबीर में कहां ऐ रे। भारत-रतन कबीर ते भौत ऊंचौ ऐ-- अनपढ़ कबीर। तेरे बाप नैं चार लाइन सुनाई हतीं। रोज तू सुनावै, आज मोते सुन लै चम्पू--
अनपढ़ कबीर के बोल अभी भी ज़िंदा हैं
हर पढ़े-बे-पढ़े पर उनका जादू समान,
थे शांति निकेतन में पढ़ते उनको रवीन्द्र
खेतों में उनका अर्थ समझता है किसान।

(23-01-08 को राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

Monday, January 21, 2008

गोविन्दा का थप्पड़


कुर्सी दर्शक से हिली, थप्पड़ मारा एक,
टीवी ने तकनीक से, थप्पड़ किए अनेक।
थप्पड़ किए अनेक, तैश में थे गोविन्दा,
राजनीति में खेल चल पड़ा निन्दा-निन्दा।
चक्र सुदर्शन, अगर रोकनी मातमपुर्सी,
क्षमा मांग ले, वरना हिल जाएगी कुर्सी।

Tuesday, January 15, 2008

खुंदक का कांटा




माया यू. पी. की बनीं, दावे से सी.एम.,
प्रबल कामना अब जगी, बन जाएं पी.एम.
बन जाएं पी. एम., काम ना होने वाला,
यदि खुंदक का कांटा तुमने नहीं निकाला।
चक्र सुदर्शन देखे, वो ही पी.एम. आया,
जिसने सदा मुलायम बन फैलाई माया।

Tuesday, November 27, 2007

डॉ. हरिवंश राय बच्चन के जन्मदिन पर











आज हुए सौ बरस,
आज के दिन पाई जीवन हाला,
जितनी अधिक पुरानी होती
उतना करती मतवाला।
सदा छलक़ते जाम रहेंगे
नाम रहेगा बच्चन का,
सदा रहेंगे पीने वाले
सदा रहेगी मधुशाला।
— अशोक चक्रधर

Thursday, November 01, 2007

8वें विश्व हिन्दी सम्मेलन की सम्पूर्ण जानकारी – ‘सम्मेलन समाचार समग्र’


प्यारे मित्रो,
इस वर्ष तेरह से पन्द्रह जुलाई न्यूयार्क में आठवां विश्व हिन्दी सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन की पूरी झांकी इस 'सम्मेलन समाचार समग्र' में है। नीचे दिए गए लिंक पर अपलोडिड पी.डी.एफ. फ़ाइल से सम्मेलन के बारे में लगभग सारी जानकारियां हासिल कीजिए। लिंक को क्लिक करें तथा 'सेव टार्गेट ऐज़' या 'सेव लिंक ऐज़' करके तो फाइल को डाउनलोड भी कर सकते हैं।
लवस्कार
अशोक चक्रधर

Monday, September 03, 2007

कारे कान्हा प्यारे क्यूं?

नैन हुए जलधारे क्यूं
कोई किसी को मारे क्यूं?








तुम इतने बेचारे क्यूं?
उनके वारे न्यारे क्यूं?

हम तो ऐसे कभी न थे
बदल गए हम सारे क्यूं?

पत्ती से पूछे चिड़िया
पेड़ की खातिर आरे क्यूं?

जिनके रहते हिम्मत थी,
वे ही हिम्मत हारे क्यूं?

दिल ही जिनके बहरे हैं
दिल से उन्हें पुकारें क्यूं?

उनके लिए महल कोठी
तुझको ईंट और गारे क्यूं?

गंगा शीश झुकाय नहीं
सागर चरण पखारे क्यूं?


सहने की भी सीमा है
मिलते नहीं सहारे क्यूं?

आंखों के मीठे सपने
बहकर हो गए खारे क्यूं?

रात में बादल धुंध धुआं
दिन में दिखते तारे क्यूं?

सन्नाटों से गूंज रहे
गांव गली गलियारे क्यूं?

गोरी से दरपन पूछे
कारे कान्हा प्यारे क्यूं?

Sunday, August 26, 2007

हृदयहीन स्वाहवलंबन और अविवेकी स्वाभिमान

आखिरी-आखिरी क्षण तक आफरीं-आफरीं होता रहा। मरहूम नुसरत फतह अली खान साहेब के गाने की तरह। बड़ी देर तक संगीत का प्रील्यूड, फिर लम्बे-लम्बे आलाप, उसके बाद सरगम के बोल, फिर आफरीं-आफरीं वे स्वयं गाएंगे, फिर गाएगी उनकी मंडली-- आफरीं-आफरीं, आफरीं-आफरीं। अंतरा कब आएगा खान साहब? यों आप अनंत काल तक आफरीं-आफरीं करते रहिए, सुरीला लगेगा, पर अंतरे पर आइए, अंतराल कम रह गया है।

तेरह जुलाई से सम्मेलन होना है। अभी आलाप ही चल रहा है। कौन जाएगा? कौन नहीं जा पाएगा। कौन मौन प्रतीक्षा में रत है? कौन महा प्रकार से रत है। किसमें नामों की सरगम में हेर-फेर करने-कराने की महारत है। वीज़ा कैसे लगेगा? टिकिट कहां से आएगी? आफरीं-आफरीं। आरोह के साथ एक अवरोह आया। राष्ट्रपति का चुनाव होना है। कोई भी मंत्री या सांसद अमरीका नहीं जा सकता। बिना नेताओं के सम्मेलन में क्या रौनक रहेगी। आफरीं-आफरीं। नेपाल, तिब्‍बत, भूटान, मॉरीशस जाना होता तो ऐसे झमेले न आते। जाना अमरीका है। किसका सफेद पासपोर्ट किसका नीला। अमरीका देश है नखरीला। जिनका वीज़ा नहीं लगा उनके लिए अखरीला। इसमें किसका दोष? ये तो ऊपर वाला जाने या ऊपर वाले जानें, लेकिन जैसी पूर्व तैयारियां मैंने पहले सम्‍मेलनों में देखीं वैसी इस बार दिख नहीं रही थीं। हालांकि यह भी सच है कि सम्‍मेलन प्रारंभ होने के बाद जैसी अफरा-तफरियां दूसरी जगह देखीं वैसी यहां नहीं दिखीं। पूर्व तैयारियों में कमी जरूर नज़र आई हो लेकिन सम्‍मेलन के दौरान अपूर्व तैयारियां थीं और तीन दिन तक सारी चीज़ें कायदे से सम्‍पन्‍न हुईं।

मुझे निकालना है ‘सम्‍मेलन समाचार’ हर दिन वहां की गतिविधियों का ब्‍यौरा देने वाला एक सोलह पृष्‍ठीय रंगीन समाचार-पत्र। उसी दिन के समाचार, उसी दिन। ‘सांध्‍य टाइम्‍स’ की तरह। तकनीकी सुविधाएं आने के बाद ऐसा काम करना अब कोई चमत्‍कार नहीं रह गया है। डिजिटल कैमरा हो, दो-तीन कम्प्यूटर और साथ में काम करने वाले दो-तीन निष्णात साथी हों, तो हो सकता है। लेकिन मेरे साथ विडंबना यह थी कि मेरे साथ काम करने वाले जो दो-तीन थे, उनका 10 जुलाई तक वीज़ा ही नहीं लगा था, मामला अधर में था। मधु गोस्‍वामी जी से कहा तो नहीं, लेकिन मैंने सोच रखा था कि अगर मेरे सहयोगियों को वीज़ा न मिला तो हाथ खड़े कर दूंगा। क्‍या फरक पड़ जाएगा अगर ‘सम्‍मेलन समाचार’ न निकला। मैं हर सत्र में शिरकत करूंगा। इस तटस्‍थ भाव से अपने साथियों को छोड़कर, ‘सम्मेलन समाचार’ के लिए सामग्री संकलन के उद्देश्य से दस तारीख को अकेला अमरीका के लिए निकल लिया। शेष लोग ग्यारह और बारह को आने वाले थे।
एअर इंडिया की उस फ्लाइट में सम्‍मेलन में भाग लेने वाले इक्‍का-दुक्‍का ही लोग थे। किसी सरकारी उपक्रम की ओर से भेजे गए होंगे। टीवी के कारण वे मुझे जानते थे, मेरा उनसे विशेष परिचय नहीं था। परिचित थीं तो श्रीमती मधु गोस्‍वामी। उनकी टिकिट बिज़नेस क्‍लास की थी, अपनी इकोनॉमी क्‍लास की। उन्होंने अपनी चिर परिचित शालीनता में पहले ही कहा था— ‘मेरी सीट पर आप चले जाइएगा अशोक जी, मैं आपकी सीट पर जाकर सो जाऊंगी।‘ मैंने उनकी सदाशयता के लिए धन्यवाद दिया पर भला उनका प्रस्ताव मान कैसे सकता था। वे बिज़नेस क्‍लास में चली गईं और स्‍थायी समिति के इस अस्‍थायी सदस्‍य को इकोनॉमी क्‍लास में अकेले बैठना पड़ा। याद आए पुराने सम्‍मेलन। लंदन वाले छठे सम्मेलन में जाते हुए जहाज की कॉकपिट से एक कविसम्मेलन संचालित किया था। सातवें सम्मेलन में सूरीनाम ले जाने वाला पूरा जहाज प्रतिभागियों से भरा हुआ था और हवाई जहाज में ही ‘सम्‍मेलन समाचार’ की आधी से ज्‍यादा सामग्री तैयार हो गई थी। हंसी-ठिठोली, इस सीट से उस सीट पर जाना, उस सीट से इस सीट पर किसी को बुलाना। साक्षात्‍कार लेना, फोटो खींचना। इस बार बैठे हैं मायूस और अकेले बैठे पी रहे हैं संतरे का जूस।

अमरीका में जेएफके एअरपोर्ट पर इंडियन कांसुलेट की ओर से लेने आए मिस्‍टर बैरी (परिवर्तित नाम)। गाड़ी मधु जी के लिए आई थी और मैं सौभाग्‍यशाली था कि मुझे उनके साथ होटल तक आने का मौका मिला। जो अन्य दो-तीन लोग होटल तक जाने के लिए वहां थे, उनके लिए कोई गाड़ी नहीं थी। पता नहीं किस तरह अपने आप पहुंचे होंगे। बैरी साहब एक विशुद्ध सरकारी कर्मचारी थे जो अपने अधिकारी को समुचित सम्‍मान देना जानते थे। मधु जी एक तो लम्बी हवाई-यात्रा के कारण अतिशय थकी हुई थीं, दूसरे बैरी साहब की अतिशय विनम्रता से थोड़े संकोच में थीं, मेरा कोई परिचय नहीं करा पाईं। बैरी साहब ने समझा ये कोई ख़ामखां किस्म का लप्पूझनझन है जो हमारी ऑफिसर की भलमनसाहत का नाजायज़ फायदा उठा रहा है। हवाई अड्डे से लेकर होटल तक मैं बैरी साहब की निगाहों से बरसती हिकारत का शिकार बैठा रहा। मैंने परवाह नहीं की। मुझे चिंता थी मधु जी की जो काफी अस्वस्थ दिख रही थीं।

होटल पेंसिल्वेनिया में पहुंचे। मेरी कल्‍पना थी कि वहां सम्मेलन के बैनर लगे होंगे, अमरीका में हिंदी देखने को मिलेगी, किसी एक कोने में कोई एक प्रतिभागी सहायता केन्द्र होगा जहां दूतावास के और भारतीय विद्या भवन के लोग मिलेंगे जो गले मिलेंगे। जिनके चेहरों की मुस्कानें कहेंगी-- आओ आओ हिंदी के उन्‍नायको, आओ। अमरीका की धरती पर होने वाले हिन्दी सम्मेलन में स्वागत है तुम्हारा। फिर हमें बिना किसी प्रतीक्षा के होटल के कमरे की चाबी थमा दी जाएगी, हमारा सामान कोई समर्पित कार्यकर्ता ऊपर ले जाने में मदद करेगा। लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ। मधु जी की तबीयत हवाई जहाज में ही ख़राब थी। होटल की लॉबी में बेचारी सिर झुकाए बैठ गईं। बैरी साहब होटल रिसेप्शन की लाइन में लगे, मधु जी का नाम होटल के रिकॉर्ड्स में था, कमरा मिल गया। अपना नाम ही नहीं था।

शायद ये बताया न जा सका हो कि मैं भी इसी उड़ान से आऊंगा। प्रतिभागियों को ग्‍यारह और बारह तारीख को आना था। बहरहाल, बैरी साहब लगे बड़बडा़ने। यह एक नया संकट आया। वे शायद समझते थे कि ये हमारी ऑफिसर के साथ जोंक सा चिपका हुआ है, होटल तक भी आ गया है, बाकी जहां इसको जाना होगा, इसका ठिकाना होगा, चला जाएगा। जब मधु जी से बैरी साहब को पता चला कि मुझे भी इसी होटल में ठहरना है और उन्होंने पाया कि वहां मेरा नाम कहीं नहीं है और अब मुझे कमरा दिलाने के लिए उन्हें कांसुलेट फोन करना पड़ेगा, फैक्‍स मंगाना पड़ेगा या ई-मेल कराना पड़ेगा और तब तक पता नहीं कितनी लाइनों में लगना पड़ेगा तो हुज़ूर की बत्ती बुझ गई। शानदार बात ये कि वे अपना आवेश छिपा भी नहीं रहे थे— ‘मैं तो फायनेंस का आदमी हूं। आज कहां फंस गया? ये मेरा काम नहीं है।‘ सरकारी कर्मचारी आम तौर से दफ्तर का समय होने के बाद एक मिनट भी रुकने में जितना विह्वल हो जाता है उससे दस गुना विह्वल हो गए बैरी साहब। मैं भी उनको बैरी नज़र आने लगा। पर वे तो मुझे अपनी नैया की अकेली पतवार नज़र आ रहे थे। भैया मेरे! पेंसिल्वेनिया नामक नैया तक ले आया है, तो पार भी लगा दे।

डेढ़-दो घंटे हमें लॉबी में बैठना पड़ा होगा। मधु जी की शालीनता यह कि वे बहुत समय तक बैठी रहीं। कमरे की चाबी पाने के बाद भी ऊपर नहीं गईं। देर अधिक होने लगी तो बोलीं—‘आइए अशोक जी सामान मेरे कमरे में रख दीजिए।‘ फिर कुछ और लोग भी मिल गए थे, जो आई सी सी आर और मंत्रालय की ओर से हमसे पहले ही वहां आए हुए थे। उन्‍हें प्रदर्शनियां सजानी थीं। आई सी सी आर के पदम तलवार और अजय गुप्‍ता, मंत्रालय के विनोद, उदय और मधु सेठी। बैरी साहब लाइन में लगे हुए थे। ज़ाहिर है मुझे कोस रहे होंगे। बेचारे! पर सच कहूं, मुझे उनसे सहानुभूति नहीं हो रही थी। वे अपनी निगाहों, आहों और कराहों से मुझे बहुत सता चुके थे। जो हो, मधु जी के कमरे में रखा सामान और इधर-उधर कमरों में शरण लेते हुए कुछ घंटे बिताए। मैं भूल चुका था कि बैरी साहब लाइन में लगे हैं मेरे लिए। याद आते ही मैं पंद्रहवीं मंज़िल से नीचे आया लॉबी में। बैरी साहब कमरे की चाबी लिए हुए मुझे ढूंढ रहे से। देखते ही बरस पड़े। वे आप से तुम तक आ चुके थे— ‘कहां थे? तुम्हें तलाशते हुए एक घंटा हो गया। कमाल है। किस तरह तुम्हारा काम कराया है, है कोई अंदाज़ा? रात भर लॉबी में पड़े रहते। ऑफिस में सबकी छुट्टी हो चुकी है और मैं यहां अटका हुआ हूं। ग़लती हो गई जो मैंने कह दिया एअरपोर्ट चला जाऊंगा। मैं फायनैंस का आदमी हूं, मुझे क्या मतलब इन सारे कामों से? ये पकड़ो कमरे की चाबी’। मैं अवाक उन्हें सुनता रहा। कहता भी तो ‘शुक्रिया’ के अलावा क्या कहता। वहां से निकल कर भी वे मुझे गालियां देते गए होंगे। मेरे कारण वे अटक गए थे, सम्‍मेलन में लगभग अंत तक अगर कोई व्‍यक्ति मुझसे नाराज, रूठा और टूटा नजर आया तो वे थे मियां बैरी। अल्लाह करें कि वो उन्‍हें इतनी शक्ति हासिल हो कि मेरे प्रति उनके मन में जो क्रोध आया होगा, उससे उन्‍हें निजात मिले। एक दिन तो सभी को ऊपर जाना है, मैं भी जाऊंगा, वे भी जाएंगे। जब वे ऊपर जाएं तो सुकून से जाएं।

अगले दिन ग्‍यारह तारीख को निकले मुआयना करने। भारतीय विद्या भवन में जयरामन जी के नेतृत्‍व में लगे हुए थे पांच-लोग, डिब्‍बों से निकाल रहे थे स्मारिकाएं। हमने खींच डालीं फोटो। अनूप भार्गव आ गए। वे एफटीआई के प्रांगण में ले गए जहां सब कुछ होना था। हेमंत दरबारी, पदम तलवार, बालेन्‍दु दाधीच और अजय गुप्ता स्थानीय लोगों के साथ प्रदर्शनियों की तैयारियों में लगे थे। केटी मर्फी एम्फी थिएटर देखा, हैफ्ट हॉल भी देखा। बड़े-बड़े सभागार, खाली-खाली कुर्सियां। मैं कल्‍पना करने लगा कि जब ये कुर्सियां हिन्दी-प्रेमियों से भरी होंगी तो कितना भव्‍य लगेगा। हिंदी पर चर्चाएं होंगी। इतने बड़े सभागारों में सेमिनार तो भारत में भी नहीं होते। चर्चाओं के नाम पर आप सौ-डेढ़ सौ लोग इकट्ठा कर लीजिए, बहुत बड़ी बात है। इतने सारे लोग शैक्षिक सत्र में चर्चाएं सुनेंगे एक अलग तरह की अनुभूति होगी।

फैशन इंस्‍टीट्यूट से पेंसिल्वेनिया होटल मात्र तीन मिनट का रास्‍ता है और दो बार फुटपाथ पार करना होता है। पेंसिल्वेनिया, मुख्य सड़कों में से एक सड़क पर, मुख्‍य होटलों में से एक होटल। चौबीस घंटे की चहल-पहल, चारों ओर लाइट्स, बड़े-बड़े पोस्‍टर्स, इलैक्ट्रॉनिक होर्डिंग्स। सड़क पर वही लोग बतियाते दिखते थे जो प्रेमी युगल के रूप में होते थे, अन्‍यथा किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। तरह-तरह के चेहरे। गोरे, सांवले, काले, भूरे, गोल, लम्बे, चपटे, फूले, पिचके चेहरे। अगर इन सारे लोगों को किसी निर्जन भूमि पर खड़ा करके पूछें कि ये किस देश के नागरिक हैं तो कोई नहीं बता सकता कि ये किस देश के हैं। क्‍योंकि अमरीका में हर देश के लोग हैं।

एक बात और आपको बताना चाहता हूं जिस समय बैरी साहब लाइन में लगे थे उस समय मैं बालेन्दू दाधीच के साथ थोड़ी देर के लिए बाहर भी आया था। फोटोग्राफी के इरादे से। कुछ चित्र मैंने उनके खींचे तो कुछ उन्होंने मेरे। कुछ हम दोनों ने चारो तरफ के। एक दृश्य जिसने मुझे कुछ सोचने को बाध्‍य किया वो था पेंसिल्वेनिया होटल से तीन-चार इमारत आगे कोने के एक भवन पर नीली निओन लाइट्स में फ्यूज़ टीवी लिखा था। ये तो मैं नहीं जानता कि उस भवन के अंदर क्‍या था। रेस्तराँ हो, बार हो या संपूर्ण फ्यूज़ टीवी का ही कार्यालय हो, फ्यूज़ के मामले में कन्फ्यूज हूं, पर मैंने देखा कि उसके बाहर कभी-कभी एक कैमरा मैन अपने सहायक के साथ बैठा रहता था जो आते-जाते लोगों का साक्षात्कार लेता था। कभी कुछ गिटार-वादक वहां गाते-बजाते थे और आने जाने वालों को लुभाते रहते थे। पर आने जाने वालों को लुभाने वाले वे वादक नहीं थे, लाइट्स थीं जो फुटपाथ पर तैर रही थी। ‘फ्यूज़’ लिखा हुआ ऊपर दीवार से आता था और फुटपाथ पर एक आयाताकार यात्रा करता हुआ फिर ऊपर चला जाता था। फुटपाथ पर चलने वाले उस चलते फिरते ‘फ्यूज़ टीवी’ पर पैर रखकर आगे निकल जाते थे। विज्ञापन की टैक्स्ट बदलती रहती थी। यही तो तकनीकों का चमत्‍कार है।

हमने अपने देश में मुगल-ए-आजम में एक शीशमहल देखा। शेरो-शायरी में शीशे के मकानों का ज़िक्र सुना। शीशे लगे होते थे छत में या दीवार में। धरती पर शीशे नृत्‍यांगना की परीक्षा लेने के लिए तोड़ कर डाले जाते थे। जब हमारे यहां रंगीन फिल्‍में आना शुरू हुईं, तो फ्लोर के नीचे से भी लाइट्स दिखीं। देखकर हैरानी होती थी कि अरे कैसा कांच है जो डांस करने से टूटता ही नहीं। अब तो छोड़े-बड़े समारोहों में फैंसी लाइट्स और डीजे के कार्यक्रमों में ऐसे छोटे-छोटे फ्लोर बनाए जाने लगे हैं, जिनमें नीचे लाइट जलती हैं। पर यहां तो फुटपाथ पर वर्ण तैर रहे थे, लिखावट तैर रही थी, कंप्‍यूटर की कमांड से कोई भी टैक्स्ट फुटपाथ पर तैराई जा सकती थी। मैं सोचने लगा कि अगर हिंदी में कुछ लिखा होता तो कितना अच्‍छा होता। हिंदी नीचे से ऊपर जाती, ऊपर से नीचे आती, लेकिन फिर सोचा अगर हिंदी में ‘हिंदी’ लिखा होता तो क्‍या मैं फुटपाथ पर उसके ऊपर पैर रखकर जा सकता था? जैसे कि फुटपाथ पर सभी लोग ‘फ्यूज़ टीवी’ पर पैर रखकर जा रहे थे। नहीं, नहीं जा सकता था। मैं बचाकर चलता, मैं ‘हिंदी’ पर पैर नहीं रख सकता था। उसे दीवार पर चढ़ते हुए घंटों देख सकता था।

पेंसिल्वेनिया होटल आने तक, जिसमें कि केवल सौ मीटर की दूरी थी, मैंने सोचा कि हिंदी के मामले में हमारे दृष्टिकोण इसी प्रकार के हैं। या तो हम इसको इतना नीचा करके देखते हैं कि फुटपाथ पर पैरों तले आ जाए या उसे इतना ऊंचा चढ़ा देते हैं कि गर्दन ऊंची करनी पड़े और वह आपकी पकड़ में ही न आए। दो अतिवादी छोरों में जीते हैं हमारा लोग। हिंदी सम्‍मेलन भी इन दो अतिवादों का शिकार रहा। मुझे लगा कि बहुत सारे लोग वहां ऐसे थे जो आए तो हिंदी के लिए थे पर शायद उसे फुटपाथ की भाषा से ज्‍यादा नहीं मानते, दूसरे वे लोग जो उसे महानताओं की ऊंचाइयों में और अकल्‍पनीय क्षमताओं के साथ देखते हैं।

पेंसिल्वेनिया होटल आ गया। अब नई खेप आई है भारत से। हाय-तौबा। बुकिंग के बावजूद कमरे नहीं मिल रहे, व्‍यवस्‍था देखने वाला कोई नहीं। वहां भारतीय विद्या भवन और कांसुलेट के लोगों को होना चाहिए था। थे भी। रहे भी, लेकिन सामूहिक आक्रामकता से घबरा किसी कोने में या होटल के पोर्च में निरपेक्ष, निर्विकार। इतने लोगों को एक साथ कैसे संभालते! मैं जिन एक दो से परिचित था उनसे बतियाने लगा।

-- कुछ तो व्‍यवस्‍था हो ही सकती थी यहां। आप एक बैनर ही लगवा देते। अपनी भाषा में। एक हैल्प-डैस्क होती। अपने लोगों से अपनी भाषा में बात करते। अगर कहा जाता तीन घंटे प्रतीक्षा करनी है तो करते। किसी को कुछ भी नहीं मालूम है। सहायता क्‍यों नहीं की जा रही?

-- सब को सब कुछ मालूम है। अशोक जी ये अमरीका है। यहां एक तो बैनर आदि का चलन नहीं है, दूसरे लॉबी में जो रिसेप्शन है, वही हैल्प-डैस्क है। जब आपके बारे में सारी जानकारियां यहां दी जा चुकी हैं तो प्रतीक्षा कीजिए। लाइन में लगिए। यहां लाइन में लगने का धैर्य सीखना होगा। यहां एक स्‍वावलंबन होता है अशोक जी, व्‍यक्ति अपने आप सब कुछ करता है, बैसाखियों की आवश्‍यकता नहीं होती यहां।
-- दोस्‍त ये बैसाखियों का मामला नहीं है। ये तो आवभगत का मामला है। हिंदी के इतने विद्वान आए हैं। ये अपने देश के सबसे स्‍वाभिमानी लोगों में से हैं। इनकी आवभगत, मेजबानी में कमी नहीं आनी चाहिए।

-- स्‍वाभिमान तो है अशोक जी, लेकिन अविवेकी स्‍वाभिमान है। विवेक कहता है कि आप इक्कीसवीं सदी के नागरिक हैं। आपके लिए तमाम सारी सुविधाएं मुहैया की गई हैं। जब आप कमरे में जाएंगे तो आपको आनंद आएगा। बहुत अच्‍छे कमरे यहां बुक गए गए हैं। सेटल होते होते थोड़ा समय तो लगेगा।
मैं सामने थे दो शब्‍द-युग्‍म। एक ‘हृदयहीन स्‍वावलंबन’ और दूसरा ‘अविवेकी स्‍वाभिमान’। बारह की रात तक सब कुछ ठीक हो गया। सबके सींग कहीं न कहीं समा गए। तेरह की सुबह संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के सभागार में जाने के लिए सभी मुस्‍कानों से भरपूर, बेफिक्र, कंधे पर थैला लटकाए हुए।

उसके बाद क्‍या हुआ, हुजूर इसके लिए आपको पढ़ना पड़ेगा ‘सम्‍मेलन समाचार समग्र’। जाते-जाते एक बात और बता दूं। जो सज्जन एअरपोर्ट पर लेने आए थे, यानी अपने बैरी साहब, वे तीसरे दिन स्थायी समिति के सदस्यों को दैनिक भत्ते का लिफ़ाफ़ा बांट रहे थे। मेरे पास आए। बड़ी मुहब्बत से बोले— ‘ये लीजिए अशोक साहब! बड़ी मेहनत कर रहे हैं। लिफ़ाफ़ा थामिए और दस्तखत कीजिए।‘ मैंने कहा— ‘शुक्रिया ज़ुबैरी (अपरिवर्तित नाम) साहब! बहुत-बहुत धन्‍यवाद’!

Friday, August 03, 2007

जंगल-गाथा: पार्ट-वन



एक नन्हा मेमना
और उसकी मां बकरी,
जा रहे थे जंगल में
राह थी संकरी।
अचानक
सामने से
आ गया एक शेर,
लेकिन अब तक तो
हो चुकी थी बहुत देर।
भागने का नहीं था
कोई भी रस्ता,
बकरी और मेमने की
हालत ख़स्ता।
उधर शेर के कदम
धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कांपें।
अब तो शेर आ गया
एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-तैसे
बच्चे को थामने।
छिटक कर बोला
बकरी का बच्चा-
शेर अंकल!
क्या तुम हमें खा जाओगे
एकदम कच्चा
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया-
हे बकरी कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
चिरायु भव!
दीर्घायु भव!
कर कलरव!
हो उत्सव!
साबुत रहें तेरे सब अवयव।
आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर
कि अब नहीं होगा कोई अंधेर।
उछलो, कूदो, नाचो
और जियो हंसते-हंसते
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर
कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
बेटा ताजुब है,
भला ये शेर किसी पर
रहम खाने वाला है,
लगता है जंगल में
चुनाव आने वाला है।