Wednesday, September 24, 2008

मुहब्बत के सीमेंट की सड़क

--चौं रे चम्पू! जे तेरे हाथ में कागज कैसे ऐं रे? कोई कबता लिख मारी का?
--चचा! इंश्योरैंस के काग़ज़ हैं। कल एक बच्चा मेरी गाड़ी का शीशा फोड़ गया। पार्किंग में खड़ी थी। बड़ी गाड़ी है। शीशा भी कई हज़ार का आएगा। अब ठीक तो करानी पड़ेगी।
--किरकिट खेल रए हुंगे।
--नहीं चचा! मोटा पत्थर मारा। पिछला तो चकनाचूर हुआ, अगला भी दरक गया। दो सौ चौदह वालों का बिगड़ैल बच्चा है।
--तोय कैसै मालुम कै वाई नै तोड़ौ ओ, तेरे सामनै तोड़ौ का?
--प्रैस वाली ने इस शर्त पर बताया कि मैं उसका नाम नहीं लूंगा। बच्चे की मां उसे धमका गई थी, ख़बरदार जो तूने उनको बताया कि हमारे बच्चे ने तोड़ा है। अब मेरी मुसीबत देखिए। अगर मैं इंश्योरैंस वालों को बताता हूं कि खड़ी गाड़ी में बच्चे ने पत्थर मार दिया तो वो पैसे देने से रहे। जानबूझ कर तोड़ा गया शीशा, वो क्लेम क्यों मानेंगे? झूठ बोलना पड़ेगा कि ऐक्सीडेण्ट हुआ। दो सौ चौदह नंबर में जाता हूं तो वे भी क्यों मानेंगे और मान गए तो क्या दे देंगे। धोबन की भी ख़ैर नहीं। उसकी मेज़ फेंक दी जाएगी, टंडीला उखाड़ दिया जाएगा। बड़ा धर्म-संकट है चचा।
--आगै बोल, चुप्प चौं है गयौ? धरम ते ई तौ संकट आंमैं। तोय जे नायं पतौ!
--क्या बात कह दी चचा! मैं भी सोच रहा था कि बच्चे जब गड़बड़ कर देते हैं तो जिस तरह मां-बाप उनकी रक्षा में सामने आ जाते हैं उसी तरह आतंकवादी बन चुके बच्चों की रक्षा में समुदाय के कुछ लोग आ जाते हैं। हमारे बच्चे ऐसा नहीं कर सकते। अरे, मान जाओ भैया कि उसने किया है। तुम्हारे सारे बच्चे ऐसे नहीं हैं। तुम भी ऐसे नहीं हो। कोई एक बच्चा है ख़ुराफ़ाती, तो उसे बचाने की कोशिश मत करो। उसे अगर दंड नहीं मिलेगा तो वह और शीशे तोड़ेगा। पहले मुझे क्लेम मिल जाए चचा, फिर जाऊंगा दो सौ चौदह वालों के पास।
--अब तू अपनी गाड़ी की बातन्नै छोड़, वोई बात बता जो बताय रह्यौ का ओ। वा बात में दम ऐ।
--चचा जामिआ मिल्लिआ एक ऐसी संस्था है जिसका जन्म सन उन्नीस सौ बीस में असहयोग और ख़िलाफ़त आन्दोलन के दौरान गांधी जी की प्रेरणा से अलीगढ़ में टैंटों में हुआ था। बाद में दिल्ली के करोलबाग़ इलाके में 13, बीडनपुरा की एक पक्की इमारत में आ गई। सन उन्नीस सौ इकत्तीस में ओखला में इसकी संगे-बुनियाद अब्दुल अजीज़ नाम के एक बच्चे के हाथों रखवाई गई। और चचा आपको हैरानी होगी कि आज जो सड़क मथुरा रोड से ओखला और बटला हाउस तक जाती है वह छोटे-छोटे बच्चों के श्रमदान से बनी है।
क्या ही जज़्बा रहा होगा, हमारा मुल्क है, हमारा इदारा है। तालीमी मेला लगता था। हिन्दोस्तान पर प्रोजेक्ट दिए जाते थे। अली बंधुओं की मां इस बात पर गर्व करती थीं कि उनके बेटे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ मुहिम में जेल चले गए। जामिआ में एक ख़िलाफ़त बैंड था, जो अंग्रेज़ों के विरुद्ध तराने गाता-बजाता था। जामिआ का तराना मुहब्बत की बात करता है। जामिआ में जितने भी रहनुमा हुए उन्होंने प्रेम और मुहब्बत का पाठ पढ़ाया और जामिआ के बारे में ये कहा कि पूरे भारत में यह एकमात्र संस्थान है जहां हर मज़हब का आदर करना सिखाया जाता है। इंसान-दोस्ती और वतन-परस्ती सिखाई जाती है। तालीमी आज़ादी, वतन-दोस्ती, क़ौमी यक़जहती, सांस्कृतिक आदान-प्रदान,ज्ञान की विविधता, सादगी और किफ़ायत, समानता, उदारता, धर्मनिरपेक्षता, सहभागिता और प्रयोगधर्मिता यहां के जीवन-मूल्य हैं। वो बच्चे जिन्होंने सड़क बनाई, अब उनमें से कुछ सड़क किनारे बम रखने लगे। मुझे सुबह-सुबह जामिआ के एक उस्ताद मिले। बड़ी शर्मिन्दगी से कहने लगे— लोग हमसे सवाल करते हैं कि क्या आप बच्चों को यही सिखाते हैं। पूछने वालों को क्या जवाब दें? किसी के माथे पर तो कुछ लिखा नहीं होता। लेकिन ये जो नई नस्ल आई है, हिंदू हो या मुसलमान, इसमें कई तरह का कच्चापन है। जामिआ के सभी कुलपतियों ने विश्वविद्यालय के विकास को लगातार गति दी और इस मुकाम तक ला दिया कि इसकी एक अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी। तरह-तरह के सैंटर, नए-नए विभाग, बहुत तरक़्क़ी की जामिआ ने। और अब देखिए। बिगड़ैल बच्चों के कारण मां-बाप को भी शर्मिंदगी का सा सामना करना पड़ रहा है। यह जो अतीफ़ था, जो मारा गया, राजनीति विभाग में ह्यूमन राइट्स में एम.ए. कर रहा था। वो ह्यूमन राइट्स कितना समझ पाया? शायद उसके ज़ेहन में ह्यूमन की परिभाषा कुछ और ही रही होगी। इंसान-दोस्ती सिखाने वाले अध्यापक क्या करें कि बच्चे का कच्चा दिमाग़ इंसान-दुश्मनी तक न पंहुच पाए। जामिआ के उसूलों की कहानी देश के हर मज़हब के बच्चे को फिर से सुनानी चाहिए और उनसे एक ऐसी सड़क बनवानी चाहिए जो देशवासियों के दिलों तक पंहुचे, जिसपर मुहब्बत के सीमेंट की गाढ़ी और मोटी परत चढ़ी हो।
--हां, सनसनी फैलाइबे ते का होयगौ रे!

Saturday, September 20, 2008

झलकियां : "जयजयवंती वार्षिकोत्सव"

प्रिय और आदरणीय मित्रो,

इन दिनों समारोहों का सिलसिला अपनी निरंतरता में गतिमान है। इंडिया हैबिटेट सैंटर के स्टाइन सभागार में 11 सितंबर 2008 को सम्पन्न हुई "जयजयवंती वार्षिकोत्सव" में सुश्री पूर्णिमा वर्मन का सम्मान हुआ। उनके लैपटॉप को हिन्दी सॉफ्टवेयरों से सज्जित किया गया। इस अवसर पर स्नेहा चक्रधर ने अपनी गुरु पद्मश्री गीता चन्द्रन के निर्देशन में भरतनाट्यम की ऐसी प्रस्तुतियां दीं जिनमें हिन्दी रचनाओं का प्रयोग किया गया था। इस समारोह की झलकियां देखने की फुरसत आपके पास हो तो नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

http://www.flickr.com/photos/jaijaivanti/

ये चित्र और उन पर की गई टिप्पणियां पायल की हैं।
लवस्कार


Wednesday, September 17, 2008

सिरफिरे सिरों को फिर से पकड़ें

--चौं रे चम्पू! गृहमंत्री ने तीन बार कपड़ा चौं बदले रे?
--बाहर के तो बाहर के अन्दर के लोग भी कीचड़ उछालेंगे तो अगला दस बार बदलेगा। क्या परेशानी है!
--अब अगलौ सवाल, जे बता कै दिल्ली सचमुच दहली का?
--चचा दिल्ली नहीं दहली। दिल्ली अगले दिन से ही उन सारे स्थानों पर टहली, जहां-जहां धमाके हुए थे। हां, मीडिया द्वारा बहली। जन संचार माध्यमों ने दहशत से दहलाने की कोशिशों में दिल्ली ही नहीं पूरी दुनिया का दिल बहलाया। हज़ार लोग पानी में बह गए, उसे कैसे दिखाओगे, एक आदमी खून से लथपथ दिखा दो तो लोग टी.वी. से चिपके रहेंगे। अरे चचा, कितना बड़ा देश है ये! इसमें दस-बीस सिरफिरे होना मामूली बात है। उन सिरफिरों के कारण आप फिरसिरे हो जाएं, यानी फिर-फिर उसी सिरे को पकड़ कर हिंसा बढ़ा-चढ़ा कर दिखाएं, उचित है क्या? सिरफिरों को हर सिरे से जोड़ना, पिछली विपदाओं पीछा छोड़ना और अगली खुशियों से मुंह मोडना कोई अच्छी बात नहीं है।
--तू कहनौ का चाहै लल्ला?
--देखिए! बाढ़ की विभिषीका अभी ख़त्म नहीं हुई लेकिन पर्दे पर पर्दे के पीछे चली गई। यहां आ गए ख़ून के छींटे। माना कि कुछ निरपराध, निर्दोष और निरीह लोग मारे गए, सौ-दो सौ घायल हुए, लेकिन क्या कोई नया दुख पुराने दुख को इस तरह ढंक देता है? आतंक की घटना दिल्ली में चार स्थानों पर हुई, चलो उसे चार बार दिखा कर आगे की बात करो। ये क्या कि उसी एक खबर को दिन-रात का रोना बना लिया। बड़े खुश हो रहे होंगे चंद आतंकवादियों के विक्षिप्त दिमाग। रातों-रात हीरो बन गए। हत्यारा अपनी क्षमताओं पर ख़ुश होता है। उसके दिलो-दिमाग की गन्दगी और दरिन्दगी को हवा मिलती है। घटना के बाद काम पुलिस और प्रशासन पर छोड़ दिया जाना चाहिए। वे उन्हें ढ़ूंढ निकालें और सही प्रक्रिया से ठिकाने लगाएं। उन्हें कम्बख़्तों को पर-पीड़ा का सुख तो न लेने दें। उन्हें कच्ची खोपड़ियों का आदर्श तो न बनने दें। उन्हें किसी मज़हब का प्रतिनिधि मान लिए जाने की भूल तो न होने दें और तत्काल कोई निर्णय न निकालें। बारह साल के बच्चे के बारे में क्या-क्या अटकलें लगाई गईं— आर.डी.एक्स. उसकी छाती पर बंधा है, बम जैसी कोई चीज़ उसके पैर में बंधी है, उसकी जेबों में विस्फोटकों की पोटलियां हैं। आतंकवाद अब बच्चों के सहारे विस्फोट कर रहा है। सबका-सब झूठ चचा, बिना बात की सनसनी फैलाने का मूर्खतापूर्ण प्रयास।
--तौ का निकरौ?
--पता चला कि वह तो गुब्बारे बेचने वाला बच्चा था। उसने आतंकवादी को देखा था। कुछ कूड़ा बीनने वाले बच्चों ने भी सुराग दिए कि उन्होंने रीगल और इंडिया गेट पर भी आतंकवादियों को पोटलियां रखते हुए देखा है। पुलिस ने बम निष्क्रिय कर दिए। लेकिन क्या किसी मीडिया कर्मी ने एक बार भी यह सवाल उठाया कि हमारे देश का बारह साल का बच्चा क्यों गुब्बारे बेच रहा है। छोटे-छोटे बच्चे क्यों कूड़ा बीन रहे हैं। ये सवाल अगर उठाते तो बड़े-बड़े लोग आतंकवादी नज़र आते। ये नन्हे बच्चे अमीरी और गरीबी की लीलाएं सुबह-शाम देखते हैं। ये अपनी मेहनत से घर चलाते हैं, पूरे कुनबे का पेट पालते हैं। ज़िम्मेदार हैं और ज़्यादा समझदार हैं। इस बचकानी दुनिया में ये बूढ़े बच्चे हैं। इनके तजुर्बों ने हादसों को टाला है। इनको चाहिए शिक्षा-दीक्षा और दिलों को जोड़ने वाली भाषा का ज्ञान। मानवीय और आत्मीय सम्प्रेषण के अभाव में अगर कोई दरिन्दा इन्हें फुसला ले तो शायद सफल हो सकता है। दरिन्दों को करना सिर्फ़ ये होगा कि मज़हब की गलत-सलत व्याख्याएं करके इन्हें अमानवीय बना दें। सबको जोड़ने की ताकत रखने वाली भाषा के स्थान पर सिर्फ़ दरारें बढ़ाने वाली ज़बान सिखा दें।
--दिलन कूं जोरिबे वारी भासा कौन सी ऐ रे?
--हिन्दी चचा हिन्दी! उसे हिन्दुस्तानी कह लो। जिसे पूरा देश बोलता है। जिसमें हमारे देश की सारी भाषाओं के शब्द हैं। वो हिन्दी! तेरह को काण्ड हुआ, चौदह को हिन्दी दिवस था। हर अख़बार में दो-तीन पन्ने तो हिन्दी दिवस पर आते ही थे। आतंकवाद की ख़बरों के कारण हिन्दी की वह जगह भी छिन गई। मीडिया के मित्रो से गुज़ारिश है कि वो आफ़त को इतना बढ़ा-चढ़ा कर न दिखाएं कि शराफत माफी मांगने को मजबूर हो जाए। सिरफिरों को इतना सिर न चढ़ाएं। सत्य के मानवीय सिरों को फिर से पकड़ें।

Thursday, September 04, 2008

हिन्दी के आत्मघाती गुलदस्ते

--चौं रे चम्पू! जे तेरे थौबड़ा पै कित्ते बज रए ऐं रे? तेरी आंख तौ लगै हंस रई और दूसरी लगै कै रो रई ऐ, चक्कर का ऐ?

--चचा ठीक पहचाना! कुछ गड़बड़ तो है जिसे मैं भी समझ नहीं पा रहा। एक गूंज सी है मस्तिष्क में, जो दांए-बांए हो रही है। कभी-कभी कोई एक बात दिमाग में घुस जाती है, वो परेशान करती रहती है, कभी राह भी सुझाती है।

--पहेली मत बुझा, मूंजी! अपनी गूंज की पूंजी बाहर निकार

--चचा! हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दीको लेकर पिछले एक साल से मासिक गोष्ठियां चल रही हैं। बारहवीं गोष्ठी में जनाब अशोक वाजपेयी ने एक बात कही थी-- निराशा का भी एक कर्तव्य होता है। इस वाक्य के बाद उन्होंने जो बोला मुझे सुनाई नहीं दिया। सुई वहीं अटक गई। तब से मैं परेशान भी हूं और सुखी भी वाकई एक आँख हंस रही है, ए रो रही है।

--निराशा कौ कर्तव्य?

--हां चचा। निराशा कहां नहीं है, हिन्दी को लेकर, औरत के माथे की बिन्दी को लेकर, गरीब के कपड़ों की चिन्दी-चिन्दी को लेकर, निराशा कहां नहीं है? लेकिन निराशा का कर्तव्य होता है, ये कहकर चचा कमाल ही कर दिया। निराशा अगर तुम्हें घनघोर निराशा में छोड़ दे तो वो निराशा अपराधी है। लेकिन निराश नज़ारा अगर ज़रा सी आशा कि किरणों भी ले आए तो वह निराशा सकारात्मक हो जाती है। हिन्दी के मामले में विद्वानों को जब भी सुनो, हिन्दी के दरिद्र भविष्य का ख़ौफ़नाक नज़ारा पेश करते हैं। हमारे मित्र राहुल देव ही अकसर कहते हैं कि आने वाले बीस-पच्चीस वर्षों में हिन्दी दरिद्रों की, रिक्शे वालों की, नाइयों-धोबियों की, नौकर-चाकरों की बोली भर बनकर रह जाएगी, बाकी पूरा समाज अंग्रेज़ी बोलता नज़र आएगा। चचा, निराशा वाजिब लगती है पर इसमें भी आशा तो है ही कि हिन्दी रहेगी तो सही। रहेगी, उन लोगों के बीच जो भाषा के सही वाहक होते हैं। ले जाते हैं आगे। शास्त्रीय भाषाएं कब आगे बढ़ी है? लोक भाषाएं ही सदा आगे बढ़ती हैं। एक सेमिनार में कुछ लोगों को हिन्दी का गिलास आधा भरा दिखाई दिया, कुछ ने कहा आधा खाली है। इस पर राजकिशोर की टिप्पणी बड़ी मज़ेदार लगी, उन्होंने पूछा—‘गिलास कहां है’? हिन्दी का तो गिलास ही गायब है।

--बात भड़िया है!

--हंस रहे हो चचा! मुझे भी हंसी आई थी। फिर मेरी इधर वाली आँख हंसने लगी। उसे कम्प्यूटर-इंटरनेट के रूप में गिलास दिखाई दे गया। इंटरनेट ऐसा जादुई गिलास है जिसमें तुम चाहे जितना भरो, गिलास भरेगा नहीं और खाली भी नहीं होगा। भरे जाओ, भरे जाओ, ये तुम्हारे ऊपर है कि कितना भर सकते हो। जो भर रहे हैं उन्हें सैल्यूट करने का मन करता है। एक हैं दुबई में पूर्णिमा वर्मन इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से नेट पर हिन्दी साहित्य को अपलोड करने का काम कर रही हैं। हर दिन नए-नए कवि कविता-कोश में सम्मिलित होते जा रहे हैं। हिन्दी विकीपीडिया हर पल बढ़ रहा है। एक बार कोई साहित्यकार अपलोड हो जाए तो तब तक नहीं हट सकता जब तक वह स्वयं न कह दे कि मुझे वहां से हटा दिया जाए। अपने आप वो हटेंगे क्या? जो बढ़ गए हैं वो घटेंगे क्या?

--फिर हिन्दी कूं फिकर का बात की?

--हिन्दी के लिए अरण्य-रोदन करने वाले ही हिन्दी के शत्रु हैं। पर वे इतने बड़े-बड़े नाम हैं कि उन्हें शत्रु घोषित कर दिया जाए तो बात बनेगी नहीं। वे हर दिन सेमिनारों में अच्छी हिन्दी बोलकर हिन्दी के विकास का रोना रोते हैं। वो मंचों पर जाते हैं। हिन्दी में कविताएं सुनाते हैं। हिन्दी को जो लोग सरल करें उनके प्रति वे कठिन हो जाते हैं। वे पारिभाषिक कोशों के हस्ताक्षर हैं। वे सलाहकार समितियों के सिंहासन हैं। वे पॉलिटिक्स के पद्मासन हैं। वे आत्म-मुग्ध हैं। वे यात्राएं करते हैं। उनके वृक्ष का पत्ता-पत्ता भत्ता पाता है। वो किसी का भी पत्ता काट सकते हैं। हिन्दी उनसे कितनी धन्य या दुःखी है ये बताया नहीं जा सकता। वे हिन्दी के आत्मघाती गुलदस्ते हैं। हिन्दी पखवाड़ा आने वाला है। इनका जमावड़ा अब लगेगा। लेकिन मेरी निराशा का भी एक कर्तव्य है चचा, जिसे पूरा करने का मन है।

--अरे! अब तो तेरी दोनों आँख हंस रही हैं।

--थैंक्यू चचा।

Monday, August 25, 2008

लकड़ी का रावण नहीं रबड़ का गुड्डा


--चौं रे चम्पू! अब मुसर्रफ कौ होयगौ रे?
--चचा! वही होगा जो एक भिखारी के साथ होता है। भीख न मिलने पर पेट में घुटने दबाकर फुटपाथ पर सोता है। तानाशाह की परिणति या तो आरी से कटने में होती है या कद भिखारी तक घटने में होती है। ताज्जुब की बात तो ये है कि चुनाव के बाद इतने दिन तक टिका भी कैसे रहा। वजह ये थी कि फौजी वर्दी के अन्दर वो एक जम्हूरियत के बन्दर की तरह अपने गलफड़ों में रसद इकट्ठी करता रहा और कट्टरता और आंतकवाद से लड़ाई नाम की दो डालों पर जब मन आया फुदकता रहा। अमरीका के पैसे से आवाम को विकास का झूठा नज़ारा दिखाता रहा। जनता कंफ्यूज़ हो गई। कारगिल में घुसपैठ करके भारत विरोधी भावनाओं को तुष्ट किया और फिर पट्ठा आ गया भारत से हाथ मिलाने।
--अब होयगौ का वाके साथ, जे बता?
--कुछ ख़ास नहीं होगा चचा, होता उसके साथ है जिसके पास कुछ होता है। न आर्मी, न अमरीका, न अवाम, साथ छोड़ गए तमाम। नवाज़-ज़रदारी के सामने पद के भिखारी ने सौ नाटक किए। नवाज़-ज़रदारी गठबंधन इतिहास को दोहराना नहीं चाहता था कि लोग समझें कि पाकिस्तान में सिर्फ तख़्ता-पलट होता है या बदले की भावना से काम लिया जाता है। अब पाकिस्तान के नए हुक्मरानों की समझ में ग्लोबल-गणित आता है। चल थोड़े दिन बना रह भइया, तेरी चला-चली तो होनी है। भली तरह से मान जा वरना इतिहास को दोहराने में भी क्या देर लगती है। बेनज़ीर के जाने के बाद वे जम्हूरियत की नई नज़ीर लाना चाहते थे। सो कटोरे में दया का सिक्का नहीं पड़ा। अल्लाह का हवाला देकर कट्टरपंथी मौलानाओं की दाढ़ी के नीचे कटोरा रखा तो दो टूक जवाब मिला-- आगे बढ़ और लाल मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ जा, वहां परवरदिगार का दीदार कर। भीख में भरोसे की एक भी दीनार नहीं दी मौलवियों ने। व्हाइट हाउस के दरवाज़े पे अल्लाह का नाम लिए बिना कटोरा फैलाया। तो अन्दर से बुश ने मुश से कह दिया-- आगे बढ़ भइया। लौटकर अपनी आर्मी के नए सिपहसालारों के आगे कटोरा फैलाया-- हुक्म मानने के वचन की भीख़ दोगे? आर्मी ने भी मुंडी हिला दी-- आगे बढ़, आगे बढ़। कटोरा घूमता-घूमता पहुंचा जुडीशरी के आगे। जज हज़रात पहले से ही बिर्र थे, एक स्वर में बोले— बर्र के छत्ते में कटोरा दे रहा है मवाली, जम्हूरियत में हो चुकी है हमारी बहाली। महाभियोग के हत्थे चढ़ गया, तो कटोरे का टोपा बना के फंदे पर चढ़ा देंगे। ये सुनहरे ख़्वाब देखने वाली सुनहरे फ्रेम की ऐनक उतार दे और गद्दी से अपने आप उतर जा। तुझे अब हुकूमत की भीख नहीं मिलने वाली, आगे बढ़। चचा, मुशर्रफ पूरा तानाशाह नहीं था। तानाशाह होता है बांस की खपच्चियों से बना लकड़ी का रावण, जो झुकता नहीं है, फुंकता है। ये तो रबड़ का गुड्डा था, जिसके साथ अमरीका ने मनोरंजन किया। पर इसने भी आतंकवादी ब्रश से बुश का ऐसा मंजन किया कि अमरीका के दांत काले हो गए। धरती के भोले-अनपढ़-निरीह मुसलमान उसके निवाले हो गए। इसने आतंकवाद को कोसा भी और पोसा भी।
--बडौ बेआबरू है कै निकरौ।
--बेआबरू होकर वह निकलता है, जिसकी कोई आबरू बची हो। पाकिस्तान के हर शहर में सड़कों पर मिठाई बंट रही है। ऐसा पाकिस्तान में पहले कभी नहीं हुआ। मुशर्रफ के ख़िलाफ़ गुस्सा है न रहम, क्योंकि बचा ही नहीं कोई दम। सुमरू मियां कार्यवाहक राष्ट्रपति बन चुके हैं और सुमरूतलैया के सामईन एक ही गाना सुनना चाहते हैं—‘जा जा जा रे जा मुशर्रफवा’। तुझे कोई नहीं मारेगा। फुटपाथ पर कोई नशेड़ी ड्राइवर तेरे ऊपर ट्रक चढ़ा दे उसकी कोई गारंटी नहीं।
--जैसे सबके दिन फिरे, वैसे मुसर्रफ के कबहुं न फिरैं।

Friday, August 08, 2008

जिज्ञासा, जज़्बा, जुनून और जीवनधारा

—चौं रे चम्पू! बिचार बड़ौ कै जीवन?
—ये भी कोई पूछने की बात है? जीवन हर हाल में बड़ा होता है चचा।
—अब बता, बिचारधारा बड़ी कै जीवनधारा?
—ये प्रश्न कठिन है! विचारधारा के लिए जिन लोगों ने जीवन दे दिए, वही महान कहलाए। बच्चा धरती पर आते ही जिज्ञासा की आंख खोलता है। जिज्ञासा विचार की जननी होती है। किशोर होते-होते जिज्ञासाएं एक नासमझ शोर में बदल जाती हैं। जवान होते-होते उस शोर में से कोई एक आवाज़ साफ सुनाई देने लगती है जो एक जज़्बा बन जाती है। फिर जज़्बाती जवानी अपनी और अपने आसपास की मुक्ति के लिए नव-जनित जुनून को अपनी जीवनधारा बनाने लगती है।
—तू तौ अपनी सुना!
—चचा अपन भी जब किशोर थे तब शाखा में जाते थे। ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे...’ गाते थे। देश-भक्ति हिलोरें मारती थी। लेकिन क्या हुआ कि एक दिन गुरू जी ने विचार-चिंतन के दौरान कहा-- इन म्लेच्छ मुसलमानों ने हमारी संस्कृति का सर्वनाश कर दिया है। बात भाई नहीं चचा। अरे, सन छप्पन में हमारा घर जब भूचाल में गिर पड़ा था, तब उसे फिर से बनाने वाले सारे राज-मिस्त्री मुसलमान थे। रामलीला में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले बनाने वाले सारे कारीगर मुसलमान थे। अपने क़स्बे में कलंगी-तुर्रा ख़याल-गायकी के अधिकांश लोग मुसलमान थे। बड़ा मीठा गाते थे। ननिहाल में मुझे पुस्तक-कला, काष्ठ-कला, चर्म-कला और गणित सिखाने वाले मास्साब मुसलमान थे। मैंने भगवा गुरू जी को रास्ते में आते-जाते प्रणाम करना तो नहीं छोड़ा पर शाखा का रास्ता छोड़ दिया चचा। जवानी की दहलीज पर खड़े जज़्बात दुनिया को बदलने के लिए कोई जुनून चाहने लगे। मथुरा में मिले कॉमरेड सव्यसाची, उन्होंने सुनाई वर्ग-संघर्ष की दास्तान। कुछ-कुछ समझ में आई, बाकी दिल्ली में कॉमरेड सुरजीत ने सुनाई। उनकी कक्षाओं के लिए विट्ठल भाई पटेल हाउस जाते थे। वे बताते थे कि धर्म एक छद्म-चेतना है, अफीम है। मान लिया। ......जवानी का दूसरा जुनून होता है प्रियतम की तलाश। विचार के साथ अनजाने ही जीवन-तलाश भी जारी थी। मिल गई हमें हमारी प्राण-प्रिया। उसे साथ लेकर जाने लगे कॉमरेड की कक्षाओं में। प्राण-प्रिया ने कक्षा से बाहर आकर कहा कि धर्म अगर छद्म है तो ये खुद दाढ़ी क्यों रखते हैं? पगड़ी क्यों पहनते हैं? अपनी तरह से मैंने समझाया कि परिधान संस्कृति है। धर्म और संस्कृति अलग-अलग चीज़ें हैं। पर प्राण-प्रिया नहीं मानी। अगली कक्षा में पूछ ही लिया। उन्होंने मुस्कुरा कर उसे अपना पारिवारिक विधान और परंपरागत परिधान बताया और कहा कि क्रांति के लिए परिवार का दिल तोड़ना ज़रूरी नहीं है। कॉमरेड की यह बात तर्कसंगत लगी। जुट गए क्रांति के लक्ष्य के लिए। फिर बहुत तरह से मोह-भंग हुए चचा। विचारधाराओं में लाइनें अलग-अलग थीं। उनकी रूस की लाइन, हमारी चीन की लाइन, कुछ नक्सल हो गए। चारू मजूमदार और कानू सान्याल के अनुसार सत्ता बन्दूक की नली से निकलती थी। हमारे कुछ कॉमरेड्स को प्राण-प्रिया के साथ हमारा अधिक समय बिताना रास नहीं आया। सो मामला पार्टी की सदस्यता तक नहीं जा सका। बचपन के गांधी-नेहरू यदा-कदा विचारों में अंगड़ाई लेने लगते थे, लेकिन उनके चेले प्रभावित नहीं कर पाए। तो, हर समय राजनीति की सांस लेने के बावजूद किसी दल के सदस्य नहीं बने।
—अच्छौ भयौ। इंसान कूं इंसान की तरियां देखिबे कौ सऊर तौ बच गयौ।
—अपने असल गुरू हैं मुक्तिबोध। बार-बार उनका ज़िक्र करता हूं। उन्होंने कहा था—‘तय करो किस ओर हो तुम, सुनहले ऊर्ध्व आसन के दबाते पक्ष में, या अंधेरी निम्न कक्षा में तुम्हारा मन? तय करो किस ओर हो तुम।‘ विचारधारा में कंफ्यूजन कम फ्यूजन ज़्यादा होने लगा। उलझन के साथ सुलझन। सोमनाथ चटर्जी चालीस साल पार्टी की सेवा करने के बाद सुनहले ऊर्ध्व आसन के दबाते पक्ष में बैठे हैं या वहां बैठ कर अंधेरी निम्न कक्षा का हित-चिंतन कर रहे हैं, सोचने की बात है। सुलझाते-सुलझाते सोल्झेनित्सिन हो जाओ। वो भी सुपुर्दे-ख़ाक हो गए, सुरजीत सुपुर्दे-राख हो गए, सोमनाथ पार्टी-विधान छोड़ कर संविधान की सुपुर्दे-साख हो चुके हैं। चचा, नतीजा ये निकला कि सब अच्छे हैं, सब बुरे हैं और विचारधारा से बड़ी होती है जीवनधारा।
—अब आयौ ऐ न लाइन पै!

Sunday, August 03, 2008

बम टिफ़िन में नहीं है



चौं रे चम्पू! का नतीजा निकरौ? अखबार देखे पिछले बीस दिना के?

हां चचा देखे। एक-एक पन्ना पलट कर देखा। एक-एक लाइन पढ़ कर देखी। क्रांतिशब्द ग़ायब हो गया अख़बारों से। बीस साल पहले तक हर पन्ने पर क्रांति होती थी। क्रांति एक सपना थी, एक विचारधारा थी। नौजवानों में, देश और विश्व समाज पर होते अत्याचारों के प्रति सात्विक समझदार क्रोध और दायित्व का बोध लाती थी क्रांति। अब टुइंया क़िस्म के आंदोलन होते हैं।

अंगरेजी के अखबार देखे?

वहां भी रिवौल्यूशन की जगह मूवमैंट शब्द आ गया। अब देखो चचा, रैवोल्यूशन का मतलब है रिवाल्व होना, घूमना। कोई एक चीज़ तुम्हारे आगे घूम-पलट कर बिल्कुल नए रूप में आई, दिपदिपाती हुई। और मूवमैंट है, जहां तुम हो, बस वहीं हिलते-हिलाते रहो। गोरखालैंड आंदोलन, डेरा राम रहीम आंदोलन, उत्तराखंड-झारखंड-नंदीग्राम आंदोलन, डॉक्टर-वकीलों के आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, ऐसे आंदोलन दिखाई दे जाएंगे…… या ऐसे आतंकांदोलन जो दूसरों को बुरी तरह आंदोलित कर दें। बंगलूरू, अहमदाबाद के बाद सूरत की सूरत बिगाड़ने पर आमादा। दोस्तोव्स्की ने ‘अपराध और दंड’ उपन्यास की शुरुआत करने से पहले लिखा था कि समाज में अपराध बढ़ें तो समझो क्रांति आने वाली है। पर आएगी कहां से, जब तुम शब्द ही गायब कर दोगे? गद्दी पर लूटपाट के अनुभव ले के, राजघाट का रस्ता ले के, बैठ गए अपराधी। उनसे कुछ भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे ही इतने बड़े लोकतंत्र की रक्षा कर रहे हैं। डैमोक्रेसी चली ग्रीक से भारत में चल रही है ठीक से। हमारे रहनुमाओं के पास अपराधों के इतने अनुभव हैं कि हर बार लोकतंत्र की रक्षा में काम में आते हैं। लोकतंत्र के चार शेर हैं, चारों के चारों दिलेर हैं। आमजन को ये खा भी जाएं तो उन्हें खुश होना चाहिए कि वो महाशक्ति का हिस्सा बन गए और लोकतंत्र में कुर्बानी का क़िस्सा बन गए।

रूस में अपराधन के बाद क्रांति आई और क्रांति के बाद अपराध आय गए, आए कै नांय? अपराधन ते कैसै लड़ौगे भैया?

अपराध एक प्रकार का निजि हितसाधन है। प्राय: दो कारणों से सम्पन्न होता है, एक तो अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के नाम पर और दूसरे अपने सम्प्रदाय-समुदाय की उन्नति के नाम पर। आंदोलन अपराधों का मुखौटा बन जाते हैं। आतंकवाद एक सांप्रदायिक हितसाधन अपराध है और जातिवाद एक सामुदायिक हितसाधन अपराध है। ये आपराधिक आंदोलन भेदभाव की बुनियाद पर आदमी को आदमी से अलग करने का वाले हैं। क्रांति का विचार था तो सब कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। मैंने भी सफ़दर हाशमी के साथ गाने गाए हैं जामा मस्जिद के चौक में। धर्म-जाति-वर्ण का कोई मामला ही नहीं हुआ करता था। अब जो पुराने क्रांतिकारी साथी हैं उनके लिए क्या शब्द विशेषण लगाऊं, कहां नाराज़ होते हैं, कहां राज की कामना रखते हैं, कुछ समझ में नहीं आता। क्रांति आमूलचूल बदलाव की बात करती थी, अब आम आदमी की चूल हिलाई जा रही है।

—तौ का करें, बता!

इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है कि एक क्रांतिकारी चेतना के साथ सद्भाव-बिगाड़ू तमाम ताकतों से लड़ा जाए। पर चचा, लड़ा कैसे जाए, ये बम-पटाखे फोड़ने वाले तरकीब भी नई-नई निकाल लाते हैं। साइकिल पर टिफ़िन में बम रखने लगे…. पूरे विश्व की पुलिस लग जाए तो भी तलाश नहीं सकती। साइकिलों पर बैन लगा दोगे और क्या करोगे? फिर पैदल ही हाथ में टिफिन रखकर चलेगा, तब क्या करोगे? अरे, बम टिफिन में नहीं है चचा। दिमाग में है। वहां डिएक्टीवेट करना पड़ेगा। मुक्तिबोध के शब्दों में— स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता, क्रॉस एग्ज़ामिन हिम थॉरोली!!दिमाग़ में भ्रांति की जगह क्रांति ट्रांसप्लांट करानी पड़ेगी। ये नई क्रांति अख़बारों की अनेकता से नहीं, घरबारों की एकता से एगी

Thursday, July 31, 2008

चक्र सुदर्शन

बची हुई है डैमोक्रैसी

डैमोक्रैसी ग्रीक से, निकली सदियों पूर्व,
भारत में यह ठीक से, चलती दिखे अपूर्व।
चलती दिखे अपूर्व, चलाते हैं अपराधी,
जब भी संकट आया, इसकी डोरी साधी।
चक्र सुदर्शन, आम जनों की ऐसी-तैसी,
गर्व
करो तुम, बची हुई है डैमोक्रैसी|

Saturday, July 26, 2008

राज रस ही रसराज

चौं रे चम्पू! कल्ल चौं नांय आयौ रे?

टीवी से चिपक-चिंतन करता रहा। उधर साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति हो रही थी और इधर करारों की राजनीति में साहित्य चल रहा था। कल लोकसभा टीवी की टी.आर.पी. सबसे ज़्यादा रही होगी। भूत-प्रेत, अपराध, भविष्य, मनी, सनसनी, सैक्स और सैंसैक्स सबकी छुट्टी हो गई। कोई राजू ते पम्मी ते पिंकी दी गड्डी में बैठ कर आया और दस दस लाख की गड्डियां फेंक गया, बड़ा रस आया राजनीति में।

तौ फिर रस-बिमर्स है जाय।

हां रस-विमर्श हो जाय। रस-सिद्धांत की पुनर्व्याख्या अब आवश्यक हो भी हो गई है चचा।आज़ादी के साठ साल बाद राजनीति भी एक रस बन चुकी है। रचनात्मक साहित्य में इस रस की उपेक्षा नहीं हुई पर काव्य-शास्त्र ने इसे अभी तक स्वीकार नहीं किया। नव-रस में से किसी एक को हटा कर 'राज रस' को जोड़ा जाना चाहिए।

राजनीति तौ सदा ते रही ऐ रे! फिर अब तक 'राज रस' चौ बनौ?

'राज रस' पहले भी था, लेकिन परिपक्व नहीं हुआ था। प्रारंभ में ये रस शृंगार में समा गया, क्योंकि दूसरों की लुगाइयां उठाने के लिए ही लड़ाइयां होती थीं। फिर बुद् को काल में शांत रस में और आदिकाल यह रस वीर रस में समा गया। भक्तिकाल रीतिकाल में भक्ति, वात्सल्य और रति-भाव ने इसे दबा दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान यह रौद्र भयानक और करुण रसों के कारण नहीं पनप सका। आज़ादी मिलने के बाद लगभग तीन दशक तक यह अद्भुत रस जैसा लगता रहा। पिछले तीन दशकों की डैमोक्रैसी में 'राज रस' हास्य रस में घुसा रहा। लेकिन अब इसने सारे रसों से बाहर निकल कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। शृंगार को कहा जाता रहा है रसराज लेकिन चचा असली रसराज यह 'राज रस' ही है। इसमें सारे रस समा जाते हैं। जिस तरह शृंगार का स्थायी भाव है 'रति', इसी प्रकार 'राज रस' का स्थायी भाव है 'आस'। श्वांस छोड़ देना पर कुर्सी की आस मत छोड़ना।

--रसराज सिंगार के दो भेद हतैं, संयोग और बियोग, 'राज रस' केऊ ऐं का?

--'राज रस' के भी दो भेद होते हैं चचा—'विश्वास राज रस' और 'अविश्वास राज रस'। जिस तरह वियोग में संयोग की अनुभूति होती है और संयोग में वियोग की, इसी प्रकार 'राज रस' के विश्वास में अविश्वास की और अविश्वास में विश्वास की अनुभूतियां चलती रहती हैं। शांडिल्य ने कहा है— 'योगेवियोगवृत्ति: विश्वासे अविश्वास वृत्ति:', वह संयोग सबसे अच्छा है जिसमें वियोग बना रहे। अगली बात उन्होंने संभवत: 'राज रस' के बारे में कही होगी। जिस पर विश्वास करो उस पर अविश्वास बनाए रखो, और जिस पर अविश्वास हो उस पर तात्कालिक विश्वास कर सकते हो। पता नहीं कब अविश्वासी विश्वासी बन जाए और कब विश्वासी अविश्वासी बन जाए। संसद में लाल-हरे-पीले बटन के दबने तक तुम्हारे रस का कौन सा वाला स्थायी भाव चला, दूसरे संशय में रहेंगे। यही इस रस का गुण है कि इस रस का स्थायी भाव स्थायी नहीं होता।

—'राज रस' के आलंबन और उद्दीपन का भए?

—आलंबन नहीं होता 'राज रस' में। इसमें आलंब ना, कोई आलंब ना। उद्दीपन कभी सपा के लिए बसपा कभी बसपा के लिए सपा। माकपा, भाकपा और भाजपा कभी खो-खो कभी पा-पा। उनमें संचारी भाव आते-जाते दिखते रहे। अब इसके जो तेंतीस संचारी भाव हैं उनके नाम गिनाता हूं— 1. अधर्म, 2. अपराध, 3. कल्मष, 4. पाप, 5. पातक, 6. रज, 7. विकार, 8. हरम, 9. पंक, 10. काम, 11. क्रोध, 12. मत्सर, 13. मद, 14. मोह, 15. लोभ, 16. अकार्य, 17. कुकृत्य 18. व्यतिक्रम 19. हवस, 20. इल्लत 21. खोट, 22. व्यसन 23. तामस, 24. भ्रष्टत्व, 25. अमर्ष, 26. ईर्ष्या 27. बदकार, 28. दुरिता, 29. पापिष्ठा 30. करारी , 31. बेकरारी, 32. आइएईए और 33. जाइएईए। सरकार बच गई या जैसी बची वैसी नहीं बची इससे क्या फ़र्क पड़ता है। चुनाव तो होने ही हैं। एक तरफ ब्रह्म है दूसरी तरफ माया है। निर्जीव मतदाता जब तक वोटानुभूति करता रहेगा भरपूर 'राज रस' आता रहेगा।

Wednesday, July 16, 2008

बारगेन फॉर बार-बार गेन

चौं रे चम्पू! चेहरा चमकीलौ, चाल में फुर्तीबाजी, का चक्कर?

चचा! एक दिव्य प्रवचन दे कर आहा हूं।

कौन सी चैनल पै?

चैनल पर नहीं चचा, म्युनिस्पैलिटी के नल पर। पानी नहीं हा था। लोग अपने-अपने सब्र का घड़ा लेकर बैठे थे। समय का जल-गुड़ुप-योग चल रहा था। हमने समय का गुडुपयोग यानी गुड उपयोग करने के लिए प्रवचन देना शुरू कर दिया। ऐसी नीली-पनीली बातें कहीं, जैसे— ‘ लाल सलामको बीजेपी नेदलाल सलामकर दिया है। ब्दों को तोड़ो-मरोड़ो या घुमाओ-फिराओ तो चा बड़ा मज़ा आता है। भले ही दमदार बात हो पर बात में दम जाता है। जैसे तुमने अभी कहा कि फुर्तीबाज़ी की चाल से रहा हूं, तुम्हारी इसी बात को मैं घुमा कर कह सकता हूं कि चचा! ये ज़माना फुर्तीबाज़ी की चाल का नहीं है, बल्कि चालबाज़ी में फुर्ती का है। बाईस को रब्बा-ईस नहीं बचाएंगे सरकार, सरक-यारों की फुर्ती बचाएगी। प्रवचन में मैंने इसी तरह की पांच बात बताईं।

बता, बता! हमैं बता !

मैंने कहाहे जल-प्रतीक्षार्थियो! नभ का नहीं पता थल के आगे पु है।

और पु का?

उथल-पुथल! पहली बात ये सुनो कि केस को क्राइम मत बना, क्राइम पर केस करो। दूसरी बात, भेस को सन्यासी मत बनाओ, सन्यास को भेस करो। तीसरी बात, रेस को जीवन मत बनाओ, जीवन में रेस करो। चौथी बात, ऐश के, यानी राख के महल मत बनाओ, जहां रहते हो उसी महल में ऐश करो। और पांचवीं बात ये कि फ़ेस पर चेंज मत लाओ. चेंज को फ़ेस करो

चम्पू उदाहरन दिए कै नांय?

उदाहरण दिए चचा! मैंने कहा आरुषि मर्डर को बीहड़ क्राइम बना दिया पुलिस ने, इतनी तरह के बयान, बिना अनुसंधान के अनुमान। केस को ऐसा क्राइम बना डाला ऐसा कि भगवान जी के भी आंसू निकल आए। तलवार को लटकाया नहीं पर तलवार तो लटका ही दी थी। क्राइम पर केस होना चाहिए था जैसा कि सी.बी.आई. ने किया। दूसरी बात, सन्यासियों के भेस में कितने सन्यासी हैं, बताना ज़रा। सन्यासियों को भेस की ज़रूरत नहीं है, सोमनाथ चटर्जी को देख लो। तीसरी बात, आजकल नौजवान रेस को जीवन समझ कर जीवन से हाथ धो बैठते हैं। कल एक युवक एक रियलिटी शो में पानी में बैठ गया। रेस इस बात की कि कौन कितनी देर तक पानी में बैठ सकता है। बेहोश हो गया पानी में। अरे जीवन में जीते हुए रेस करनी पड़ती है मुन्ना। ऐसे थोड़े ही कि रेस के चक्कर में जीवन गंवा बैठो। चौथी बात नेपाल के राजा के लिए है, जहां रहो उसी को महल समझ कर ऐश करना प्यारे। अब लास्ट एण्ड फाइनल बात ये कि फ़ेस को चेंज मत करो, चेंज को फ़ेस करो। माना कि तुमको पच्चीस करोड़ का प्रस्ताव मिला, तुम्हारे चेहरे पर बल पड़ गए कि इतने से रुपयों में क्या छौंक लगेगा? मुद्रा-स्फीति और महंगाई के इस दौर में पच्चीस करोड़ क्या मायने रखते हैं । तो हे सांसद भैया, इस चेंज को फ़ेस करो। थोड़ा बारगेन करो। बारगेन से बार-बार गेन कर सकते हो।

तौ ये प्रवचन दियौ तुमनै! बंडरफुल!!!