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Tuesday, December 07, 2010

डिजिटलन का खलबलन

—चौं रे चम्पू! तेरी कालौनी में कोई बाचनालय पुस्तकालय है कै नायं?
—चचा कम्युनिटी सैंटर में एक कमरा लायब्रेरी के नाम का बनाया गया है। किताबों के चार-पांच रैक हैं,पर वहां इक्का-दुक्का ही कोई आता है। अल्मारियां बन्द रहती हैं। दिलचस्पी न होने का एककारण यह भी हो सकता है कि जिस तरह की किताबों की ज़रूरत आजकल है, उस तरह की वहां मिलती नहीं। दूसरी वजह एक और है चचा।
—दूसरी वजह बता!
—आजकल इंटरनेट पर तरह-तरह की वेबसाइटों में मनवांछित ज्ञान प्रचुर मात्रा में मिल जाता है। बड़ी-बड़ी लायब्रेरियां नेट पर उपलब्ध होने लगी हैं। पाठक नेट से तालमेल करेगा या अपने वाचनालय की पुरानी किताबों की दीमकों को इनहेल करेगा? नौजवान पीढ़ी को अब लाइब्रेरी क्लिक नहीं करती, वह अपने हाउस में बैठी-बैठी माउस के क्लिक पर किताबें पढ़ने लगी है। मुझे भी इच्छित सामग्री नेट पर मिल जाती है। पहले जितनी किताबें पढ़ा करता था, अब कहाँ पढ़ पाता हूँ। घर के हर कमरे में किताबें ही किताबें हैं, पर इस जन्म में पांच प्रतिशत भी पढ़ पाऊँगा, उम्मीद नहीं है।
—तो बाँट दै किताबन्नै!
—हां, बांटी हैं। जगह की कमी के कारण लगभग दो हज़ार पुस्तकें अलग-अलग पुस्तकालयों को दान कर दीं, पर किताबों से मोह समाप्त नहीं होता। सामग्री देखता हूं नेट पर। पठन-पाठन के इस सारे दृश्य में गूगल ने धमाका कर दिया है। प्रकाशकों में हाहाकार मच गया है, लेखक त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, क्योंकि उसने विश्व के प्रमुख पुस्तकालयों से संबंध बनाकर किताबों का डिजिटलीकरण कर लिया है।
—जे का ऐ भइया, डिजटलीकरन?
—अरे चचा, इंटरनेट पर अब स्थान की कोई समस्या नहीं रही। लाखों-करोड़ों क्या अरबों-खरबों पुस्तकें नेट पर चढ़ाई जा सकती हैं। अंग्रेज़ी तो अंग्रेज़ी सारी भारतीय भाषाओं के लिए ऐसे सॉफ्टवेयर आ गए हैं कि बड़ी आसानी से पुस्तकें नेटालोडित की जा सकती हैं। एक होता है ओ.सी.आर., किताब स्कैन करी और टैक्स्ट में बदल गई। टाइप करने के झमेले से बचे। सत्तर लाख किताबें बिना प्रकाशकों और लेखकों की अनुमति के लाइब्रेरियों से सांठंगांठ करके गूगल ने चढ़ा दीं और बना दी गूगल लाइब्रेरी। प्रकाशक हैरान, लेखक दुखी। जब तक पता चलता तब तक न जाने कितने लोगों ने वहां से डाउनलोड कर लीं किताबें। और एक बार किताब गई तो गई, फिर उसकी कितनी अवैध कॉपी बनेंगी राम जाने। चार देशों कनाडा, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने प्रतिरोध किया। अंग्रेज़ी के बहुत सारे लेखकों ने आपत्ति दर्ज कराई तो इनके साथ गूगल ने कोई सैटिलमेंट कर लिया।
—और बाकी देस?
—बाकी देश सो रहे हैं। अपना भारत तो ऐसा देश है जहां आप जानते ही हैं कि कॉपीराइट या बौद्धिक संपदा जैसी किसी चीज़ के लिए कोई सम्मान नहीं है। प्रौपर्टी वही है जो दिखाई दे। हाथ का कंगन प्रौपर्टी है और ज़मीन-जायदाद प्रौपर्टी है। अपने यहां बौद्धिक सम्पदा कोई सम्पदा नहीं है, जबकि शक्तिशाली देशों में बौद्धिक सम्पदा को काफी महत्व दिया जाता है। शायद उनकी शक्ति बढ़ी भी इसीलिए है, चूंकि उन्होंने इंटैलैक्चुअल प्रौपर्टी को प्रौपर धन-मान दिया। हमारे यहां कोई एक लेखक बता दो जो केवल लेखन के बलबूते अपनी रोजी-रोटी चलाता हो।
—सो तौ ऐ!

वहां राउलिंग का दिमागी रोलर चला, हैरी पॉटर का चक्का घूमा और बन गई विश्व की सबसे अमीर औरत। हमारे यहां ये बहुत दूर की कल्पना है चचा। लेखक रोता है कि प्रकाशक पैसा नहीं देता। प्रकाशक रोता है कि किताबों की ख़रीद बन्द हो गई है। फिर भी किताबें धकाधक छपती हैं। किताबें छापना आसान भी हो गया है, कठिन होता जा रहा है बेचना, क्योंकि अब प्रकाशक आए हैं गूगल जैसी बड़ी व्हेल मछली की चपेट में। पुस्तकों के डिजिटलन या डिजिटलीकरण से खलबलन या खलबलीकरण हो रहा है। लेखक-प्रकाशक अब निकट आने को बाध्य हैं। प्रकाशक पारदर्शिता नहीं रखेंगे तो नुकसान होगा। साइबर स्पेस के जंगल में अभी कानूनविहीन मंगल है। उधर पाठक, श्रोता, दर्शक को लगभग मुफ्त का माल नेट पर मिल जाएगातो वह दूकान पर क्यों जाएगा! देख लेना चचा, बहुत जल्दी सारा ज्ञान-मनोरंजन बाज़ार मोबाइल फोन में समा जाएगा।
—अच्छा जी!
—मोबाइल गर हाथ में, तो लाइब्रेरी साथ में। लेखक-प्रकाशक टापो, अपना रस्ता नापो! छिन गई तुम्हारी जगह, ओम गूगलाय नम:।