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Wednesday, December 01, 2010

थ्री टी से टी थ्री तक

-चौं रे चम्पू! एक हफ़्ता में बनारस, पटना, रांची, मुंबई, रायपुर, आगरा, अरे घर में टिकै कै नायं?
-चचा, पाँव में चक्कर है। आपके चम्पू का नाम ही ऐसा है। सभी जगह हवाई जहाज से गया। आगरा बाई रोड, और सिर्फ बनारस से पटना रेल से गया। पिछले दिनों जब से दिल्ली में टर्मिनल थ्री खुल गया है, सुबह या शाम की सैर हो जाती है। सुबह-सुबह की फ्लाइट से जाओ, बोर्डिंग गेट तक डेढ़ दो किलोमीटर की पद-यात्रा करके पहुंचो। ऐसे ही लौटने में। क्या दिव्य टर्मिनल बनाया है चचा! दुनिया भर के हवाई अड्डे देखे, अपना टी थ्री भी कम नहीं है।
-मजा आय रए ऐं तेरे! पहलै जातौ ओ बसन में, रेलगाड़ीन में, अब उड़ै हवाईजहाजन में।
-चचा, तीस-पैंतीस साल पहले रेल में संघर्ष और इंसानी सम्पर्क का जो आनन्द था वह इस हवा-हवाई दौर में नहीं है। अब इंटरनेट और सहयोगी सारा काम कर देते हैं। कविसम्मेलनों का सफर सामान्य थ्री टी यानी थ्री टायर से शुरू हुआ था और टी थ्री यानी टर्मिनल थ्री तक आ गया। थ्री टायर में लकड़ी के फट्टे होते थे, गुदगुदी सीट नहीं होती थीं। बुकिंग क्लर्क ने कह दिया कि जगह नहीं है तो मानना पड़ता था, लेकिन पिछवाड़े से एजेंट के ज़रिए टिकिट मिल जाती थी। आरक्षण न मिले तो पांच रुपए में कुली-कृपा से जनरल बॉगी में किसी भी बर्थ पर अंगोछा पड़ जाता था। कुली कौशलपूर्वक खिड़की से अन्दर कर देते थे। कई बार आपका धड़ अन्दर, पैर बाहर, अटैची बीच में। अन्दर पहुंच कर ऐसा सुख जैसे कोई किला फतह कर लिया हो। खिड़कियों से ठंड में ठंडी और गर्मियों में गर्म हवा आती थी। सुविधाएं आईं होलडोलबिस्तर युग में।
—बिस्तर युग की बात बिस्तार ते बता।
—बर्थ के साइज़ का एक ऐसा होलडोल आता था चचा, जिसमें फोम लगी रहती थी। दोनों ओर खांचे। सिरहाने की तरफ़ कविता की डायरी, लेखन-डाक सामग्रीऔर फूंक वाला तकिया और दूसरी तरफ़ चादर-कम्बल और खाने का टिफिन। दो बक्कल वाली चमड़े की छोटी सी अटैची में कपड़े-लत्तेऔर मुख-मंडल सुधारक सामग्री। पानी की बोतल पर चढ़ा रहता था कम्बल का टुकड़ा ताकि पानी ठण्डा रहे। राजसी ठाठ होता था, क्योंकि डिब्बे में हमारे जैसा होलडोल किसी के पास हुआ ही नहीं करता था। अगल-बगल ईर्ष्या की लहरें उठती थीं। देखो हम लकड़ी के फट्टे पर पड़े हुए हैं और पट्ठा गुदगुदे गद्दे पर मौज कर रहा है। अब हवाई जहाज में फ्रिज से निकली हुई ठण्डे पानी की बोतलों में वह मजा ही नहीं है जो उस झरी के पानी में आता था। टी.टी. से संवाद का अलग मजा। बर्थ के लिए उसके पीछे ऐसे भागते थे जैसे गैया के पीछे बछड़े लगे रहते हैं। दूध दे दे मैया, सीट दे दे भैया।
—टी.टी. कवीन की मदद तौ करते हुंगे?
—कवि हैं, जानने के बाद कुछ तो खुश हो जाते थे। अनेक टीटी स्वयं कवि होते थे, बिना पैसे लिए बर्थ भी दे देते थे। कोई-कोई खड़ूस टकरा जाता था, मैं क्या करूं कवि हैं तो? हर कोई, कोई न कोई काम करता है। वहां से पैसा नहीं लाओगे क्या? हम समझ जाते थे, निगाहों-निगाहों में वह आश्वस्त हो जाता था, बर्थ मिल जाती थी। एक बार मैं और सुरेन्द्र शर्मा कोलकाता से आ रहे थे। हर हालत में दिल्ली पहुंचना था। टी. टी. के लिए दस-पन्द्रह रुपए काफी हुआ करते थे। सुरेन्द्र जी ने बंगाली बाबू को सौ का नोट थमाया, दादा, दो बर्थ का इंतज़ाम कर दो। दादा बोले खुल्ला नहीं हैं, छुट्टा देओ। सुरेन्द्र जी ने कहा पूरे रख लीजिए। सौ का नोट देख कर बंगाली बाबू घबरा गया। कहने लगा, कौमती देओ, कौमती देओ, रेलवे में चौलता, पर इतना नईं चौलता, कौमती देओ! चचा, उस समय भ्रष्टाचारी में भी एक आनुपातिक ईमानदारी हुआ करती थी। आटे में नमक के बराबर लिया जाता था। आज टाटा का नमक रह जाता है, आटा गायब हो जाता है। लेने वाला टाटा भी नहीं करता। थ्री टी का जमाना टी थ्री से अच्छा था।
-जनरल बौगी आज ऊ लगी भई ऐं। फट्टा वारी! हिम्मत ऐ तौ लग लाइन में!
—चचा, तपस्या का कुछ तो फल मिले, अब लाइन में नहीं ऑन-लाइन रहने दो!

Tuesday, October 19, 2010

चंपू चक दे फट्टे

—चौं रे चम्पू! सबते मधुर और सबते ख़तरनाक चीज कौन सी ऐ, बता।
—परीक्षा लेते रहते हो चचा! अपने एकदम ताजा अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि सबसे मधुर और सबसे ख़तरनाक होती है भोर की बेला में यानी सुबह साढ़े चार से साढ़े पांच के बीच आने वाली चार सैकिण्ड की झपकी। संसार में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं इसी काल में होती हैं। यह झपकी देर से किए गए भोजन और थकान के कारण आती है। इतनी मधुर होती है कि इसका रोकना असम्भव सा हो जाता है। परिणाम ख़तरनाक होते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ दो दिन पहले।
—का भयौ तेरे संग?
—मैं गया था कानपुर एक कविसम्मेलन में। कानपुर की देर तक कविसम्मेलन चलने की परम्परा देखते हुए मैंने अपना आरक्षण ए.सी. प्रथम श्रेणी में कराया, पांच बजकर अठारह मिनट पर चलने वाली स्यालदाह राजधानी से। कुछ कवियों को ढाई बजे वाली राजधानी एक्सप्रेस से राजधानी लौटना था। संचालक सुरेंद्र शर्मा का आरक्षण भी उसी में था, सो दो बजे ही कार्यक्रम समाप्त करवा दिया उनकी रेल ने। हमें थे तीन घंटे और झेलने। खैर जी, पांच बजकर पांच मिनट पर अपन प्लेटफॉर्म नम्बर वन पर थे। सूचना बोर्ड बता रहा था कि गाड़ी इसी प्लेटफॉर्म पर ही पांच बजकर तेरह मिनट पर आएगी। मैं अपनी अटैची और एक छोटा बैग अपने पैरों के पास रखकर एक बेंच पर बैठ गया। पांच बजकर नौ मिनट पर मुझे वही पांच सेकिण्ड वाली झपकी आई। इस बीच घोषणा हुई कि तेईस तेरह स्यालदाह राजधानी प्लेटफॉर्म वन के स्थान पर दो पर आ रही है और चचा मैं वह उदघोषणा सुनने से चूक गया। गाड़ी मेरे सामने समय पर आई और मेरे सामने ही निकल गई। कुली से पूछा कि है कोई गाड़ी दिल्ली के लिए? उसने बताया तीन नम्बर प्लेटफॉर्म पर खड़ी भुवनेश्वर राजधानी दिल्ली जाएगी। मैं लबड़-धबड़ सीढ़ियां चढ़ और उतर कर प्लेटफॉर्म तीन पर आया। अधिकांश डिब्बों के दरवाजे बंद थे। चार-पांच लोगों से घिरे एक टीटी महोदय झल्लाते हुए बता रहे थे कि किसी क्लास में कोई जगह नहीं है। वेटिंग टिकिट वाले चढ़ने की कोशिश न करें। अचानक एक नौजवान ने मेरा सामान लिया और पैंट्रीकार में ऊपर चढ़ गया। वह मेरा प्रशंसक एक वेटर था।
—बन गयौ तेरौ काम!
—हां चचा बन गया। पैंट्रीकार में रात्रिकालीन सेवाओं के बाद वेटरों के सोने के लिए पुराने थ्री टायर डिब्बे जैसे लकड़ी के फट्टे लगे होते हैं। मेरा प्रेमी वेटर मुझे बिठाकर टीटी महोदय को ढूंढने निकला। तभी एक दूसरा वेटर नींद से उठा और सामान सहित मुझे देखकर कहने लगा, नहीं-नहीं, यहां नहीं बैठ सकते, उतर जाइए। मैंने मजाक में कहा भैया मैं यात्री नहीं हूं पैंट्रीकार में नई-नई नौकरी लगी है, बताओ किस डिब्बे में चाय पहुंचानी है? वह कंफ्यूज हो गया। दूसरे वेटर उठे उनमें से दो-तीन मुझे पहचान गए। एक कहने लगा, सर ऊपर आराम से लेट जाइए। मैं ऊपर चढ़कर लकड़ी के फट्टे पर लेट गया।
—चम्पू! तेरी तौ चक दे फट्टे है गई।
—ए.सी. प्रथम श्रेणी में उत्कृष्ट कोटि की व्यावसासिक सेवाएं मिलती हैं, लेकिन पैंट्रीकार के फट्टे पर जो प्यार मिला उसका वर्णन करना मुश्किल है चचा। बीस साल पुराने दिन याद आ गए जब रेलगाड़ी में आरक्षण ना होने पर फट्टे पर बैठ कर रात निकाली जाती थी। लेटने को मिल जाए तो बल्ले-बल्ले हो जाती थी। मुझे ए.सी. प्रथम श्रेणी से ज्यादा मजा आया चचा। टीटी महोदय भी पुराने प्रेमी निकले। उनके हाथ में कानपुर से लिया हुआ अख़बार था जिसमें दीपप्रज्ज्वलन के समय मंत्री जी के साथ खड़े आपके चम्पू की तस्वीर भी थी। मैंने उन्हे टिकिट दिखाई और नई बनाने का अनुरोध किया। वे मुस्कुराते हुए बोले बना देंगे, पर अभी आप बी-सिक्स में मेरी बर्थ पर जाकर सो जाइए। मैंने कहा चला जाऊंगा, अभी अपने वेटर मित्रों का आतिथ्य प्राप्त कर लूं। मेरे लिए बिना चीनी की चाय आने वाली है। लेकिन चचा चाय आने से पहले ही मैं ऐसी मधुर झपकी का शिकार हुआ जो नींद में बदल गई। सपने में क्या कर रहा था पता है?
—बता!
—यात्रियों को भोजन परोस रहा था।