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Tuesday, March 30, 2010

बाकी सब कोढ़ में खाज

—चौं रे चम्पू! आज भौत सारे सवाल पूछने ऐं, जवाब देगौ?
—क्यों नहीं चचा, लेकिन बलवीर सिंह ‘रंग’ ने कहा था— ‘बहुत से प्रश्न ऐसे हैं, जो सुलझाए नहीं जाते, मगर उत्तर भी ऐसे हैं, जो बतलाए नहीं जाते।’
—रंग जी की बात करकै अपनी रंगदारी मती ना दिखा। हां-ना में बात कर। जवाब देगौ कै नायं? बता चिकित्सक कौन ऐ?
—चिकित्सक होता है यमराज का भाई। यमराज तो सिर्फ प्राण लेता है। चिकित्सक प्राण के साथ पैसा भी खींच लेता है। कहावत है कि जो सौ को मारे सो वैद्य, हजार को मार दे सो चिकित्सक। वैसे, आधा चिकित्सक तो रोगी स्वयं ही होता है, क्योंकि वह अपने और अपने रोगों के बारे में जानता है। फिर भी चचा जो सही इलाज कर दे वो है भगवान जैसा। जिसकी नज़र में ना हो पैसा। इलाज के लिए तरह-तरह की पैथियां हैं। आयुर्वेदिक, यूनानी, एलोपैथी, होम्योपैथी। होम्योपैथी में हजार सवाल पूछे जाते हैं, तब एक दवाई निकाली जाती है। अंधेरे का तीर है, चलाने वाला अगर पृथ्वीराज चौहान हो तो आंखों पर पट्टी बांधने के बावजूद निशाना ठीक लगेगा, लेकिन चिकित्सक वही उत्तम है जो पट्टी तब बांधे, जब घाव हो। ऐसा न हो कि पट्टी के पैसे के लालच में घाव ही कर दे।
—ठीक, अब जे बता कै इंजीनियर कौन ऐ?
—इंजीनियर वह जो मनुष्य की छोटी-बड़ी ज़रूरतों के हिसाब से सुविधाओं का पहिया घुमाने में महारत रखता हो। पुल बनाए, मकान बनाए, बिजली लाए, सैंट बनाए, सीमेंट बनाए। भौतिक रासायनिक सुख-तत्त्व जुटाने में अपने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कौशल को लगाए।
—और ठेकेदार कौन?
—ठेकेदार वह प्रजाति है जो इंसान और इंजीनियर के बीच में लाभ कमाने के लिए आती है। काम पूरा करने की जिम्मेदारी लेती है, इनके बिना भी काम नहीं चल पाता। ठेकेदार हजार प्रकार के होते हैं, कहां तक गिनाऊँ?
—वकील कौन?
—वकील, वह कील जो ठुक जाए तो निकले नहीं। इसीलिए मुक़दमे को ठोकना कहते हैं। वकील सही हो तो सारे कील-कांटे दुरुस्त कर सकता है।
—अध्यापक कौन?
—जो अपने अनुभव, अध्ययन और विवेक को अपने छात्रों में स्थानांतरित कर दे। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है चचा। कोई कितना भी अर्जित कर ले, फिर भी कम।
—बुझी-बुझी सी बात करन लग्यौ लल्ला! चल छोड़, जे बता कै साहित्यकार कौन ऐ?
—इसका जवाब देना वाकई मुश्किल है। आजकल तो साहित्यकार वह है जो अपने आपको मान ले कि वह साहित्यकार है। वैसे, समीक्षक और.... अथवा सामाजिक जिसको मान लें, वह साहित्यकार होता है। समीक्षक देखते हैं कि उसने किसी समाज का इलाज किस तरह किया। शिल्प की इंजीनियरिंग का कौशल कैसे दिखाया। प्रतिबद्धता की ठेकेदारी करके इंसान को बेहतर बनाने में कोई भूमिका अदा की या नहीं, मेहनत से इंसानियत की वकालत की या नहीं।
—साहित्यकारन कौ कोई ग्रेड है का?
—डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, वकील सबके ग्रेड हो सकते हैं, लेकिन साहित्यकार का ग्रेड बनाना बड़ा मुश्किल है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और सरकारी संस्थाओं के सामने भी यह समस्या है। अभिनेता और संगीतकार के ग्रेड होते हैं, ए ग्रेड, बी ग्रेड। उसी के हिसाब से उनकी फीस निर्धारित होती है, लेकिन साहित्यकारों-कवियों का कोई ग्रेड नहीं है। सबके लिए वही पांच सौ रुपए। अगर वह टैक्सी से आए तो भी पूरा न पड़े। बड़े-छोटे का कोई मानक नहीं है। संगीत में सही सुर मिलाओगे, दिलकश गाओगे तो ए ग्रेड मिलेगा। अभिनय में उतार-चढ़ाव दिखाओगे तब ए ग्रेड मिलेगा। यहां क्या मिलाएगा भाई। अगर तुक मिला दी तो स्वनामधन्य महान साहित्यकारों की नज़र में साहित्यकार कहां रहा? छंद बना दिया तो छल-छंदी मानेंगे तुझे। और अगर छंद न बनाया, तुक न मिलाई तो जनता तुझे साहित्यकार नहीं मानेगी। समीक्षक एकजुट हो जाएं तो किसी को भी महान बना दें। कुपित हो जाएं तो किसी को भी गिरा दें। साहित्यकार कौन है, मैं बता भी दूं तो महायान में इस हीनयानी की मानेगा कौन? लेकिन इतिहास गवाह है कि महायान टुइयां सा था और हीनयान बहुत विस्तृत-व्यापक, वही आगे विकसित भी हुआ, इसलिए बेहतर है मौन।
—चल छोड़। हम तोय ज्ञान की बात बतामैं। तोय मालूम ऐ कै चिकित्सकन कूं संसकिरित में कविराज कह्यौ करैं हैं। तू तौ समाज की चिकित्सा कर। जो कुशल ठेकेदारी, इंजीनियरिंग, वकालत, अध्यापकी के जरिए मनुष्य के तन मन कूं स्वस्थ करै, सो कविराज। जाकूं मानै सकल समाज। बाकी सब कोढ़ में खाज।

Wednesday, March 17, 2010

मौहब्बत कोई ठुकराने की चीज़ है

—चौं रे चम्पू! हमाई बगीची-कमैटी नै सोची ऐ कै तोय बगीचीसिरी की उपाधी दई जाय, तोय कोई आपत्ती तौ नायं?
—आपत्ति क्यों होगी चचा? लिख कर दिए देता हूं।
—लिखे कौ कोई भरोसा नायं रे! कल्ल कूं पलट जाय कै बगीची के पुरस्कार में का धरौ ऐ, मैं तौ उद्यान-पीठ कौ पुरस्कार लुंगो। हमाई बगीची की तौ थू-थू है जायगी।
—चचा, मैंने आज तक कोई सम्मान नहीं ठुकराया। मौहब्बत कोई ठुकराने की चीज है? आप बगीचीश्री बना कर मेरी अवहेलना तो नहीं कर रहे न! आपने मेरे प्रति अनास्था तो नहीं जताई! ज़िल्लत, तिरस्कार, तौहीन, मानहानि, अवमानना, बेअदबी और फ़जीहत तो नहीं कर रहे! मैं क्यों स्वीकार नहीं करूंगा? जो देंगे, सो सिर माथे! लेकिन इतना बता दूं चचा, सम्मान मैंने कभी ख़रीदा नहीं है। जो मान देता है, ज़िम्मेदारी भी बढ़ा देता है कि मेरे पास उस सम्मान के योग्य ज्ञान भी हो। आजकल लोग ख़ुद को सम्मानित कराने के लिए पचास तरह के गुंताड़े बिठाते हैं। आप तो आशीर्वाद दें कि जीवन में कभी ऐसा काम न करूं जो अपमान दे। मेरी पत्नी ने एक बार कहा था—
मैंने समझाया था, तुमने माना नहीं
अब सुनूंगी मैं कोई बहाना नहीं।
कुछ उठाने की ख़ातिर झुके ठीक है,
पर क़लम अपनी नीचे गिराना नहीं।
—बहूरानी समझदार ऐ! जे बता, तैनैं कबहुं कोई सम्मान लौटायौ ऊ ऐ का?
—ना चचा ना! मैंने कभी कोई सम्मान नहीं लौटाया। सम्मान देने वाला इसलिए सम्मान देता है कि उसके मन में आपके प्रति आदर-भाव है। वह आप में आस्था रखता है। आपकी इज़्जत करता है, लिहाज़ करता है। आपके प्रति श्रद्धा और समादर की भावना है उसके मन में। सारी भीड़ में से उन्हें आपका चेहरा दिखा। उन्होंने नवाज़ा, मैंने स्वीकार किया।
—तो लल्ला जे बता, सम्मान ठुकराइबे वारे की का मानसिकता होय?
—हवा और हंसी में अनीति घुसी हुई है। आदमी अपना लाभ-अलाभ देखता है। सम्मान अगर घोषित हो गया तो एक प्रकार से मिल ही गया, लेकिन यदि अस्वीकार कर दिया तो आप अपनी और अपने गढ़े हुए समाज की नज़र में और ज्यादा सम्मानित हो गए। दोहरा-तिहरा सम्मान हो गया। बहाने कुछ भी बना लो लेकिन मैं समझता हूं कि ठुकराने का निर्णय, अधिक लाभ उठाने की कामना से उत्पन्न होता है। ले भी लिया और नहीं भी लिया। लेकर बड़े हो गए, नहीं लेकर और बड़े हो गए।
—तेरे हिसाब ते हर सम्मान स्वीकार कन्नौ चइऐ?
—मैंने ऐसा नहीं कहा चचा। कुछ संस्थाएं योग्य और नामी व्यक्ति को सम्मानित करके खुद को सम्मानित करती रहती हैं। यह भी होता है। ऐसी संस्थाओं को चलाने वाले सोचते हैं कि साहित्यकार कलाकार सम्मान के भूखे होते हैं, दौड़े-दौड़े चले आएंगे।
—फिर ठुकराइबे में का हर्ज ऐ?
—अब यह तो ये लोकतंत्र है चचा! अपने-अपने विवेक की बात है। बहुतों ने पद्मभूषण ठुकरा दिया, पद्मश्री ठुकरा दी। पर मैं दूसरी बात कह रहा हूं। उन लोगों की जो अपनी नज़र में अपने आपको ज्यादा बड़ी संस्था मानते हैं और सम्मानों और सम्मान देने वालों का स्वीकृति देने के बावजूद अनादर करते हैं। वे उन भावनाओं रौंद देते हैं जो आपके प्रति शुद्ध पद्धति से जन्मीं। अरे, जिन्होंने आपको किसी भी रूप में पूजनीय, माननीय, मोहतरम, वन्दनीय, वरेण्य माना, आपके सत्कार्यों को सम्मान के योग्य पाया, आपकी स्तुति गाई, उनका अपमान कैसे कर सकते हो? एक बार ठुकरा दोगे तो दूसरे भी सौ बार सोचेंगे कि हमने अगर इसको महान बना दिया तो वह तुम्हें बौना सिद्ध करने पर आमादा हो जाएगा।
—कछू उकसाइबे वारे ऊ तौ हौंय लल्ला।
—बिल्कुल होते हैं चचा। निहित स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर उन लोगों के प्यार को ठुकरा देते हैं जिन्होंने आपको सिर माथे चढ़ाया। कहां तक रोओ। इसलिए सम्मान के लेने और देने की चिंता छोड़ कर आराम से बांह का तकिया बना कर सोओ। बाई-द-वे बगीचीश्री कब दे रहे हो? निश्चित तिथि बताओ। बहुत बिज़ी हूं आजकल। बगीचीश्री का कोई ड्रेस कोड हो तो वो भी बता दो। लंगोट पहन कर भी आ सकता हूं। उसे अश्लील तो नहीं मानोगे?