Wednesday, July 15, 2009

गुज़र कर क्या करोगे, कर गुज़रो

—चौं रे चम्पू!! राजतंत्र और जनतंत्र कौ कोई एक मुख्य अंतर बता?
—चचा, राजतंत्र में किसी निर्णय को लागू कराने में एक दिन क्या, एक मिनट नहीं लगता, लेकिन जनतंत्र में किसी योजना को अमल में लाने के लिए सौ दिन भी कम पड़ते हैं।
—तेरे दिमाग में नई सरकार के सौ दिन के एजेण्डा की बात ऐ का?
—बिल्कुल वही है। ये सरकार कुछ कर गुज़रना चाहती है, लेकिन ऐसे लोग, जो गुज़र गए और कुछ कर न पाए, उनके पेट में मरोड़ है। नए प्रस्ताव उन्हें दिशाहीन, अतार्किक और अव्यावहारिक लगते हैं। उन्हें तो विरोध के लिए विरोध करना है बस। यशपाल जैसे अनुभवी और वरिष्ठ शिक्षा-शास्त्री ने हर स्तर की शिक्षा के लिए वर्षों के अनुसंधान के बाद कुछ सिफ़ारिशें की हैं। जाने माने शिक्षा-शास्त्री कृष्ण कुमार समर्थन कर रहे हैं और मानव-संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने ऐलान कर दिया कि नई शिक्षा नीति सौ दिन के अन्दर लागू हो जाएगी।


विरोधी तो विरोधी, कुछ अंतरंग भी हो गए क्रोधी।
—तौ मुद्दा का ऐ?
—तुम्हें मालूम तो है चचा! किशोर बच्चों पर और उनके अभिभावकों पर परीक्षा का भारी तनाव रहता है। बहुत सोच-समझ कर ये फैसला लिया जा रहा है कि दसवीं के बोर्ड की परीक्षा से बच्चों को मुक्त किया जाए। स्थानीय शिक्षक ही उनके काम का मूल्यांकन करें। वो फिल्म देखी थी चचा, ‘तारे ज़मीं पर’। क्या शानदार सन्देश था उसका। हर बच्चे में कोई चमक होती है। समय रहते अगर उस पर आपकी निगाह न जाए तो चमक फीकी पड़ने लगती है। मुक्तिबोध ने कहा था— ‘मिट्टी के ढेले में भी होते हैं किरणीले कण’।


अगर उन दीप्तिमान कणों की पहचान न हो पाए तो ढेला या तो उपेक्षित रह जाता है या बुलडोज़र के नीचे आ जाता है। हमारी शिक्षा-प्रणाली कई बार अंकुरित होती प्रतिभाओं पर बुलडोज़र फिरा देती है। दसवीं कक्षा तक स्कूल का शिक्षक बच्चों का आदर्श होता है क्योंकि बच्चों से उसका सीधा और आत्मीय संबंध होता है। वह हर बच्चे के अलग-अलग किरणीले कणों को पहचानता है इसलिए उन्हें आगे की राह सुझा सकता है। चचा, मैं इस बात से सहमत हूं कि दसवीं की परीक्षा को बोर्ड की परीक्षा न बनाया जाए। बच्चा परिपक्व होकर प्रतियोगिता में निकले और अपनी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार अपना भविष्य चुने। चचा, हमारा अतीत होता है आचार-विचार-पत्र, वर्तमान समाचार-पत्र, भविष्य प्रश्न-पत्र और हमारी ज़िंदगी है उत्तर-पुस्तिका। उत्तर-पुस्तिका पर लिखते समय इतना तो बोध हो जाए कि भविष्य के प्रश्न-पत्र को कैसे हल करना है। एक किशोर पर आप अपने निर्णय नहीं लाद सकते। बारहवीं का बोर्ड एकदम ठीक है और मैं इस बात से भी सहमत हूं कि खूब सारे विकल्पों की सुविधा देते हुए कुछ अनिवार्य विषयों के साथ, पूरे देश में एक पाठ्यक्रम और एक बोर्ड होना चाहिए। प्रांतीयतावाद और क्षेत्रीयतावाद को समाप्त करने का इससे बढ़िया कोई तरीका नहीं है।
—तौ बिरोध का बात कौ?
—विरोधी भिन्नता की दुहाई देते हैं। चचा, दसवीं ग्याहरवीं में सिखाई जाती थी जटिल-भिन्न, आजकल के बच्चे जिसे कहते हैं कॉम्प्लेक्स ईक्वेशन।


देश भर के सारे बच्चे इन्हें सरल करना सीखते हैं। हमारा देश भी किसी जटिल-भिन्न से कम नहीं है। भिन्नताएं हैं, विभिन्नताएं हैं लेकिन अगर वे अभिन्न होने की दिशा में नहीं बढ़ेंगी तो भुनभुनाती रहेंगी, परिणामत: जीवन की उत्तर-पुस्तिका पर संकीर्ण सोच की ज़हरीली मक्खियां भिनभिनाने लगेंगी। माना कि असम और केरल की संस्कृति भिन्न हैं लेकिन देश की आस्था और राष्ट्रीय मानकीकृत जीवन-मूल्यों का स्वर तो एक है। हमारे राष्ट्रीय आईकॉन तो एक हैं। केरल का युवा असम जाए तो चिंतन की, व्यवहार की, और भविष्य के लक्ष्य की एक समता तो महसूस करे। एक चीज़ और है जिस पर मैं बल देना चाहता हूं और इसमें कोई राजनैतिक रोड़ा नहीं अटकना चाहिए। वह है हिन्दी भाषा। हम सब आज अपने इस आज़ाद देश की हवा और हंसी के हकदार हैं, हमें याद रखना चाहिए कि आज़ादी दिलाने में हिन्दी ने पूरे देश को एक धागे में पिरोने का काम किया था। पूरे देश के लिए जो एक पाठ्यक्रम बने उसमें राज्य की सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुसार वैकल्पिक विषय ज़रूर हों, लेकिन हिन्दी हो अनिवार्य।
—तू चौं झगड़िबे के इंतजाम कर रयौ ऐ?
—सारे झगड़े मिट जाएंगे चचा! मैं तो जनाब कपिल सिब्बल से कहता हूं कि वक्त गुज़र जाएगा, सौ दिन बहुत होते हैं, इंटरनेट के ज़रिए राज्यों से तत्काल सहमति-असहमति पर विचार करो और कर गुज़रो।

Wednesday, June 17, 2009

विश्वास है कि चमत्कार घटित होगा

—चौं रे चम्पूत! तन के कांटे तौ सब जानैं, तू मन के कांटे बता?
—वो तो हर मन ने अपने लिए अलग-अलग छांटे, लेकिन दुःख अगर बांटा जाए तो निकल जाते हैं सारे कांटे। संस्कृत के एक श्लोक का भाव ध्यान आ रहा है, जिसमें सामंती दौर के उस कवि ने अपने मन के सात कांटे बताए थे। पहला— दिन में शोभाहीन चन्द्रमा, दूसरा— नष्टयौवना कामिनी, तीसरा— कमलविहीन सरोवर, चौथा— मूर्खता झलकाता मुख, पांचवां— धनलोलुप राजा, छठा— दुर्गतिग्रस्त सज्जन और सातवां— राजदरबार में पहुंच रखने वाला दुष्ट।
—तू तौ अपनी धारना बता!
—सब कुछ विपरीत है। मैं अपनी कल्पना में देख रहा हूं कि राजदरबार से दुष्टों की छंटाई शुरू हो चुकी है। सज्जन की टिकिट भले ही कट गई हो पर दुर्गतिग्रस्त नहीं हैं। जिनका शासन है वे अभी धनलोलुप नहीं हैं। मूर्खता झलकाने वाले मुखों को पिछवाड़े का रास्ता दिखाया जा रहा है। सरोवर में पानी ही नहीं है, कमलविहीन होने की तो बात क्या करें! नष्टयौवना कामिनियों के लिए बाज़ार सौन्दर्य-प्रसाधनों से अटे पड़े हैं। रही बात दिन में शोभाहीन चन्द्रमा की, तो चचा, मैंने पिछले दिनों रात में पूर्णिमा का चन्द्रमा शोभाहीन देखा था। दुष्ट चन्द्रमा, व्हाइट टाइगर जैसा खूंख़ार था। तीन कवियों का शिकार करके वो ले गया उन्हें यादों की मांद में। हां! आकाश से बादलों को भेदता, पाण्डाल को छेदता, मंच पर सीधा झपट्टा मारता है, इतनी ताकत है चांद में। ले गया उन्हें यादों की मांद में। चचा! भरोसा करना, बेतवा महोत्सव के कविसम्मेलन वाली रात मुझे पूर्णिमा का चन्द्रमा बिल्कुल नहीं सुहा रहा था। कविसम्मेलन प्रारंभ हुआ तब वह मंच के बाएं किनारे पर था, नीरज पुरी के ठीक ऊपर, और जब कविसम्मेलन समाप्त हुआ तो वह दाहिनी ओर कविवर ओम प्रकाश आदित्य के ऊपर दिख रहा था।


तेरह कवियों में से उसने तीन को झपट्टा मार कर ऊपर उठा लिया।
—पूनम कौ चंदा तौ समन्दर में लहरन्नै उठाय देय। ज्वार आ जायौ करै ऐ लल्ला।
—और ज्वार के बाद भोरपूर्व अंधियारे में जो भाटा आया, वह तो कविसम्मेलन जगत का बहुत घाटा कर गया। दिन का चन्द्रमा नहीं चचा, रात का चन्द्रमा शूल सा चुभा। स्थान-स्थान पर शोक सभाएं हो रही हैं। अख़बारों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पास भले ही इनके लिए अधिक स्पेस न हो, पर जिस विराट श्रोता समुदाय ने इन्हें वर्षों से सुना है, उनके दिल रो रहे हैं। प्रदीप चौबे बता रहे थे कि बैतूल में नीरज पुरी की अंत्येष्टि में पूरा शहर शरीक़ था। शाजापुर के उस गांव की आबादी चार हज़ार भी नहीं है, जहां लाड़ सिंह गूजर रहते थे, लेकिन उन्हें अंतिम प्रणाम करने के लिए पांच हज़ार लोग आए।


कविवर ओम प्रकाश आदित्य की अंत्येष्टि मालवीय नगर में इतनी जल्दी हो गई कि लोगों को पता ही नहीं चल पाया। फिर भी मोबाइल एसएमएस सन्देशों के माध्यम से दिल्ली के कविता प्रेमी अंतिम विदाई के लिए पहुंचे। महानगर से ज़्यादा उम्मीदें की भी नहीं जा सकतीं चचा, पर हर तरफ़ लोग अन्दर से दुखी हैं।
—ओम व्यास के का हाल ऐं रे?
—मामूली ही सही, पर सुधार है। भोपाल से एयर एम्बुलेंस द्वारा उन्हें दिल्ली के अपोलो अस्पताल में लाया गया। डॉ. ए. के. बनर्जी और डॉ. सोहल की निगरानी में हैं। भोपाल के डॉ. अशोक मस्के, डॉ. मृदुल शाही और डॉ. दीपक कुलकर्णी, जिन्होंने प्रारंभिक उपचार किया था, निरंतर सम्पर्क में हैं। मध्य प्रदेश शासन ने घोषणा की है कि इलाज का सारा ख़र्च दिया जाएगा। दिल्ली सरकार ने भी महत्वपूर्ण सुविधाएं अपोलो अस्पताल में दिलाई हैं। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री, कवि के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं। उज्जैन में हज़ारों लोग अपनी-अपनी तरह से शुभकामनाओं का प्रसार कर रहे हैं। वहां के पुलिस अधीक्षक पवन जैन जो स्वयं कवि हैं, हर घण्टे ख़बर ले रहे हैं और दे रहे हैं। सिर में बेहद गम्भीर चोटें हैं चचा। डॉ. भी कहते हैं कि उपचार के साथ-साथ हम चमत्कार की प्रतीक्षा में हैं। चचा! चमत्कार हमारे विश्वास की सबसे प्यारी औलाद है। सभी को विश्वास है कि ओम स्वस्थ होंगे। सातों कांटे निकल जाएंगे चचा।


आठवें दिन,लम्बी बेहोशी के बाद कल ओम ने एक पल के लिए आंख खोलने की कोशिश की थी। हमारा विश्वास है कि चमत्कार घटित होगा।

Tuesday, June 16, 2009

उस शहर का सूरज ज़रूर देखना

—चौं रे चम्‍पू! तू तौ ठीक ऐ न?
—मैं तो ठीक हूं चचा! पिछली गाड़ी में था। कविवर ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड़ सिंह गूजर जिस गाड़ी में थे वो हमसे पांच मिनिट आगे थी, लेकिन उन्हें वो गाड़ी हमसे बहुत दूर ले गई।
—भयौ का जे बता!


—विदिशा में वर्षों से वार्षिक बेतवा उत्सव होता आ रहा है। कई दिन तक बहुरंगी कार्यक्रम होते हैं, अंतिम दिन होता है कविसम्मेलन। तेरह कवि थे, तीन कवियों के लिए वह दिन अंतिम हो गया। रात में दस बजे शुरू हुआ कार्यक्रम सुबह पौने चार बजे समाप्त हुआ था। उसके बाद कवियों ने किया भोजन।
—जे कोई भोजन कौ टैम ऐ?
—यही तो विडम्बना है चचा। मंच के कवि प्रस्तुति-कलाकार होते हैं, परफौर्मिंग आर्टिस्ट! कोई विशेष मेक-अप नहीं करते। कई दिन से यात्राओं में हों तो उन्हीं कपडों से काम चला लेते हैं, पर चेहरे पर चमक बनी रहे इस नाते कार्यक्रम से पहले भोजन नहीं करते। भूखा रहने से चेहरे पर अलग तरह की चमक आ जाती है। आदमी भूखा हो तो आवाज़ कंठ से नहीं दिल से निकलती है। भूखा आदमी फिर देश के भूखे आदमी के बारे में ईमानदारी से बात करता है।


—आगे बोल!
—भोजन की पैक्ड प्लास्टिक थालियां रात में ही लाकर रखी होंगी। पूर्णिमा के चंद्रमा ने उन्हें सुबह तक शीतल कर दिया था। मौसम की गर्मी ने भी भोजन से छेड़छाड़ की होगी। आदित्य जी बोले— ‘दाल मत खाना, उतर गई है’। मैंने कहा— ‘पनीर मत खाना, चढ़ गया है’। वे बोले— ‘चलो दही खाते हैं’।


मैंने कहा— ‘खट्टी है’। वे बोले— ‘चलो, भोपाल पंहुच कर होटल में खाएंगे। वैसे ये गुलाबजामुन ठीक हैं’। मेरी गुलाबजामुन पहले ही नीरज पुरी ये कहते हुए खा चुके थे कि आपके साथ तो पहरेदारी के लिए बेटी आई है भाई साहब, आप तो खाएंगे नहीं। बीवी-बच्चे चंडीगढ़ में हैं। यहां कौन टोकेगा? कवियों में सद्भाव इतना है कि साला कल मरता हो तो आज मर जाए। ओम व्यास कहने लगे— ‘आज मंच पर मरने की बात कुछ ज़्यादा ही हो चुकी है, अब मत करो। अभी गुलाब जामुन खा लो कल जामुन पीस कर खा लेना’।


—मंच पै मरिबे की का बात भई रे?
—संचालन में ओम ने आनंद लिया था— ‘तेरह कवि हैं मेरे पास। एक से तेरहवीं तक का पूरा इंतज़ाम है (तालियां)। ये जो श्री ओम प्रकाश आदित्य बैठे हैं, ये कविसम्मेलन उद्योग के कुलाधिपति हैं। कवियों में सबसे बुजुर्ग हैं, हालांकि ये ख़ुद को बुजुर्ग मानते नहीं हैं (तालियां)। मित्रो, पैकिंग कैसी भी कर दी जाय, अगर पुराना सामान है तो पुराना ही निकलता है (तालियां)। आप और कवियों को सुनें न सुनें, पर इनको जीभर कर सुनियेगा, हम तो अगले साल भी आ जाएंगे (एक पॉज़ के बाद तालियां)’। आदित्य जी पीछे से ठहाका लगाते हुए बोले— ‘मारूंगा’ (तालियां)। ओम जारी रहे— ये वो नस्ल है मित्रो, जो ख़त्म होने जा रही है (तालियां)। उसका ये एक मात्र बीज सुरक्षित है (तालियां)। उसे और ज़्यादा सुरक्षित रखेंगी आपकी ज़ोरदार तालियां (ज़ोरदार तालियां)’। उसके बाद ओम ने नीरज पुरी, देवल आषीश, विनीत चौहान, सरिता शर्मा, पवन जैन,लाड़ सिंह गूजर, मदन मोहन समर,जॉनी बैरागी, संतोष शर्मा,प्रदीप चौबे, और मेरे लिए ज़ोरदार तालियां बजवाईं।


अपने लिए कहा— ‘मैं इन तेरह कवियों की परोसदारी करने आया हूं, मुझ पर दया आती हो तो मेरे लिए भी बजा दें (घनघोर तालियां)। पर तालियां न तो बीज को सुरक्षित पाईं और न कविसम्मेलन के दो और फलदार डालों को। ओम जीवन-संघर्ष कर रहे हैं। उनके उर्वर मस्तिष्क में इस समय अनेक प्लॉट्स की जगह अनेक क्लॉट्स हैं। ड्राइवर का बुरा हाल है। चचा, कविसम्मेलन के कवियों के लिए एक कहावत है कि जिस जगह जलवा दिखाओ, अगले दिन उस जगह का सूरज न देखो। अगली सुबह सारी तालियां थक कर सो जाती हैं। आते वक़्त कवियों को जो सूरज-भर सम्मान मिलता है वह लौटते वक़्त किरण-भर नहीं रह जाता। सुबह चार और पांच के बीच ड्राइवर को आती है झपकी। वह भी तालियां बजाने के बाद बासी भोजन करके आया होता है। मैं तो कवियों से कहूंगा कि तुम्हारी वाणी में बड़ा बल है कवियो! मंच पर मृत्यु का उपहास मत करो ! अगले दिन उस शहर का सूरज ज़रूर देखो ताकि मृत्यु आंखें फाड़-फाड़ कर अंधेरी सड़क पर तुम्हारा इंतज़ार न करे।

Friday, June 05, 2009

तन डोले न मन डोले तो ईमान डोले

-चौं रे चम्पू! तेरौ लल्ला तौ आस्ट्रेलिया में ई ऐ न?
—उसे गए हुए तो दस साल हो गए चचा! दो साल के लिए पढ़ने भेजा था, काम मिला, नाम मिला, दाम मिला तो वहीं जम गया। इंटरनेट के ज़माने में लगभग रोज़ाना बात होती रहती है। दूरी का अहसास नहीं होता। इधर, दो-तीन दिन से शुभचिंतकों के बड़े फोन आ रहे हैं। बेटा वहां ठीक तो है?
—हां बता, काई परेसानी में तौ नायं?
—नहीं, किसी परेशानी में नहीं है। चचा, मैं पहली बार आस्ट्रेलिया नाइंटी एट में गया था। वहां मिले हिन्दी-उर्दू-संस्कृत पढ़ाने वाले प्रो. हाशिम दुर्रानी, डॉ. पीटर ओल्डमैडो और डॉ. बार्ज। बड़ा अच्छा लगा कि वे लोग हिन्दी-उर्दू पढ़ाने के लिए नए-नए पाठ्यक्रम बना रहे थे। भव्य इमारत, भव्य लोग। अगले साल पुत्र को भेज दिया।
चार सैमिस्टर की पढ़ाई थी। हर सैमिस्टर के चार लाख रुपए देने थे। पहली किस्त मैंने प्रोविडेंट फण्ड से निकाल कर दी और उसे आश्वस्त भी कर दिया कि अगली का जुगाड़ भी लगाएंगे बेटा। सात महीने बीत गए उसने पैसा नहीं मांगा तो चिंता हुई। हड़बड़ा कर फोन मिलाया। उसने हंसते हुए बताया कि उसने पढ़ाई के दौरान ख़ाली वक्त में काम करके इतना पैसा कमा लिया है कि अब फण्ड से पैसा नहीं निकालना पड़ेगा। खुशी भी हुई और स्वावलंबी होते हुए बालक को अब हमारी सहायता की ज़रूरत नहीं है, इस अहसास से कुछ मलाल-सा भी हुआ। भई हम किसके लिए कमा रहे हैं? दिन-रात काम क्यों करता है? पढ़ाई कर ना, जिसके लिए भेजा है। चचा, उस देश में मेहनत और प्रतिभा की कद्र होती है। अगले साल हम चले गए, जब यहां गर्मियों की छुट्टियां हुईं। सिडनी विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग ने हमें विज़िटिंग स्कॉलर बना दिया। वहां के छात्रों को पढ़ाने का मौका मिला। कई साल मिला। प्रो. हाशिम दुर्रानी ने आपके इस चम्पू की कविताओं के आधार पर पाठ्यक्रम भी बनाया। लाइब्रेरी में निर्बाध प्रवेश के लिए अपना इलैक्टॉनिक कार्ड भी बन गया था। बड़ा आनंद आया चचा। वहां के विश्वविद्यालय पैसा लेते ज़रूर थे पर ज्ञान भी भरपूर देते थे। लेकिन इन पिछले दस वर्षों में शिक्षा ऑस्ट्रेलिया में एक फलता-फूलता उद्योग बन गया। विभिन्न विश्वविद्यालय सब्ज़ बाग़ दिखा कर छात्रों को बुलाने लगे।
—ये जो मैल्बर्न में भयौ, जे कैसे भयौ?
—वही तो बता रहा हूं चचा। पैसा आने लगा, तो वहां के विश्वविद्यालय सदाशयता खोने लगे। हिन्दी-उर्दू पढ़ाने से उन्हें पहले भी पैसा नहीं मिलता था पर चलाते थे। पिछले साल सिडनी विश्वविद्यालय के प्रशासन ने कह दिया कि भारतीय समाज के लोग मिलकर अगर इतने हज़ार डॉलर नहीं देते तो हम ये विभाग बन्द कर देंगे। भारतीय लोग भाषा के नाम पर उतना पैसा दे नहीं पाए और विभाग हो गया बन्द। उन्हें तो चाहिए थी माल-मलाई। फोकट का दूध बांटने के लिए क्यों चढाते कढ़ाई! अब लगभग एक लाख भारतीय विद्यार्थी चढ़ावा चढ़ाते हैं और अपने माता-पिता पर बोझ न बन जाएं, इस नाते रात-रात भर काम करते हैं। हॉस्टिल की सुविधाएं हैं नहीं। विश्वविद्यालय के पास मिलते हैं महंगे मकान, इसलिए दूर-दराज के उपनगरों में कम किराए पर रहते हैं। काम के बाद मौज-मस्ती और पार्टीबाज़ी वहां के नौजवानों का आम सांस्कृतिक शगल है। हमारे मेधावी-मेहनती छात्र अपनी आर्थिक सीमाओं के रहते प्राय: उससे दूर रहते हैं। चचा, वहां के स्थानीय बेरोज़गार नौजवानों को ‘डोल’ के नाम पर हर हफ्ते ढेड़-सौ दो सौ डॉलर का बेरोज़गारी भत्ता मिलता है। कल्याणकारी राज्य के लिए ‘डोल’ एक स्वस्थ परम्परा है। यह डोल उदरपूर्ति के लिए तो काफ़ी है लेकिन मदकची अपराधियों की मौज-मस्ती नहीं हो पाती उसमें। उतने से डोल से तन डोले न मन डोले, ईमान डोले। भारतीय एवं तीसरी दुनिया के छात्र बन जाते हैं इन रुग्ण डोलिये और मनडोलिये अपराधियों के कोमल शिकार। ये छोटी-मोटी घटनाओं की शिकायत तक नहीं करते। देर रात में तरह-तरह का काम करने के बाद, अपनी उस दिन की कमाई, लैपटॉप और मोबाइल के साथ जब ये रेल या बस से उतर कर सुनसान सड़कों पर पैदल चल रहे होते हैं तब निकल आते हैं अपराधियों के पंजे और कसने लगते हैं शिकंजे। अपराध का अस्लवाद नासमझी के कारण धीरे-धीरे नस्लवाद का रूप अख्तियार करने लगता है। ऑस्ट्रेलिया हमारा मित्र देश है, यदि वह विश्वविद्यालयों की धन-लोलुपता पर और अपने अपराधियों पर अंकुश नहीं लगाएगा तो……..।
—तौ का?
—मैं अपने परिचय में गर्व से लिखता हूं ‘पूर्व विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, सिडनी यूनिवर्सिटी’, हटा दूंगा चचा।

Wednesday, May 27, 2009

जय हो की जयजयकार

—चौं रे चम्‍पू! ‘जय हो’ की जयजयकार कैसे भई रे?

—‘जय हो’ की जयजयकार हमेशा हुई है चचा! कोई नई बात नहीं है। ‘जय हो’ भारत की पुरानी भावना है। ऐसा आशीर्वाद है, जो बड़ों ने छोटों को दिया और छोटों ने बड़ों को। ‘महाराज की जय हो’ से लेकर जनतंत्र की ‘जय हो’ तक जनता अपनी शुभेच्‍छाएं सदियों से व्‍यक्त करती आ रही है।

—हम तौ कांग्रेस की ‘जय हो’ की बात कर रए ऐं!

—वही तो बता रहा हूं। मैंने कांग्रेस के प्रचार के लिए अतीत में बनाए गए आठ गाने सुने। भला हो सुमन चौरसिया का, जिन्‍होंने अपने ‘ग्रामोफोन रिकार्ड संग्रहालय’ से मुझे ये गीत उपलब्‍ध कराए। सब गानों में किसी न किसी रूप में ‘जय हो’ या ‘जयजयकार’ शब्‍दों का या भाव का प्रयोग किया गया था। आशा भोंसले और महेन्‍द्र कपूर की आवाज में एक गीत था— ‘नेहरू की सरकार रहेगी, हिंद की जयजयकार रहेगी।’ इस गाने में एक पंक्ति आती है— ‘अपने दिल की बात सुनेंगे, जिसे चुना था उसे चुनेंगे।’
आप देखिए, पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावों में भी अधिकांश मतदाताओं ने दिल की बात सुनी। क्षेत्रीयता के बिल में रहने वाले जीवधारियों को जनता ने कमोवेश नकार दिया। शंकर जयकिशन के संगीत और रफी के स्वर में, क़ाज़ी सलीम के एक गाने का मुखड़ा था— ‘कभी न टूट पाएगा ये उन्‍नति का सिलसिला, ये वक्‍त की पुकार है कि कांग्रेस की जय हो।

’ आशा, मन्‍ना डे, महेन्‍द्र कपूर और मुकेश जैसे महान गायकों ने ये गीत गाए थे। शंकर जयकिशन के ही संगीत में हसरत जयपुरी का लिखा हुआ और मुकेश द्वारा गाया हुआ एक गीत है— ‘भेद है, न भाव है, ये प्‍यार का चुनाव है, कांग्रेस की जय हो, कांग्रेस की जय हो।’ इस गाने में आगे कहा गया है— ‘जीतनी हैं मंज़िलें, दूर की हैं मुश्किलें, हर जगह सजाई हैं, तरक्कियों की महफ़िलें।’ चचा, गाने में यह नहीं कहा गया कि ‘जीत ली हैं मंज़िलें’। ऐसा नहीं कि इंडिया शाइनिंग हो गया, अब फील्गुड करो भैया। प्रचार में बड़बोलापन और अहंकार हमारी जनता को कभी नहीं पचा। न तो अहंकार चाहिए और न सोच में नकार। कांग्रेस के ‘जय हो’ गीतों में न तो कोई बड़बोलापन था और न कोई नकारात्‍मकता। प्रचार की कमान संभाले हुए आनंद शर्मा, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश और विश्वजीत ने श्रेय आम आदमी को दिया और उसके हर बढ़ते कदम से भारत की बुलंदी की उम्‍मीद जगाई।

—उल्‍टी बात, बोलिबे वारे पै उल्‍टी पड़ौ करै भैया!

—हां चचा, आज़ाद भारत में अब तक के चुनाव प्रचारों का ये इतिहास है कि जिस भी दल ने नकारात्‍मक अभियान चलाया, वह जीत नहीं पाया। कांग्रेस ने भी एक बार ऐसा किया और उन्‍हें हार का सामना करना पड़ा था। गाना था— ‘हिंदू, मुस्लिम, सिक्‍ख, ईसाई से ना जिनको प्‍यार है, वोट मांगने का ऐसे ही लोगों को अधिकार है।’
गाने में दूसरी पार्टियों पर व्‍यंग्‍य था कि विरोधी झूठ बोलते हैं, उन्‍हें कुर्सी का रोग है और उन्‍हीं के कारण देश बीमार है। बात भले ही सही रही हो पर जनता को नहीं पची। इधर भाजपा के प्रचार को देख लीजिए, ‘जय हो’ का ‘भय हो’ करके क्‍या संदेश दिया? न तो हास्‍य था, न व्‍यंग्‍य और न भय। एक प्रकार का विद्रूप था। ‘कहं काका कविराय’ के अंतर्गत काका हाथरसी की शैली में जो रेडियो जिंगल चलाए उनमें विपुल मात्रा में छल-छंद का निषेधी स्‍वर था और छंदों में भयंकर मात्रा-दोष। दूसरी तरफ़ ए आर रहमान की धुन पर पी. बलराम और सुखविंदर द्वारा गाए हुए, परसैप्‍ट कंपनी के अजय चौधरी द्वारा बनाए हुए ‘जय हो’ गीतों ने मन मोह लिया। चचा, पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्डों में एक स्‍वागत गीत भी था— ‘राजीव का स्‍वागत करने को आतुर है ये सारा देश, प्रथम अमेठी करेगा स्‍वागत, बाद करेगा प्‍यारा देश।’इस गाने में ‘राजीव’ को ‘राजिव’ गाया गया था क्योंकि छंद में एक मात्रा बढ़ रही थी। अब राजीव के स्‍थान पर राहुल रख देंगे तो गायकी में बिलकुल ठीक आएगा, सनम गोरखपुरी के गीत में संशोधन किया जाना चाहिए।


—और ‘जय हो’ कौन्नै लिखौ?

—तुम्‍हारे इस चंपू की कलम काम में आई चचा। शब्दों का कुछ जोड़-घटाना सुखविंदर ने भी किया

—चल, अब ‘जय हो’ कौ नयौ अंतरा लिख, गुलजार के भतीजे।

Tuesday, May 26, 2009

‘टर्निंग पॉइंट’

प्रिय एवं आदरणीय मित्रो,

इन दिनों इंडिया हैबिटेट सैंटर द्वारा ‘टर्निंग पॉइंट’ नामक एक मासिक कार्यक्रम श्रृंखला चलाई जा रही है। इसके अंतर्गत कला-संस्कृति क्षेत्र के दो प्रतिनिधि व्यक्तित्वों की श्रोताओं के सम्मुख बातचीत आयोजित की जाती है। इस सिलसिले को जारी रखते हुए भरतनाट्यम, सिनेमा एवं रूपंकर कलाओं के महत्वपूर्ण विद्वानों का संवाद आयोजित किया गया। उनके संवाद से उस विशेष कला-रूप की विकास यात्रा श्रोताओं के सामने आई, श्रोताओं ने भी बातचीत में भागीदारी की। इस बार डॉ. कन्हैयालाल नन्दन के साथ बात करने के लिए मुझे भी आमंत्रित किया गया है।

इंडिया हैबिटेट सैंटर द्वारा बनाया गया निमंत्रण पत्र इस मेल के साथ संलग्न है। यदि दिल्ली में हों और समय मिले तो आइए। हिन्दी कविता की विकास यात्रा के कुछ नए पन्ने खुल सकते हैं और कुछ नए पन्ने आप भी जोड़ सकते हैं।

लवस्कार
अशोक चक्रधर


Friday, May 08, 2009

पोलियो ड्रॉप जैसा हो पोलिंग ड्रॉप

—चौं रे चम्पू! प्रचंड का ऐ रे?
—चचा, कुछ भी स्थाचयी रूप से प्रचंड नहीं है। न तो नेपाल में, न दिल्लीप में।
—नेपाल की तौ समझ में आई, पर दिल्ली् ते का मतलब ऐ?
—वहां प्रचंड प्रधानमंत्री नहीं रहे, यहां प्रचंड गर्मी नहीं रही।
—जे बात मानी!
—चचा कुछ भी स्थाधयी नहीं है। आज नेपाल में प्रचंड ने यह कहकर इस्तीनफा दे दिया कि मैं विदेशी तत्वोंी तथा प्रतिक्रियावादी बलों के दबाव में आकर सत्तास में रहने की बजाय इस्तीिफा देना पसंद करूंगा। अब सेना उनसे ज़्यादा प्रचंड हो सकती है, पर हम क्यों कुछ बोलें। भारत ने कह दिया कि ये उनका आंतरिक मामला है। हमारे लिए महत्वपूर्ण ये है कि यहां गर्मी ने बिना कुछ कहे अपनी प्रचंडता से इस्तीफ़ा दे दिया। राहत मिली। पर क्या, पता कल फिर प्रचंड हो जाए। मौसम का मिज़ाज किसने जाना?
—सही बात ऐ चंपू!
—चचा हमें बताया गया कि पिछले चुनाव-चरणों में गर्मी के कारण कम मतदान हुआ। कल देखते हैं, कितना प्रतिशत होता है। मेरे ख्यांल से तो गर्मी-सर्दी से कोई फ़र्क पड़ता नहीं है। वोट अंदर की गर्मी का मामला है। जो इसका अर्थ समझता है, उसके लिए मौसम का मारक मिजाज़ कोई मायने नहीं रखता।
—गल्तई बात। गरमी के मारै लंबी लाइन छोड़ गए कित्तेई मतदाता।
—तुम्हेंा क्यार मालूम चचा कि वे दुबारा आए या नहीं। जो एक बार लाइन में आ जाता है, आसानी से वापस नहीं जाता। पानी पी कर और राजनीति को कोस कर फिर आ जाता है। प्रत्‍याशियों में कोई पसंदीदा हो न हो, वोट डालता है। उंगली पर गीली स्या ही रखवाने के बाद सुखाने के लिए फूंक मारता है। उस निशान को देखकर ऐसा खुश होता है जैसे ब्यागह-शादी के मौके पर लड़कियां मेंहदी देख-देख कर सिहाती हैं। उसकी फूंक सही लग जाए तो तख्तोसताज बदल जाते हैं चचा! वोट डालना एक बहुत बड़ी राहत का एहसास देता है। एक सुकून देता है, जैसे पुराने ज़माने में पोस्ट -बॉक्स में प्रेम-पत्र डालने से मिला करता था। आप तो जानते हैं प्रेम गर्मी से ज़्यादा प्रचंड होता है। वोट डालना लोकतंत्र के प्रति हमारा इज़हार-ए-इश्कल है। हां, कुछ होते हैं जो वोट न डाल पाने के बाद कसमसा कर रह जाते हैं। उन्हींम के लिए फै़ज ने लिखा था— ‘और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्ब त के सिवा’। किसी को रोज़गार के कारण बाहर जाना पड़ गया। किसी को किसी की तीमारदारी में लगना पड़ा। मतपेटी की याद रह रहकर सताती होगी, पर हालात के आगे मुहब्बीत हार जाती होगी। ऐसे लोगों को माफ़ कर दिया जाना चाहिए चचा। ठीक है न?
—बिरकुल गल्त बात। पांच सालन में एक दिना की बात ऐ। देस-प्रेम निजी-प्रेम ते बड़ौ होय करै। ऐसे लोगन कूं माफी नायं, सजा मिलनी चइऐ।
—एक तो ग़रीबी और गर्मी की मार, ऊपर से सज़ा और दे दो। दरअसल, ऐसे तरीके निकालने चाहिए कि जो जहां है, वहीं से अपने मताधिकार का प्रयोग कर सके। मतपेटी की जगह जैसे अब वोटिंग मशीन आ गई है, उसी तरह आगे से वोटिंग मशीन की जगह नए माध्य मों का इस्तेटमाल किया जाए।



जैसे पोलियो ड्रॉप्स लेकर सरकारी कर्मचारी घर-घर जाते हैं, वैसे ही पोलिंग-ड्रॉप-बॉक्स लेकर हर मतदाता के पास जाया जाए। इंटरनेट और मोबाइल की मदद ली जाए। और आप जो कह रहे थे, कई देशों में वैसा विधान भी है। ऑस्ट्रेऔलिया में वोट न डालो तो फाइन लगता है। लेकिन ये सुविधा भी है कि कोई नागरिक यदि विदेश गया हुआ है तो वहां की एम्बेहसी में जाकर अपनी वोट डाल सकता है। अगले चुनाव तक हमारे देश में भी चुनाव सुधार होंगे चचा। हम सरकार इसीलिए बनाते हैं कि वह नागरिकों का पूरा ध्‍यान रखे। हमें सुख, सुविधा और सुरक्षा दे। पर यहां तो आधी आबादी के लिए दिन में दो रोटी के लाले पड़े हैं। रोज़गार और शिक्षा की दुकानों और अस्पहतालों पर उस आबादी के लिए ताले पड़े हैं। नंगे पैर जिसके पांवों में छाले पड़े हैं, अत्यांचार के मौसम में जिसके हाथ-पांव काले पड़े हैं, उसे कैसे समझ में आएगा तुम्हारी वोट का मतलब?
—सब बेकार की बात। बोट नायं डारैं, जाई मारै उनकी ऐसी हालत ऐ। वोट नायं डारी तौ और बुरी हालत है जायगी। सज़ा जरूरी ऐ।
—तुम भी प्रचंड हो गए चचा!

Tuesday, April 28, 2009

रास्‍ते नहीं फूटे रास्‍ते से ही फूट लिए

—चौं रे चम्पू! अधिकार का ऐ और कर्तब्य का ऐ, बता?

—ऐसी भारी-भरकम बात मत पूछो चचा! ऐसे अधिकारों को धिक्‍कार, जिनका कोई फल न मिले और ऐसे कर्तव्य बेकार, जिन पर ज़िन्दगी व्‍यय करने के बाद भी कोई पहचान न मिले।

—ऐसी मरी-मरी बुझी-बुझी बात! चम्‍पू तेरे म्‍हौं ते सोभा नायं दै रईं! जे तेरे ई बिचार ऐं का?

—मेरे नहीं हैं, पर समझो मेरे ही हैं, क्‍योंकि आजकल मैं युवा बनकर सोचने लगा हूं। ये आज के युवा के विचार हैं। चचा युवा-मन को समझने की बहुत कोशिश करता हूं । मेरा एक मन कहता है कि इन युवाओं की कर्तव्‍यहीनता और अधिकार-उदासीनता को तू सह मत और दूसरा मन कहता है कि फौरन सहमत हो जा। आंकड़े दिए जा रहे हैं कि इस समय भारतीय लोकतंत्र की निर्मिति युवाओं के हाथ में है। साड़े सतहत्तर करोड़ मतदाताओं में दस करोड़ मतदाता ऐसे होंगे जो पहली बार वोट डालेंगे, यानी ताज़ा-ताज़ा युवा। चउअन प्रतिशत मतदाता चालीस वर्ष से कम उम्र के हैं। इतने प्रतिशत मतदान हो जाए तो गनीमत समझी जाती है। यानी चचा, धुर जवानी अगर चालीस तक की मानी जाती है तो समझिए देश अब सचमुच युवाओं के हाथ में है।

—सवाल जे ऐ कै युवा कौनके हाथ में ऐं?

—किसी के हाथ में नहीं हैं। माता-पिता के होते हुए भी अनाथ जैसे भटक रहे हैं। अधेड़ अभिभावकों के आरोप हैं कि वे कन्‍फ्यूज़ हैं, दिग्‍भ्रमित हैं, भटक गए हैं। उनके सामने अब कोई आदर्श नहीं है। कल अख़बार पढ़ रहा था, वरिष्‍ठ मनोविज्ञानी अरुणा ब्रूटा कहती हैं कि आज के युवा को पता ही नहीं कि आदर्श का क्‍या मतलब है। जब युवाओं के आदर्श ही बिगड़े हुए हों और शॉर्टकट वाले लोग हों तो आप उनसे अधिक उम्‍मीद नहीं कर सकते। वरिष्‍ठ लेखक सुधीश पचौरी मानते हैं कि युवाओं के सामने अब आदर्श आईकॉन नहीं बनते, आइटम निर्मित होते हैं। युवा-वर्ग आइटमों से काम चलाता है, वह आईकॉनों को भूलने लगा है। आइटम भी अति चंचल और क्षणभंगुर! सिर्फ़ उतनी देर रहते हैं जितनी देर आप उन्‍हें उपभोग करें। वरिष्‍ठ पत्रकार विभांशु दिव्याल बहुत सारी चिंताएं गिनाने के बाद कहते हैं कि युवाओं की भूमिका और भागीदारी को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। चिंता उनके सामने विकल्‍प प्रस्‍तुत करने की होनी चाहिए।

—तू अपनी बता!

—सन उन्नीस सौ उनहत्तर में अठारह साल का युवा हुआ करता था मैं। वह वर्ष गांधी की जन्‍मशती का वर्ष था। गांधी का आईकॉन दिल-दिमाग में ऐसा घुसा कि ‘बांह छाती मुंह छपाछप’ रगड़ूं धोऊं तो भी आज साफ नहीं होता। आज अठारह का बनकर देखता हूं तो पाता हूं कि गांधी करैंसी नोट पर आइटम बनाकर पेश किए जा रहे हैं। दो अक्तूबर ड्राई-डे होता है। उपभोक्‍तावादी दौर में गांधीगिरी थोड़ी देर रहती है और संजय दत्‍त की तरह सक्रिय राजनीति में शामिल होकर साफ हो जाती है। सन उन्नीस सौ उनहत्तर में ही मैंने मुक्तिबोध की एक किताब पढ़ी थी, जो मथुरा में सुधीश पचौरी ने दिल्ली से लाकर मुझे दी थी— ‘नई कविता का आत्‍मसंघर्ष’ । उसमें नई कविता का कम, युवा-मन का आत्‍मसंघर्ष अधिक था। मध्यवर्गीय युवा एक कदम रखता था तो सौ राहें फूटती थीं। कदम भले ही गांधी जी के कहने पर रखा हो, गौडसे के कहने पर रखा हो या मार्क्स के कहने पर, क़दम रखा जाता था। फिर सौ राहों के विकल्‍पों में बड़े-बड़े सिद्धांतों अथवा सिद्ध-अंतों से प्रभावित होता हुआ, कर्तव्‍य, अधिकार और विचार की राह पर चल पड़ता था। आज आलम ये है चचा कि सौ रास्‍ते सामने हैं पर नौजवान उन पर कदम रखने के बजाय उन रास्‍तों से ही फूट लेता है। चालीस साल पहले जो धांसू विकल्‍प आते थे, उन पर सोचने-विचारने का सुकून भरा समय होता था। आज इस उपभोक्‍तावादी आपाघापी में न तो युवाओं के पास सोचने का समय है और न उन्हें कोई विकल्‍प धांसू लगता है। ज्ञान और सूचनाओं की ऐसी बाढ़ आई है कि दिल और दिमाग के बांध टूट गए हैं। समस्‍या पहला कदम रखने की है।

—तौ बता नौजवान पहलौ कदम का रक्खैं?

—अपने मताधिकार का कर्तव्य की तरह पालन करें। वोट डालने ज़रूर जाएं। भले ही बाद में गाएं— ‘वोटर गारी देवे, पार्टी जी बचा लेवे, मतदान गेंदा फूल। प्रत्याशी छेड़ देवे, मीडिया चुटकी लेवे, मतदान गैंदा फूल।

Saturday, April 25, 2009

20वीं जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी

हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी
20वीं जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी

बहुत-बहुत फ़ास्ट पॉडकास्ट
मुख्य अतिथि :डॉ. निर्मला जैन, वरिष्ठ साहित्यकार
अध्यक्ष :श्री उदय प्रताप सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार एवं राजनेता
सम्मान :वरिष्ठ पत्रकार श्री आलोक मेहता को ‘जयजयवंती सम्मान
मुख्य-प्रस्तुति :‘बहुत बहुत फास्ट पॉडकास्ट’ श्री अभिषेक बक्शी, माइक्रोसॉफ़्ट
ब्लॉग-पाठ : श्री मुकेश कुमार, ‘देशकाल डॉट कॉम’

आप सादर आमंत्रित हैं।


अशोक चक्रधर
अध्यक्ष, जयजयवंती
(संयोजन)


राकेश पांडेय
संपादक, प्रवासी संसार
(व्यवस्था)

26 अप्रैल 2009 / रविवार / 6.30 चाय-कॉफी / 6:45 कार्यक्रम आरंभ
गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबीटैट सैंटर, लोदी रोड, नई दिल्ली






लाइव मीटिंग के लिए न्यौता

Join the meeting.

Audio Information
Computer Audio
To use computer audio, you need speakers and microphone, or a headset.
First Time Users:
To save time before the meeting, check your system to make sure it is ready to use Microsoft Office Live Meeting.
Troubleshooting
Unable to join the meeting? Follow these steps:

1. Copy this address and paste it into your web browser:
https://www.livemeeting.com/cc/usergroups/join

2. Copy and paste the required information:
Meeting ID: BMCKB2
Entry Code: 2/;GPsS@c
Location: https://www.livemeeting.com/cc/usergroups

If you still cannot enter the meeting, contact support

ध्यान दें
Microsoft Office Live Meeting can be used to record meetings. By participating in this meeting, you agree that your communications may be monitored or recorded at any time during the meeting.

Friday, April 24, 2009

हरी पेंसिल — पीली पेंसिल

—चौं रे चम्पू! प्यार ते मजबूत बंधन कौन सौ ऐ रे?
—चचा! जो लोग समझते हैं कि प्यार का बंधन सबसे मज़बूत होता है, वे मूर्ख हैं। प्यार तो किसी भी नखरीली गैल में रूठने के बाद टूट सकता है, पर एक बंधन होता है कृतज्ञता का, ये बंधन कभी नहीं टूटता। लेकिन…. ये बात कृतघ्नों पर एप्लाई नहीं होती चचा!
—कृतज्ञ कौन और कृतघ्न कौन?
—कृतज्ञ माने अहसानमंद और कृतघ्न माने अहसानफ़रामोश। एक होशमंदी का उदाहरण देता हूं कि कृतज्ञ होते हैं वोटर और कृतघ्न होते हैं नेता। वोट लेकर वोटर को भूल जाएं ऐसा दुर्गुण नेताओं में पाया जाता है। और वोटर को देखिए! जिसका खाओ उसकी गाओ, जिसका पियो उसके लिए जिओ। इन दिनों वोटर को खिलाने-पिलाने के सारे इंतज़ाम चल रहे हैं क्योंकि हमारे नेता जानते हैं कि खाने-पीने के बाद वोटर जान दे देगा पर अपनी आन नहीं छोड़ेगा।
जिसने अपने महान नेता के हाथ से सौ का नोट ले लिया, जिसके कुनबे ने दो जून की रोटी खा ली वो अप्रैल-मई में दगा थोड़े ही देगा। जिसने शराब पी ली वह कोई दूसरा बटन थोड़े ही दबाएगा। पोस्टमार्टम के बाद भी अगर उसका हाथ कहीं गिरेगा तो उसी बटन पर गिरेगा। और नेता लोग भी कृतघ्न भले ही हों, जान-बूझ कर तो ज़हरीली शराब बांटेंगे नहीं। ये तो बीच के आंसी-सांसी लोग हैं जो पच्चीस परसैंट से ज़्यादा मिथाइल एल्कोहल मिला देते हैं। नशीले कैप्सूल डाल देते हैं। वोटर पस्त! चक्कर, उलटी, दस्त! पीने वाले की कृतज्ञता देखिए कि पिलाने वाले का नाम तक नहीं बताता। उसे क्या मतलब कि पउए की थैली बांटने वाला ख़ुद रुपयों से थैली भरेगा। उसने पी ली है तो उसी की खातिर मरेगा। कोई नामबताऊ अर्ध-मुर्दा करवट भी लेने लगे तो पुलिस उसकी डंडा-डोली कर देती है।
—नामुराद पुलिस नै बंटाढार कद्दियौ।
—देखो चचा, मैं ज़िन्दा-मुर्दा कुछ भी बर्दाश्त कर सकता हूं, लेकिन पुलिस की निन्दा नहीं। इतने भोले-सरल पुलिस वालों को कुछ न कहना। उनसे महान कौन होगा जो ड्यूटी करते हुए अपने शरीर तक की परवाह नहीं करते। कितनी तोंद बढ़ जाती है, आंखों के पपोटे फूल जाते हैं, हिलने तक में कई बार परेशानी आती है, फिर भी बड़े अफसर के आने पर खड़े होते हैं। इनकी कितनी ऊर्जा कृतज्ञ और कृतघ्नों के बीच संतुलन बनाने में खर्च होती है। पोस्टमार्टम के बाद कितनी ही विधवाओं ने चाहा कि शव को एक बार घर ले जाने दो पर पुलिस ने उनके पैसे बचवाए— नहीं, सीधे मुर्दघाट लेकर जाओ! फूंक दो!

अब इसमें बचा ही क्या है? चचा, हमारी बेचारी भोली पुलिस भूल जाती है कि फूंकने के बाद बचता है विधवा का वोट। विधवा की हाय लग जाय तो लोग पुलिस चौकी को फूंक डालते हैं। वोटरों ने राजौरी गार्डन पुलिस बूथ को फूंक दिया कि नहीं?
—जिन लोगन्नै जहरीली सराब कांड में पुलिस चौकी फूंकी वो कृतज्ञ ऐं कै कृतघ्न ऐं?
—चचा, मुझे कंफ्यूज़ करने की कोशिश मत करो। एक बात सोचो, अख़बार में छाप दिया कि ज़हरीली शराब से पन्द्रह मरे, तीस गम्भीर। मैं आपसे सवाल करता हूं कि क्या इस मुद्दे पर सिर्फ़ तीस लोगों के गम्भीर होने से बात बनेगी। सोचो चचा, सोचो! गम्भीरता से सोचो कि कितने लोगों की गम्भीरता चाहिए। एक पुलिस वाले ने मुझे बताया था कि चोरी, डकैती, कत्ल का अपराधी एक बार मौक़ा-ए-वारदात पर ज़रूर आता है, ये देखने के लिए कि कहीं उस पर तो शक नहीं जा रहा। इसी तरह दो दिन से नेता लोग झुग्गियों में जा-जा कर मरे हुए लोगों से हाल पूछ रहे हैं और मरीज़ों को श्मशान और कब्रिस्तान में सुविधाएं दिलाने का वादा कर रहे हैं।
—छोड़ इन बातन्नै! एक पार्टी कौ कार्यकर्ता जे दो पेंसिल दै गयौ ऐ। कित्ती अच्छी बात ऐ! तुम पढ़ौ-लिखौ जाके ताईं कैसौ भड़िया प्रतीकात्मक उपहार ऐ।
—वाह चचा! लाओ मुझे दो ये पेंसिल! इन पेंसिलों का पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता नहीं है। जे. जे. कॉलोनी के कच्ची दारू के ठेके पर हरी पेंसिल के बदले महुआ से खिंची कच्ची शराब मिलेगी और पीली के बदले रम। उस कार्यकर्ता ने तुम्हें पेंसिल का महत्व नहीं बताया क्या? बैठो, मैं अभी लाया दो थैलियां। बगीची पर गिलास तो रखे हैं न? पी कर मर गए तो हरिद्वार में मिलेंगे, नहीं तो यहीं अगले बुधवार को।

Thursday, April 23, 2009

क्या सबसे पचनीय?

काजू ताजा नारियल, किशमिश और बदाम,
रोट बने अखरोट के, लीची ललित ललाम,
लीची ललित ललाम, बताओ क्या-क्या खाएं?
व्यंजन जो पच जायं, हमें तत्काल बताएं!
चक्र सुदर्शन, किस व्यंजन में कितना बूता,
सबसे जल्दी पचता, पत्रकार का जूता।

Wednesday, April 22, 2009

वोटर कित्ते प्रकार के

—चौं रे चम्पू! वोटर कित्ते प्रकार के होंय?
—चचा जिस तरह का हमारा लोकतंत्र है, उसमें वोट बड़ी बेतुकी-सी चीज़ हो गई है| वोटर भी बेतुका-सा बनकर रह गया है।
—का बात कर दई? हमारे महान लोकतंत्र के बारे में तेरे ऐसे बेतुके बिचार! मोय तोते ऐसी उम्मीद ना ईं रे।
—चचा मुझे अपने देश के लोकतंत्र पर बेहद गर्व है। मेरा विचार अगर आपको बेतुका लग रहा है तो चलिए तुक मिला देता हूं। वोट की जितनी भी तुकें हो सकती हैं, उतने ही प्रकार के वोटर होते हैं। शुरू करते हैं ओट से।

पहला वोटर होता है ओटर, जो ओट में रहता है। वोट डालने के नाम पर छिप जाता है इसलिए उसे खोज कर पोलिंग बूथ तक लाना पड़ता है। अगला खोटर, इसके मन में खोट होता है। खुंदक में किसी को भी वोट डाल सकता है। अगला वोटर है गोटर, जो दूसरों के लिए भी गोटियां बिछाता है। न केवल खुद वोट डालता है, बल्कि दूसरों से भी अपनी मनवांछित वोटें डलवाता है। नैक्‍स्‍ट घोटर! ये वाला वोटर बहुत घोटा लगाता है। मंथन करता है। किसे दूं? अंतिम क्षण तक निर्णय पर नहीं पहुंच पाता। जब तक उंगली पर नीला निशान नहीं लगता, तब तक वह निर्णय की ओर नहीं बढ़ता। उसका घोटन तभी समाप्त होता है, जब बटन दब जाता है।
—चुप्‍प चौं है गयौ? आगे बोल।
—तुकें तो सोचने दो चचा। एक होता है चोटर। जिसे बाहुबली पीट देते हैं, क्‍योंकि बाहुबलियों को पता चल जाता है कि वह किसे वोट डालने वाला है। ऐसे वोटर को छोटर भी कह सकते हैं, क्‍योंकि महान लोकतंत्र में वह पिद्दी-सा है, छोटा-सा है। एक और होता है— टोटर। वह टोटकों का शिकार होता है। गांव के मुखिया और सशक्‍त लोग उसे धमका देते हैं कि पट्ठे, अगर तूने हमारे उम्‍मीदवार को वोट नहीं डाला तो डायन-पिशाचिनी तेरा सर्वनाश कर देगी।
और चचा यह तो आप जानते हैं कि नोटर नामक वोटर जिससे नोट लेता है, उसी को वोट देता है। मोटर नामक वोटर तब तक घर से नहीं निकलता, जब तक कि कोई वाहन उसे लेने न आ जाए। एक होता है रोटर, जो एक वक्‍त की रोटी की लालच में ही आदेशानुसार बताए गए चुनाव चिह्न का बटन दबाता है। ओवरकोटर नामक वोटर सिर्फ रोटी से नहीं बहलता, उसे कंबल और ओवरकोट चाहिए। एक होता है लंगोटर, वह इस चिंता में वोट डालने चला जाता है कि कहीं नेता लोग उसका लंगोट भी छीन कर न ले जाएं। पेटीकोटर मानसिकता का कुंठित वोटर इसलिए बूथ तक आता है कि बूथ पर महिलाएं दिखाई देंगी। अगला विस्‍फोटर! यह पोलिंग-बूथ को मौका-ए-सनसनी-ए-जुर्म-ए-वारदात बना सकता हैं। कट्टा-तमंचा साथ लेकर जाता है। गलाघोटर भी इसी संप्रदाय का वोटर होता है। कचोटर वह वोटर है, जिसे वोट डालने के बाद उसकी आत्‍मा कचोटती रहती है। वह सोचता है कि कम्बख्‍़त जब तुझे अपने चुने हुए प्रतिनिधि को घटिया प्रदर्शन पर वापस बुलाने का अधिकार नहीं है तो चुनकर ही क्‍यों भेजता है? कुछ वोटर लोटपोटर होते हैं, जिनके लिए चुनाव एक प्रहसन अथवा हास्‍य नाटक है। अखरोटर किस्‍म के वोटर दरवाज़ा तोड़ने पर ही घर से निकलते हैं, जैसे—अखरोट की मेवा दम लगाकर तोड़ने से निकलती है। प्रमोटर नामक वोटर बुद्धिजीवी होता है, जो जन-जन को वोट की महत्ता समझाता है। उससे भी ऊंचे दर्जे का होता है पेट्रीयोटर। यह मताधिकार का प्रयोग करने में अपनी देश-भक्ति की सार्थकता समझता है। सपोटर और सपोर्टर किस्‍म के वोटर मूलत: नेताओं के पिछलग्‍गू होते हैं, जो वोट डालने से पहले जिसको सपोर्ट कर रहे होते हैं उसका माल सपोटने में संकोच नहीं करते। इनमें जो श्रेष्‍ठ होते हैं, उन्‍हें लोटमलोटर कहा जा सकता है। वे अपने प्रत्‍याशी के कैम्‍प में अहर्निश लोटमलोट मुद्रा में पाए जा सकते हैं। वे तामलोट भी अपने प्रत्‍याशी का ही प्रयोग में लाते हैं। एक होता है मिस्कोटर, जो लोकतंत्र के लिए एक मिस्‍ट्री है। बातें तो ऊंची-ऊंची करेगा, लेकिन अपने ऊंचे भवन से निकलेगा ही नहीं।
—सबते खराब बोटर कौन सौ ऐ रे?
—वह जो स्‍वयं प्रत्‍याशी भी है, और इसलिए खड़ा हुआ है ताकि जीतने के बाद नोंचखसोटर, अथवा लूटखसोटर बन सके।
—और सबते सानदार बोटर कौन सौ ऐ?
—सबसे शानदार है होता है डिवोटर। जो हर हालत में वोट डालने जाता है। आंधी हो, तूफ़ान हो, कैसा भी व्यवधान हो, सम्मान हो या असम्मान हो, कितना ही म्लान हो, कितनी ही थकान हो और भले ही लहूलुहान हो वह चाहता है कि उसका मतदान हो और उँगली पर लोकतंत्र की स्याही का निशान हो। चचा, ऐसे डिवोटर वोटर का जयगान हो।

Thursday, April 16, 2009

चक्र सुदर्शन / विरह और मिलन

मिलन कामना उर बसी, फिर क्यों बिछुड़े नाथ?
बस कुछ दिन की दुश्मनी, फिर मिलाएंगे हाथ।
फिर मिलाएंगे हाथ, अभी नकली तलाक है,
वोटर को फुसलाना, क्या कोई मज़ाक है!
चक्र सुदर्शन, कुछ दिन का है रोल विलन का,
बिना विरह के बोलो क्या आनंद मिलन का!

Friday, January 23, 2009

नायक, खलनायक और दखलनायक

—चौं रे चम्पू! समाज के सच्चे नायक कब सामने आमिंगे रे?
—सच्चे नायक अपने आप कभी आगे नहीं आते चचा, आगे लाए जाते हैं। अपने आप आगे आते हैं खलनायक।
—तौ राज खलनायकन कौ ऐ?
—नहीं चचा, लोकतंत्र में खलनायक कभी राज नहीं कर सकते।
—कमाल ऐ? नायक आगे नायं आमैं, खलनायक राज नायं कर सकैं, फिर राज-काज कौन चलाय रह्यौ ऐ?
—वो एक तीसरी प्रजाति है चचा। न नायक, न खलनायक, वे हैं दखलनायक। ये दखलनायक हमेशा दखल देते हैं। नायक और खलनायक आगे न आ जाएं, इसलिए दखल देते हैं। बात थोड़ी उलझी हुई सी लग सकती है चचा।
—तू सुलझाय दै।
—चचा, सब जानते हैं कि खलनायक मूर्ख और अहंकारी होता है। उस पर तरस आता है। अपनी झूठी अकड़ और बड़बोलेपन के कारण उस पर हंसी भी आती है। लोग उससे डरते और किनारा करते हैं। लेकिन सब जानते हैं कि उसे एक न एक दिन मरना है। और खलनायक सदियों से मरते आ रहे हैं। उनके मरने पर खुशियां मनाई जाती हैं। चचा, ये दखलनायक, खलनायक से ज़्यादा ख़तरनाक होता है, क्योंकि, न तो अहंकारी होता है और न ही मूर्ख। न राक्षसी अट्टहास करता है और न बड़बोला होता है। ये सारे काम नेपथ्य में करता है। पर्दे के पीछे। इसका सबसे पहला काम होता है नायकों की काट करना। चचा, नायक और खलनायक दोनों भोले होते हैं। अंतर इतना ही है कि खलनायक अहंकारी होता है और नायक स्वाभिमानी। नायक समर्पण और निष्ठा के साथ जनहित में काम करता है। खलनायक निजिहित में मनमानी। दोनों के द्वारा किए गए कार्यों के परिणाम साफ दिखाई देते हैं। नायक काम का दिखावा नहीं करता। वह श्रेय भी नहीं चाहता पर एक चीज़ उसे सहन नहीं हो पाती।
—वो कौन सी चीज?
—वो ये कि कोई उसके काम पर उंगली उठाए। यही उससे सहन नहीं होता। और इन दखलनायकों का काम उंगली उठाना ही होता है। पर दखलनायक चालाक होते हैं, वे उसके सामने उंगली नहीं उठाते। महाप्रभुओं को एकांत में उसके बारे में उल्टी सूचनाएं देते हैं। उदाहरण के लिए चचा, हमारे देश में ज्ञान की जितनी परीक्षाएं होती हैं उनमें सबसे कठिन मानी जाती हैं प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाएं, जैसे आई.ए.एस. की परीक्षा। इस देश को आई.ए.एस, आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. ही चला रहे हैं। जो इन परीक्षाओं में टॉप करे उसे नायक माना जा सकता है। लेकिन, एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इन परीक्षाओं के जितने भी टॉपर हैं वे किसी न किसी कारण से निरंतरता में प्रशासनिक सेवाएं नहीं दे पाए, त्याग-पत्र देते रहे। टॉपर नायकों के सामने स्टॉपर दखलनायक भारी पड़ते रहे। अच्छा-सच्चा और ज्ञानी नायक अपनी स्वाभिमानी प्रवृत्ति के कारण आगे नहीं आ पाता चचा। आगे आते हैं कामचोर, आंकड़ों का जमावड़ा दिखाकर प्रभावित कर लेने वाले चाटुकार। ये अपने अधीनस्थों को दबाते हैं और उच्च-पदस्थों के आगे सिर नवाते हैं। नायक न दबता हैं न दबाता है। खलनायक मारा जाता है। दखलनायक राजकाज चलाता है। समझे!
—दखलनायक के प्रभाव में महाप्रभु चौं आ जायं रे?
—क्योंकि नायक और महाप्रभु में सीधा-संवाद प्राय: नहीं होता। जहां-जहां महाप्रभु नायकों की पहचान रखते हैं, वहां काम अच्छा होता है, लेकिन हमारे देश के महाप्रभु या तो अंधे हैं या फिर उनके भी अपने धंधे हैं। वे नायकों की उपेक्षा करते हैं।
—ऐसौ चौं भइया?
—महाप्रभु ‘ना’ सुनना पसंद नहीं करते और नायक हर बात के लिए ‘हां’ नहीं करता। दखलनायक के पास महाप्रभुओं के लिए ‘हां’ के अलावा और कुछ नहीं होता और अपने अधीनस्थों के लिए ‘ना’ के अलावा कुछ नहीं होता। दखलनायक बिचौलिए होते हैं। सीमित ज्ञान से असीमित उपलब्धियां यही लोग प्राप्त कर सकते हैं। ये घर के भेदिए होते हैं, सब जानते हैं। इन्हीं का हर क्षेत्र में हस्तक्षेप होता है और शासन-प्रशासन पर इन्हीं का आधिपत्य चलता है। ‘दखल’ शब्द उर्दू का है और इसके यही दोनों अर्थ हैं— हस्तक्षेप और आधिपत्य। उदाहरण दे कर समझाता हूं— अगर हम कहें कि किसी के काम में दखल मत दो तो इसका अर्थ हुआ ‘हस्तक्षेप मत करो’ और अगर कहें कि इस भूमि पर किसका दखल है तो अर्थ होगा, ‘किसका आधिपत्य है’। दखलनायक नायक के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं और सत्ता-अधिग्रहण करके आधिकारिक तौर पर आधिपत्य जमा लेते हैं।
—चम्पू! भासा में तेरी दखलंदाजी ते मोय बड़ौ मजा आवै।

Tuesday, January 20, 2009

हाय असत्यम

सत्यम के संग शिव नहीं, शिव संग सुन्दर नाहिं,
धन अंसुअन की झील में, शेयर पड़े कराहिं।
शेयर पड़े कराहिं, बचा नहिं एक अधन्ना,
बजे तड़पती ताल, ताक धन धन धन धन्ना।
चक्र सुदर्शन, हवस खोपड़ी करती धम धम,
हाय असत्यम, हाय असत्यम, हाय असत्यम।

Tuesday, January 06, 2009

कटाई छंटाई बुरशाई कुतराई की चतुराई

—चौं रे चम्पू! फसल कटाई-छंटाई के अबसर पै गाम में दस-पंद्रै कबीन कूं लै कै एक अखिल भारतीय कविसम्मेलन करायं तौ कित्ते पइसा लगिंगे?
—चचा, भूल जाओ अखिल भारतीय। लाख-दो-लाख से कम में नहीं होते आजकल कविसम्मेलन।
—अच्छा! इत्ते रुपइया! इत्ते की तो फसल ऊ न होयगी। टैक्टर गिरवी धरनौ पड़ैगौ।
मैंनै सोची दो-तीन हजार में है जायगौ। संग में देसी घी के साग-पूरी की दावत और रायते में सन्नाटौ कर दिंगे। चल पांच हज़ार सई। बस कौ किरायौ अलग ते।
—अखिल पंचायती कविसम्मेलन भी नहीं होगा चचा। ऐसा करो, मेरा एकल काव्य-पाठ रख लो। फोकट-फण्ड में। गन्ने का रस पिला देना और ताज़ा गुड़ खिला देना।
—अरे हट्ट रे! तेरी कौन सुनैगौ? कबियन की लिस्ट में छंटनी कर लिंगे। तब तौ है जायगौ?
—तुम्हें भी छंटनी की महानगरीय बीमारी लग गई चचा।
—चल छोड़ कविसम्मेलन! खिच्चू आटे वारे के चेला रसिया गा दिंगे। तू छंटनी की बता।
—बड़ी-बड़ी कम्पनियां वैश्विक मंदी के नाम पर मोटी और छोटी-मोटी तनख़्वाह वाले कर्मचारियों को धकाधक निकाल रही हैं। महानगरों में नौकरी के भरोसे भारी कर्ज़ लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले नौजवानों में हड़कम्प मच गया है। छंटनी की तलवार हर किसी पर लटकी हुई है। तुम कटाई-छंटाई का उल्लास मनाना चाहते हो और महानगरों में कटाई-छंटाई का मातम चल रहा है। जो छंटनी से बच गए उनकी कटाई चल रही है। तनख़्वाह, पैंशन और इन्क्रीमैंट में कटाई। ग्रामीण और शहरी संस्कृति में यही अंतर है चचा! गांव में खुशी के कारण शहर तक आते-आते दुःख के कारण बन जाते हैं। छंटनी शब्द वैसे आया गांव से ही है।
—सुद्ध भासा में कहते तौ का कहते?
—उसको कहते कृंतन या कर्तन। जैसे वाल काटने-छांटने वाले कई भाइयों ने दुकान के आगे लिखवा रखा है ‘केश कर्तनालय’। जब से इन दुकानों पर केश के साथ फेस पर भी काम होने लगा तब से सब के सब ब्यूटी पार्लर हो गए हैं। जो एग्ज़िक्यूटिव हर हफ्ते ब्यूटी पार्लर जाया करते थे उन्होंने अपने बजट में कटाई करते हुए पार्लर जाना बन्द कर दिया। वहां बटुआ कर्तन होता था। चचा, एक शब्द और है— बुरशाई। मुद्रण जगत के लोग जानते हैं कि किताबों की बाइंडिंग के बाद बुरशाई की जाती है। बुरशाई, कटिंग मशीन पर कागज़ को बहुत मामूली सा काटने की प्रक्रिया को कहते हैं। आड़े-तिरछे निकले हुए फालतू कागज़ कट कर इकसार हो जाते हैं। किताब चिकनी कटी हाथ में आती है। कुछ कम्पनियों ने छंटाई की जगह अपने खर्चों में बुरशाई शुरू की है। ये ठीक है! आदमी मत निकालो, फालतू के खर्चे कम करो। कई एयरलाइंस कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों को बिज़नेस क्लास की जगह इकॉनोमी क्लास में सफर करने की हिदायत दी हैं। कुछ कहती हैं कि जाते क्यों हो, टेलिकांफ्रैंसिंग से काम चलाओ। यात्रियों के नाश्ते-पानी में भी कतराई-बुरशाई हुई है। कुछ सॉफ्टवेयर कम्पनियों ने कर्मचारियों को फोकट की चाय-कॉफी पिलाना बंद कर दिया है। फालतू की फोटोकॉपी बाज़ी और कम्प्यूटर-प्रिंटर के इस्तेमाल में चतुराई से कुतराई की है।
—कुतराई?
—हां चचा! कम्पनी के मालिकों की चेतना जब चूहों से मेल खाए तो वे अपने खर्चों को कुतरने लगते हैं। एक आइडिया है, आप तो जानते हैं कि कविता का जन्म करुणा से होता है। जिनकी पिछले दिनों छंटनी हुई है वे ज़रूर कवि बन चुके होंगे। एक छंटनीग्रस्त कवियों का सम्मेलन करा लीजिए। करना ये होगा कि बस एक-एक पोस्टर बड़ी-बड़ी कम्पनियों के दरवाज़े के बाहर लगा दिया जाए, जिस पर लिखा हो— ’छंटनीग्रस्त कवियों को कविता-पाठ का खुला निमंत्रण’। दस-बीस नहीं हज़ारों में मिलेंगे। बड़ी-बड़ी दर्दनाक, मर्मस्पर्शी कविताओं का मौलिक सृजन सामने आएगा। नाम रखेंगे ‘कटाई-छंटाई-बुरशाई कुतराई कविसम्मेलन’। अखिल भारतीय कविसम्मेलन के नाम पर होने वाले लतीफा सम्मेलनों से भी मुक्ति मिलेगी। कैसी रही?
—तौ जे बता, मैं अब पांच हजार में ते कित्ते की कटाई-छंटाई-बुरशाई-कुतराई की चतुराई दिखाऊं?

Sunday, January 04, 2009

17वीं जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी



17वीं जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी
हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी
मीडिया में भाषा और तकनीक

अध्यक्ष : श्री शरद दत्त, वरिष्ठ मीडियाकर्मी
सम्मान : वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक को 'जयजयवंती सम्मान'
एवं उनके कम्प्यूटर पर हिन्दी सॉफ्टवेयर 'सुविधा'
लोकार्पण : डॉ. स्मिता मिश्र एवं डॉ. अमरनाथ 'अमर' द्वारा लिखित
'इलेक्ट्रॉनिक मीडिया : बदलते आयाम'
मुख्य-प्रस्तुति : श्री पंकज पचौरी, वरिष्ठ मीडियाकर्मी, एन.डी.टी.वी.
ब्लॉग-पाठ : श्रीमती वर्तिका नंदा एवं श्री पवन दीक्षित

आप सादर आमंत्रित हैं।
अशोक चक्रधर
अध्यक्ष, जयजयवंती
(संयोजन) 26941616

राकेश पांडेय
संपादक, प्रवासी संसार
(व्यवस्था) 9810180765

11 जनवरी 2009 / रविवार
सायं 6.15 से चाय-कॉफी / 6.30 कार्यक्रम आरंभ
गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबीटैट सैंटर, लोदी रोड, नई दिल्ली
संरक्षक : श्री गंगाधर जसवानी एवं पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर (मंत्री, चित्र कला संगम)

Friday, December 26, 2008

सूमो टिंगो हमारे सूम को नहीं पछाड़ सकता

—चौं रे चम्पूस! कोई ऐसी बात हतै तेरे पास जाते मन खुस है जाय?
—क्यार दोगे अगर ऐसी कोई बात बताई?
—आसीरवाद दिंगे और का!
—बड़े कंजूस हो चचा! चलो एक खुशी की बात बताता हूं कि अंग्रेज़ी की एक किताब में ‘कंजूस मक्खीडचूस’ शब्दच को आदरपूर्वक स्थांन दिया गया है।
—कौन-सी किताब ऐ?
—बड़ा हल्लाच है किताब का। ब्रिटिश राइटर एडम जाको द बोइनोद ने बनाई है।
—बड़ौ बिचित्र नाम ऐ।
—विचित्र तो किताब है चचा। तीस साल श्रम करके उसने पूरी दुनिया की विभिन्नय भाषाओं से ऐसे शब्दत तलाश किए जो अनोखे हैं और ऐसा अर्थ देते हैं जिन्हें सुन कर झुरझुरी-सी आ जाए, जुगुप्साि हो या भय का कंपन व्या प्तस हो जाए, शरीर में। किताब का नाम है— ताउजोर्स टिंगो।
—किताब कौ नाम ऊ बिचित्र ऐ। मतलब का भयौ?
—एस्टबर आईलैंड में प्रचलित एक शब्दा है ‘टिंगो’। टिंगो एक प्रवृत्ति है। आप अपने पड़ोसी से कुछ मांगने जाओ, मिल जाए तो फिर कुछ मांगने जाओ और तब तक मांगते रहो जब तक कि उसका घर ख़ाली न हो जाए। देखा, शब्दा ज़रा-सा है और अर्थ सोचने बैठो तो कितनी ही कहानियां जन्म ले सकती हैं। मांगने वाले से कोई दुःखी हो जाए तो हमारे यहां कहते हैं— ‘आंती आना’। होते हैं कुछ लोग ऐसे, जो मांगते ही रहते हैं। देने वाला आंती आ जाता है, पर अपने दानशील स्वेभाव के कारण देने से मना नहीं करता। पर चचा, भाषाएं कभी आंती नहीं आतीं। वे उदार होती हैं। अफसोस है कि एडम ने हिंदी से केवल दो शब्द-युग्मा लिए। अगर उसका टिंगोनुमा इरादा होता और हमसे हमारे मुहावरे और हमारी कहावतें मांगता, हम देते जाते, देते जाते, फिर भी हमारा घर खाली नहीं होता। हमारी भाषाओं के पास लोकोक्तियों, मुहावरों और कहावतों का अथाह भंडार है। ताउजोर्स टिंगो का हल्ला हो गया। ऐमेज़ॉन डॉट कॉम पर धकाधक बिक रही है। इधर हमारे अरविंद कुमार के थिज़ारस की मामूली-सी चर्चा होकर रह गई। शब्दोंह का जितना शोध अरविंद कुमार ने किया है आधुनिक युग में उतना संसार के कुछ गिनेचुने भाषा-शास्त्रियों ने ही किया होगा। वे भी चालीस साल से समांतर कोश बनाने में लगे हुए हैं। कंजूस के कितने ही पर्यायवाची प्रसंग उनके कोश में मिल जाएंगे। संसार का सबसे बड़ा थिज़ारस है। इसी तरह डा. भोलानाथ तिवारी ने हिंदी का बृहत लोकोक्ति कोश बनाया। शब्दों के अनुसंधान पर ज़िंदगी खर्च‍ कर दी। हिंदी के दिग्गलज लोग भोलानाथ का भाषा-विज्ञान के लिए ‘भाषा नाथ का भोला-विज्ञान’ कहकर मज़ाक बनाते रहे। हमारे यहां प्रशंसा में बेहद कंजूसी बरती जाती है।
—एडम कूं कंजूस-मक्खींचूस में का खास बात दिखी भैया?
—ख़ास बात हमें नहीं दिखती, क्यों कि हम बचपन से सुनते-सुनते इसके आदी हो गए हैं, लेकिन कोई विदेशी अगर अपनी भाषा में मक्खी चूस का अनुवाद पढ़ेगा तो मक्खी के चूसने की कल्पवना से ही उसे ज़बरदस्ती झुरझुरी आ जाएगी। कंजूस के लिए एक शब्दे है सूम। सूम की कहानी दो दोहों में सुनो चचा— ‘जोरू बोली सूम की, क्यों् कर चित्त मलीन। का तेरौ कछु गिर गयौ, का काहू कछु दीन?’ सूम जवाब देता है— ‘ना मेरौ कछु गिर गयौ, ना काहू कछु दीन। देतौ देखौ और कूं, तांसू चित्त मलीन’। कोई किसी को कुछ दे रहा है, इसी से सूम दुःखी हो जाता है। कितना भी सूमो जितना बलशाली टिंगो हो हमारे सूम को नहीं पछाड़ सकता। वह सूम से कुछ लेकर तो दिखा दे। बहरहाल, एडम की किताब तो टिंगो-टैक्नीक से बन ही गई।
—हिंदी कौ दूसरौ कौन सौ सब्दर लियौ?
—ये कहानी भी दिलचस्पस है चचा। दो दिन पहले एक टी.वी. चैनल से मेरे पास एक फोन आया, इस खुशखबरी का कि हमारे दो शब्दर लंदन में आदर पा रहे हैं। कंजूस-मक्खीैचूस तो उनकी समझ में आ गया था, दूसरा रोमन में लिखा होने के कारण समझ में नहीं आया। और जैसा उनकी समझ में आया, वैसा मेरी समझ में नहीं आ पाया। वे पूछने लगे— ‘काती कहरी’ क्याज होता है? मैंने कहा कि भैया ‘काती कहरी’ मैंने तो सुना नहीं। वे कहने लगे— शेर की खाल से काती हुई किसी चीज़ को नापने जैसा कोई भाव है। मैंने दिमाग दौड़ाया। व्यांघ्र-चर्म तो सुना था पर शेर की खाल का धागा…. वह तो बनता नहीं, जिसे कात-बुन कर नापा जाए। और दिमाग दौड़ाया। सोचने लगा कि ‘काती कहरी’ को रोमन में कैसे लिखा गया होगा? झट से समझ में आ गया। शब्दे रहा होगा ‘कटि-केहरी’। शेर की कमर को नापने का संदर्भ रहा होगा। सोचो चचा, शेर की कमर को नापने का काम किसी को सौंपा जाए तो उसे झुरझुरी आएगी कि नहीं? ऐसे ही हज़ारों शब्दोंन का संकलन किया है एडम साहब ने।
—किताब कित्ते रुपैया की ऐ?
—भारतीय मुद्रा में केवल पाँच सौ कुछ रुपए की।
—इत्ते रुपैया खर्च करिबे ते अच्छौौ ऐ कै कटि-केहरी नाप कै आ जायं, तुम भलेई हमें कंजूस मक्खीतचूस बताऔ। का फरक परै?

Friday, December 19, 2008

16वीं जयजयवंती साहित्य-संगोष्ठी


हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी
ब्लॉग-पाठ : एक सिलसिला

मुख्य अतिथि : डॉ. प्रभा ठाकुर, वरिष्ठ कवयित्री एवं सांसद
अध्यक्ष : डॉ. रामशरण जोशी, उपाध्यक्ष, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान
सम्मान : वरिष्ठ भाषाविद् प्रो. सूरज भान सिंह को 'जयजयवंती सम्मान' एवं उनके कम्प्यूटर पर हिन्दी सॉफ्टवेयर 'सुविधा'
प्रस्तावना : डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, कम्प्यूटरकर्मी भाषाविद्
ब्लॉग-पाठ : श्रीमती प्रत्यक्षा, डॉ. आलोक पुराणिक, श्री रवीश कुमार, श्री अविनाश वाचस्पति एवं श्रीमती संगीता मनराल

आप सादर आमंत्रित हैं।
अशोक चक्रधर
अध्यक्ष, जयजयवंती
(संयोजन)
26941616

राकेश पांडेय
संपादक, प्रवासी संसार
(व्यवस्था)
9810180765

24 दिसम्बर 2008 / बुधवार
सायं 6.30 से चाय-कॉफी / 6.50 कार्यक्रम आरंभ

गुलमोहर सभागार, इंडिया हैबीटैट सैंटर, लोदी रोड, नई दिल्ली
संरक्षक : श्री गंगाधर जसवानी एवं पद्मश्री वीरेन्द्र प्रभाकर (मंत्री, चित्र कला संगम)

Thursday, December 18, 2008

हाथ भी नहीं बचेंगे मलने के लिए मलाल में

—चौं रे चम्पू! पाकिस्तान कूं कत्थ,ई चावल चौं नांय पच रए?
—इसलिए नहीं पच रहे क्योंकि इंसान के खून में पकाए गए हैं। लेकिन चचा, कत्थई चावल कौन से हुए? हमारे यहां से तो बासमती चावल जाते हैं| हालांकि, वे इस लायक नहीं हैं कि हमारे सुवासित बासमती चावल का लुत्फ उठा कर आतंकवाद की बास इधर भेजते रहें। निर्यात फौरन बंद कर देना चाहिए।
—ठीक कही लल्ला! पर ....कमाल ऐ, तोय कत्थई चावल कौ कछू पतौ नांय!
—माफ करना चचा। मैंने गुलाबी चना तो सुना लेकिन कत्थरई चावल के बारे में वाकई नहीं जानता।
—अरे हट्ट पगले! हम कै रए ऐं ब्राउन और राइस के बारे में। ब्राउन और राइस उन्हेंा पचे नईं।


—कमाल कर दिया चचा तुमने भी! दूर की कौड़ी फोड़ कर लाने लगे हो, चूरन बनाके। मैं शब्दों में निहित स्वाद, गंध और नाद पर गया, अनुवाद तक नहीं जा पाया। शब्दों से खेलने लगे हो। अरे, अब हम कहां के कवि रहे? कवि की पदवी तुम्हेंन मिल जानी चाहिए। शब्दों से नए-नए अर्थों का जलवा बिखरा रहे हो।
—आजकल्ल सब्दवन कौ खेल तौ अखबार कर रए ऐं। नाम एक ऐ, पर तीन तरह ते लिख्यौ जा रह्यौ ऐ। वा आतंकवादी कूं कोई कासब कहै, कोई कसब, कोई कसाब।



—हां चचा! हम इसको ‘कस अब’ भी पढ़ सकते हैं। अंग्रेज़ी में तो स्पेलिंग एक ही है, उसे हिन्दी में कैसे भी पढ़ लो। नर्मदा प्रसाद नर मादा प्रसाद हो जाते हैं। चचा, जैसे ही कासब को कसा गया, उगल दिया उसने। विडम्बना ये है कि पुलिस की हिरासत में जो भी बोलेगा, कहा जाएगा कि कसाब के ऊपर कसाव बनाकर कहलवाया गया है। पर उनके अपने टी.वी. ने स्टिंग ऑपरेशन करके जो पूरी दुनिया को दिखा दिया उसे थोड़े ही झुठला सकते हैं। गांव वालों ने सच्चा-सच्चा बोल दिया कि अपना ही बच्चा है। पाकिस्तानी प्रशासन को चेत आया तो गांव की ज़बान पर ताला लगा दिया गया। फरीदकोट में फर का कोट ओढ़ा-ओढ़ा कर सबको मौन कर दिया गया। लेकिन देर कर दी उन्होंने। बात तो पूरी दुनिया तक पहुंच ही गई कि आतंकवाद के शिविर-अड्डे और इंसानियत के लिए गड्ढे, पाकिस्ताआन में सबसे ज़्यादा हैं। ….इतना भी समझ लो चचा कि मुम्बई के मामले में ब्राउन और राइस का पाकिस्तान जाकर डांटना सिर्फ़ इसलिए नहीं हुआ है कि भारत के साथ उनकी कोई ख़ास हमदर्दी है, इसलिए हुआ है कि आतंकवाद की मार उन्हों ने खुद भी झेली है। ब्राउन के खुफिया-तंत्र का मानना है कि उनके यहां हुई आतंकवादी घटनाओं में तीन-चौथाई हाथ तो पाकिस्ताुन के प्रकांड आतंकवादियों का ही रहा है। अमरीका पहले ही एक तगड़ा झटका झेल चुका है। ब्राउन और राइस के बाद अमरीका के सीनेटर जॉन कैरी के हस्तक्षेप से भी पाकिस्ता न अब सहम गया है चचा। कुछ महीने हम निश्चिंत रह सकते हैं कि आतंकवाद की कोई बड़ी घटना होगी नहीं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी साहब को भी गिलानी हो रही है।
सारा दोष ग़रीबी के मत्थे मढ़ रहे हैं। मीडिया के सामने संभल कर बोल रहे हैं।
—मीडिया में बड़ी ताकत ऐ।
—हां चचा, मीडिया ने अपनी ताकत का जलवा दिखा दिया। ये जो कासब कसब कसाब का राइफल के कसाव के साथ फोटो छपा है, कमाल कर दिया। तगड़ा टेली लैंस लगा कर जिस भी छायाकार ने वह चित्र लिया है, उसे थैंक्यूा, धन्य वाद, शुक्रिया देना चाहिए। चचा, लेकिन मीडिया भी टी.आर.पी. के तवे पर समाचार सेंकता है। हां, इतना है कि पड़ोसी देश का मीडिया झूठ का जो विस्तालर करता है उसका सौंवा हिस्सा भी हमारे यहां नहीं होता। कितना भी हम मीडिया को कोसें लेकिन तस्वीररें हक़ीकत के आसपास बनी रहती हैं।
—सरसंघ चालक सुदरसन जी तौ कह रए ऐं कै कर देओ आक्रमन! हौन देओ परमानु युद्ध।
—कोई ज़िम्मेदारी तो है नहीं, कुछ भी बोल सकते हैं। पड़ौसी देश में ऐसे ही वक्तव्यों को देश का नज़रिया मान लिया जाता है। सुदर्शन जी को यह नहीं मालूम कि परमाणु युद्ध के परिणाम अब वैसे नहीं होंगे जैसे हिरोशिमा-नागासाकी में थे। अब तबाही ऐसी होगी कि त्राहि-त्राहि भी मुंह से नहीं निकल पाएगा। इसलिए दोनों देशों के युद्ध भड़काऊ नेताओं को भी कसकर रखना होगा। अच्छां है कि पाकिस्तांन में इन दिनों जैसी भी है डैमोक्रैसी तो है। अगर कहीं होता सैनिक शासन, तो भड़काऊ तक़रीरों के प्रभाव में आकर युद्ध-युद्ध खेलने को मचलने लगता। दबाव में सही, धीरे-धीरे सही, पर वहां के चुने हुए नेता मान तो रहे हैं कि गड़बड़ उनके यहां है। वहां के जनतांत्रिक नेताओं की समझ में यह बात आ रही है कि अगर हम फंस गए परमाणु आयुधों के जंजाल में, तो हाथ भी नहीं बचेंगे मलने के लिए मलाल में।

Wednesday, December 10, 2008

हंग निहंग विहंगम जंगम

--चौं रे चम्पू! कूट का होय?
--कूट के तो बड़े अर्थ हैं। एक अर्थ है कपट। दूसरा... पर्वत को भी कूट कहते हैं, जैसे रेणुकूट। कूट माने गुप्त और गोपनीय भी होता है। उसी से बनी कूटनीति। और कूटना तो आप जानते ही हैं, जैसे असभ्य पति अपनी पत्नी। को कूटते हैं और सभ्य। पत्नियां अपने पति को कूटती हैं।
--अरे तू तो कविता लिख्यौ करै, कूट और कविता कौ का संबंध ऐ?
--वह होता है कूट-काव्यन।
--कूट-काव्यि के बारे में बता?
--तुम्हें मालूम तो सब है चचा! कूट-काव्यऐ वह काव्य जो आसानी से समझ में न आए। जिसका अर्थ बड़ी मुश्किल से निकले।
--तो सुन, मैं एक कूट-काव्यर सुनाऊं, वाकौ मतलब समझा।
--परीक्षा ले रहे हो?
--अरे तेरी क्याे परीच्छा लैनी! ऐसी कौन-सी तेरी इज़्झजत ऐ, जो न बता पायौ तौ बिगड़ जायगी। चल अर्थ बता--
हंग विहंग निहंगम जंगम,
गमन गम न कर, नंगम संगम।
--ये कूट-काव्यस काहे का है चचा, अर्थ तो साफ निकल रहा है। पीछे से शुरू करो। चुनाव के संगम पर नंगों का गमन हुआ। परिणाम ऐसे आए कि कोई गम न करे, बस गमन करे। ये तो हो गई निचली लाइन। ठीक?
--ठीक! अब ऊपर की लाइन कौ अर्थ बता-- हंग निहंग विहंगम जंगम।
--चचा, इसका अर्थ भी सुन लो। पीछे से शुरू करता हूं। जमकर जंग हुई। उसके बाद विहंगम दृश्यच देखने को मिले। कांग्रेस दिल्ली , राजस्था।न और मिजोरम में जीत गई और छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश में भाजपा जीती। अब मालाएं पड़ रही हैं। ढोल-तासे बज रहे हैं। जो भीतरघात करने वाले थे, वे सबसे पहले बधाई देने जा रहे हैं। ग़लतफहमियां दूर हो रही हैं। अहम ग़लतियां हो रही हैं। विहंगम दृश्यव हुआ कि नहीं? और निहंग वे लोग होते हैं, जो प्रतिबद्ध होते हैं, कटिबद्ध होते हैं, एक पंथ के अनुयायी होते हैं और शांत रहते हैं। हथियार रखते हुए भी जो विनम्रता बनाए रखे वह निहंग। शीला दीक्षित और अशोक गहलौत अब निहंग की तरह काम कर सकते हैं, क्योंहकि विकास की राह में कोई रोड़ा नहीं होगा और सरकार ऐसी बना सकते हैं जिसमें कोई थका हुआ घोड़ा नहीं होगा।
--ठीक। चल मान लिया। अब हंग बता।
--चचा हंग शब्दल हिंदी में तो है नहीं।
--अटक गयौ न!
--खुल गया चचा, हंग का कूट भी खुल गया। दिल्ली में बहुत सारे चुनाव विशेषज्ञों को ये डबका था कि यहां हंग सरकार आएगी। त्रिशंकु सरकार बनेगी। बसपा की घुसपैठ के कारण नुकसान कांग्रेस को होगा। लेकिन मामला पल्टीक खा गया। कांग्रेस ने कूट के धर दिया भाजपा को। बसपा भाजपा के लिए भारी पड़ गई। कमल के फूल पर कुर्सी नहीं सज पाई। कुर्सी वहीं की वहीं रही। जीत गया दिल्लीप का हरा-भरा विकास और आत्मलविश्वाकस से भरा-भरा शीला आंटी का चेहरा। हंग सरकार नहीं बनी। जो काम हुआ, मैं तो समझता हूं कि ढंग का हो गया।
--कैसे?
--क्यों कि जनता जान चुकी है कि थोथे और ऊपरी नारों से बात बनती नहीं है। भाजपा आ जाती तो क्याा महंगाई रोक लेती? आतंकवाद रोक लेती? आतंकवाद को समेटने के लिए अनुत्तेजक समझदारी की आवश्यआकता होती है और विकास के लिए निरंतरता की। शीला आंटी ने विकास की जो निरंतरता बनाई थी उसमें गतिरोध आ जाता। माना कि काम फिर भी होते। मैट्रो फिर भी विकसित होती, लेकिन हर काम के लिए टेंडर दुबारा खुलते। अधिकारी बदले जाते और बदले की भावना प्रबल होती। चुनाव आने से पहले राज-मिस्त्रियों कारीगरों के जो पेचकस, छैनी, हथौड़े, फावड़े जैसे औज़ार शांत पड़े थे, अब दनादन कूटम-कूटम करेंगे। काम की रफ्तार बढ़ जाएगी। रेडियो पर मैट्रो के बारे में एक विज्ञापन सुना था— 'मियां जुम्मटन, जवाहर, दीप सिंह, पीटर मेरे भाई! कहां पर बैठे थे हम, और कहां जाके निकाला है, मैट्रो का मेरी दिल्लील में ये, जादू निराला है'। हम कांग्रेस की मैट्रो में बैठे थे, दस साल सवारी करी और कांग्रेस के ही स्टेरशन पर उतर आए। ये कूट-काव्या कांग्रेसियों की समझ में भी आ जाए तो सेमीफाइनल के बाद फाइनल में भी उनका जलवा हो सकता है। दो चीज़ों की दरकार है-- समझदारी की निरंतरता और निरंतरता की समझदारी। जीत ऐसे ही नहीं होती है। जीत के लिए किए जाते हैं प्रयास। और प्रयासों में भागीदारी से जीता जाता है भरोसा। जो जीते हैं, उन्होंंने भरोसा जीता है।
--वाह रे कूटकार चम्पूा!

Thursday, December 04, 2008

प्राइमरी से लेकर हाईमरी तक

--चौं रे चम्पू! भारत कौ सुभाव नरमाई कौ ऐ कै गरमाई कौ?
--गरमाई का होता चचा, तो एक भी आतंकवादी इस तरह नचा नहीं सकता था, और अगर नरमाई का होता तो कोई भी आतंकवादी बचता कैसे? लेकिन ये बात सच है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमारा रुख़ इतना कड़ा नहीं है, जितना कि होना चाहिए। कानून में अनुच्छेद कम छेद ज़्यादा हैं। इन्हीं छेदों में से आतंकवादी अन्दर आ जाते हैं, इन्हीं से बाहर निकल जाते हैं।
--तौ छेद छोड़े ई चौं ऐं?
--अब इसका क्या जवाब दूं चचा! संविधान बनाने वाले ज़्यादातर लोग ऊपर चले गए। कोई रास्ता भी नहीं छोड़ गए कि आसानी से छेद मूंदे जा सकें। संसद में एक पार्टी का वर्चस्व हो तो कानून भी बदले। यहां तो मिली-जुली सरकार में बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं। कोई दिल बदले, कोई दल बदले। बदलने की भावना की जगह बदले की भावना! फिर कानून कैसे बदले?
--जनता साथ दे तौ सब कछू बदल सकै।
--जनता का ज़िक्र करके चचा, तुमने मेरी दुखती रग पर उंगली रख दी। कौन सी जनता? रंग, वर्ण, सम्प्रदाय, जाति, गोत्र, धर्म में बंटी जनता! अल्पसंख्यक जनता या बहुसंख्यक जनता! आरक्षित जनता या अनारक्षित जनता! निरक्षर, अनपढ़, गंवार जनता या पढ़ी-लिखी तथाकथित समझदार जनता! शोषित जनता या शोषक जनता! हमारे यहां हंसोड़ संता और बंता की पहचान तो है पर जनता की कहां है?
ऐसी बिखरी हुई जनता के बलबूते कानून नहीं बदले जा सकते।
--सरकार है कै नईं ऐ? वाऊ की कछू जिम्मेदारी हतै कै नांय?
--ये दूसरी दुखती नस है। सरकार है भी और नहीं भी है। होती तो अपने वोटरों की फ़िक्र करती। ये वोटर पाँच साल बाद काम में आते हैं! फिर क्या? दरअसल, सरकार को अपने बचने-बचाने की फ़िक्र ज़्यादा रहती है। इस एक अरब की आबादी में सौ, दो सौ, हज़ार, दो हज़ार मर भी जाएं तो फ़र्क क्या पड़ता है? मुम्बई में अगर फ़र्क पड़ा है, तो इस कारण क्योंकि मामला ताज नामक फाइव स्टार होटल का है और मीडिया मुंह खोले खड़ा है। पल-पल की ख़बर मिल रही है कि लोकतंत्र की इमारत दस सिरफिरों के कारण बुरी तरह हिल रही है। सच पूछो चचा, तो हमारे नेताओं में आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति है ही नहीं। न उपायों को खोजने का कोई संकल्प है।
--अच्छा तू सरकार मैं होतौ तो का करतौ, जे बता?
--फंसा लिया न चचा! पहला काम तो ये करता कि प्राइमरी से लेकर हाईमरी तक.....।
--हाईमरी?
--हां ये मरी हाई ऐजुकेशन। सब जगह पाठ्यक्रम में ‘आतंकवाद’ एक विषय बना देता। बच्चों से लेकर चच्चों तक सबको सिखाया जाता कि ये कैसे ये फलता-फूलता-फैलता है और कैसे इसे टोका-रोका जा सकता है और कैसे दिया जा सकता है धोखेबाज़ों को धोखा। आतंकवादी आसमान से नहीं उतरते। कॉलोनी हो या होटल, किराए पर कमरा लेते हैं। पैसा मुंह पर मार के विश्वास ख़रीदते हैं। जिस बोट में बैठकर समंदर से चंद लोग आए, उसका किराया था अठारह हज़ार प्रति घंटा। बोट वाले ने पैसा लिया, उसे क्या टंटा? जहां वी.आई.पी. हों और ग़रीब जनता सुनने जाए, वहां तो होगी तलाशी की भरपूर इंतज़ामी, पर फाइव स्टार होटल में विदेशी कार से उतरो तो मिलेगी ताल ठोक सलामी। प्यार लाए हो या हथियार कौन देखेगा? सुरक्षा में बड़े लोचे हैं चचा।
--अमरीका तौ चाक-चौबंद हतो, वहां कैसे घुस गए?
--ग्यारह सितंबर के बाद आतंकवाद वहां कोई सितम कर पाया क्या? उन्होंने अपनी सुरक्षा इतनी मज़बूत कर ली कि अब वहां कोई आतंकवादी गतिविधि असंभव नहीं तो मुश्किल तो हो ही गई है। भारत में बहुत आसान है। तुमने ठीक कहा था कि भारत नरम है और ये भी सही है कि अमरीका गरम है। आतंकवाद रूपी राहु भारत को रोज़-रोज़ ग्रस सकता है, अमरीका को नहीं। माघ ने ‘शिशुपाल वध’ के एक श्लोक में कहा था...
--फिर संसकिरत छांटैगौ का?
--तो तुम अनुवाद ही सुन लो। श्लोक का सार ये है कि अपराध समान होने पर भी राहु सूर्य को चिरकाल बाद और चन्द्रमा को जल्दी-जल्दी ग्रसता है। यह चन्द्रमा की कोमलता, शीतलता और नर्मी का साक्षात प्रमाण है। भारत की नर्मी अच्छी है पर आतंकवाद के सामने गर्मी दिखानी पड़ेगी चचा।
--जेई तौ अपनी तमन्ना ऐ।

Wednesday, November 19, 2008

तेरी बात नईं पची

--चौं रे चम्पू! भावनान कूं रोकिबे कौ का उपाय ऐ?
--चचा, मार दिया। पापड़ बेलने वाले बेलन की मूठ से। अब काम नहीं चलेगा झूठ से। दरअसल, भावनाएं इंसान की चेतना को इस कदर बेलती हैं कि उनके विस्तार को अस्तित्व की तंत्रियां बड़ी मुश्किल से झेलती हैं। लेकिन आप तो उस संतई तक पहुंच चुके हैं जहां भावनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है। आप मुझसे क्यों सवाल करते हैं? ज़रूर आपके पास कोई जवाब है, आप ही बता दें।
--नायं तू ई बता।
--चचा, भावना हमारे यहां बहुतायत में पाई जाने वाली चीज़ है। पिछले दिनों एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण करने वाली संस्था ने पाया कि इस धरती पर सबसे ज़्यादा भावुक लोग भारत में पाए जाते हैं। भा से भारत और भा से भावना। भावना का खेल निराला है। भावना को भाव ना मिले तो भाव खा जाती है और भीतर ही भीतर भयंकर, भयावह भभूके उठाती है। भावना के ऊपर दिमाग का ज़ोर चले तभी काबू में आ सकती है। मनुष्य का अस्तित्व भी एक बगीची है चचा, जिसमें भावना और ज्ञान का मल्ल-युद्ध चलता रहता है। भावना जीत गई तो ज्ञान गया गड्डे में और ज्ञान जीत गया तो भावना गई भाड़ में। अखिल ब्रह्मांड में मनुष्य अनुपम कृति है। अचरजों से भरा है यह शरीर। कहा गया है-- ‘दुर्लभं मानुषं देही’। पर यह भी जानते हैं कि ‘देहिनां क्षणभगुंर:’। इस सर्वोत्तम कृति को समाप्त भी होना है। ‘जीवानां मृत्योर्ध्रुवम्’।
--भौत संसकिरत बोल रयौ ऐ?
--चचा! मृत्यु ध्रुव है यानी अटल। जितनी ज़िंदगी है वही है असल। मिर्ज़ा ग़ालिब कह गए हैं कि जिस शख़्स को जिस शग़ल में मज़ा आता है उसके लिए वही ज़िंदगी है। ज्ञान की लगाम पकड़े बिना भावना के घोड़े पर बैठोगे तो उस सफर का अपना मज़ा है। जग-डंडी देखोगे न पग-डंडी। साध के सवारी करोगे तो समकालीन राजपथ पर कालीन-सम सुविधाएं बिछ जाएंगी। इस तरह भी कह सकते हैं कि ज़िंदगी ज्ञान के सहारे चलेगी तो सुरम्य घाट बनाएगी, नहीं तो अपनी ही भाव-धारा से बारह-बाट कर देगी।
--भारत में भाव-धारा बलवती चौं ऐ?
--क्योंकि अंकुश बहुत ज़्यादा है। भावनाएं जहां निर्द्वंद्व होती हैं, जहां सब कुछ अभिव्यक्त करने की आज़ादी होती है, वहां दिमाग को अतिरिक्त श्रम करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हमारा समाज भावना-प्रवण होते हुए भी इतना भावना विरोधी है कि व्यक्ति को अन्दर ही अन्दर ज्वालामुखी बना देता है। ज्वालाएं खुलकर नहीं नाच पातीं, गुपचुप गेयता बढ़ती जाती है।
--गुपचुप गाऔ, का परेसानी ऐ?।
--चचा, गेयता का मतलब समझे नहीं। संबंधों में गेयता।
--पहेली मत बुझा, साफ बता?
--पुरुष जब पुरुष से संबंध बनाता है तब उसे गेयता कहते हैं। नारी जब नारी से संबंध बनाती है, उसे लेस्बिता कहते हैं। जानकारी में तो तुम्हारी सब कुछ है चचा। तुम से भला कौन सा अनुभव बचा। हमारे देश में गे अथवा गेय अथवा गेयता के अपार सिलसिले हैं। संबंध गुपचुप गेय हैं। अनेक देशों में कानूनी मान्यता मिल गई। ‘दुर्लभं मानुषं देही’ जिसका जो हो जाए सनेही। पर अपना समाज नहीं मानता। किसी व्यक्ति को कुंवारे रहने का तो कानूनी अधिकार है पर गेयता का नहीं।
--अरे मैं समझ गयौ, जे सब तौ बचपन की कौतुक क्रीड़ा ऐं। सरीर की आंधी और बवंडर के कारन पैदा होयं और समय रहते चली जायौ करें। जामें भावुकता कौ कोई मसला नांऐं।
--ये तुम कैसे कह सकते हो चचा। भावना का क्या है, पता नहीं कब किससे जुड़ जाए। प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी। चंदन जहां घिसो वही सुगंध। इज़राइल से दो गेय माता-पिता योनातन और उमर घेर मुम्बई आए हुए हैं। ये तय करना मुश्किल है कि कौन माता, कौन पिता? दोनों माता, दोनों पिता! ये दोहरा लाभ है गेयता में। वे भारतीय कानून की धारा 377 का मज़ाक बनाते हैं जो समलैंगिकता को अपराध बताती है। लेकिन प्रसन्न हैं कि किराए कि कोख आसानी से उपलब्ध हैं। बान्द्रा में मिल गई किराए की कोख। पा गए बच्चा! सुख का कारोबार सच्चा। अख़बार में जो फोटो छपा है उसे देख कर कोई कह नहीं सकता उनसे अधिक सुखी कोई होगा। असल चीज़ है जीवन का आनंद, जो बिना किसी को नुकसान पहुंचाए मिलता रहे।
जिन्हें गेयता रास नहीं आती वो रासा तो न करें। परसों एक नामी-गिरामी व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। भावना की मार थी या जीवन में भाव ना मिला, पंखे से लटक गए। कितने ही युगल सामाजिक बंधनों के कारण आत्मघाती हो जाते हैं। ऐसे लटकने से गेयता भली। ज़िंदगी तो बची।
--चम्पू! तेरी बात नईं पची।

Sunday, November 16, 2008

न तो लूलू है न हवाई बातें करता है

--चौं रे चम्पू! तोऐ ओबामा के बारे में कछू पतौ ऐ कै नांय?
--चचा, सरसरी तौर पर अख़बार पढ़ने वालों को जितना पता होता है उतना तो मुझे भी पता है।
--तौ बता ख़ास-खास बात!
--चचा, होनूलूलू में पैदा हुआ, इसका मतलब ये नहीं है कि वह कोई लूलू है। होनूलूलू है हवाई में। इसका मतलब यह भी नहीं है कि वो सिर्फ हवाई बातें करता है। ख़ानदानी विरासत लेकर ऊपर से नहीं उतरा है वो, नीचे से उगा है। माली-रक्षित क्यारी में नहीं उगा, ख़राब माली हालात की दुनियादारी में उगा है। अंकुर की तरह धरती फोड़ते ही निकल कर उसने भदमैला आसमान देखा है और आसपास की श्वेत-अश्वेत परस्पर विरोधी हवाओं को झेला है। उसे अंदर की ताकतों ने मज़बूत बनाया है। वो छियालीस साल का बूढ़ा बच्चा है चचा, बूढ़ा बच्चा।



--चौं! बूढ़ौ बच्चा कैसै है गयौ रे?
--देखिए! माता-पिता के विवाह-संबंध के छ: महीने बाद ही धरती पर आ गया। संबंधों की मजबूरी और मजबूरी के संबंधों के बारे में अभिमन्यु की तरह गर्भ में ही सब कुछ जान गया। पिता केनियाई श्यामवर्णी, माता अमरीकन गौरांग, दोनों में ज़्यादा निभी नहीं। न निभ पाने का कारण रंग भेद था कि ढंग भेद था, क्या पता, पर अंतरंग जलतरंग ज़्यादा नहीं बजा। पिता के प्यार से विहीन, मां के दामन से लिपटा, सौतेले पिता और नाना-नानी के साए में पला। बचपन में ही बहुत कुछ देख लिया उसने। गोरों से नफ़रत नहीं की लेकिन धरती मां के काले लालों के कसालों को क़रीब से देखा उसने। उसकी जीत पर अमरीका के काले लोगों को आंसू बहाते देखा आपने? खुशी के आंसू थे।
--वोऊ तौ रोय रई हती... का नाम ऐ वाकौ... ओफरा बिन फ्री!
--क्या कहने हैं चचा। अबोध होने का ढोंग करते हो और जानते सब कुछ हो। ओफ्रा विन फ्री को भी जानते हो! वाह। उसके आंसू तो आपके कलेजे में अभी तक रिस रहे होंगे?
--आगे बोल!
--आगे क्या बताऊं चचा! जीवन में घिस्से बहुत खाए उसने। मां ने दूसरा ब्याह कर लिया और दूसरे ब्याह के बाद इंडोनेशिया में बस गई। तो एक तरफ ओबामा ने पहली दुनिया यानी अमरीका का सुपर वैभव देखा तो दूसरी तरफ तीसरी दुनिया के इंडोनेशिया की चतुर्थ श्रेणी की गरीबी में गुज़र करती ज़िंदगी के कुचले रंग भी देखे। अंधेरी निम्न कक्षाओं में मानवीय संबंधों का विस्तार भी देखा और अति विलास का मस्तिष्क-शून्य होना भी देखा। बच्चा माता और पिता की संयुक्त कृति होता है। मां-बाप भले ही अलग हो जाएं, एक दूसरे के लिए मर चुके हों, लेकिन बच्चे के अन्दर न तो बाप मरता है, न मां। अब वो पहली दुनिया का पहला नागरिक होने जा रहा है। अमरीका का चौवालीसवां राष्ट्रपति।
--मैक्कैन की तौ नानी मर गई होयगी। इत्ते बोटन ते जीतौ।
--मैक्कैन को छोड़ो चचा, तुम्हें मालूम है कि ओबामा की नानी अपना वोट डाल कर इलैक्शन के रिज़ल्ट आने से एक दिन पहले ही मर गई। जीत की आहट पाकर खुशी से चली गई होगी। ओबामा को याद आई होंगी नानी की कहानियां। कहानियां अन्याय की, भुखमरी की, प्रवंचना की, गरीबी की, विडम्बनाओं की। जिनके कारण इस बूढ़े बच्चे ने तय किया होगा कि लड़ेगा। लड़ेगा लड़ाई के खिलाफ। बुश से उसका विरोध इस बात को लेकर था कि ईराक के युद्ध के दौरान पैदा हुए अमानवीय हालात को रोका जाए। वो इंसानों की सोशल सीक्योरिटी की बात करता है। विश्व भर के स्वास्थ्य की चिंता करता है। कहता है— ‘हम न लिबरल अमरीका में रहते हैं न कंज़र्वेटिव अमरीका में रहते हैं, हम युनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमरीका में रहते हैं। हम युनाइटेड हैं’। ठीक बात है। लिबरल कहलाना भी ढोंग है। बहुत उदारता दिखाने वाले लोग सिंहासन पर बैठकर कृपाएं लुटाया करते हैं। युनाइटेड हैं तो भेदभाव गैरज़रूरी है। चचा! ओबामा को इलैक्शन के लिए जनता ने दिल खोल कर चंदा दिया। सौ पचास डॉलर देने वालों की तादाद ज़्यादा थी। उन्होंने पैसा दिया जिनके बीच उसने काम किया। वो डी.सी.पी. यानी डवलपिंग कम्यूनिटीज़ प्रोजैक्ट का डायरैक्टर था। उसने अल्पसंख्यकों के लिए आवाज़ उठाने से पहले कानून की पढ़ाई की। उनके बारे में किताबें लिखीं। कई साल तक युनिवर्सिटी में लैक्चरर बन कर कानून पढ़ाता रहा।
--पइसा तौ कम ना ऐ वाऊ पै।
--माना कि उसके पास भी मिलियनों में पैसा है, पर उसे किताबों की रॉयल्टी से मिला है। भारत में कभी ऐसा हो सकता है? एक फटीचर आदमी, जिसने कानून की पढ़ाई की हो, लैक्चरर बन जाए, फिर सीनियर लैक्चरर.... और किताबें लिखे, और जी राष्ट्रपति बन जाय।
--तू ऊ तौ प्रोफेसर रह चुकौ ऐ। तो ऊ ऐ तौ रॉयल्टी मिलै किताबन की?
--उससे तो चचा कॉलोनी का इलैक्शन भी नहीं लड़ा जा सकता। पता नहीं भारत में ऐसे दिन कब आएंगे जब हमारी वोटर जनता राजनीति के सारे खोटरों को रिजैक्ट करके अपने सही शुभचिंतकों को उनकी कोटरों से निकाल कर लाएगी।