Wednesday, August 25, 2010

तुम्हारा ‘ना’ तुम्हारा ‘हां’

—चौं रे चम्पू! पुरानी याद ताजा है जाएं, ऐसौ कोई सेर है तेरे पास?
—क्यों नहीं चचा! अर्ज़ किया है— ‘इकहत्तर, बहत्तर, तिहत्तर, चौहत्तर....
—इरसाद, इरसाद, आगै!
—पिचहत्तर, छियत्तर, सतत्तर, अठत्तर।
—जे कैसौ सेर ऐ रे?
—इकहत्तर से अठत्तर तक का काल शानदार यादों का था। जिन चार महाकवियों का यह जन्मशती वर्ष है, बाबा नागार्जुन, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और शमशेर, उनके साथ सत्संग का मौक़ा मिला। सबसे ज़्यादा सत्संग हुआ बाबा नागार्जुन के साथ।
—बगीची पै जन्मसती समारोह करौ। इन लोगन कूं ऊं बुलाऔ।
—चचा, इनमें से कोई सौ साल पूरे नहीं कर पाया।
—अरे मानिबे में का हरज ऐ? मान कै चलो कै वो अभी हतैं। सबते पहलै बाबा नागार्जुन समारोह करौ। उनकी पसंद की चीज बगीची पै बनाऔ। उनकी पसंद के काम करौ।
—तो फिर चचा, मंगाओ एक स्टोव, मिट्टी के तेल वाला। वे कहते थे कि कविता में माटी की गंध होनी चाहिए और चाय में मिट्टी के तेल की, तभी अच्छी लगती है। सुधीश पचौरी के फोट्टी एट टैगोर पार्क नामक एक कमरे के कम्यून में एक लंगड़ी टाँग का स्टोव हुआ करता था। नोज़ल साफ करने के लिए पिन लगी टिन की पत्तियां आती थीं। कई बार पिन नोजल में रह जाती थी, कभी पत्ती टेढ़ी हो जाती थी। काफी युद्ध करने के बाद स्टोव की नाक जब ठीक होने लगती थी तो इधर-उधर तेज मात्रा में मिट्टी का तेल फेंकती थी जो दीवारों से बाउंस होकर बर्तनों पर गिरता था। इधर चाय की तलब में, ठण्ड के मारे, बाबा की नाक बहने लगती थी। बाबा की नाक उसी चाय को पीने से ठीक होती थी।
—और खाइबे के तांईं?
—स्टोव पर पकवान तो बनते नहीं थे। खिचड़ी बना लो या भीगे चने बघार लो। हरा धनिया, मिर्च मैं काटूं या सुधीश या भास्कर या राजपाल, नमक कितना डलेगा, वे बताएंगे। बाबा को थोड़ा चटक नमक पसंद है। जब तक चीज़ पक न जाय तब तक उनके अधैर्य को भी झेलना पड़ेगा। स्टोव बीच में कभी भी बुझ सकता है। मिट्टी का तेल कभी भी खत्म हो सकता है। कोई भी आकस्मिक विपदा चनों की रंधन-प्रक्रिया में रोधन डाल सकती है। अगर अचानक ही तीन कॉमरेड और आ गए तो संकट दूसरा। दरअसल, उनको लगता था कि उनको बहुत भूख लग रही है और वे बहुत ज्यादा खाएंगे, पर खाते वे खोड़ा सा ही थे। चार दाने पेट में गए नहीं कि उनकी आंखों में चमक आ जाएगी और अपने हिस्से का भी वे कॉमरेड्स में बांट देंगे। फिर कविता सुनाएंगे— आगामी युगों के मुक्ति-सैनिको! आओ, मैं तुम्हारा चुंबन लूँगा, जूतियाँ चमकाऊंगा तुम्हारी.....
—ठीक ऐ, मट्टी कौ तेल मगाय लिंगे। ...और माटी की गंध वारी कबता कौन सुनायगौ?
—एक तो मैं भी सुना सकता हूं। मेरी ‘खचेरा और उसकी फेंटेसी’ कविता को वे मिट्टी की गंध वाली कविता कहा करते थे। यह कविता एक दिन उन्होंने लगातार तीन बार सुनी। मैं हर बार अपने नाटकीय कौशल से उनको सुनाता था। एक अंश उनको बहुत भाता था— ‘वह बौहरे की जूती का तेल है, वह पंडित की लड़ावनी की सानी है, वह साह जी की बैठक की झाडू है, वह रमजिया के हुक्के का पानी है, वह बैज्जी के बैल का खरैरा है, वह कुमर साब के घोड़े की लीद है। --हमारा छप्पर छा देना खचेरा! --हमारा सन बट देना खचेरा! --हमारी खाट बुन देना खचेरा! खचेरा छा रहा है, बट रहा है, बुन रहा है, खचेरा अपना ही सिर धुन रहा है।’ इन पंक्तियों पर वे ठुमकने भी लगते थे।
—और बता।
—और क्या? उनसे बात करने के लिए लोग चाहिए। ऐसे लोग जो समाज की चिंता रखते हों। बात नहीं करोगे तो किसी और ठिकाने पर चल देंगे। जहाँ जहाँ जाना होगा, पोस्टकार्ड पर चार लाइन लिख कर सूचित कर देंगे। उनके खूब पोस्टकार्ड आते थे हमारे सनलाइट कॉलोनी वाले घर में। प्रिय अ॰च॰ और बा॰च॰ तुम्हारे पुत्र से अठखेली करने अमुक तिथि को आऊँगा। तुम्हारा... और नीचे बंगाली शैली में बहुत सुन्दर सा लिखा होता था— ‘ना’। हर पोस्टकार्ड-पाऊ को लगता था तुम्हारा ‘हां’।
—पोस्टकार्ड ऊ मंगाय लिंगे, और बता।

Wednesday, August 18, 2010

साकार सरासर और सरेआम

—चौं रे चम्पू! कस्मीर में फिर एक जूता-काण्ड है गयौ! पिछले जूता-काण्डन में और जा जूता-काण्ड में का फरक ऐ रे?
—चचा, देश में या विदेश में, पहले जितने भी जूतास्त्र चले, वे पत्रकार-प्रजाति द्वारा चलाए गए। उनका उद्देश्य था समस्याओं की ओर विश्व का अथवा देश का ध्यानाकर्षण। लेकिन, इस बार उमर अब्दुल्ला पर जो जूता फेंका गया है, वह किसी पत्रकार द्वारा रखा गया ध्यानाकर्षण प्रस्ताव नहीं था। यह एक कांस्टेबुल का ताव था। दूसरा मुख्य अन्तर यह है कि अब तक जिनको भी लक्ष्य बना कर जूतास्त्र का उपयोग किया गया है, उनमें से किसी के पिताजी ने घटना का महिमा-गायन नहीं किया। फ़ारुख अब्दुल्ला कहते हैं कि उनके पुत्र का क़द और बड़ा हो गया है। उमर अब अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बुश, पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी, चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और केंद्रीय गृहमंत्री के ग्रुप में शामिल हो गए हैं। इस ‘विशिष्ट क्लब’ में फ़ारुख साहब ने सिरसा जूता-कांड का ज़िक्र नहीं किया।
—सिरसा में का भयौ ओ?
—साध्वियों के यौन शोषण और हत्याकांडों के मुख्य आरोपी, डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख, गुरमीत सिंह पर, मजलिस के दौरान, एक व्यक्ति ने जूता फेंका था। ख़ैर छोड़िए, तीसरा महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि इस जूता-फेंकू का निशाना पूर्ववर्तियों की तुलना में सबसे ख़राब था। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि इसका विरोध व्यक्तिगत था। पुलिस का यह निलंबित कान्सटेबुल क्रोध में स्वयं को संतुलित नहीं रख पाया। घटना के बाद कहा भी जा रहा है कि वह पागल है।
—अरे, नायं, पागल नायं है सकै! दिमाग में जब कोई चीज ठुक जाय, तबहि कोई ऐसौ कदम उठायौ करै। लोग पागल कहि दैं, सो अलग बात ऐ।
—पागल कहने में शासन की इज़्ज़त बच जाती है न! पागल था, जूता फेंक दिया। क्या हुआ?
—अंदर की कहानी कछू और ई निकरैगी!
—अन्दर की कहानी जानने के लिए मुझे जाना पड़ेगा कश्मीर। कश्मीर जाना हालांकि अब रिस्की नहीं है, लेकिन हमारे पचपन जवान हाल ही में शहीद हुए हैं। प्रधानमंत्री जी ने अपने भाषण में उनको संवेदना भी ज्ञापित की थी। मैं ‘अब तक छप्पन’ न हो जाऊं चचा!
—अरे, हट्ट पगले! चौं जायगौ कस्मीर?
—यही पता लगाने कि वह व्यक्ति पागल है या दिमागदार!
—का फरक परै?
—तुम्हीं तो उकसा रहे हो चचा। फर्क ये पड़ता है कि उसको पागल कहने में शासन-प्रशासन को सुविधा होती है। अपमान की मात्रा कम होती है। जूता एक निराकार शक्ति बनकर रह जाता है, जबकि है वह साकार, सरासर और सरेआम अपमान-प्रदाता। चलिए वो पागल भी था, लेकिन निलंबित था, यह तो एक सच्चाई है न? निलंबित क्यों था? इसकी जांच होनी चाहिए। इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि जनाबेआली उमर अब्दुल्ला ने जिस शेखी के साथ यह बघार दिया कि पथराव से ज्यादा अच्छा है जूता फेंकना, उन्हीं के इशारे पर पन्द्रह पुलिसकर्मी और निलंबित कर दिए गए, जिनमें तीन बड़े पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं। अब अताइए, उनका ऐसा क्या कुसूर! एक आदमी जो पुलिस-व्यवस्था की कमजोरियों को जानता है, किसी राजनेता का निमंत्रण-पत्र लेकर, विशिष्ट दर्शक-दीर्घा में घुस आया, इसमें उन पन्द्रह लोगों का क्या कुसूर? अब उमर अब्दुल्ला साहब ने एक साथ पन्द्रह लोगों को पागल हो जाने का मौका दे दिया।
—सो कैसै?
—ये पन्द्रह लगभग अकारण ही निलंबित हुए हैं। देखना कि पन्द्रह के कितने गुना पागल होते हैं। ये पागल, इनकी बीवियां पागल, इनके बच्चे पागल, इनके दोस्त पागल। पन्द्रह के बजाय पन्द्रह सौ पागल हो जाएंगे। असल चीज है न्याय का मिलना। न्याय अगर न मिले तो पागलपन बढ़ता है चचा। निश्चित रूप से उस जूता-मारू कांस्टेबुल के साथ कोई अन्याय हुआ होगा।
—तेरी भली चलाई चंपू! कोई और बात कर।
—उमर की उम्र-नीति तो सुन लो। एक ताज़ा कुण्डली बनाई है— काजू ताजा नारियल, भीगे हुए बदाम। उम्र बढ़ाने के लिए, आते हैं ये काम। आ नहिं पाते काम, अगर हो पत्थरबाज़ी। उम्र न झेल सकेगी जनता की नाराज़ी। उम्र बढ़े, यदि मिले उमर-कथनी सा बूता। पत्थर से बेहतर है कांस्टेबुल का जूता।

Wednesday, August 11, 2010

लेह में मेह लील गई देह

—चौं रे चम्पू! जे बता कै का कियौ जा सकै और का नायं कियौ जा सकै?
—चचा, यह सवाल तो बहुत व्यापक है। करने योग्य बहुत सारी चीजें हैं और जो नहीं की जा सकतीं, ऐसी भी बहुत हैं।
—तू कोई एक बता यार। घुमावै चौं ऐ?
—चचा, प्रकृति का विरोध किया जा सकता है, लेकिन उसे सम्पूर्ण रूप से पराजित नहीं किया जा सकता।
—बात तौ सई कई ऐ रे!
—लेह में बादल फट गए। हम प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के हज़ार प्रयत्न कर लें, पर प्रकृति के कोप की तोप के प्रकोप के आगे कोई स्कोप नहीं। यूरोप के पोप बचा सकते हैं न कान्हा के गोप। जो लोप हो गए अब उनकी होप भी कम है।
—बादर फटे कैसै?
—बंगाल की खाड़ी से उठने वाली भाप बादलों में बदल गई। घन इतने सघन हो गए कि टकराने लगे। धरती के एक टुकड़े पर धांय से गिर पड़े। इसे कैसे रोकेंगे, बताइए! बादल फटने से पहले माना कि प्रकृति ने बिजली कड़का कर टैलीग्राम भेजा था कि संभल जाओ, लेकिन हम कब उस चेतावनी को इतनी गंभीरता से लेते हैं। खूब बिजली कड़कीं लेह में, ऐसी कड़कीं जैसी वहां पर पहले कभी न कड़की होंगी। गांव वाले अपने घरों में दुबक गए। जब ऊपर नभ से पानी का कुंभ औंधा हुआ तो यहां के सारे घड़े टूट गए घड़ी भर में। लेह की रेह जैसी मिट्टी निर्मोही मेह के कारण दलदल में बदल गई। वह दलदल न जाने कितनी देहों को लील गया।
—तौ लेह में मेह लील गई देह!
—उनमें सेना के हमारे जवान भी थे। सीमा पर तैनात, शत्रु पर कड़ी नजर रखे हुए, लेकिन मिट्टी, कीचड़, पानी में बहते-बहते पहुंच गए पल्ली पार। अब भारत सरकार पाकिस्तान से मांग कर रही है कि उस मिट्टी में से हमारे सैनिकों को निकालने में हमारी सहायता करे। बताइए, जो सैनिक लड़ने के लिए खड़े थे सीमा के इस ओर, उनके शवों को निकालने में उनकी दिलचस्पी क्यों होगी भला?
—अरे नायं रे, इत्तौ बुरौ नायं पाकिस्तान, मौत-मांदगी में तौ दुस्मन ऊ मदद करै। चौं नाय निकारिंगे?
—हां, वही तो बात मैं भी कहना चाहता हूं चचा कि अब हमारे वे सैनिक शहीद हो गए। पाकअधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के जो सैनिक उनकी देह निकालेंगे, वे मनुष्य होंगे। मनुष्यता के नाते लेह से बही हुई एक-एक देह को निकालेंगे। निश्चित रूप से निकालेंगे। अपना सद्भाव-सौहार्द दिखाएंगे, क्योंकि लड़ाई एक मानसिकता है, भलाई दूसरी मानसिकता है। मनुष्य अन्दर से जो प्रकृति रखता है वह कड़ाई से भलाई की ओर जाती है। प्रसाद जी ने लिखा था— ‘निकल रही थी मर्म वेदना करुणा विकल कहानी सी, वहां अकेली प्रकृति सुन रही हंसती सी पहचानी सी।’ प्रकृति जो कभी हमें सजाती और संवारती है, वही रोने के लिए भी विवश कर देती है।
—पिरकिरती कूं परास्त नायं कर सकै कोई।
—उसे धैर्य से ही परास्त किया जा सकता है। अन्दर की प्रकृति हो या बाहर की, कुल मिलाकर घोर संग्राम के समय में और विकट विपत्तियों में हमारे जीवन में कुछ कांट-छांट करती है। हमारे वे एक सौ तेतीस जवान आपदा प्रबंधन में महारत रखते थे। उनको ऐसी दीक्षा दी गई थी कि इतनी ऊंचाई पर अगर कोई विपदा आए तो तुम कैसे अपने देशवासियों को बचाओगे। वे स्वयं ही काल-कलवित हो गए। दूसरे देश के मनुष्य उनकी देह निकाल रहे हैं। दूसरे देश के सैनिकों को धन्यवाद दूंगा कि उन्होंने हमारे सैनिकों को सम्मानपूर्वक तिरंगे में लपेटने की सुविधा प्रदान की। धन्यवाद देना चाहता हूं आमिर खान को जिन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल से कहा है कि टूटी इमारत बनाने में मदद करेंगे। प्रिंसिपल ने साधन और श्रमशक्ति को देखकर अनुमान से बताया है कि पुनर्निर्माण में आठ-नौ महीने लग जाएंगे। बहुत समय होता है आठ-नौ महीने चचा! स्कूल को तो आठ दिन में खड़ा कर देना चाहिए। मन करता है कि मैं भी लेह पहुंच जाऊं और जो घर, स्कूल कार्यालय टूटे हैं, उजड़े हैं, वहां कार सेवा करूं। बच्चों को पढ़ाऊं। किलकारियों को वापस ले आऊं।
—चल तौ मैं ऊं चलुंगो तेरे संग। बता कब चलैगौ?

Wednesday, August 04, 2010

चमन को अचरज भारी

—चौं रे चम्पू! कछू नई-पुरानी सुना, चुप्प चौं ऐ?
—चचा, नई तो ये कि जल-पुरुष राजेंद्र सिंह से मुलाक़ात हुई और पुरानी ये कि मैं एक पुरानी पंक्ति पर अटक गया। इन दिनों इतनी बरसात हो रही है, फिर भी पीने के पानी का संकट है। जगह-जगह बुरा हाल है। इतनी बरसात के बावजूद अकाल है। एक गीत की प्रथम दो पंक्तियों में दूसरी तो याद थी, पहली याद नहीं आ रही थी।
—तू दूसरी ई सुना।
—दूसरी पंक्ति है— ‘यही चमन को अचरज भारी, पानी कहां चला जाता है?’ किशोरावस्था में यह गीत सुना था, धुन भी याद है। मसला पहली लाइन का था। मैं सोचने लगा गोपाल सिंह नेपाली की है या शिशुपाल शिशु की, बच्चन जी की तो नहीं ही है। चचा उदय प्रताप सिंह से पूछा। वे बोले— ‘पंक्ति तो याद आ रही है, लेकिन कवि कौन है, कुछ समझ में नहीं आ रहा। सोम ठाकुर जी से पूछा। वे तपाक से बोले— ‘यह पंक्ति ग्वालियर वाले आनन्द मिश्र की है।’ लेकिन पहली पंक्ति? इस पर वे भी मौन हो गए, लेकिन चचा, जैसे ही सोम जी ने आनन्द मिश्र का नाम बताया, मुझे पहली पंक्ति का आधा हिस्सा याद आ गया। सन चौंसठ-पैंसठ की बात होगी। उनका चेहरा अब मेरे सामने था। वे आकाश की ओर देख कर गीत शुरू किया करते थे— ‘बादल इतना बरस रहे हैं...’, लेकिन इसके आगे क्या?
—हम पानी कूं तरस रए हैं...!
—नहीं चचा नहीं! पानी दूसरी पंक्ति में आ चुका, अब पहली में नहीं आ सकता। कल भोपाल में मिले ग्वालियर वाले प्रदीप चौबे। उन्होंने कहा कि ग्वालियर के पुराने लोगों में दामोदर जी बता सकते हैं, आनंद मिश्र के छोटे भाई प्रकाश मिश्र तो अभी सो कर न उठे होंगे। फोन लगाया। दामोदर जी के यहां घण्टी बजती रही। मैंने कहा बैजू कानूनगो को ट्राई करिए! बात बन गई। उन्होंने तो पूरा गीत सुना दिया— ‘बादल इतना बरस रहे हैं, फिर भी पौधे तरस रहे हैं, यही चमन को अचरज भारी, पानी कहां चला जाता है।’ वाह चचा वाह! सुन कर आनंद आ गया। मैंने कवि-जगत के जलपुरुष आनंद मिश्र को मन ही मन प्रणाम किया, जिन्होंने अबसे पचास वर्ष पहले यह गीत लिखा था।
—और जल-पुरुस राजेंद्र सिंह?
—वे व्यवहार-जगत के जल-पुरुष हैं। पानी के लिए ज़बरदस्त सकर्मक चेतना रखते हैं। राजेन्द्र सिंह जल संरक्षण के घनघोर समर्थक हैं। कहीं इन्हें वाटरमैन कहा जाता है, कहीं पानी बाबा। सरकारी नौकरी छोड़कर इन्होंने राजस्थान के ग्यारह जिलों के आठ सौ पचास गांवों में चैकडेम बनाकर वर्षा जल संरक्षण का बहुत ज़ोरदार काम किया। सूख गई नदियों के पुनरुत्थान में जुट गए। ग्रामीणों को जल के प्रति आत्मनिर्भर बनाया। और चचा, जब भी कोई अच्छा काम करता है तो इनाम भी मिलते हैं। इन्हें बहुत सारे सम्मान मिले, मैगसैसै पुरस्कार से नवाजे गए।
—मुलाकात भई तौ वो का बोले?
—वे कहने लगे कि ये देश बड़ा अद्भुत है जो नदियों को मां कहता है, लेकिन पिछले नब्बे वर्षों में जिसे हम विकास कहते हैं उसने हमारे ज्ञान की विकृति, विस्थापन के साथ एक तरह से हमारे संस्कार का विनाश शुरू कर दिया। जिसे हम मां कहते हैं उसे हमने मैला ढोने वाली मालगाड़ी बना दिया। अधोभूजल को ट्यूबवैल, बोरवैल और पम्प लगा कर सुखा दिया। नदियां मरने लगीं।
—तौ राजेन्द्र सिंह नै का कियौ?
—चाचा, उन्होंने तरह-तरह की तकनीकों से ग्रामीण क्षेत्रों में जलसंरक्षण के कमाल के काम किए। जनचेतना अभियान छेड़ दो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है। उन्होंने कहा कि बरसात के बाद पानी जब बहुत तेज़ दौड़े तो उससे कहो धीमा चले, जब धीमे चलने लगे तो कहो कि रैंगे,और जब वह रैंगने लगे तो कहो कि ठहर जा और जब पानी ठहर जाएगा तो जहां-जहां धरती का पेट खुला मिलेगा वहां-वहां बैठ जाएगा। ज़रूरत पड़ने पर नदियों में निकाल आएगा। फिर यह अचरज नहीं होगा जो पचास साल पहले आनन्द मिश्र को हुआ था कि पानी कहां चला जाता है। पानी कहीं नहीं जाएगा। हम उसको धरती के गर्भ में सुरक्षित रखना सीख लें, बस।
—बरसात है रई ऐ, बगीची कौ पानी बगीची में ई रोक लें, आजा।

Wednesday, July 28, 2010

शब्दोत्तर और लोकोत्तर मनोभूमि

—चौं रे चम्पू! कानन में तार ठूंस कै का सुनि रह्यौ ऐ रे?
—चचा, भारतीय कविता उत्सव का टेप सुन रहा हूं, हैडफोन लगा के। आप को भी सुनवाऊंगा। उड़िया कवि डॉ॰ सीताकान्त महापात्र ने अपनी भाषा में पांच कविताएं सुनाई थीं और फिर डॉ॰ रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव परिचयदास ने उनका अनुवाद पढ़ा था।
—कबितान कौ अनुबाद तौ भौत मुस्किल काम ऐ।
—मुश्किल है पर यदि अनुवादक भी अच्छा कवि हो, उसे पर्याप्त से अधिक भाषा-ज्ञान हो तो इतना मुश्किल नहीं है। अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि वाक्य-विन्यास और शब्द-ध्वनियों में काफ़ी अन्तर होता है, पर किसी अन्य भारतीय भाषा से हिन्दी में अनुवाद करना उतना कठिन नहीं होना चाहिए।
—हां, तौ आगे बता!
—मैंने एक बात पर ध्यान दिया कि जब उड़िया में महापात्र जी अपनी कविता सुना रहे थे तो ध्वनियां हमें आह्लादित कर रही थीं। कविताएं समझ में नहीं आ रही थीं। संस्कृत हमारी भाषाओं की मूल है, इसलिए कुछ-कुछ शब्द तो समझ पाता था, लेकिन पूरा भाव पल्ले नहीं पड़ रहा था। ऐसा ही सभागार में रहा था। कविता पूरी समझ में नहीं आईं फिर भी हर कविता के समापन पर तालियां बज रही थीं। शब्दोत्तर और लोकोत्तर मनोभूमि का आनंद था। लेकिन जब उनका अनुवाद पढ़ा गया, कविताएं समझ में आईं, तो पहले से कहीं ज़ोरदार तालियां बजीं। कविता के समापन पर ही नहीं, बीच-बीच में भी। लोगों ने पहली बार जो तालियां बजाईं वे महापात्र जी के महाकवि के लिए बजाईं थीं। उनके अपने श्रीमुख से सुनना एक अनुभव था। यह भी कह सकते हैं की वे सम्मान की तालियां थीं, और जब श्रीवास्तव जी ने उन्हीं कविताओं का हिन्दी अनुवाद सुनाया, तब जो तालियां बजीं वे तालियां अनुवादक के लिए उतनी नहीं थीं, जितनी महापात्र जी की कविता के लिए। अनुवाद के बाद कविता हम तक पहुंच गई न! कविता का उत्स ही न समझ में आए तो उत्सव क्या मनेगा?
—जे बात तौ तेरी सई ऐ!
—कविताएं सुनाने से पहले एक बात महापात्र जी ने कही थी कि कविता का ये उत्सव हमारी पारस्परिकता के लिए है और अनुवाद की महत्ता उसमें बहुत ज़्यादा है।
—जे बात बी सई ऐ!
—हां चचा, उत्स तक पहुंचने के लिए हमें संप्रेषण का कोई तो पुल चाहिए। अनुवाद के पुल पर चलकर हम महापात्र जी की अद्भुत कल्पनाओं और निराले बिंबों तक पहुंच सके। माचिस की डिबिया में तीली बनकर यात्रा करने के बाद कविता का नायक देर से पहुंचा। दादी के ऊपर चढ़ी चादर ने आकाश से संपर्क साध लिया। पिता की छाया, गोबर लिपी दीवार पर रो रही थी। माटी की महक और क्षितिज में डूबते हुए सूरज के साथ पिता भी चले गए। क्या बिम्ब-माला रची थी! एक कविता में भिखारी बच्चा कोमल स्पर्श तब महसूस कर पाता है जब उसकी देह न रही। चंदा उसके अल्मूनियम के कटोरे में सिक्के की तरह आ गिरा। कविता में शब्दों की खनक और उठने वाली गूंज को सुना जा सकता है। शब्दों की अर्थछायाओं में भी प्रतिच्छायाएं होती हैं चचा। ये प्रतिच्छायाएं हमारे अंदर अवसाद के साथ एक आनन्द को जन्म देती हैं।
—आनंद कैसौ लल्ला?
—हम अपने स्वयं के अनुभवों में झांकने लगते हैं न। कवि के साथ हमारी अपनी कल्पनाएं भी एक झरना बन जाती हैं। अच्छी कविता वही होती है जो सुनने-पढ़ने वालों को भी कवि बना दे। तनावों में अकुंठ करे। एक बात तो तय है कि कविता के जितने फलक और आयाम हो सकते हैं, वे केवल कवि-प्रदत्त ही नहीं होते। एक बार जब कवि कविता सुना देता है तो वह उसकी कहां रह जाती है? वह तो सबकी हो जाती है। स्वयं में एक सत्ता बन जाती है। कविता बढ़ने लगती है, नए-नए शब्द गढ़ने लगती है। शब्द भी अकेला नहीं आता। अपने साथ पूरा कुनबा लेकर आता है। कुनबे के साथ पूरा समाज चला आता है। शब्दों के संकल्प-विकल्प देता है। मैं अक्सर कहता हूं— मेरे शब्द, शब्द नहीं हैं, डूबते को सहारे के तिनके हैं। और मेरे भी कहां हैं वे शब्द, पता नहीं किन-किन के हैं? लो तुम्हें दे रहा हूं गिन-गिन के, तुम्हारे हो जाएंगे अगर तुम हो सकोगे इनके।
—ला, जे तार मोय दै, मैं सुनुंगो। हैडफोन लगाय कै!

Wednesday, July 21, 2010

गुद्दे पर मुद्दे और गुदगुदी कुर्सी

—चौं रे चम्पू! सिडनी ते लौटतेई भोपाल चलौ गयौ, भोपाल ते लौटौ ऐ तौ मुम्बई जाइबे की तैयारी ऐ, पकड़ में ई नांय आवै। बे-लगाम है गयौ ऐ। गल्त कहि रह्यौ ऊं का?
—चचा मेरी लगाम किसी एक के पास नहीं है, और लगाम जब ज़्यादा लोगों के पास हो तो सबके इशारों पर चलना पड़ता है। परसों वीरभूम ज़िले में एक रेल बे-लगाम हो गई थी पर तुमने बे-लगाम कहा तो मुझे बेलगांव याद आ गया। वहां के हालात भी बे-लगाम हैं।
—का भयौ?
—बेलगांव, महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा पर है, कर्नाटक में। वहां भाषाई आधार पर दोनों प्रांत झगड़ रहे हैं।
—भाषा झगरिबे की चीज थोड़ैई ऐ लल्ला!
—यही तो अभी तक लोगों की समझ में नहीं आया। भाषाएं एकदूसरे को जोड़ने के लिए हैं न कि नाता तोड़ने और सिर फोड़ने के लिए। माना कि भाषा से एक संस्कृति की पहचान बनती है। एक भाषा-भाषी एक समान सांस्कृतिक आधार रखते हैं, लेकिन संस्कृतियां टकराने के लिए नहीं बनी हैं। संस्कृतियां घुलन-मिलनशील होकर मनुष्यता को आगे बढ़ाने के लिए होती हैं।
—तौ मसला का ऐ?
—मसला ये है कि कर्नाटक के बेलगांव, कारवाड़, बीडर और गुलबर्गा चार ज़िलों के आठ सौ पैंसठ गांवों में काफ़ी संख्या में मराठी रहते हैं। भाषाई अस्मिता के नाम पर महाराष्ट्र चाहता है इन चारों जिलों के आठ सौ पैंसठ गांव महाराष्ट्र में सम्मिलित कर लिए जाएं। सीमा का यह विवाद सीमा से ज्यादा बढ़ गया है चचा। ….और कहते हैं कि जब तक फैसला न हो, तब तक इस क्षेत्र को केंद्र शासित घोषित कर दिया जाय।
—बड़ी अजीब बात ऐ रे!
—हां चचा, दिल्ली का उदाहरण देता हूं। आर.के.पुरम में ज़्यादातर लोग दक्षिण के हैं, आज अगर भाषाई अस्मिता के नाम पर कर्नाटक-तमिलनाडु ये दावा करने लगें कि आर.के.पुरम हमें दे दो, कोई मानेगा क्या? चितरंजन पार्क में बंगाली अधिक रहते हैं तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि चितरंजन पार्क पश्चिम बंगाल को सौंप दिया जाय। पटेल नगर पंजाब को, नजफ़गढ़ हरियाणा को, होडल-पलवल ब्रजभाषा के आधार पर उत्तर प्रदेश को देने का निर्णय लो और जब तक निर्णय न हो तब तक इन्हें यूनियन टैरेटरी घोषित कर दो। ऐसा तो सपना भी नहीं देख सकते।
—तू बेलगाम की बता।
—मराठी माणूस पीढ़ियां पहले कर्नाटक आए थे, यहां उन्नति की सीढ़ियां चढ़ते-उतरते गए। सहजता से कन्नड़ भाषा सीख ली। कारोबार कन्नड़ में, पारिवारिक लोकाचार मराठी में। बहरहाल, कर्नाटक के जन-जीवन में घुल-मिल गए। बेलगांव के वडगांव नामक इलाके में कितने ही कन्नडिगा बुनकर परिवार हैं जो पैथानी साड़ी बनाते हैं। पैथान नाम का कस्बा बेलगांव से सिर्फ सौ किलोमीटर दूर होगा, जो कि महाराष्ट्र में है। इस साड़ी पर कर्नाटक के लोग गर्व करते हैं पर नाम मराठी है। बुनकर और साड़ी के कारोबारी मराठी भी हैं, कन्नड़ भी हैं। बड़ी शानदार साड़ी है। उसमें ज़री के तार और कपास महाराष्ट्र के तो रेशम कर्नाटक की होती है। कहीं का ताना कहीं की भरनी दोनों के तारों से बुनी चदरिया। ये लोग अपनी बनाई हुई साड़ी से ही प्रेरणा नहीं लेते। क्या दिल के तारों की बुनी हुई मिली-जुली संस्कृति की साड़ी को पहन-ओढ़ नहीं सकते। उस संस्कृति की साड़ी को पहनेंगे तो अगाड़ी जा सकते हैं। चीरा-फाड़ी रोकें, हिंसा रोकें।
—जे हिंसा-फिंसा तौ नेता लोग करायौ करें लल्ला!
—क्या अरब-खरब टके की बात कही है चचा। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए बहुत सारे स्थानीय नेता जो राष्ट्रीय स्तर का नेता बनने के लिए और अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ाने के लिए ही ऐसा करते हैं। मुद्दों की कमी है। ले देकर भाषा और क्षेत्रीयता का मुद्दा बचता है। सो भाषा के आधार पर लड़ाते हैं। जनतंत्र के निरीह भोले जनों को इनके इरादों के भालों का क्या पता। इनका शिकार हो जाते हैं। नई पीढ़ी अंतर्प्रांतीय-अंतर्क्षेत्रीय विवाह कर रही है, सबसे बड़ी समस्या उसकी है। नेपथ्य की राजनीति उनका पथ्य छीन रही है चचा।
—नेतन कूं तौ मुद्दा चइऐ!
—सत्ता की कुर्सी बनाने के लिए पेड़ चाहिए। पहले नफ़रत के बीजों से मुद्दों का पेड़ उगाएंगे, फिर उसके गुद्दे पर बैठेंगे और इन बेमतलब मुद्दों से गुदगुदी कुर्सी के मजे पाएंगे।
—पतौ नायं कब हमारी जनता इन फालतू के मुद्दन के गुद्दन कूं काट कै ओछे नेतन के ताईं खाट बिछाऐगी?

आधा इधर आधा उधर

—चौं रे चम्पू! सिडनी ते अब आयौ रे?
—चचा, तीन-चार दिन हो गए।
—तीन चार दिना है गए और आज आयौ ऐ बगीची पै?
—आपकी बगीची के अलावा मेरा एक चमन भी है चचा, वहां आए हुए थे कवि उदय प्रताप सिंह। उन्होंने भी उलाहना दिया कि इतने दिन हो गए न चिट्ठी न पत्री! मैंने उन्हें उनका ही एक शेर सुना दिया— ’मोबाइलों के दौर के आशिक़ को क्या पता, रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकाल कर।’ वाक़ई चिट्ठियों वाले दिन भी क्या ही दिन थे चचा! उनके साथ चिट्ठियों के बारे में लम्बी चर्चा हुई।
—का चर्चा भई, हमूं सुनैं!
—यही कि पाती क्या-क्या काम करती थी, कितने तरह की होती थी। कौटिल्य ने बताया कि पत्र में तेरह तरह के भाव प्रकट होते— निंदा, प्रशंसा, इच्छा, आख्यान, अर्चना, प्रत्याख्यान, उपालंभ, निषेध, प्रतिषेध, प्रेरणा, सांत्वना, भर्त्सना और अनुनय।
—सब रट लए तैंनैं?
—ये भाव तो कौटिल्य के ज़माने के थे, लेकिन यह कुछ अजीब सी बात है कि जिन पत्रों को लिखने की हमारी सबसे ज्यादा इच्छा रहा करती थी, वे अक्सर देर में लिखे जाते थे। तेरह क्या तेरह सौ तरह के भाव आते-जाते रहते थे। मन करता था कि एक चिट्ठी में सब कुछ भर दो। गिरिजा कुमार माथुर कितना सही कहा करते थे कि ख़त निजी अखबार है घर का। पहले थीं पाती, पाती और सिर्फ पाती। ये डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू यानी जगत जोड़ते जाले की माया भला कहां थी? आपको पाती का इतिहास बताऊं चचा?
—बता! भूगोल में घूमिबे बारी पाती कौ इतहास बता।
—चचा! प्रारंभ के भी प्रारंभ में संचार के दूत थे प्रकृति और मनुष्य के बीच। देवदूत जन्म देते थे और यमदूत प्राण लेते थे खींच। फिर पत्र-दूत बने मनुष्य और मनुष्य के बीच। पत्र गंतव्य तक पहुंचते थे भले ही रास्ते में खाई हो, खंदक हो या कीच। फिर पता नहीं कब आए कलम और दवात। लेकिन सब जानते हैं ये बात, कि रामदूत बनकर गए थे हनुमान और लेकर गए थे अंगूठी। मेघों को दूत बनाने की कल्पना थी कालीदास की अनूठी। फिर परिन्दे खगदूत बनकर चिट्ठियां ले जाने लगे, और हम यहां नीचे कबूतर जा-जा-जा गाने लगे। फिर आए तुरगदूत घुड़सवार हरकारे, लेकर जाते थे पत्र प्यारे-प्यारे। सात समन्दर पार जल के दूत जल-पोत जहां सामान ढोते थे, वहां वे पत्र भी थे जो कभी हंसाते थे कभी ख़ुद रोते थे। धरती पर पहियों के भरोसे, पत्र यहां-वहां, कहां नहीं खोंसे? लोहे की पटरी पर रेल चली छुक-छुक, स्टेशन-स्टेशन रुक-रुक, लेकिन हर चिट्ठी में धड़कन, धुंआ और धुक-धुक। वायुदूत भारी-भारी हवाई जहाज, एयरमेल आज भी ले जाते हैं मशीन के बाज। फिर जी तार-संचार के दूत आए, बेतार-संचार के दूत आए और जो सबसे ज्यादा काम आए, वे पंचदूत कहलाए।
—पंचदूत कौन से?
—पहला लाल रंग का लैटर बॉक्स, दूसरी ट्रिन-ट्रिन करती टेलीफोन की घंटी, तीसरा खट-खटाखट तार, चौथा टैलेक्स और पांचवां फैक्स। कितना सूकून मिलता है जब एक हाथ डाल जाता है डाकखाने में चिट्ठी। और कितना सूकून मिलता है जब घर के अंदर आकर गिरती है वो चिट्ठी। चिट्ठियों का पहला दुश्मन आया टेलीफोन। इसने बदल दी संदेश की टोन। क्यों लिखें? नम्बर लगाओ तो इसे पाओ, उसे पाओ, जिसे चाहो उसे पाओ। लेकिन टेलीफोन से भी आगे, जमाना बड़ी तेजी से भागे। पिछड़ गए हवाई जहाज, पिछड़ गई रेल क्योंकि आ गई ई-मेल यानी इलैक्ट्रोनिक मेल। संचार का एक जादुई खेल। यहां न खग हैं, न तुरग हैं, न गाड़ी है, न रेल, न जहाज, न तार। आ गई ब्राउजरों की बहार्। वर्ल्ड वाइड वेब में ले जाने वाली नई-नई तकनीकें। बच्चे सब जानते हैं, बेहतर हो उन्ही से सीखें। नेट की दुनिया स्वछंद है। वेब ब्राउजरों के बढ़ते कदम और हर कदम पर इंटरनेट बुलंद हैं। लिखो चाहे जितने लंबे किस्से, पर ई-मेल एड्रेस के होते हैं दो हिस्से। आधा इधर, आधा उधर। बीच में एट दा रेट का निशान, पलभर में करेगा पाती प्रदान।
—अच्छी रही चर्चा!
—हां, ई-मेल है ही ऐसी पाती, जिसमें न पर्चा, न खर्चा। लेकिन हमारी पीढ़ी के पास तो लेखनी भी है और कीबोर्ड की लहर भी है, आधी इधर भी है आधी उधर भी है।

Wednesday, July 07, 2010

इर्द-गिर्द की गर्द

—चौं रे चम्पू! सिडनी में सिरफ रंगल-मंगल ई कर रह्यौ ऐ कै कोई कबता-फबता ऊ लिखी ऐ?
—चचा, यहां सपने में ग़ज़ल हो रही हैं। जब एक-दो शेर हो जाते हैं तब याद आता है कि अरे ये तो सपना है, कहीं सुबह तक भूल न जाऊं, मुझे उठकर काग़ज़-कलम लेने चाहिए। उठकर कागज-कलम लाता हूं और लिखने लगता हूं। ग़ज़ल पूरी हो जाती है। खुश होता हूं। अपने अशार पर मुग्ध होता हूं। अब किसे सुनाऊं? किसे जगाऊं? बिस्तर से उठकर डैक्स्टर के पास जाता हूं….
—जे कौन ऐ?
—डैक्स्टर! सबरीना का एक बड़ा प्यारा सा टॉय पूडुल कुत्ता है चचा। उसे दो दिन के लिए कहीं जाना था सो हमारे यहां छोड़ गई। तो मैं डैक्स्टर महाशय के सामने अपना हासिले-गज़ल शेर गुनगुनाता हूं। फुसफुसाते हुए सुनाता हूं, ताकि कोई जग न जाय। डैक्स्टर एक बेहद समझदार कुत्ता है, पर मेरी ग़ज़ल वह बेचारा क्या समझता, कूं-कूं करके अपने बिस्तर में सो जाता है। फिर मैं भी काग़ज़-कलम तकिए के नीचे रखकर सो जाता हूं। सुबह जब उठता हूं तो देखता हूं कि डैक्स्टर मियां अपने झबरीले बालों में छिपी आंखों से मुझे इस आशा में निहार रहे हैं कि मैं उन्हें प्रात:कर्म के लिए बाहर घुमाने ले जाऊंगा। ले जाऊंगा भैया, ले जाऊंगा! तसल्ली रख! ज़रा अपनी ग़ज़ल तो देख लूं। तकिया हटाता हूं, पर वहां से कुछ भी हासिल नहीं कर पाता। वहां कुछ नहीं है। यानी सब कुछ सपना था, सपने में उठना सपना था, ग़ज़ल सपना थी। सचाई के रूप में रह गए तकिया, बिस्तर, मैं और डैक्स्टर!
—एक ऊ सेर याद नायं रह्यौ का?
—याद था चचा, एक शेर थोड़ी देर तक याद था, लेकिन दिन की चकाचौंध से घबरा कर दिमाग के गलियारों में जाकर कहीं छिप गया। चचा, दिल-दिमाग में रहेगा तो किसी न किसी रूप में, कभी न कभी निकलेगा ज़रूर। उसके लिए फिर से सपना देखना पड़ेगा, लेकिन दिन में। सपना देखे बिना कविता नहीं आती।
—तुम कबियन की बात निराली। आगे बोल!
—दिन में जब हम सपनीले होते हैं तो भावनाओं से गीले और पनीले होते हैं और दिमाग की सवारी पर शब्दों के पीछे सरपट दौड़ लगाने लगते हैं। आखेट करते हैं शब्दों का, लेकिन चचा, रचना तब दमदार बनती है जब शब्द तुम्हारे पीछे भागें। शब्द तुमसे कहें कि हम तुम्हारे हैं। तुम्हारे इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं। हमें रख लो, अपने दिल में, अपने दिमाग में। और कहीं जगह नहीं है तो कुर्ते की जेब में ही रख लो। बटुए में रख लो। घर जाकर निकालना दिल-मन की अलग-अलग जेबों से और सहेज कर सजा देना एक काग़ज़ पर। हम तुम्हारे इर्द-गिर्द मंडराते रहेंगे अगर तुम अपने इर्द-गिर्द पर गहरी निगाह रखोगे।
—इर्द-गिर्द पै निगाह रखि कै का देखौ फिर तैंनैं?
—चचा, यहां व्यवहार का खुलापन देखकर अच्छा लगता है। अजनबियों से भी मुस्कान का आदान-प्रदान करते हुए हालचाल का पूछना, यह एक ऐसी संस्कृति है जो पूरी धरती पर होनी चाहिए। धरा के हर जीवधारी में अपने आप होती है। अपना कोई स्वजातीय मिल जाए तो सब कितने प्रसन्न होते हैं। मैं डैक्स्टर को सिडनी पार्क में घुमाने ले गया तो बड़ा मजा आया। वहां देखा कि कितनी ही जातियों और प्रजातियों के कुत्ते अपने मालिकों के साथ उस पार्क में आए हुए थे। आश्चर्य कि कुत्ते एक-दूसरे को देखकर भौंक नहीं रहे थे। हमारे ब्लॉक की गली में तो अगर दूसरे ब्लॉक का कुत्ता आ जाए फाड़ खाने को दौड़ते हैं। वहां के कुत्तों पर भी वहां के इर्द-गिर्द की गर्द का प्रभाव पड़ चुका है और यहां आदमी ने अपने इर्द-गिर्द के गर्दविहीन स्वभाव को कुत्तों में स्थानांतरित किया है। क्यों भौंकते हो बिना बात? कहा— बैठ जाओ, तो बैठ जाते हैं। उन्हें मनुष्य और मनुष्यता के साथ रहने की एक ट्रेनिंग दी जाती है। उनकी अपने स्वजातीयों के साथ सोशलाइजिंग कराई जाती है ताकि वे दूसरों पर बेवजह आक्रामक न हों। यहां वे एक-दूसरे के आनंद में खलल डाले बिना खेलते-कूदते हैं।
—तेरौ डस्टर खेलौ?
—डस्टर नहीं चचा डैक्स्टर! मैं भी दूसरे श्वान-पालकों के समान एक बॉल लेकर गया था। बहुतों के पास बॉल होती हैं। बॉल दूर फेंकी जाती है, कुत्ता उसके पीछे भागता है, उठाकर मालिक को लाकर देता है। मजाल क्या कि कोई कुत्ता किसी दूसरे की बॉल छीने। ट्रेनिंग ही ऐसी है।
—यहां तौ गैंद में बम बनाइबे की टिरेनिंग दई जाय लल्ला। वहां तोय इर्द-गिर्द की गर्द नायं दिखी का?

Monday, June 28, 2010

रंगल मंगल और दंगल का आनन्द

—चौं रे चम्पू! कहां ऐ तू? एक हफ्ता में कित्ते ई फोन मिलाए, उठावै चौं नांय?
—रुको चचा! मैं मिलाता हूं। ….हलो, हलो, हां! चचा, आप जब भी फोन मिलाते हैं मैं सिडनी में कहीं न कहीं कला, संस्कृति या खेल के रंगल, मंगल या दंगल का आनन्द ले रहा होता हूं। यहां इन दिनों आर्ट बिनाले चल रहा है। आठ स्थानों पर विविध कलारूपों की प्रदर्शनियां लगी हुई हैं। एक बार जब आपका फोन आ रहा था, मैं कोकाटू आयलैंड पर आधुनिक कला की विराट प्रदर्शनी के टर्बाइन हॉल में था। चचा! चित्र-कला, मूर्ति-कला, स्थापत्य-कला तो आप जानते हैं, पर शायद आपने इंस्टालेशन आर्ट के बारे में नहीं सुना होगा। जितनी भी चाक्षुष कलाएं हैं उनमें डिजिटल आर्ट और वीडियो और जोड़ दीजिए। आकार और स्थान की परवाह मत करिए, फिर देखिए आपकी कल्पना कैसा रूप धारण करती है। चीन के एक कलाकार काई गो कियांग ने ’इल्यूज़न’ नामक एक ऐसा एनीमेशन इंस्टॉल किया जिसमें नौ बड़ी-बड़ी कारें तोड़ फोड़ कर हवा में टांग दी गई थीं। विस्फोट का भ्रम देने के बाद कलामुंडी खाती हुई कार धरती पर सकुशल उतर आई।
—हवा में कैसै टांग दईं कार?
—एक विराट छत के नीचे। अब खुद सोच लें कि वह हॉल कितना बड़ा होगा जिसमें वह काम लगाया गया था। दूसरी बार जब आपका फोन आया तब मैं डार्लिंग हार्बर के विराट प्रांगण में विविड सिडनी शृंखला का एक गीत-नाट्य ‘फायर वाटर’ देख रहा था। बंदरगाह के तीन तरफ दर्शक थे और समुद्र की खाड़ी में मंच था। कहानी ये थी कि अठारह सौ तीस में कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक बारह-तेरह साल की लड़की सिडनी आई थी। वह लड़की ही इस नाटक की सूत्रधार थी। लाइट-साउंड के अभिनव प्रयोग, खूब सारे कलाकार। एक बड़ा पानी का जहाज भी नाटक का हिस्सा था। मैंने पूरी दुनिया घूमी है चचा, पर इतना बड़ा नाट्य-मंच पहली बार देखा। इस नाटक का संगीत निर्देशक एक भारतीय था, बॉबी सिंह। सितार और भारतीय ताल-वाद्यों के साथ यहां के आदिवासी वाद्य डिजरीडू का प्रयोग करते हुए शानदार सांगीतिक रचनाओं में घुले-मिले नृत्य दिखाए गए। देखने के लिए मुंडी पूरी दो सौ डिग्री घुमानी पड़ती थी।
—वाह भई वाह!
—एक बार कटूंबा के विंटर फेस्टीवल में था। चालीस पचास हज़ार लोगों का रेला-मेला। जैसा दिल्ली का सूरज कुंड मेला होता है। उसके बाद जब आपका फोन आया उस समय फुटबॉल फीवर के कारण सिनेमा हाल की धरती कांप रही थी। फोन कैसे उठाता? मैच से पहले ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को थ्री डी एनीमेशन के ज़रिए जब मैदान में प्रस्तुत किया गया तो सारे दर्शक अपने पैरों से हॉल के फर्श को पीट रहे थे, एक भूकंप सा आ रहा था। उल्लास का भूंकप। फिर जी आए विपक्ष के खिलाड़ियों के एनिमेशन। पूरे हॉल में सियारों जैसी आवाज़ें गूंजने लगीं, जैसी हमारे यहां किसी कवि को हूट करने के लिए निकालते हैं।
—ठीक ऐ ठीक ऐ, और अभी जो फोन मिलायौ ओ?
—एक कंसर्ट में था चचा। सिडनी एंटरटेनमेंट सेंटर में। जैसा अपने यहां दिल्ली में आईजी इंडोर स्टेडियम है न, वैसा। दस हज़ार की क्षमता वाला हॉल खचाखच भरा हुआ था। गायक था यूसुफ। उम्र में मुझसे लगभग तीन साल बड़ा होगा। अद्भुत गायक है। उसका मूल नाम है केट स्टीवेंस। बचपन से ही गाने लगा था। सत्तर के दशक में पॉप स्टार के रूप में उसका बहुत नाम था। खूब सम्पत्ति, खूब यश। सतत्तर में उसने मुस्लिम धर्म कुबूल कर लिया और नाम बदल कर रख लिया यूसुफ़ इस्लाम। भारत में तो दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम धर्म कुबूल करते हैं। उसे इस्लाम धर्म अंतर्मन से भा गया। कट्टरपंथियों ने कहा कि इस्लाम कुबूला है तो गाना बंद करना पड़ेगा। और उसने दसियों साल तक गाना नहीं गाया। कमाल है न! सिडनी छत्तीस साल बाद आया था। श्रोता भी सारे पैंतालीस साल से ऊपर के थे, जिन्हें उसके पुराने गाने याद थे।
—फिर गाइबौ कैसै सुरू कियौ?
—दुनिया भर में फैले अपने प्रेमियों के आग्रह पर। अपने नाम से उसने इस्लाम निकाल दिया, सिर्फ़ यूसुफ़ रह गया और गाने लगा। धर्म रखो, कट्टरता निकाल दो तो गाना अपने आप फूट कर बाहर निकल आएगा। क्यों चचा?
—हां, प्रेम तौ हर मजहब ते बड़ौ ऐ लल्ला!

Tuesday, June 15, 2010

दो कर छोड़ कर दिखाओ सौ कर



-- चौं रे चम्पू! आस्ट्रेलिया पहौंच कै ना तौ तैनैं फोन मिलायौ और ना ई मेरौ फोन उठायौ, का भयौ?
—माफ करना चचा, आपका फोन मैं शोर-शराबे में सुन नहीं पाया। उस वक्त मैं सिडनी में फुटबाल का मैच देख रहा था और बज रहे थे सुबह के तीन। मैच साउथ अफ्रीका के डरबन शहर में चल रहा था और फीफा का बुखार यहां दिखाई दे रहा था। ये मैच होना था जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया के बीच, इसलिए भी सिडनी में इतने तड़के इतनी रौनक थी।
—टीवी पै ई तौ देखते हुंगे।
—हां टीवी का प्रसारण ही देखते हैं, पर घर में बैठ कर देखने में क्या मज़ा! रैस्टोरेंटों और पबों में हल्ला-गुल्ला करते हुए देखते हैं। जैसे दर्शक-दीर्घा में बैठे हों। डार्लिंग हार्बर पर ’सिडनी इंटरनेशनल फीफा फैन फेस्ट’ ने समुद्र के पानी में चार जम्बो स्क्रीन लगाए और तट पर बनी सीढ़ियों पर बैठ कर हज़ारों लोगों ने ठंड में कुड़कुड़ाते हुए मैच देखा।
—सुबह के तीन बजे?
—हां चचा, पर हम वहां नहीं गए थे। न्यू टाउन में घर के पास ही एनमोर थिएटर है। सत्तर-अस्सी साल पुराना। उसका मालिक फुटबॉल प्रेमी है। बड़े परदे पर प्रोजेक्शन से खेल दिखाता है। पूरा वातावरण मैदान जैसा ही बना देता है। खेल शुरू होने से पहले, मैं तो वहां चलते हुए दूसरे खेल देख रहा था।
—दूसरे कैसे खेल लल्ला?
—हर दरवाज़े से उल्लास का शोर अंदर आ रहा था। कुछ लड़के और लड़कियां ऑस्ट्रेलिया की टीम के कपड़े पहनकर, हॉल में बजते सगीत पर थिरकते हुए मगन थे, लेकिन कोई किसी के आनन्द की परिधि में घुसने की चेष्टा नहीं कर रहा था। धीरे-धीरे हॉल भरने लगा। खेल शुरू होने से पहले एक उद्घोषक ऑस्ट्रेलिया का झण्डा लिए हुए निकला तो दूसरा जोड़ा जर्मनी का झण्डा दिखाता हुआ निकल गया। हमारे यहां क्या कोई ऐसा कर सकता है कि किसी दूसरे का झण्डा लेकर क्रिकेट के मैदान में निकल जाए?
—आस्ट्रेलिया खेल-प्रेमी देस ऐ!
—इस खेल के प्रेमी पूरी दुनिया में हैं, लेकिन हम हतभागी हैं। फुटबॉल के वर्ल्ड कप में कभी पहुंच पाते हैं भला? क्रिकेट के आगे किसी और खेल को तरजीह ही नहीं देते। आज पूरी दुनिया का खेल है फुटबाल जिसे सौकर भी कहते हैं। अब पूछो ’सौकर’ इसका नाम क्यों पड़ा! मेरे दिमाग में एक बात आ रही है।
—बता! अपने दिमाग की बात जरूर बता।
—देखो चचा! इंसान की सारी क्षमताओं का केन्द्र उसके दो हाथ होते हैं न! एंगिल्स ने भी कहा कि बन्दर से आदमी बनने की प्रक्रिया में हाथों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हाथों के कारण ही दिमाग विकसित हुआ और हाथों के जरिए ही उसकी सारी प्रगति हुई। ये खेल इंसान की उस केन्द्रीय शक्ति को बाधित कर देता है। यानी हाथों की गतिविधि को न्यूनतम कर देता है। दो कर छोड़ कर पूरे शरीर में लगे सौ कर इस्तेमाल करो। पैर जिनसे सिर्फ चलने का काम लिया जाता है उनसे सर्वाधिक काम करके दिखाओ।
—आगे बता।
—खेल शुरू होने से पहले सट्टे के रेट स्क्रीन पर आ रहे थे। जर्मनी पर दाव लगाओगे तो एक का डेढ़ मिलेगा और ऑस्ट्रेलिया पर लगाओगे तो एक के साढ़े पांच मिलेंगे। ऑस्ट्रेलियाई टीम की जीत की संभावना सटोरियों ने पहले ही समाप्त कर दी थी। जुआ यहां लीगल है चचा! सट्टा सरेआम होता है, पबों पर, अलग-अलग बूथों पर, ख़ास खिड़कियों पर, आप कहीं भी जुआ खेल सकते हैं। अमेरिका में जुआ बैन है, लेकिन इंटरनेट के ज़रिए वहां के लोग ऑस्ट्रेलिया में दाव लगाते हैं। ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने सोच-समझ कर निर्णय लिया है कि दबे-ढके आर्थिक अपराधों से तो अच्छा है कि उन्हें कानूनी बना कर होने दो और सरकारी खजाना बढ़ाओ। सरकार जानती हैं कि जुआ लीगल करने से जुआ बढ़ेगा नहीं, घटेगा। क्योंकि व्यक्ति अपनी सामाजिकता, अपने सामाजिक सरोकारों और अपनी हैसियत के हिसाब से खेलेगा। कुछ लोग कंगाल हो भी जाएं तो थोड़ा सा बेरोज़गारी भत्ता देने से काम चल जाएगा। घाटा नही है। भारत में क्रिकेट पर अरबों रूपए का सट्टा लगता है लेकिन सब काले धन में तब्दील हो जाता है। अपने देश में सौ तरह के कर लगा लो, तब भी कानून टूटेंगे।
—वाह रे सौकर और सौ कर और सौ कर।

Wednesday, June 09, 2010

धन फॉर रन एंड रन फॉर फ़न


—चौं रे चम्पू! का हाल ऐं रे तेरे?
—फिट, एकदम फिट हैं चचा।
—चौं रे, जे फिट की परिभासा का ऐ? कोई आदमी फिट कैसै मानौ जायगौ?
—अगर उसकी जरूरतें पूरी हो रही हैं, वह मस्त है, तो फिट है।
—जरूरत का ऐं इंसान की? वोई रोटी, कपड़ा और मकान।?
—लेकिन पूछिए कि रोटी को किस चीज़ की ज़रूरत है। पुराना ज़माना होता तो कहते— नून, तेल, लकड़ी। अब खाते हैं पित्जा और सलाद में खीरा-ककड़ी। कपड़े के लिए भूल गए हम मार्कीन और लट्ठा। अब सूत न कपास, लेकिन कम्पनियों में लट्ठमलट्ठा। मकान के लिए चाहिए न ईंट, न गारा। बस लोन, एक तेरा सहारा। चचा, अब ज़माना बदल गया है हमारा। कैसे भी करके अगर ये तीनों ज़रूरतें हासिल कर लीं तो ज़िन्दगी की वैतरणी पार, लेकिन नाव में लदा हुआ है तनाव। शहरी मध्य वर्ग के लिए इस समय रोटी, कपड़ा और मकान बुनियादी जरूरत नहीं रह गई हैं।
—फिर का ऐं भैया?
—अब ज़रूरत है फिटनैस की। मध्य वर्ग का शहरी फिट रहना चाहता है।
—सब टीवी सनीमा कौ असर ऐ।
—सही फ़रमाया चचा! आजकल के हीरो और हीरोइन ख़ुद को फिट रखते हैं। अभिनय कौशल के साथ फिटनैस भी चाहिए। अनंत अभिनय क्षमता के बावजूद आज मीनाकुमारी, आशा पारेख नहीं चल पाएंगी। करीना-कैटरीना चाहिए जो फिगर दिखाती हैं। आप बताइए, किसी ने देवानंद, दिलीप कुमार, राज कपूर के भुजदंड देखे? पहले फिटनैस सौंदर्य का पैमाना नहीं होती थी। अब आमिर, शाहरुख, सलमान खान अपनी बनियान उतारकर फिटनैस दिखाते हैं। आज का युवा इन जैसा ही बनना चाहता है। फिगर-चेतना के बारे में फिगर्स तो मेरे पास नहीं हैं, लेकिन आज युवा मन की ज़रूरतें हैं— वेट का कंट्रोलीकरण, एनर्जी-संचय और स्टेमिना-वर्धन। पहले ज्यादा खाओ फिर चर्बी कम करने के लिए खड़ी ट्रेड मिल पर दौड़ लगाओ। बाज़ार में फिटनैस के लिए विटामिन, टॉनिक और स्वास्थ्यवर्द्धक औषधियों का बोलबाला है। बचपन में आरोग्यधाम जैसी इक्का-दुक्का स्वास्थ्य संबंधी पत्रिकाएं देखने में आती थीं। अब आपको योगा, बॉडी एंड सोल, हैल्थ, मसल एण्ड फिटनेस, स्टे फिट, मैन्स हैल्थ, प्रीवेन्शन…. सैकड़ों मैगज़ीन मिल जाएंगी।
—सब अंग्रेजी में!
—मध्यवर्ग अब एक नव-अंग्रेज़ी समाज है। इस समाज में अच्छा दिखने की ललक बड़ी तेजी से बढ़ रही है। सास-बहू के सीरियलों को देखने के बाद हर समय सजे-धजे रहने की कामनाएं बलवती हो रही हैं। सासें चाहती हैं कि बहुएं किचिन-सुन्दरी बनी रहें और वे ज़्यादा कंटान और चकाचक फिट-टिचिन सुन्दरी बनी रहें। एक सास बहू को ताना मारते हुए कह रही थी जब से जिम जाने लगी हूं, तेरे पापा जी की नज़र तो मुझसे हटती ही नहीं है। बहू ने लाड़ से कहा और आपका बेटा भी तो एकटक निहारता ही रहता है मुझे, जबसे मैंने जिम ज्वॉइन किया है।
—तौ आजकल सास-बहू दोनों मिल कै जिम जायं का?
—हां, एक साथ मिल कर जीमेंगी नहीं, पर जिम जरूर जाएंगी। पहले स्वास्थ्य-सजग सीमित लोग ही सुबह-शाम टहलने जाते थे, लेकिन अब जिधर देखिए पार्कों , जिमों और ब्यूटी-पार्लरों की बहार है। बहुमुखी आनन्ददायी स्वास्थ्य गतिविधियां बढ़ गई हैं। नौजवान पीढ़ी में खेल, नृत्य, एरोबिक्स, दौड़ना, साइकिल चलाना, टेनिस खेलना और जिम जाना सामाजिक प्रतिष्ठा की बात है। बच्चे पहले सिनेमा की टिकट के लिए पैसे मांगते थे, अब जिम के लिए मांगते हैं। मां-बाप पहले खुश थे कि सिनेमा की टिकट के पैसे कम देने पड़ते थे, जिम के लिए चाहिए हज़ारों में।
—अब लल्ला, पैसा आवैगौ तौ खर्च ऊ होयगौ।
—हां, इसीलिए तो दनादन खुल रहे हैं जिम। अब छोटे-छोटे शहरों में भी ईवैन्ट मैनेजमेंट के लोग मैराथन दौड़ कराते हैं। मिलता है धन फॉर रन! लेकिन कहते हैं— रन फॉर फ़न। दौड़ो!! फिटनेस विद फन। अब व्यक्ति खेल के मैदान में सिर्फ दर्शक बनकर नहीं जीना चाहता, वह अपने लिए मैदान तलाश करता है। नई कॉलोनियों के विज्ञापनों में बताया जाता है कि हमारी सोसायटी में जिम है, स्विमिंग पूल है, गोल्फ है। ओलम्पिक साइज़ की सारी सुविधाएं हैं। फिर भी दुविधा! दुविधा कि इस सबके बावजूद तनाव।
—तौ तनाव का इलाज का ऐ?
—चचा मेरा दोस्त अनिल सीतापुरिया बोला— तनाव न हों तो ज़िन्दगी बोरियत से भर जाए और खुश रहने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है, इसलिए फिट रहो।
—ठीक है लल्ला।

Wednesday, June 02, 2010

कठिन अवसरों में कूल

—चौं रे चम्पू! खबर पढी ऐ कै एयर इंडिया कौ एक जहाज पांच हज्जार फीट ताईं गोता खाय गयौ? हवाई जहाजन के बारे में जे कैसी-कैसी खबर आय रई ऐं रे?
—चचा, सारथी चाहे बैलगाड़ी का हो चाहे हवाई जहाज का, अपने वाहन पर ध्यान नहीं देगा, सो जाएगा या कहीं खो जाएगा तो कुछ भी हो जाएगा।
—सो बात गल्त। बैलगाड़ी कौ गाड़ीवान सो ऊ जाय तौ बैल घर पहुंचाय दिंगे।
—कौन से घर चचा? मुझे बचपन का एक सच्चा किस्सा याद आ रहा है। मेरे मामा के एक दोस्त मामा की बैलगाड़ी से मामा की ससुराल गए। अपनी किसी हरकत के कारण पिट कर लौट रहे थे, हड्डियां टूटी हुई थीं, मुंह सूजा हुआ था, किसी तरह बैलों को दौड़ाया और सो गए। मामा के बैलों की मामा की ससुराल में अच्छी ख़ातिर हुई थी। बढ़िया दाना-पानी मिला था। उन बैलों ने मामा के दोस्त को वापस वहीं पहुंचा दिया। बैलों की और मामा के दोस्त की दोबारा से अच्छी ख़ातिरदारी हुई।
—तेरे सच्चे किस्सा सच्चेई मजेदार होंय। पर तू बैलगाड़ी की नायं, जहाजन की बता।
—एयर इंडिया एक्सप्रेस दो सौ बारह में एक सौ बारह यात्री और चालक दल के छ्ह सदस्य सवार थे। पायलट स्वचालित प्रणाली के भरोसे लघुशंका को चला गया। विमान काफी नीचाई तक गोता खा गया। अगर दीर्घशंका को बैठ जाता तो इसमें शंका नहीं कि एक सौ अठारह लोग जीवन से उठ जाते। और भी कई घटनाएं हो गई इस दौरान। दिल्ली से श्रीनगर वाली फ्लाइट के पहियों में भी कुछ ख़राबी आ गई थी। मुश्किल से दोबारा लैण्ड हुआ। अभी दो-तीन दिन पहले दो हवाई जहाज आमने-सामने की टक्कर से बच गए। कई बार वीआईपी मूवमेंट के कारण जहाजों का ईंधन खत्म हो जाता है और पायलेट को किसी और हवाई अड्डे पर विमान उतारना पड़ जाता है। देवेन्द्र जी बता रहे थे।
—कौन से देवेन्द्र जी?
—बताया तो था पिछली बार! जो मुझे बीस साल पहले मिले थे! उस जहाज में, जिसके पहिए नहीं खुले थे। देवेन्द्र जी ने चेन्नई-हैदराबाद आईसी चार सौ चालीस के बारे में बताया कि ईंधन की कमी के कारण कैप्टन भल्ला को खेत में विमान उतारना पड़ा था। बैंगलोर जाते वक़्त देवेन्द्र जी के साथ पूर्णिमा जी से भी मुलाकात हुई। उन्होंने वीरता से भरी हुई अपनी अनुभव गाथा सुनाई।
—पूर्णिमा जी कौन हैं?
—पूर्णिमा जी एक वरिष्ठ विमान परिचारिका हैं। उन्होंने बताया कि वे टीयू एक सौ चउवन रूसी विमान में हैदराबाद से दिल्ली आ रही थीं। फ्लाइट का पायलट भी रूसी था। फॉग के कारण विजिबिलिटी ज़ीरो थी। रूसी को कुछ दिखाई नहीं दिया लेकिन उत्साह में आकर विमान को लैंड कर दिया। एक पहिया कच्चे में, एक पक्के में। डगमग डगमग मंडराता हुआ, एक पंख तुड़वाता हुआ हवाई जहाज एकदम उल्टा हो गया। अब सारी सीट ऊपर, यात्री बेल्ट से बंधे हुए। कुछ टपक गए, कुछ लटके रहे। मरा कोई नहीं, लेकिन पूर्णिमा जी ने जो काम कर दिखाया वह भी ग़ज़ब था। उन्होंने अनेक यात्रियों को सीट-बेल्ट खोल कर नीचे उतारा। जो यात्री अपने वज़न के कारण कुर्सी सहित नीचे आ गए थे, उन्हें खड़ा किया। विमान से अंतिम यात्री के बाहर निकल जाने तक पूर्णिमा जी सबकी मदद करती रहीं। विमान में आग लग चुकी थी, लेकिन उन्होंने मानव सेवा से आगे अपनी जान की परवाह नहीं की। इस साहसिक कारनामे के लिए उनको ‘नीरजा भनोट पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। नीरजा भनोट का नाम तो आपने सुना होगा? वह भी एक एयरहोस्टेस थीं, जिन्होंने करांची हवाई अड्डे पर आतंकवादियों को रोकने के लिए सीने पर गोली खाई और यात्रियों को बचाया। तो चचा उस दिन एक साथ दो विभूतियों के दर्शन हुए। मैंने दोनों से उनका अता-पता लिया। देवेन्द्र जी से तो फोन पर बातें होती रहती हैं आजकल। पूर्णिमा जी भी दिव्य हैं। मैंने उनसे ई-मेल आईडी पूछा तो उन्होंने बताया— पूर्णिमा कूल एट द रेट ऑफ पता नहीं क्या था, याहू, रेडिफ, जीमेल या कुछ और, लिखा हुआ है मेरे पास। चचा, वे लोग प्रणम्य होते हैं जो कठिन अवसरों में कूल रहते हैं। दुर्घटना की संभावना में और दुर्घटना के बाद कूल रहना जरूरी है।
—चल ई-मेल करै तौ हमारी ऊ राम-राम लिख दीजियो।
—ज़रूर चचा।

Thursday, May 27, 2010

मरने से पहले करने का मौका

—चौं रे चम्पू! मंगलौर गयौ ओ कै बंगलौर?
—बंगलौर गया था चचा, लेकिन मेरी फ्लाइट से पहले जब मंगलौर वाली फ्लाइट की घोषणा हुई तो निगाह बोर्डिंग गेट की ओर गई। सोच रहा था कि उस छोटे रनवे वाले हवाई-अड्डे से कुछ दिन तक तो यात्री शायद घबराएंगे, लेकिन गेट पर बड़ी लंबी लाइन थी चचा। बड़ी से बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं और हम भारतवासी अपनी जीवन की धारा में बहुत जल्दी लौट आते हैं। हां, एक कमाल हुआ चचा। इंडियन एयरलाइंस की दिल्ली बंगलौर की फ्लाइट आठ सौ तीन में जो परिचारक महोदय थे, देवेन्द्र भारद्वाज, मुझे पहचान गए। उन्होंने कहा, याद है बीस साल पहले की वह घटना, जब दो सौ सीरीज़ के बोइंग सेवेन थ्री सेवेन जहाज के पहिए नहीं खुले थे, मैं भी था आपके साथ। आप सबसे पिछली सीट पर बैठे थे। चचा, सचमुच, अभी दस मिनिट पहले मैं उस घटना को याद कर रहा था।
—का भयौ ओ?
—कलकत्ता, तब कलकत्ता को कोलकाता नहीं कहते थे। अंग्रेज़ीदां लोग कैलकटा कहते थे। हमारा जहाज कैलकटा से सीधे दिल्ली नहीं आ रहा था, गैल-कटा था। लखनऊ में रुका। वहां कुछ यात्री उतरे, कुछ सवार हुए। मैं खिड़की वाली सीट पर था। आकाश से धरती को देखना बड़ा अच्छा लगता था। कल्पनाओं में खोया रहता था। कालिदास पता नहीं कैसे धरती के टॉप एंगिल दृश्यों का इतना अद्भुत वर्णन कर पाए! मेघदूतम् और रघुवंशम् में देखिए।
—आगे की बात बता!
—वो ज़माना दूरदर्शन के एकाधिकार का था, इसलिए हिन्दीभाषी लोग मुझे खूब पहचानते थे। लेकिन, मेरी बगल में जो सज्जन आकर बैठे, उन्होंने मेरी मुस्कान का भी उत्तर नहीं दिया। मैंने सोचा टीवी न देखते होंगे।
—फिर वोई बात, दुर्घटना की चौं नायं बतावै?
—दुर्घटनाएं पलांश में हो जाती हैं। इस पल आप हैं और अगले पल नहीं हैं। झटके में मौत आ जाए तो ख़ास कष्ट नहीं होता, लेकिन अगर आपको पता हो कि कुछ देर बाद लगभग निश्चित है कि आप नहीं रहेंगे, ऐसी स्थिति विकट होती है। घोषणा हो चुकी थी कि विमान दिल्ली में उतरने वाला है, उतरने भी लगा, हवाई-पट्टी दिखाई देने लगी थी, लेकिन जहाज उतरा नहीं, हवाई-पट्टी तक जाकर अचानक ऊपर उठ गया। जानकारी में आया कि उसके पहिए नहीं खुल पाए थे। सब स्तब्ध। जहाज में हलचल मच गई।
—फिर का भयौ?
—पैंतालीस मिनट तक हवाई जहाज आकाश में उड़ता रहा। अपना ईंधन समाप्त करने के लिए, ताकि आपातकालीन लैंडिंग के समय जहाज में आग न लग जाए। फ्लाइट पर्सर देवेन्द्र जी ने बताया कि पायलट थे कैप्टेन विर्क और कंट्रोल टावर ने उनसे कह दिया गया था कि अपनी रिस्क पर ही वे लैंड करें। वे सोचते रहे कि किसी खेत में उतारें कि रेत में और यात्रियों के चेहरों से दहशत कैसे उतारें। लखनऊ से बैठे हुए सज्जन अचानक मुझसे लिपटकर रोने लगे— ‘कवि जी! मेरे पांच बच्चे हैं, एक पैट्रोल पम्प है, मैं मर गया तो सब बरबाद!’ मुझे उन कष्ट की घड़ियों में भी आंतरिक हंसी आई। अब जब मौत सिर पर आ गई है तब पहचान रहे हैं श्रीमान जी! ख़ैर, वे मेरे बड़े काम आए। अपने आप को डर से बचाने के लिए मैं उन्हें आध्यात्मिक प्रवचन देने लगा। देवेन्द्र जी ने ही बताया कि जब अधिकांश लोग रो रहे थे तब आपने खड़े होकर ज़िन्दगी से जुड़ी हुई एक कविता सुनाई थी, जो आपने वहां के हालात पर वहीं बनाई थी। मुझे तो चचा बिल्कुल याद नहीं, पर उस दिन आकाश से धरती बड़ी प्यारी लग रही थी।
—एअर हौस्टैस ऊ रोय रईं का?
—नहीं चचा बिलकुल नहीं। सब निर्भीक होकर प्रबंधों में लगी थीं। फर्स्ट एड बॉक्स, पैराशूट, एग्ज़िट गेट… सारे इंतज़ाम यात्रियों के सामने ही किए जा रहे थे। एक बात देवेन्द्र जी ने बहुत बढ़िया कही, वे बोले— ‘कुछ करने का मौका तो तभी होता है सर जी, जब मालूम हो कि मरना है, इसलिए मरने से पहले कर जाओ जो करना है।’ पैंतालीस मिनट तक जीवन-मृत्यु का संघर्ष कराते-कराते, अंतत: पहिये खुलने पर जहाज उतर गया। सबने तालियां बजाईं। कोई भी आदमी, कहीं भी शिकायत करने नहीं गया। कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई, न ये खबर किसी अख़बार में आई।
—अख़बार में तौ तब आती, जब कछू है जातौ।

Tuesday, May 18, 2010

ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो दंडित होय

—चौं रे चम्पू! ढाई आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय कै दंडित होय?
—चचा जवाब तुम्हारे पास है और सवाल मुझसे पूछते हो। पंडित कैसे हो जाएगा? पंडितों ने तो गोत्र, जाति, धर्म वाले सारे रगड़े फैलाए हुए हैं। वे कहां समझते हैं प्रेम-प्यार की भाषा, वे लाते हैं रार-तकरार की भाषा। अगर कहीं प्यार कर बैठे आप, तो खप से खा जाएगी खाप। उनका कहा मान लो चुपचाप, वरना बन जाओगे मसान की भाप।
—पहलै पाबन्दी बस्स दो-तीन गोत्रन की रहती।
—फिर पांच गोत्रों तक हो गई। सामाजिक समर्थों और आर्थिक रूप से शक्तिशाली लोगों ने पच्चीस गोत्रों तक मामला पहुंचा दिया। जो गोत्र समर्थ हैं, जिसके ज्यादा लोग हैं उन्हीं की खाप पंचायत में वकत होती है। उन्हीं का दबदबा होता है। ढाई आखर तो दब-दबा के रहते हैं। पंचायत में तो पंचाक्षर— ’ख़बरदार’! कितने प्रकार की आर्थिक, सामाजिक, मानसिक कुंठाएं हैं चचा आप कल्पनाएं नहीं कर सकते। यही पंचायत के लोग चुपचाप दलित बस्तियों में मुंह मारते दिखाई दे सकते हैं। ये देह के धर्म को ढाई आखर से नहीं नापते। ये नापते हैं, सात फिट की लाठी के बल से। बाहुबली भुजाएं और भोग। उनके लिए ढाई आखर तो है एक रोग।
—तलवार दुधारी, कट्टा और कटारी!
—पहले प्यार करने वाले कहा करते थे— मार कटारी मर जाना, मगर हाय दिल न लगाना। ठीक कहा चचा, अब खुद कटारी मारने की जरूरत नहीं है, दूसरे ही कटारी मारने के लिए आ जाएंगे। मीरा बाईं कह गईं थीं— जो मैं ऐसा जाणंती, प्रीत किए दुख होय, नगर ढिंढोरा फेरती, प्रीत न करियो कोय। मीरा बाईं तो बहुत पहले समझ गई थीं कि ये कानून को न मानने वाली पंचायतें प्रेमियों पर कुठाराघात करेंगी।
—अरे लल्ला, अगर प्यार में अड़ंगा न लगै तो संसार की आधी ते जादा कहानी तौ खतम है जांगी।
—लेकिन चचा कहानी इतनी दुखांत भी नहीं होनी चाहिए। प्रेम अभी परवान भी नहीं चढ़ा कि आपने उनको फांसी चढ़ा दिया। दिल जुड़ जाते हैं तो कई बार कुटुम्ब टूट जाते हैं, लेकिन फिर कुटुम्ब पिघल भी जाते हैं और प्रेम की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं। यह कहानी तो समझ में आती है, लेकिन मामला अगर गठबंधन के बजाए मूंछ ऐंठन का हो जाए और पंडित फेरे दिलाने से इंकार कर दे तो ढाई आखर क्या करेगा भला। ढाई घर चलने वाले घोड़ों पर सवार होकर पंच आ जाते हैं। शतरंज शत-रंज बन जाती है, जब मौत अपनी बिसात बिछाती है। ढाई घर की चाल चलने वाले घोड़े प्यार के ढाई आखर को कुचल देते हैं। आपने वो दोहा सुना होगा— दृग उरझत, टूटत कुटुम्ब, जुरत चतुर-चित प्रीत, परत गांठ दुर्जन हिए, दई नई यह रीत।
—सुनौ तौ ऐ, पर मतलब समझा।
—चचा जो चीज़ उलझती वही टूटती है, जो टूटती है वही जुड़ती है, और जो चीज जुड़ती है उसी में गांठ पड़ती है। यहां सारा मामला गड़बड़ है। उलझे तो दृग, टूट गए कुटुम्ब, जुड़ गए चतुर चित, गांठ पड़ गई दुर्जनों के हृदय में। अब ये बिहारी के जमाने में नई रीत रही होगी। तब से अब तक पुरानी पड़ चुकी है, लेकिन खत्म होने का नाम नहीं ले रही। दुर्जनों की गांठें कैसे खुलें चचा, सवाल ये है।
—सरकार चौं नाय कछू करै?
—अरे चचा सरकार में भी तो वही लोग होते हैं। जिस प्रांत में ऐसा सब हो उसके अधिकारी भी तो वहीं से निकल कर आते हैं, वे भी उसी समाज के हिस्से होते हैं, उनका दिमाग भी वही समाज बनाता है, वो कोई संविधान पढ़कर बैठते हैं वहां पर। वे कानून की किताबों के अनुसार समाज को थोड़े ही चलाते हैं। जब तक भयंकर हाहाकार और मारकाट न हो जाए, पुलिस भी एफआईआर नहीं लिखती है। पुलिस के जवान भी खाप पंचायत के चौधरियों की मूंछ के नीचे पले हुए बच्चे ही होते हैं। मूंछों के साए में पलने के बाद उनकी मूंछें कोई अलग किस्म की नहीं होती हैं। ठीक कहा आपने— ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो दंडित होय।
—चल मेरौ अगलौ सवाल सोचि कै रख कै महिमामंडित कब दंडित हुंगे?

Thursday, May 13, 2010

बीरबल हुए बलबीर रहमोकरम पर रहीम

—चौं रे चम्पू! आज बिना कलफ बिना प्रेस कौ कुर्ता पहरौ ऐ! का चक्कर ऐ? कपड़न समैत ई तेरी घर में धुलाई है गई का?
—चचा घर में मेरी धुलाई तो प्रेस के कपड़ों में भी हो जाती है। हुआ ये कि कल रात एक कविसम्मेलन में गया था। वहां इतना पानी बरसा कि सारा कलफ़ निकल गया। फिर कुर्ता बदला ही नहीं।
—तौ का खुले में औ कविसम्मेलन?
—हां चचा! मौसम बरसात का नहीं है, पर अचानक बारिश आ गई। पन्द्रह कवि थे। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी। लग रहा था जैसे इस गर्मी के मौसम में आसमान गुलाब जल छिड़क रहा हो। श्रोता भी कई हज़ार थे। हल्की फुहारों में पहले दो कवियों ने सुदीर्घ काव्य-पाठ किया। मैंने देखा कि बिजली की कड़क मामूली नहीं थी। आभास होने लगा यह बिजली कविसम्मेलन पर भी गिर सकती है। संचालक से मैंने कहा कि सब कवियों से अनुरोध करो थोड़ा-थोड़ा ही सुनाएं, ताकि पहले चक्र में सबको अपनी एक कविता सुनाने का अवसर मिल जाए। बारिश न आई तो एक दूसरा दौर किया जा सकता है।
—पहलै तौ चार-चार दौर होते!
—अचानक बरसात तेज हुई। श्रोताओं में भगदड़ मची। अब संचालक को लगा कि अगर सारे कवियों ने काव्य-पाठ न किया तो आयोजक कवियों को लिफाफा न देंगे। सब कवियों से कहा गया कि अपनी चार-चार पंक्तियां सुना दें। भागती-दौड़ती भीड़ के बीच में दो कवियों ने एक-एक मुक्तक सुनाकर दो मिनट में काव्य-पाठ समाप्त कर दिया। इस दो मिनट में श्रोता रह गए चौथाई से भी कम। लेकिन बारिश थमी। जैसे थोड़ी देर के लिए धमकी देने आई हो। अगले कवि ने देखा कि श्रोता लौट रहे हैं। उन्हें भ्रम हुआ कि यह उनकी कविता की ताकत है जो श्रोताओं को वापस ला रही है। आधा घंटा ले गए। संचालक के इशारे काम न आए। मेरे ख्याल से बारिश भी नाराज हो गई — एक बार धमकाया था हे कवियो! मेरी धमकी का तुम पर कोई असर न हुआ। तो जी, घन-गरज के साथ छींटे पड़े। कविताएं हो रही थीं। श्रोता पानी के साथ-साथ कविताओं में भी भीग रहे थे। माइक पर खड़ी कवयित्री ने कहा कि यह मेरा अंतिम मुक्तक है। इस पर ज़्यादा तालियां बज गईं। वे इन तालियों का अर्थ न समझ पाईं। लीजिए दो मुक्तक और सुना रही हूं। चलते-चलते बोलीं— इधर एक ताजा गीत लिखा है उसे सुनाए बिना तो मैं बैठने वाली नहीं हूं।
—कबियन में बड़ी पढ़ास होय करै।
—संचालक माइक से इशारे करे। ऐसे में कविगण संचालक की ओर देखते ही नहीं हैं। बहरहाल रिम-झिम में श्रोता बैठे रहे। फिर जी एक आए भूतपूर्व कवि और वर्तमान लाफ्टर चैलेंज के ख्यातिनाम व्यक्ति। उन्होंने उस रिम-झिम में पौना घंटा खींच दिया। लतीफों की झड़ी लगा दी। सड़े-गले चुटकुले झेलते रहे श्रोता। हंसते भी रहे। लतीफेबाज़ का अभिनय भी काम में आ रहा था। अचानक…
—का भयौ अचानक?
—एक बहुत अच्छी बात हुई। श्रोताओं में से दो-तीन लोग आगे आए। उन्होंने चीखकर उस लाफ्टर चैंलेंज वाले कवि से कहा— बैठ जाइए। हम लतीफे सुनने नहीं आए। कविताएं सुननी हैं। अभी जो कवि बचे हैं, उनकी कविताओं के लिए लोग रुके हुए हैं। बन्द करिए लतीफेबाज़ी। उस हास्य कलाकार ने हास्य-मिश्रित क्रोध में उन लोगों की ओर इशारा करते हुए जनता से कहा हटाओ इन्हें। कौन आ गए प्रोग्राम बिगाड़ने? उसने समझा कि सारी भीड़ उसका साथ देगी। चचा मुझे प्रसन्नता इस बात की हुई कि जनता ने उसका साथ नहीं दिया। लाफ्टर वाले को आफ्टर ऑल बैठना पड़ा। उसके बाद अपनी भी बारी आई।
—तैंने का सुनाई?
—रिम-झिम जारी थी। कविता सुनाईं सो सुनाईं पर मैंने इतना कहा कि कविसम्मेलनों की जो परंपरा हमारे कस्बों और नगरों में है— लोग सचमुच कविता सुनने आते हैं। सम्पूर्ण भोजन की थाली चाहते हैं। सिर्फ चटनी, अचार, मुरब्बे के लिए नहीं आते। अकबर के दरबार में बीरबल भी थे और रहीम भी थे। दोनों मौलिक थे। अब मंच पर मौलिकता तो मुश्किल से दिखती है। ऐसा न हो कि बीरबल व्यर्थ ही बलबीर होने की कोशिश करें और रहीम इनके रहमोकरम पर रह जाएं। कविसम्मेलनों में कविता को बचाइए।
—तेरी बात सुनी लोगन नै।
—सुनी! चचा वहां तो तालियों की बरसात हो गई।

Wednesday, May 05, 2010

नंगापन और नंगपना

—चौं रे चम्पू! कपरा-लत्ता की महत्ता का ऐ?
—चचा इंसान नंगा ही आया था, नंगा ही जाएगा। कपड़ा इंसान के दिल और दिमाग की बातचीत के बाद आंखों के कारण अस्तित्व में आया होगा। जब दिल ने चाहा होगा कि दूसरे शरीर को यहां-वहां देखा जाए, दिमाग ने कहा होगा मत देख या एकटक देखता ही रह, तब दूसरे शरीर ने भी देखा होगा कि यह कहां-कहां देखना चाहता है। आंखों की लुकाछिपी कुंठाएं पैदा करने लगीं तो लताओं ने पत्ते के रूप में लत्ते प्रदान कर दिए, बुद्धि ने तन ढकना शुरू कर दिया। कपड़ा सभ्यता बन गया।
—तौ सारौ दोस आंखिन कौ ऐ? आंख तौ पसु-पच्छीन के पास ऊ हतैं!
—उनके दिमाग में कुंठाएं नहीं हैं न! वे अकुंठ हैं, इसलिए अवगुंठन की ज़रूरत नहीं पड़ी। आपकी बहूरानी ने एक मुक्तक लिखा है— ’किस तरफ कितनी हैं राहें, सब उसे मालूम है। किसके मन में कैसी चाहें, सब उसे मालूम है। भीड़ में बैठी है गुमसुम, नज़र नीचे हैं मगर, उसपे हैं कितनी निगाहें, सब उसे मालूम है।’ वस्त्र संस्कृति की महायात्रा में सदी दर सदी, नदी दर नदी बहते हुए हमारे पास आए हैं। हमने उन्हें समय के घाट पर धोया है। वस्त्रों ने घाट-घाट का पानी पिया है। गांधी जी सूट-बूट और पगड़ी में रहा करते थे, लेकिन एक अर्धवसना स्त्री को देखकर संकल्प किया कि अर्धवसन रहेंगे। ताउम्र संकल्प निभाया। चचा, उस महिला की तो मजबूरी थी, पर इस नवधनाढ्य संस्कृति में किसने मजबूर किया है कि कम कपड़े पहनें। चलिए, मज़ेदार लतीफे सुनाता हूं आपको।
—सुना, लतीफा जरूर सुना।
—एक आयकर अधिकारी जब किसी फिल्मी तारिका की इन्कम टैक्स रिटर्न देख रहा था तो अचानक हंसने लगा। उसके सहायक ने पूछा, क्यों हंसते हैं सर? अधिकारी बोला कि कपड़े तो पहनती नहीं है और लाउण्ड्री का खर्चा दस लाख का दिखाया है। दूसरा सुनो, एक धोबी ने हीरोइन के वस्त्र प्रेस करने से मना कर दिया। प्रोड्यूसर ने पूछा, क्यों, क्या तकलीफ है तुझे? धोबी बोला— जी कम से कम इतना बड़ा तो हो कि पकड़ में आए, पूरा कपड़ा तो प्रेस के नीचे दब जाता है, कहां से पकड़ूं इसे।
—मजाक मत कर चम्पू। मैंने तौ गंभीर बात करी।
—सबसे ज्यादा गंभीर बात खलील जिब्रान ने कह दी। उन्होंने कहा कि वस्त्र हमारे शरीर के असुन्दर को नहीं, सुन्दर को ढक लेते हैं। असुन्दर हो जाता है चेहरा, जिस पर आते-जाते भाव हमारे अंतर्लोक को उजागर कर देते हैं। घृणा, द्वेष, ईर्ष्या, स्वार्थ, सुख-दुख चेहरा बता देता है, आंखें बता देती हैं। मेरा नाम जोकर में अपने आंसू छिपाने के लिए राजकपूर ने काला चश्मा लगाया था। लेकिन चचा, नंगापन और नंगपना दो अलग-अलग चीजें हैं। कपड़ों से नंगापन ढक सकता है, नंगई नहीं। मुक्तिबोध की दो पंक्तियां मुझे रह-रह कर अनेक प्रसंगों में याद आती रहती हैं चचा— मैंने उन्हें नंगा देख लिया, इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी। आजकल लोग हमाम के बाहर भी नंगे हैं और आपने अगर उनको देख लिया तो कसूरवार आप ही ठहराए जाएंगे। थरूर का गुरूर हो या मोदी की गोदी। आई.पी.एल. मायने इंडियन पैसा लीग। हर कोई कपड़ों के बावजूद नंगा है, ऐसा लफड़ा है। अखबार हर दिन कितने लोगों को नंगा करते हैं, गंगा फिर भी बह रही है। कपड़े धोने के लिए नहीं, उनके मैल काटने के लिए। बेचारी खुद मैली हो जाती है। मैली गंगा में क्या मैल साफ होगा? आश्चर्य होता है किसी के घर डेढ़ टन सोना निकल रहा है, किसी के पास डेढ़ सौ ग्राम गेहूं नहीं है। किसी का वार्डरोब हजार साड़ियों हजार सूटों से भरा है, किसी के पास एक कपड़ा ही नहीं है। वह किस वार्ड में जाकर अपना रौब दिखाए! एक शायर ने कहा है— वादा लपेट तनपे लंगोटी नहीं तो क्या? विषमताएं हैं, समाज में बहुत विषमताएं हैं।
—तू बात कूं फैलावै भौत ऐ चम्पू! बात हौनी चइयै सारगर्भित और छोटी, जैसै कै हमाई बगीची के पहलवान की लंगोटी।

Wednesday, April 28, 2010

एक सवाल को घुमा गई रोटी

—चौं रे चम्पू, आजकल्ल भौत लोग तेरे पीछे परे भए ऐं, आरोपन ते घिरौ भयौ ऐ, चक्कर का ऐ?
—चक्कर तो वही लोग जानें चचा! मुझे तो मुल्ला नसीरुद्दीन का एक किस्सा याद आ रहा है।
—मुल्ला नसीरुद्दीन, जाके किस्सा एक ते एक हसीन।
—हां चचा, उन पर आरोप भी लगाए जाते थे संगीन। दरबार में सारे के सारे मनसबदार, शायर, सूफ़ी, अलग़ज़ाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी, आलिमोफाज़िल, सब के सब सरदार, सिपहसालार, ओहदेदार मुल्ला से चिढ़े-कुढ़े रहते थे। क्योंकि मुल्ला उन्हें अज्ञानी और झूठा मानते थे। सबने मिलकर बादशाह से शिकायत कर दी कि मुल्ला नसीरूद्दीन हुकूमत के लिए खतरा बन चुका है आलमपनाह। सो जी उन पर राजदरबार में मुकदमा चलाया गया। दरबार में बादशाह ने मुल्ला से कहा— मुल्ला नसीरुद्दीन! पहले तुम अपनी बात दरबार के सामने रखो। मुल्ला ने कहा— कुछ कागज़ और कलम मंगा लीजिए। कागज़-कलम मंगा लिए गए। मुल्ला ने कहा कि अब दस बुद्धिमान लोगों को एक-एक कागज़ और कलम दे दीजिए। ऐसा ही किया गया। अब दसों से मुल्ला ने कहा कि अपने-अपने कागज़ पर इस सवाल का जवाब लिख दें कि रोटी क्या है?
—फिर का भयौ?
—सबने जवाब लिख दिए और् दरबार में राजा और जनता के सामने पढ़कर सुनाए गए। पहले ने लिखा— रोटी भोजन का सामान है। दूसरे ने लिखा— यह ईश्वर का वरदान है। तीसरे ने लिखा— यह आटे और पानी का घोल है। चौथे ने लिखा— कहीं चपटी, कहीं गोल है। पाँचवे ने लिखा— रोटी की वजह से ही खुशहाल घर और घरौंदा है। छठवें ने लिखा— यह एक पकाया हुआ आटे का लौंदा है। सातवें ने लिखा— रोटी न मिले तो इंसान रो देता है। आठवें ने लिखा— इसके आगे सब कुछ को खो देता है। नौवें ने लिखा— यह पौष्टिक आहार है और दसवें ने लिखा— कुछ कहा नहीं जा सकता इसकी महिमा अपार है।
—सबन्नै सही बात लिखी!
—लेकिन मुल्ला ने भरे दरबार में कहा— अगर इतने विद्वान और गुणी लोग इस पर एकमत नहीं हैं कि रोटी क्या है तो वे यह कैसे कह सकते हैं कि मैं अपनी हंसाने वाली बातों से लोगों को गलत राह दिखाता हूं, लोगों की मति भ्रष्ट करता हूं। मुल्ला का मुकदमा ख़ारिज़ हो गया।
—यानी तेरौ ऊ मुकद्दमा खारिज है जायगौ?
—मेरी बात छोड़िए, पर इतना तय है कि रोटी न मिले तो मति को कर सकती है भ्रष्ट, दे सकती है अपार कष्ट और कर सकती है नष्ट। मिलती रहे तो मां होती है, न मिले तो हत्यारी होती है। अच्छी है या बुरी है, रोटी ही दुनिया की धुरी है।
—वाह भई वाह!
—मैंने फेसबुक पर अपने मित्रों के बीच में सवाल दागा कि रोटी क्या होती है। लगभग सौ लोगों ने अपनी-अपनी तरह से रोटी की व्याख्या की। एक से एक लाजवाब।
अशोक गोयल ने लिखा कि रोटी वो चीज है जो पेट में जाने के बाद परांठे की हवस को जन्म देती है।
तरुण भारद्वाज ने लिखा, रोटी किसी के लिए खाना है, किसी के लिए खज़ाना। अमित कुमार त्रिपाठी कहते हैं कि रोटी भूख का अंत और लालच की शुरुआत है। बिन्दु अरोड़ा बोले कि पैसे से रोटी तो बन सकती है मगर पैसे की रोटी नही बन सकती। नन्दलाल भारती ने कहा कि रोटी का असली मतलब तो वही जानता है, जिसका चूल्हा पसीने से गरमाता है। अंशु माला ने बड़ी मार्मिक बात कही— अमीर का बच्चा जिसे चुपके से कूड़ेदान में डाल आता है गरीब कूड़ा बीनने वाला बच्चा चुपके से कूड़ेदान से उठा लाता है। मुल्ला नसीरुद्दीन का सवाल इंटरनेट की मेहरबानी से हजारों लोगों तक पहुंच गया।













—तू का लिखतौ?
—मैं क्या लिखता! रोटी खुद ही एक सवाल है। मेरी चंद पंक्तियां सुन लीजिए— गांव में अकाल था, बुरा हाल था। एक बुढ़ऊ ने समय बिताने को, यों ही पूछा मन बहलाने को— ख़ाली पेट पर कितनी रोटी खा सकते हो गंगानाथ? गंगानाथ बोला— सात! बुढ़ऊ बोला— गलत। बिलकुल गलत कहा, पहली रोटी खाने के बाद पेट खाली कहां रहा? गंगानाथ, यही तो मलाल है, इस समय तो सिर्फ़ एक रोटी का सवाल है।

Friday, April 23, 2010

विश्व-प्रेम की दिशा में आगे बढ़ने की सीढ़ी

—चौं रे चम्पू, सानिया-सुऐब कौ ब्याह ठीक भयौ का? तू का मानै?
—चचा, विवाह तो हर प्रकार से विचार करने के बाद ही किया जाता है। सानिया ने सोचा है कि ठीक है, तो बिल्कुल ठीक है। उसने किसी अन्य जीवधारी से तो विवाह नहीं किया! समलिंगी से तो नहीं किया! प्रकृति के नियमों का पालन किया। एक पुरुष से प्रेम किया। मुश्किल में उसका साथ दिया। इसमें क्या बुराई है?
—एक पाकिस्तानी ते कियौ, जे गल्त बात नायं का?

—ग़लत क्यों है? कोई नई बात है क्या? विभाजन के बाद से दो देशों के युवाओं में विवाह होते आ रहे हैं। परस्पर ख़ून के प्यासे कबीलों के युवाओं ने युद्ध भी कराए हैं और मैत्रियां भी। कहानियों में अमर हो गए ऐसे प्रेमी। इन प्रेमियों ने भविष्य के नज़रिए बदल दिए। चचा, ये बताइए कि अगर नई पीढ़ी नहीं बदलेगी तो कौन बदलेगा इस दुनिया को?
सानिया कौ एक खेल-प्रेमी समाज ऊ तौ हतै अपने देस कौ? सो बिचार नायं कियौ?
—क्या बात करते हैं चचा! मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। आप तो जानते हैं कि धरती सूरज से छिटक कर एक आग के गोले के रूप में अरबों खरबों वर्ष तक अपने ठण्डे होने की प्रतीक्षा करती रही होगी तब कहीं उसमें जलचर, नभचर, थलचर पैदा हुए होंगे। उस धरती में देश नहीं थे, सीमा रेखाएं नहीं थीं। आदि मानव ने आज का मानव बनने में हजारों-लाखों वर्ष लगाए हैं, उसी ने सीमा रेखाएं खींची हैं, उसी ने देश बनाए हैं। हमारा देश तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत को मानने वाला रहा है। पूरी वसुधा एक कुटुम्ब है। तो फिर क्या हिन्दुस्तानी और क्या पाकिस्तानी?
—बहुत ऊंची मत छोड़ रे, जमीन की हकीकत बता।
—चचा! ज़मीन पहले आई या वो हकीकत पहले आई, जिसका आप ज़िक्र कर रहे हैं? ज़मीन अपने आप में एक हकीकत है। विवाहों के इतिहास पलट कर देखिए। मोहनमाला नाम की किताब के पेज एक सौ छ: पर महात्मा गांधी ने लिखा है— ’विवाह जिस आदर्श तक पहुंचाने का लक्ष्य सामने रखता है, वह है शरीरों के द्वारा आत्मा की संयोग-साधना। विवाह जिस मानव-प्रेम को मूर्त रूप प्रदान करता है, उसे दिव्य-प्रेम अथवा विश्व-प्रेम की दिशा में आगे बढ़ने की सीढ़ी बनाया जाना चाहिए।’ सानिया-शोएब विवाह से युद्धोन्मादियों को सबक लेना चाहिए।
—तू अपने देस के लोगन कूं जानैं नायं का? जब सानिया खेलेगी तौ भारत में तारी बजिंगी का, बता?
—अगर नहीं बजती हैं तो हमें अपने आपको समझाना होगा कि वह हमारे देश की बालिका है, कॉमनवेल्थ गेम्स में हमें उसका मनोबल बढ़ाना है। अगर हमने उसका मनोबल न बढ़ाया तो अच्छा खेल नहीं दिखा पाएगी। उसने स्वयं कहा है कि मैं पाक की बहू नहीं, शोएब की पत्नी हूं। मैंने किसी पाकिस्तानी से नहीं, एक इंसान से शादी की है। दो लोग दो देशों का प्रतिनिधित्व करते हुए भी पति-पत्नी बने रह सकते हैं। यह भविष्य की संस्कृति का संकेत है। हर चीज में बुराई देखना अच्छी बात नहीं होती है चचा। और वे घर भी बसाना चाहते हैं ऐसी जगह जो न भारत है, न पाकिस्तान। मेरी कामना तो ये है कि पूरी धरती पर जो भी अपने कौशल को जिस तरह से दिखाना चाहता है, उसको मौका मिले। अब यह तो प्यार की, आत्मीयता की और एकमेक हो जाने की भावना पर निर्भर करता है कि शोएब भी सानिया को उतना ही स्पेस देता है कि नहीं। मैं तो समझता हूं, जब भारत की ओर से खेलते समय कॉमनवेल्थ गेम्स में सानिया लगातार जीतेगी तो शोएब भारत के लिए तालियां बजाएगा और शोएब ने अगर हमारी सानिया के लिए तालियां बजाईं तो हम उसे सिर आंखों पर रखेंगे और कामना करेंगे कि आजादी से पहले जो प्यार, सद्भाव हम सबमें था, वह वापस आ जाए। किसी कठमुल्ले या कठपंडित के फतबों से ऊपर उठकर ये युगल अपना रुतबा दिखाए और पूरी दुनिया को बताए कि प्रेम एक बड़ी ताकत है जो राजनीति को नीति में बदल सकती है और युद्ध को शांति में।
—ऐसे ख्वाब मत देखै, जो पूरे नायं है सकैं।
—चचा तुम मेरे गुब्बारे में पिन मारते रहते हो, मैं अच्छी-अच्छी सोच की हवा भर के फुलाता हूं, तुम फिस्स कर देते हो।
—अरे तेरे सोचिबै ते का ऐ? फिस्स करिबे वारे ठस्स लोगन की कमी ऐ का हिन्दुस्तान में!

Friday, April 16, 2010

संकल्प लेने वाले लोगों ने काश…

—चौं रे चम्पू! बता आज के दिन की महत्ता का ऐ रे?
—महत्ता ये है चचा कि आज चौदह अप्रैल को बाबा साहब भीम राव अंबेडकर का जन्मदिन है।
—संविधान के जनक अंबेडकर जी कौ!
—हां चचा! लेकिन वे स्वयं को जनक नहीं मानते थे। वे तो बड़ी सौम्यता से कहते थे कि मैं प्रारूप समिति का अध्यक्ष हूं। जो मुझसे कहा गया मैंने लिख दिया। संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद हैं। चचा, दो सौ चौरासी सदस्यों को संविधान बनाने में दो वर्ष, ग्यारह महीने और सत्रह दिन लगे। वक़्त ज़्यादा लग रहा था तब एक नजीरुद्दीन अहमद साहब ने तो यहां तक कह दिया कि इस कमेटी का नाम ड्रिलिंग कमेटी रख दो, ड्रिल कर रही है। पता नहीं कब बन पाएगा। आलोचनाएं तो हर काम की होती हैं चचा। अंबेडकर साहब ने अपने भाषण में विलम्ब के कारण बताए और साथ में कह दिया कि मैं समझता हूं कि संविधान चाहे जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। यानी चचा, फर्क इससे पड़ता है कि चलाने वाले लोग कौन हैं, कैसे हैं, उनकी नीयत कैसी है।
—ठीक बात। लेकिन हमारे लोगन कूं कोई खास जानकारी है नायं संविधान के बारे में।
—जानकारी कैसे हो? मूल तो अंग्रेजी में बनाया गया। हिन्दी अनुवाद हुआ तो मुश्किल भाषा में हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की तो पीड़ा ही यह थी कि इसका मूल प्रारूप हिन्दी में क्यों नहीं बना। अब कुछ लोग कहते हैं कि पुराना हो गया है, नई ज़रूरतों के अनुसार इसको बदल देना चाहिए। दरसल, हमारे संविधान की बुनियाद इतनी मज़बूत रखी गई है कि बदलना आसान नहीं है। दो तिहाई बहुमत दोनों सदनों में हो तब कुछ हो सकता है। सरकारें खुद बैसाखियों के सहारे चल रही हैं, बैसाखी के दिन ऐसा कैसे हो सकता है कि सब कुछ आपकी इच्छा के अनुरूप हो जाए।
—जे बात तौ है।
—चचा, मेरे एक मित्र हैं गोरखनाथ जी। उन्होंने मुझे संविधान की अंग्रेजी में हस्तलिखित मूल प्रति की एक प्रतिलिपि भेंट की। हर पृष्ठ पर शानदार बौर्डर बना हुआ है। कलात्मक संरचना है। एक फुट बाई सवा फुट की होगी। मोटी किताब है। वज़न भी तीन-चार किलो से कम नहीं होगा। मैंने यह सोच कर कि कोई मार न ले जाए, उसके पहले ख़ाली पृष्ठ पर ‘मेरा आस्था ग्रंथ’ लिख कर नीचे अपने हस्थाक्षर कर दिए। फिर पन्ने पलटने लगा, अंतिम पृष्ठ पर कुछ हस्ताक्षर थे, जिनमें अंतिम हस्ताक्षर फ़ीरोज गांधी का था।
—कुल्ल कित्ते दस्कत हते?
—दो सौ चौरासी। पहला हस्ताक्षर ससुर जी का यानी पंडित नेहरू का था और अंतिम दामाद जी यानी फ़ीरोज गांधी का था। पहला हस्ताक्षर अध्यक्ष जी का होना चाहिए था लेकिन कहते हैं कि सबसे पहले नेहरू जी ने कर दिए। भाषाओं की सूची के नीचे जरा सी भी जगह नहीं थी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उनसे ऊपर भाषाओं की सूची के सामने एक टेढ़ी लाइन खींच कर पहले हिन्दी में हस्ताक्षर किए और उसके नीचे अंग्रेज़ी में। मैं घंटों तक उन हस्ताक्षरों को देखता रहा। हस्ताक्षरों में अतीत झांक रहा था। मुझे सारे के सारे सदस्य सैंट्रल हॉल में बैठे हुए नज़र आने लगे। दो सौ चौरासी में से पैंतीस लोगों ने हिन्दी में हस्ताक्षर किए और पांच ऐसे थे जिन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किए। पर एक चीज देखने में बड़ी मजेदार लगी।
—बता!
—जहां-जहां हिन्दी के हस्ताक्षर आते थे, आमतौर से चार-पांच एक साथ आते थे। यानी हिन्दी के पक्षधर, एक साथ बैठते थे। हिन्दी वाले थे दो सौ चौरासी में से केवल चालीस। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का संकल्प लेने वाले सारे लोगों ने काश हिन्दी में हस्ताक्षर किए होते तो हिन्दी देश में एकता की भाषा बन जाती। उस समय दिल से कोई भी उन्हें सलाह देता तो शायद सब मान जाते चचा।
—दो सौ चौरासी में ते कौन-कौन चौरासी योनीन में कहां-कहां भटक रह्यौ ऐ, का पतौ?

Wednesday, April 07, 2010

कविता कवि की है या मठाधीशी की

—चौं रे चम्पू! जे अचरज कौ गणित का होय लल्ला?
—अहंकारी गणितज्ञों को अक्सर अचरज होता है चचा। प्रमेय बनाते हैं, बड़े श्रम से अपनी गणनाओं का गणित बिठाते हैं। वे अपने उस गणित पर परम आश्वस्त रहते हैं। सोचते हैं कि सूरज चांद सितारों को उन्हीं के गणित से चलना होगा। उन्हें अचरज होता है जब वे देखते हैं कि ये सूरज चांद सितारे अपने नियमों से कैसे चल रहे हैं। इन्हें अपने गणित पर इतना गर्व होता है कि मात्र दो मिनिट में किसी भी बड़ी से बड़ी संस्था को अप्रासंगिक करार दे सकते हैं। ये सूर्य से भी तेजस्वी महसूस करते हैं स्वयं को। इनके आगे खद्योतों की क्या बिसात। इनके स्वयं के अहंकार और निहित स्वार्थों के कारण बिसात जब पलट जाती है तो औंधे मुंह गिरते हैं। जीवन अपनी गति से चलता है, सिर्फ़ गणित की गोटियों से नहीं। कभी-कभार चल जाता है, सदा-सदैव नहीं चल पाता चचा।
—इनकौ का इलाज ऐ?
—लाइलाज हैं चचा। जो इनका इलाज करे, स्वयं बीमार हो जाए। अहंकारी की उपेक्षा करनी चाहिए क्योंकि वह अपनी गलती नहीं देखता। दूसरों में खोट निकालता है। अपना अंतःकरण नहीं टटोलता, दूसरों के अंतःकरण में अंधेरा देखता है।
—अहंकारी कूं कबहुं अहंकार नायं दिखानौ चइऐ।
—बिल्कुल ठीक चचा। अहंकार सहजता, आनन्द और समूह से डरता है। पिछले दिनों दिल्ली की हिन्दी अकादमी ने भारतीय कविता उत्सव किया। देश भर से संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, सिंधी, पंजाबी, डोगरी, कश्मीरी, नेपाली और हिन्दी के एक से एक तेजस्वी कवि आए। उद्घाटन किया उड़िया के वरिष्ठ कवि डॉ. सीताकांत महापात्र ने। उन्होंने बड़ी अच्छी बातें कहीं।
—हमें ऊ बता।
—पहले तो उन्होंने कहा कि भारतीय कविता उत्सव, ये नाम उन्हें बहुत अच्छा लगा। उत्सव में आनन्द आता है। ये सिर्फ कविता के लिए ज़रूरी नहीं है, सारी कलाओं के लिए है। अभी सब ऐसा सोचने लगे हैं, पाठक भी सोचने लगे हैं कि कविता प्रीस्टहुड (मठाधीशी) की है, कवियों की नहीं। वे जो समीक्षक हैं, कविता के चिंतक हैं, ऐसा लगता है कि सबमें प्रीस्टहुड है। हम सबको आगे बढ़कर पाठकों को अपने पास लाना है। समूहों को अपने पास लाना है।
—भौत अच्छी बात कही।
—लेकिन अहंकारी मठाधीशी तो समूहों से डरती है चचा। सही बात कहां सुनती है? आनन्द उसे रास नहीं आता। सहजता से कांप-कांप जाती है। एक ही समय में होने वाले विभिन्न प्रयत्नों में स्वयं को महान और दूसरों को ओछा दिखाती है। डॉ. महापात्र अक्सर कहते हैं कि एक समय में कई समय होते हैं और सभी समयों के अलग-अलग आयाम होते हैं। एक हमारा काव्य-समय होता है जिसे हम खुद रचते हैं। कविता का आनन्द छोटी-छोटी चीजों में है। जीवन समाज में आनन्द बहुत ज़रूरी है।
—चल सबकूं आनन्द लैन दै। और का कही सीताकांत जी ने।
—उन्होंने कहा कि भारत का हर भाषा-भाषी कवि चाहता है कि उसके लिखे को सब भारतीय पढ़ें। एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में जब तक सीधे अनुवाद संभव नहीं हो पा रहा है तब तक एक फिल्टर लैंग़्वैज से काम चलाया जा सकता है। और वह फिल्टर लैंग़्वैज अभी हिन्दी ही है। इसी के ज़रिए एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा तक पहुंचा जा सकता है। यह बात अंग्रेजी में नहीं है। इसके बाद चचा उन्होंने अपनी पांच कविताएं उड़िया भाषा में सुनाईं। अकादमी के सचिव साहित्यकार डॉ. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव परिचयदास ने उनका हिन्दी अनुवाद सुनाया। अनुवाद पर ज़्यादा तालियां बजीं।
—अनुवाद पै जादा चौं बजीं रे?
—क्योंकि अनुवाद अच्छा था, पाठ अच्छा था और असल बात ये कि कविताएं संप्रेषित हुईं। अद्भुत कविताएं थीं। चचा, संप्रेषण कविता का मूल धर्म है। डॉ. महापात्र भी चाहते थे कि कविता पाठकों तक और उत्सवों के ज़रिए समूहों तक पहुंचे और आपके इस चंपू की तमन्ना भी यही है कि कविसम्मेलन इतने स्तरीय हुआ करें कि हमारी संस्कृति और जीवन के सुख-दुख के बिम्बों और प्रतीकों का आनन्द संप्रेषित कर सकें।
—फिकर मत कर चम्पू, लग्यौ रह ईमान्दारी ते। फसलता मिलैगी।