Wednesday, March 23, 2011

अकादमिक अकड़ का अखाड़ा ऑक्सफोर्ड


—चौं रे चम्पू, तेरी यूके की जात्रा कैसी रई रे?

चचा सात दिन की यात्रा थी। सात लोग साथ में थे। सात जगह कार्यक्रम हुए। साथ में तुम्हारी बहूरानी भी थी तो ऐसा आनन्द आया जैसे सातवें आसमान पर कोई पहुंच जाए। बताने के लिए सात घंटे चाहिए। लिखने के लिए कम से कम सात अध्याय हों।


और सात जनमन तक सुनैं तेरी बातन्नैं!

सात जन्मों की क्या चलाई चचा, चलो अभी सात मिनिट ही काफ़ी हैं। मुझे सबसे ज़्यादा मज़ा आया

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में, क्योंकि वहां जाने कितने जन्मों की शैक्षिक आत्माएं घूम-विचर रही

थीं। भटक रही थीं तो नहीं कह सकता, क्योंकि उनकी उपस्थिति से कोई बेचैनी नही हुई। उस इलाक़े मे जाकर एक अलग तरह की अकादमिक शांति की अनुभूति हुई।

अरे हमारे तक्ससिला और नालन्दा कौ मुकाबलौ कोई कर सकै का?

लेकिन जिस दुनिया को हम आधुनिक कहते हैं उसे बनाने में इस विश्वविद्यालय का बड़ा योगदान रहा है। अंग्रेजी बोलने वालों का ये सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। अजब तरह का वातावरण है। पूरा शहर जैसे किताबों में, शब्दों में और ज्ञान-विज्ञान में भी डूबा हुआ है और बीयर की दुकान पर चुस्की भी लगाता है।

बीयर की दुकान?


हां चचा, एक बड़ी दिव्य बीयर की दुकान देखी मैंने। बहुत पुरानी! सौ डेढ़ सौ साल से ज़्यादा पुरानी। छोटी सी जगह, पुराना फर्नीचर। कोई कुर्सी टूट भी जाती है तो नई कुर्सी बिल्कुल पुरानी जैसी ही बनाई जाती है। एक छोटा सा कमरा है जिसकी दीवारों और छतों पर फ्रेमबद्ध टाइयां टंग रही हैं।

टाइयां! कैसी टाइयां रे?

उन विद्यार्थियों की जो यहां से पढ़कर गए हैं। जाते-जाते निशानी बतौर पब को अपनी टाइयां भेंट कर गए। हज़ारों टाइयां हैं। जिसकी टाई है, एक पर्ची पर उसका नाम भी नत्थी है। आज की नहीं हैं, सौ-पचास साल पुरानी हैं। भदरंग हो गई हैं। जिन कागज़ों पर नाम लिखे हैं, वे पीले पड़ चुके हैं। लेकिन एक मधुर सा अहसास तो होता है कि ये हज़ारों हज़ार टाइयां जिन गलों में बंधी होंगी, वे गले यहां स्वयं को तर करने के लिए ज़रूर आते रहे होंगे। इस स्थान से उनका प्रेम रहा होगा। पश्चिम की ये बात मज़ेदार है कि वहां पढ़ने-लिखने के गम्भीर काम को भी जीवन के रंग और उत्साह के साथ किया जाता है। पूरा शहर पुरानी और भव्य इमारतों से सम्पन्न है। घुमाने वाले ने भी एक एक बात बारीकी से बताई।

कौन्नै घुमायौ?

एक हैं वहां पद्मेश जी। बिजनेस कॉलेज चलाते हैं। जिस भवन में उनका कॉलेज चलता है, वह उन्नीस सौ आठ में बना था और ऑक्सफोर्ड के मुख्य बस अड्डे के सामने है। वो हमें वहां की गलियों में घुमाने ले गए। ऑक्सफोर्ड की गलियां हमारी ज़ामा मस्ज़िद की गलियों की याद दिलाती हैं। पतली सी गली घूमते-घामते पता नहीं कौन से कॉलेज में निकल जाएगी। उस कॉलेज में अन्दर जाओ तो दिव्य हरी घास का एक आंगन होगा और उसके चारों तरफ कक्षाएं। आप अनायास कहीं घुस जाएं इसलिए कई जगहों पर बोर्ड लगे देखे— ‘प्राइवेट। यानी, किसी का निवास है। निवास के पास ही अध्ययन केन्द्र हैं, पुस्तकालय हैं, चर्च हैं। इतिहास विभाग के सामने से गुज़रा तो मुझे .एच.कार की याद आई। उनकी किताबव्हाट इज़ हिस्ट्रीका अब से बत्तीस साल पहले मैंने हिन्दी अनुवाद किया था।

अपनी छोड़, व्हां की बता!

पूरे ऑक्सफोर्ड में ऐतिहासिक स्मृतियों के पुरानेपन की हवा बहती हो जैसे। किताबों के पन्नों और कबूतरों की फड़फड़ाहट। नीले रंग के कलात्मक पुराने खम्बे जिन पर गलियों के नाम लिखे हुए हैं, वे भी नहीं बदले। हर खम्बे के ऊपर एक गोलाकर नारियलनुमा गुम्बद-सा बना हुआ है, जिसके नीचे गलियों की ओर इशारा करने वाली पतली-पतली लौह-पट्टियां हैं, जिन पर स्थानों के नाम लिखे हैं। दुकानें हैं। मकान हैं। ज्ञान है। आपस का सम्मान है। किसी और शहर जैसा हंगामा नहीं है। बसें विश्वविद्यालय का टूर कराती हैं। विद्यार्थी ज़्यादातर साइकिलों का इस्तेमाल करते हैं। एक अलग तरह की अकादमिक अकड़ का अखाड़ा लगा ऑक्स्फोर्ड, जहां सादगी की साइकिलों की लम्बी-लम्बी कतारें थीं।

Tuesday, March 22, 2011

कुनामी कहने को सुनामी

(जापान की त्रासदी पर भारतवासियों के दिल भी खूब रोए हैं)

बहुत पहले बहुत पहले

बहुत पहले से भी बहुत पहले

इस असीम अपार अंतरिक्ष में

घूमती विचरती हमारी धरती!

बड़े-बड़े ग्रह-नक्षत्रों के लिए

एक नन्हा सा चिराग थी,

जिसके चारों ओर आग ही आग थी।

बहुत पहले से भी बहुत पहले

जब प्रकृति की सर्वोत्तम कृति

मनुष्य का कोई हत्यारा नहीं था,

तब समंदर का पानी भी

खारा नहीं था।

इंसान बिना किसी पोथी के

एक दूसरे की आंखों में

प्यार के ढाई आखर बाँचता था,

तब समंदर भी

अपनी उत्ताल लय ताल में

नाचता था।

लहर लहर बूंद बूंद उछलता था,

तट पर बैठे प्रेमियों के

पैर छूने को मचलता था।

अचानक कोई कुलक्षिणी कुनामी

पर कहने को सुनामी

बेशुमार बस्तियों को ढहा कर ले गई,

प्यारे-प्यारे इंसानों को

बहा कर ले गई।

बहुत पहले से भी बहुत पहले,

दिल दहले बहुत दहले।

जिन्होंने भी अपने आत्मीय खोए

वे ख़ूब-ख़ूब रोए।

और जैसे ही व्याकुल और सिरफिरा,

पीड़ा का पहला आंसू

समंदर में गिरा,

समंदर सारा का सारा,

पलभर में हो गया खारा।

आज 'दैनिक भास्कर' में खिली बत्तीसी





Wednesday, March 16, 2011

शापग्रस्त पापग्रस्त समंदर खारे का खारा

—चौं रे चम्पू, जापान में तौ गज़ब है गयौ रे, का नई खबर ऐ?
—खबरें तो अच्छी नहीं हैं चचा! नुकसान का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। छब्बीस दिसंबर दो हज़ार चार को हम भी अपने देश के दक्षिण में सुनामी का कहर झेल चुके हैं। जापान में तो दोहरी मार पड़ी। वहां भयंकर भूकंप के साथ सर्वनाशी सुनामी भी आ गई।—सुनामी कायकी ऐ रे, पूरी कुनामी ऐ!
—कुलक्षणी कुनामी ही है चचा। उन्नीस सौ सैंतालीस के हिरोशिमा-नागासाकी विध्वंस से ज़्यादा बड़ा संकट आया है जापान में। नाभिकीय रिएक्टरों पर ख़तरा अभी भी मंडरा रहा है। लाखों लोग गायब हैं। अरबों खरबों की सम्पदा कबाड़खाने में बदल गई है। धरती की धुरी इतनी खिसक गई कि जीपीआरएस के नेवीगेशन सॉफ्टवेयर गलत परिणाम दिखा रहे हैं। दुनिया भर में मौसम में क्या बदलाव आएँगे राम जाने। विनाश की तस्वीरें अविश्वसनीय लगती हैं। मुझे तो इसी नौ अप्रेल को जापान जाना था चचा। हो सकता है चला भी जाऊँ, राहत की कुछ कविताएँ सुना कर आऊँ।
—कबता सुनिबे की फुरसत कौनके पास होयगी रे!
—जाऊँगा तो कुछ तो करूँगा, मलवा उठवाने में ही मदद करूँगा। चचा, दो हज़ार चार में तेरह दिसंबर को मैं अपने पूरे परिवार के साथ दक्षिण की यात्रा पर गया था। महाबलीपुरम के जिस रिज़ॉर्ट में ठहरे थे उसका नामोनिशान नहीं बचा। तेरह दिन बाद गए होते तो सबकी तेरहवीं हो चुकी होती।
—उल्टी-सीदी बात मती कर। ढंग की बात कर!
—ढंग की बात तो ये है चचा कि जापानी नागरिक बड़े हौसले वाले होते हैं। बहुत जल्दी अपने देश को फिर से खड़ा करके दिखा देंगे। पूरी दुनिया उनके साथ है। वह अमरीका भी साथ है, जिसने बम बरसाए थे।
—तैनै कोई कबता लिखी का?
—एक लिखी थी, तभी दो हज़ार चार में, आज याद आ रही है।
—सुना!
—बहुत पहले, बहुत पहले! बहुत पहले से भी बहुत पहले!! इस असीम अपार अंतरिक्ष में, घूमती विचरती हमारी धरती! बड़े-बड़े ग्रह-नक्षत्रों के लिए एक नन्हा सा चिराग थी, जिसके चारों ओर आग ही आग थी। बहुत पहले, बहुत पहले! बहुत पहले से भी बहुत पहले!! जब प्रकृति की सर्वोत्तम कृति, मनुष्य का कोई हत्यारा नहीं था, तब समंदर का पानी भी खारा नहीं था। बहुत पहले, बहुत पहले! बहुत पहले से भी बहुत पहले!! जब बिना किसी पोथी के इंसान एक दूसरे की आंखों में प्यार के ढाई आखर बाँचता था तो समंदर अपनी उत्ताल लय ताल में नाचता था। लहर लहर बूंद बूंद उछलता था तट पर बैठे प्रेमियों के पैर छूने को मचलता था। अचानक किसी सुमात्रा में बेहद कुमात्रा में तलहटी कांपी, तो जाने कौन सी कुलक्षिणी कुनामी, पर कहने को सुनामी लहरों ने लंबी दूरी नापी। वो लहरें झोंपड़ियों मकानों बस्तियों को ढहा कर ले गईं, प्यारे-प्यारे इंसानों को बहा कर ले गईं। बहुत पहले बहुत पहले दिल दहले बहुत दहले। जिन्होंने भी अपने-अपने आत्मीय खोए, वे ख़ूब-ख़ूब रोए। झोंपड़ी के आंसू बहे, बस्ती के आंसू बहे, शहरों के आंसू बहे, मुल्कों के आंसू बहे। इतने सारे मानो रुके हुए हों सदियों से आंसू, पानी भरो तो मिलें नदियों से आंसू। और जैसे ही व्याकुल सिरफिरा पीड़ा का पहला आंसू, समंदर में गिरा, समंदर सारा का सारा, पलभर में हो गया खारा। बहुत पहले, बहुत पहले! बहुत पहले से भी बहुत पहले!! सारा का सारा, समंदर हो गया खारा। लेकिन ज़िंदगी नहीं हारी, न तो हुई खारी, बनी रही ज्यों कि त्यों, प्यारी की प्यारी, क्योंकि हर गीली आंख के कंधे पर, राहत की चाहत का हाथ था, इंसान का इंसानियत से, जन्म-जन्मान्तर का साथ था। फिर से चूल्हे सुलगे, और गर्म अंगीठी हो गईं, मुहब्बत की नदियां फिर से मीठी हो गईं। फिर से महके तंदूर, फिर से गूंजे और चहके संतूर, फिर से रचे गए उमंगों के गीत, फिर से गूंजा जीवन-संगीत। शापग्रस्त पापग्रस्त समंदर भले ही रहा खारे का खारा, लेकिन उसने भी देखा हौसला हमारा। मरने नहीं देंगे किसी को हम फिर से आ रहे हैं, तेरी छाती पर सवारी करने। इस बार ज़्यादा मज़बूत है, हमारी नौका। छोड़ेंगे नहीं जीने का एक भी मौका।

Tuesday, March 15, 2011

फेस-संवर्धक केश-कर्तक नरेश

—चौं रे चम्पू, देर कैसे है गई!
—चचा, महीने भर से बाल नहीं कटाए थे, आज सोचा तुम थोड़ा इंतज़ार कर लोगे और क्या! वहां बैठा तो पूरे दो घंटे निकल गए।
—दो घंटा में बार कटे तेरे?
—अरे चचा. एक बार उस दुकान में घुस जाओ तो दो घंटे लगना मामूली बात है। अब वहां सिर्फ़ बाल नहीं कटते हैं, जेब कटती है। पहले बाल कटाई की दुकान पर ग्राहकोँ की लाइन लगती थी। हर पांच मिनट में सीट पर ग्राहक बदल जाते थे। अब मैं देखता हूं कि एक ग्राहक जिस सीट पर जम जाता है वह दो घंटे से पहले नहीं उठता। दरअसल, अब लोग आमतौर से केशवदास वाली पीड़ा नहीं भुगतना चाहते।
—केसवदास की कौन सी पीड़ा?
—अरे, केशवदास ने कहा था न— “केशव केसन अस करी, जस अरिहू न कराय, चन्द्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि-कहि जाय’। अब बुढ़ापे में भी स्वयं को कोई बाबा कहलवाना पसंद नहीं करता। वैसे श्वेत-धवल कितना अच्छा लगता है, शान्ति का रंग, पर श्वेत केश अच्छे नहीं लगते। आधा घंटे में लगती है डाई। तब तक बैठा-बैठा क्या करेगा भाई? पूछता है हेयर ड्रैसर कि सर! सिर का काम तो हो गया इस बीच फेश्यिल कर दूं? जब तक आपके बाल रंगेंगे तब तक चेहरे पर रौनक आ जाएगी। फिर शुरू होता है जेब कटाई पार्ट टू। क्लींज़र, स्क्रब, जैल-रब, फोम लगी फिर भाप, तू फंदे में आ चुका, बैठा रह चुपचाप।
—खूब दोहा बनायो रे!
—दोहा बनाने में देर नहीं लगती चचा!
—तौ बाल के परयायबाची बता, दोहा में!
—लो सुनो— केश अलक कच सिरोरुह, सारंग सिर के बाल, छाज फूस सिर अग्र कछ, छल्ला जटा बबाल। एक दोहा और सुन लो— चुटिया जूड़ा ताज सिख, उलझे चिपके केश, झूंटा झोंटा घूंघरा, कुल्ला रोआं शेष।
—मान गए लल्ला! अब दुकान की आगे कि कहानी बता।
—फेस-संवर्धक केश-कर्तक का नाम नरेश था। उसने भी एक दोहा सुना दिया— ‘श्वेत-श्वेत सब कुछ भलो, श्वेत भलो नहीं केश, नारी रिझे, ना रिपु डरै, न आदर करै नरेश।’ मैंने कहा, नरेश! बस तू तो आदर करता रह, जो चाहे कर दे भैया। तो चचा, उसने एक कटोरे में घोरुआ सा घोला और रंग दिए बाल। इतनी देर में केश-काव्य के संदर्भ में मुझे कभी जायसी याद आएं, कभी विद्यापति, कभी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था— ज़ुल्फों को लेके हाथ में, कहने लगा वो शोख, गर दिल को बांधना हो तो, काकुल से बांधिए।’ हालांकि ये बात महिलाओं के संदर्भ में कही गई थी, उनकी ज़ुल्फ़ें दिल को बांध लेती हैं, लेकिन आजकल पुरुष भी औरतों के दिल को बांधने के लिए अपनी ज़ुल्फ़ों पर ख़ासा काम कराते हैं। जायसी ने कहा था— ‘भंवर केश वह मालति रानी……
—अरे छोड़ चम्पू विद्यापति और जायसी। तू अपनी बात कर। कित्ते पइसा दै आयौ?
—चचा पहले बताओ कि आपने पिछली बार बाल कब कटाए थे?
—अरे हमनैं तौ यईं बगीची पै हरिया बुलाय लियौ ओ। एक ईंट पै वो बैठौ, एक ईंट पै हम बैठे। छोटौ सौ दर्पन, एक अदद उस्तरा और खैंच दई दाढ़ी। पूरे दस रुपैया लै गयौ। पैलै तौ दो रुपाइया में काम है जातो।
—आपने दिए दस रुपए और बेहोश न हो जाओ तो मैं बताऊं कि मुझसे कितने ले लिए नरेश ने?
—बता!
—पूरे डेढ़ हज़ार चचा, डेढ़ हज़ार।
—डेढ़ हज़ार! अरे डेढ़ हज़ार में तौ पूरे गांम के बार बन जायं! जे का भयौ!
—अब चचा क्या बताऊं! जो मुझसे पहले बैठे हुए थे और मुझसे बाद में जाने का इरादा रखते थे, वे हाई क्लास फेश्यिल करा रहे थे। स्पेशल मालिशें हो रही थीं। विदेशी अथवा आयुर्वेदिक तेल लग रहा था। सिर में क्या लगा रहे थे, हमें ही तेल लगाया, हमें ही चूना। ड्रायर मार कर बाल फुला दिए और बोला, मना है छूना!

Sunday, March 13, 2011

तीन समुद्रों का संगम

—चौं रे चम्पू! दक्खिन की जात्रा में कन्याकुमारी तक गयौ कै नायं?
—गया था चचा। त्रिवेंद्रम से लगभग पिचासी किलोमीटर ही तो है। सुबह-सुबह निकल गए। एक पूरी रात वहां बिताई।
—बिस्तार ते बता ना!
—चारों तरफ हरियाली का विस्तार देखा। नारियल और ताड़ के वृक्षों के बीच बने हुए छोटे-बड़े सादा-सरल से मकान। सड़क किनारे सघन वृक्षों के नीचे नारियल की दुकानें। ख़ूब नारियल पानी पिया और पहली बार ताड़ के फल का जैली जैसा गूदा खाया। सड़क के नीचे गड्डों में इतने नारियल और ताड़ फल इकट्ठा हो गए थे कि मुझे लगा जैसे किसी नाजी कैम्प की खुदाई के बाद मानव खोपड़ियां निकलीं हों।
—ख़राब बात मत कर! कन्याकुमारी कौ सौंदर्य बता।
—होटल में सामान पटककर विवेकानंद शिला की तरफ गए। फेरी में बैठकर चट्टान तक जाना होता है। बड़ी लंबी लाइन थी चचा। तीन-चार एकड़ लंबी-चौड़ी और समुद्रतल से पचास-साठ फुट ऊंची वह चट्टान कन्याकुमारी के पूरब में करीब ढाई किलो मीटर दूर है। समुद्र के बीचों बीच। यहीं पर देवी का एक पुराना मंदिर है। स्वामी विवेकानंद अठारह सौ बानवै में हिमालय से शुरू हुई अपनी यात्रा का समापन करने के लिए यहां आए थे। किसी नाव या फेरी से नहीं वे तैर कर उस चट्टान पर पहुंचे। यहां उन्होंने तीनों समुद्रों से संवाद किया होगा। दक्षिण में हिंद महासागर, पश्चिम में अरब सागर और पूर्व में बंगाल की खाड़ी का समुद्र। यहीं से वे अमरीका गए थे, जहां उन्होंने अपना विख्यात भाषण दिया था, जिससे उन्हें रातोंरात विश्वव्यापी ख्याति मिली। तभी से इस चट्टान को विवेकानंद चट्टान कहा जाने लगा। चचा इस चट्टान से समुद्र का जितना बड़ा क्षितिज दिखाई देता है उतना मैंने संसार में कहीं नहीं देखा। इसके पास में ही बना है समुद्रों की त्रिवेणी का प्राचीन घाट।
—नदीन कौ संगम तौ सुनौ ऐ पर समुद्रन कौ नायंसुनौ।
—मैं तो देखकर आया हूं चचा। पानी में पांव डालकर घंटे भर बैठे रहे। सागर चरण पखार रहा था। सूरज अरब सागर में डूबने की तैयारी कर रहा था। वहां से पूरब की ओर देखा तो दूसरी चट्टान पर तिरुवल्लुवर की मूर्ति डूबते सूर्य के प्रकाश मेंदमक रही थी।
—जे कोई देवता ऐं का?
—तमिलनाडु में बहुत बड़े कवि हुए हैं तिरुवल्लुवर, जिनको मैं बहुत पसन्द करता हूं। वे यहां के तुलसीदास सदृश्य हैं। मैंने पूरे संसार में किसी कवि की इतनी बड़ी प्रतिमा नहीं देखी। सोवियत संघ में लेखकों की प्रतिमाएं लगी देखी थीं। हालांकि वे लेनिन के बराबर की नहीं थीं। अमेरिका में भी इतनी बड़ी प्रतिमाएं नहीं देखीं। कन्याकुमारी के विवेकानन्द रॉक्स के बराबर क्या विराट और भव्य प्रतिमा बनाई है तिरुवल्लुवर की। अन्दर उनकी सूक्तियां दीवारों पर खोद दी गई हैं। कलात्मक सांवले पत्थर पर श्वेत वर्णों में तिरुवल्लुवर दीप्तिमान थे। मुझे उनका एक कथन बार-बार याद आता है कि अभी तक सीखा ही कितना है। इतने ज्ञान के बावजूद उन्होंने कहा था ज्ञान तो धरती के जितना है, मेरे पास तो मात्र मुट्ठी के जितना है। जब मैंने तिरुवल्लुर की ये बात कहीं पढ़ी तो मैंने ख़ुद से पूछा कि हे चम्पू तेरे पास कितना है? उनके पास मुट्ठी के बराबर है तो तेरे पास तो चुटकी बराबर ही होगा। वह भी चुटकी बजाने में कहीं गिर न जाए इस बात का भी ख़तरा। मैंने चार लाइनें उनसे प्रेरित होकर बनाई थीं।
—चल अपनी चार लाइनन्नैं सुना।
—जो सीखा चुटकी भर सीखा, धरती भर है बाकी, उस पर अहंकार दिखलाना, है यह सीख कहां की? इल्मों के मयखाने से जितना चाहो पी डालो, हर पल रहता खुला और हर दम तत्पर है साकी।
—खूब कही!
—प्रतिमा के चरण छुए। आपकी बहुरानी ने फोटो खींचा। इस यात्रा में आनन्द वर्षा होती रही। कन्याकुमारी से गुरुवायूर, त्रिशूर, कोयम्बटूर और मैसूर होते हुए बैंगलूर पहुंचे। सुदूर ग्यारह सौ किलोमीटर। बाई रोड। ये वृत्तांत फिर कभी सही।
—जरूर।

Wednesday, February 23, 2011

तीन ईंट एक हांडी

चौं रे चम्पू! कल्ल मैंनैं इत्ती बार फोन मिलायौ, उठायौ चौं नायं?

चचा, मैंने बताया था न कि तिरुअनंतपुरम में उत्तरआधुनिकता और हिंदी साहित्यऔर मैसूर में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में कारक चिह्नविषयों पर संगोष्ठियां हैं, नौ दिन के लिए दक्षिण की यात्रा पर जा रहा हूं।

तौ दक्खिन में का मोबाइल नायं बजै!

क्यों नहीं चचा, बजा होगा, ज़रूर बजा होगा, यही तो एक ऐसा वाद्य है जो पूरे भूमंडल पर बज रहा है। बालकवि बैरागी जी के गीत की एक पंक्ति है चौपाटी से गौहाटी तक और केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा। गोविंद व्यास ने उसमें अटक से कटक तक भी जोड़ा।कटक तो मालूम है, अटक का पता नहीं कि कहां है, बहरहाल, इतना फैला हुआ हमारा देश विविध संस्कृतियों का एक महान देश है। अलग भाषाएं, अलग वेश-भूषाएं, अलग आभूषण, अलग खानपान और अलग तीज-त्यौहार, पर कान पर वही एक नोकिया। हाथ में दूसरा मोबाइल रिलायंस का भी हो सकता है, शौकिया।

तौ उठायौ चौं नायं, कहां अटक गयौ?

--सुनाई देता तब तो उठाता। मलयाली भक्ति-संगीत अनहद नाद की तरह पूरे त्रिवेंद्रम में बज रहा था। डबल-आदमक़द स्पीकर-कॉलम्स हर पचास फिट पर खड़े थे। शीशे चढ़ी कार में भी लग रहा था जैसे अंदर फुल वॉल्यूम में म्यूज़िक-प्लेयर चला रखा हो। मैंने देखे थे आपके मिस्ड कॉल, रात में। फिर सोचा आप ठहरे जल्दी सोने वाले, अब क्यों मिलाऊं?

--छोड़! तेज म्यूजिक चौं बजि रह्यौ ओ रे?

हमारा सौभाग्य देखिए कि जब हम तिरुअनंतपुरम पहुंचे तब अट्टुकल पोंगल महोत्सवम की तैयारियां चल रही थीं। किसी एक मौके पर, किसी एक स्थान परमहिलाओं की ऐसी विराट उपस्थिति संसार भर में नहीं होती है। आपको यह जानकर शायद भरोसा हो जाएगा कि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में इसका उल्लेख है। पूरे संसार में सर्वाधिक महिलाओं की उपस्थिति त्रिवेन्द्रम में ही होती है। लार्जैस्ट एनुअल गैदरिंग ऑफ़ वीमैन इन द वर्ल्ड! वन पॉइंट फाइव मिलिअन चचा, वन पॉइंट फाइव मिलिअन!

अरे हमें तौ हिन्दी में बता।

पन्द्रह लाख औरतें जमा हुई थीं। मलयाली कुम्भम महीने का यह महिला कुम्भ मेला था। कोई स्थान नहीं बचा चचा, पूरे त्रिवेन्द्रम में। सड़कों के फुटपाथ, सरकारी कार्यालयों के प्रांगण, पार्क, पगडंडियां जहां स्थान पाया वहां उन महिलाओं ने डेरा जमाया। उन्हें तो अट्टुकल भगवती अट्टुकलम्मा के लिए एक साथ पोंगल बनाकर चढ़ाना था।

एक संग कैसै बनायौ रे?

तीन ईंटों पर एक मिट्टी की या स्टील की हांडी रखकर लकड़ी के ईंधन से सुबह दस बजकर पैंतालीस मिनिट पर लाखों महिलाओं ने एक साथ पोंगल बनाया। परम्परा पता नहीं कब से चली आ रही है। आप तो जानते है कि केरल में महिला साक्षरता शत-प्रतिशत है, लेकिन एक अतिरिक्त अंतर्ज्ञान से दिपदिपाती महिलाओं से जब आपकी बहूरानी ने संवाद किया तो सभी ने बताया कि यह त्यौहार सर्व-सुख के लिए है। परिवार और समाज में शांति, समृद्धि और वैभव के लिए है। किसी एक के लिए नहीं, जैसे करवाचौथ का व्रत सिर्फ पति के लिए रख लिया। अहोई अष्टमी का व्रत सपूत के लिए रख लिया। अट्टुकल देवी से अपने आस-पास पर्यावास की शुद्धि और सुख-शांति के लिए कामना की जाती है। उत्तरआधुनिकतावादी सांस्कृतिक प्रदूषण अभी यहां आया नहीं है। लाखों मटकियां कुम्हारों ने बनाईं। ईंटें देसी भट्टों में पकीं। लकड़ियां थीं जंगल के उच्छिष्ठ की। केले के पत्ते पर पूजा की सामग्री, चावल, नारियल, तुलसी के पत्ते और पुष्प। कोई दिखावा नहीं। हर वर्ग की महिलाएं, ग़रीब से ग़रीब, अमीर से अमीर, वहीं फुटपाथ पर, तीन ईंटों पर अपनी हंडिया में पोंगल पकाते हुए। चेहरों पर एक ज्ञान-दीप्ति, कोई मेकअप, न कोई बॉलीवुडीय प्रभाव।एक साथ धुआं उठा, एक साथ हांडी खदकीं। सेवाभाव यहां की महिलाओं में कूट-कूट कर भरा हुआ है और चेहरे पर अंतर्दीप्ति और मानवता इनका सौन्दर्य है।

फोटू खैंचे?

हां खींचे। घर आओ, दिखाऊंगा। चचा, यह भी एक सत्य है कि केरल में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक हैं। बाहर के प्रांतों में पलायन भी होता है। और हम देखते ही हैं कि भारत में चौपाटी, गौहाटी, करगिल घाटी या अटक-कटक कहीं के भी अस्पताल में चले जाइए, वहां आपको सेवाभावी नर्सें मिलेंगी तो अधिकांश केरल की ही मिलेंगी।

चल चम्पू, बीमार परि जायं थोरे दिनां कूं।

Tuesday, February 15, 2011

दूसरी कक्षा में प्रविष्ट चन्द्रयान

—चौं रे चम्पू!पूरे साठ कौ है गयौ! सीनियर सिटीजन!! कैसौ लगि रह्यौ ऐ रे?
—चचा, सीनियर सिटीजन सुनकर उतना ही बुरा लग रहा है, जितना पैंतालीस की उम्र में किसी दो-तीन साल छोटे ने चाचा कह दिया था, तब लगा था। अन्तर इतना है कि तब मैं उस शख़्स पर उत्तेजित हो गया था, अब बुरा लगने के बावजूद मुस्कुरा रहा हूं। वैसे, पिता जैसा सम्मान देने वाले मेरे बहुत से विद्यार्थी रहे हैं, जिन्होंने बीस इक्कीस की उम्र में ही मुझे पिता का सा बोध करा दिया था। सन बहत्तर में जब सत्यवती कॉलेज में नौकरी लगी थी तब फकत इक्कीस का था। खुद को बड़ी उम्र का मानने में तब तो बिल्कुल बुरा नहीं लगता था। अच्छा लगता था चचा, बहुत अच्छा लगता था। एक हाथ में चॉक-डस्टर और दूसरे में हाजरी का रजिस्टर लिए जब बाहर निकलता था तो पिताजी के भी पिताजी जैसा महसूस करता था।
—जे का बात भई! अच्छौऊ लगै, बुरौऊ लगै, ठीक बता!
—थोड़ा कफ़्यूज़ सा हूं। माफ़ करना मैं बता नहीं सकता कि अच्छा लग रहा है या बुरा।
—लल्ला तू सठियाय गयौ ऐ! साठ कौ हैबे के बाद ऊ खुद कूं सीनियर सिटीजन नायं मान रह्यौ, तौ और का कही जाय, बता!
—तुम भी लठिया लो। तुम्हारी गठिया की दवाई अब नहीं लाऊंगा, बता दिया है, हां।
—देख, हमाई एक्स्पायरी डेट कब की निकरि चुकी ऐ, तौऊ जिंदगी के मजा लै रए ऐं।तेरे ताईं दबाई कौ काम करि रए ऐं कै नायं, बोल!सीनियर सिटीजन है चुकौ ऐ तौ मान जा!
—सीनियर सिटीजन कहलवाते ही आदमी दया का सा पात्र बन जाता है, जो मैं नहीं चाहता। एक-डेढ़ साल पहले मेरे एक सहयोगी ने मेरे लिए जब रेलवे का आरक्षण कराया तो संभवत:टिकिट में छूट पाने के लिए, उम्र साठ लिखा दी और मुझे सीनियर सिटीजन बना दिया। सच बताऊँ चचा बुरा नहीं लगा।लिखने से क्या है, हुआ थोड़े ही हूं!टीटी को बताया कि गलती से लिख गया है, डिफरेन्स ले लीजिए। वे भी मेरा फायदा कराने पर आमादा थे। मुस्कुराते हुए बोले अभी आता हूं और लौटे ही नहीं। अब जब सचमुच साठ का हो चुका हूं तो पूरे पैसे की टिकिट लेकर यात्रा करना चाहता हूं। रेलवे का पुराना बकाया भी है। पर यह ‘सीनियर सिटीजन’ संबोधन हज़म नहीं हो पा रहा।
—तू तौ सांचे ई सठियाय गयौ रे!
—चचा, मेरे मनोभावों को समझने की कोशिश तो करो!आगे के वर्षों में लोगों को ठीकठाक काम करता दिखाई दूंगा, तब शायद यह सोचकर अच्छा लगे कि ’सीनियर सिटीजन’ होने के बावजूद, जवानों से ज़्यादा काम कर रहा हूं। बुढ़ापा दरअसल, बुढ़ापा आने से पहले भी आ जाता है, अगर हम उसे न्यौता दे दें। काम करते रहें तो पास नहीं फटकता। जब पचास का हुआ था तब एक कविता लिखी थी। अब साठ का होने पर भी लिखी है।
—सुनाय दै!
—अख़बार में छप चुकी है, पढ़ लेना!
—नाराज चौं है रह्यौ ऐ, एकाध लाइन तौ सुनाय दै!
—कविता में कुछ ऐसा था कि साठ साल का इंसान ख़ूब वज़न ढो चुका होता है, थककर ख़ूब सो चुका होता है, काफ़ी मेहनत बो चुका होता है, पा चुका होता है खो चुका होता है, अकेले में ख़ूब रो चुका होता है, चुका हुआ नहीं होता, सब कुछ कर-चुका हो-चुका होता है। ठहाके लगाता मुस्कुराता है, ज़माने से मान-सम्मान पाता है, तब लगता है उसे कुछ नहीं आता है। शिकायतों को पीना जानता है, अब आकर जीना जानता है। जवान नहीं होता बच्चा होता है, सोच में कच्चा पर सच्चा होता है। ये झरना ख़ुद झरना नहीं चाहता, ऐसा-वैसा करके मरना नहीं चाहता। वह दूसरी कक्षा में प्रविष्ट होने वाला चन्द्रयान होता हैऔर नए सोच का अभियान होता है। बेल्ट में आगे तक छेद कराता है, ठीक से दाढ़ी नहीं बनाता है। नज़र सौ तरफ गड़ाई होती है, उसकी ख़ुद से ज़्यादा लड़ाई होती है। गुरूर मर जाता है, फिर भी अगर मगरूर होता है, तो बड़ी जल्दी चूर-चूर होता है। रज़ाई में यादें हरजाई सोने नहीं देतीं, सिटीजन को सीनियर होने नहीं देतीं।
—तू सच्चेई सठियाय गयौ रे!

Wednesday, February 09, 2011

स्वप्न-संगीत-सम्मेलन का धांसू गायन

—चौं रे चम्पू! सास्त्रीय संगीत की काई महफिल में गयौ ओ का?
—चचा, तुम्हारा चम्पू इतना व्यस्त हो गया है कि सुकून के पल निकालना बड़ा भारी पड़ता है। मन तो करता है कि जाऊं, पर जा नहीं पाता। शास्त्रीय संगीत अच्छा बहुत लगता है। हां, पिछले दिनों सपने में एक संगीत-सम्मेलन में धांसू गायन सुना।
—कौन्नै गायौ?
—गायक थे पं. बौड़म सौरसिया और उन्होंने सुनाई राग स्विस कल्याणी की एक बंदिश। पहले व्याख्याकार ने भूमिका बनाई कि हमारी पुरानी बंदिशें प्राय: राधा-कृष्ण, सास-ननदियाया प्रेम के विरह अथवा संयोग पर आधारित हैं, आज के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक हालात पर आधारित नहीं हैं। इन दिनों हर अख़बार में स्विस बैंक में जमा काले धन पर चर्चा हो रही है, इसी के मद्देनज़र हमारे वरिष्ठ गायक पं. सौरसिया आपके सामने एक नई बंदिश सुना रहे हैं। तो हो जाए पंडिज्जी! पं. सौरसिया ने गाना शुरू किया— ’आयो कहां से धन स्याम?’ घनस्याम की जगह धन स्याम करते ही मज़ा आ गया। पहली पंक्ति पर ही सभागार में क्या तालियां बजीं चचा!‘बता री सखि, आयो कहां से धन स्याम?’ फिर चचा उन्होंने अंतरा गाया— ‘यार से या हथियार से आयो, ड्रग ट्रैफिक व्यापार से आयो, तस्करिया गलियार से आयो, पायो कहां से धन स्याम?’ इसके बाद व्याख्याकार ने व्याख्या करी कि ये सारा काला धन अवांछित मैत्रियों और अवांछित हथियारों से आता है, जिससे पूरे संसार का अहित हो सकता है। मादक द्रव्यों का कारोबार काले धन का बड़ा ही उत्पादक स्रोत है। तस्करिया गलियारों में हीरे-पन्ने के व्यापारी टहलते-टहलते ही अपार धन एकत्र कर लेते हैं। हीरे का मोल तो पारखी जानते हैं, पर पारखी होते कितने हैं? अपार पैसा दे जाते हैं जो स्विस कल्याणी बैंक में चला जाता है।
—रुक चौं गयौ? बता,सौरसिया नै आगे का सुनायौ?
—हां, पंडिज्जी! आगे गाइए। ‘नेता से या अभिनेता से आयो, लेता से आयो कि देता से आयो, लोकतंत्र के प्रणेता से आयो, लायो कहां से धन स्याम?’ व्याख्याकार ने व्याख्या करी। पहले स्याम धन पाने की बात की गई थी अब यहां लाने की बात की जा रही है। तू किससे लाया? उस नेता से जिसने काली कमाई करी! उस अभिनेता से जिसने बरजोरी-करचोरी करी! लेता से आयो कि देता से आयो का मतलब है कि हवाला के ज़रिए स्विस कल्याणी में लाया गया। और बता सखी कि लोकतंत्र के किन प्रणेताओं से लाया गया?
—राग में सखी कौन ऐ रे?
—सखी सरकार है और कोर्ट सखी पूछ रही है। गायक गा रहा है। ’कोरट ने अरदास लगाई, सीवीसी चुप आरबीआई, बात पते की नहीं बताई, खायो कहां से धन स्याम?’ अब ये जो कोर्ट सखी है ये सरकार सखी से पूछ रही है कि हमारी अरदास पर सीबीसी और आरबीआई की चुप्पी क्यों? हम बार-बार पूछ रहे हैं कि उनका पता तो बताओ। पर तुम पते की बात ही नहीं करते। तो हे सखी खायो कहां से धन स्याम। इतना बड़ा उदर तू कहां से लाई कि पूरे श्याम धन को पचा गई। हे सखी ‘ना कोई कुर्की, ना कोई नालिश, ना कोई बंदिश, ना कोई जुंबिश, स्विस कल्याणी की ये बंदिश, गायो कहां से धन स्याम?’ पं. बौड़म सौरसिया जी ने इस बार गायकी पर भी सवाल उठाया है कि इतने धन के बावजूद न तो कोई कुड़की हुई, न कहीं किसी ने किसी को कोई घुड़की दी, न कोई नालिश हुई, बल्कि चेहरों पर पालिश हो गई, चमक गए चेहरे। न किसी पर कोई बंदिश है, न कोई हरकत या जुंबिश है। निःशब्द कैसे गायो? अंत में वे सारा रहस्य बताते हैं, सुनिए— ‘अंतर्यामी ये धन रब-सा, अविगत अंतर्लोक अजब सा, हम पर ये अन्याय गज़ब सा, ढायो कहां से धन स्याम, बता दे सखि, ढायो कहां से धन स्याम।’ अंतिम बंदिश में ही सार है चचा! व्याख्याकार ने बताया कि असल अन्याय तो उस आदमी पर है जिसका गोरा धन श्याम हो जाता है। वही अन्याय ढाता है, लेकिन ये श्याम धन अद्भुत अंतर्यामी विधाता है। बड़ा अजब अंतर्लोक है। अविगत गति कछु कहत न आवै, ज्यों गूंगौ मीठे फल कौ रस अंतर्गत ही पावै। गूंगे का गुड़ है चचा, वही जानता है जिसने चखा है। दूसरे क्या जानें धन स्याम की माया!
—भौत सई लल्ला। आगै बता।
—आगे क्या बताऊं! सपना ख़तम!

Wednesday, February 02, 2011

यही प्रार्थना है और कुछ नहीं

—चौं रे चम्पू! का भयौ ओ अयोध्या में?
—बारह अक्टूबर इक्यानवै को, अयोध्या में तीन महान संगीतकारों, पं. भीमसेन जोशी, उस्ताद अमजद अली खां और उस्ताद अमीनुद्दीन खां डागर के साथ मैं भी गया था एक सद्भावना कार्यक्रम में। उसकी टेप मिल गई मुझे। बीस साल पुराना संगीत सुना, बातें सुनी।
—बात का सुनीं?
—काफ़ी तनाव के दिन थे चचा! हम चारों लोग नि:शुल्क गए थे। संचालन करते हुए मैंने कहा— संगीत के क्षेत्र की हमारी ये विभूतियां अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। इन्होंने निर्णय लिया कि अयोध्या जाएं और वहां अपने हृदय की बात संगीत के माध्यम से कहें। संगीत हमारी सांसारिक उत्तेजनाओं को शांत करता है। मैं हास्य-व्यंग्य का कवि माना जाता हूं, लेकिन आज संगीत के इन महारथियों का सारथी बन कर आया हूं। यह नगरी संस्कृतियों की मिलन-स्थली है। इस नगरी में कुछ ऐसा-वैसा होने लगता है, तो पूरे देश का दिल धड़कता है। आज हम लोग पूरे देश को एक चेतना और दृष्टि देने का संकल्प लिए हुए हैं। सन उन्नीस सौ इक्यानवै से कविता में निवेदन किया कि हे नाइंटी वन तू इतना कर दे! ये जो खाइयां-सी खुद गई है न, दिलों में, नफ़रत और पराएपन की, इन्हें भर दे। इन्हें भरने के लिए हमारे रहनुमाओं में फ़िकर दे, फ़िकर भी जमकर दे। संप्रदायवादियों को टक्कर दे, और टक्कर भी खुलकर दे। ज़रूरतमंदों को ज़र दे, और ज़र भी जरूरत-भर दे। उनके घरों में जगर-मगर दे। कलाकारों को पर दे और पर भी सुंदर दे। उनमें चेतना ऐसी प्रखर दे कि खिडक़ियां खुल जाएं हट जाएं परदे। हमारे तथाकथित नेताओं को और भी मोटे उदर दे। उदर ढकने को और भी महीन खद्दर दे। ध्रुपद को अमीनुद्दीन डागर दे। भाई अमजद के सरोद के सुरोंकी गागर दे। पं. भीमसेन जोशी के सुरों का सागर दे। अच्छा, ये सब तो दे, पर तू इतना तो ज़रूर कर दे, ये जो खाइयां-सी खुद गई हैं न दिलों में नफ़रत और पराएपन की इन्हें भर दे।
—तारी पिट गई हुंगी जापै तौ?
—हां चचा। फिर उस्ताद अमजद बोले कि मेरी अपनी ख़्वाहिश रहती है कि हमारे देश के और विदेश के जो पवित्र स्थल हैं वहां जाकर अपना मत्था टेकूं। इससे मुझे दिली शांति मिलती है। अफ़सोस सिर्फ़ इस बात का है कि जिन हालात में हम लोग यहां आए हैं, अगर उसके बजाय यहां नॉर्मल हालात होते तो ज़्यादा अच्छा होता। कलाकार लोग ज़्यादातर राजनीति में इंवॉल्व नहीं होते, लेकिन हम समाज से अलग भी नहीं हैं। देश में जो कुछ होता रहता है, अच्छा-बुरा, उसकी ख़बरें मिलती रहती हैं। हमें अपने बच्चों के बारे में सोचना है कि उन्हें अच्छा भविष्य मिले। देशवासियों का आपसी रिश्ता रूहानी और अटूट है। हमें कुछ तोड़ना नहीं, जोड़ना चाहिए। चचा, डागर साहब ने भी मौहब्बत का संदेश दिया।
—पंडिज्जी का बोले?
—उन्होंने कहा- ‘गाने वाले अपनी तरफ़ से ज़्यादा बोलते नहीं हैं, साथ में कविराज भी बैठे हैं, इनका भी असर होगा शायद। दो शब्द मैं भी बोल रहा हूँ। गाने में कोई धर्म नहीं है, गाना ही धर्म है। जिसके गले से या वाद्य से या नृत्य से जनता के ऊपर असर होता है, वह कलाकार कुछ न कुछ कर सकता है, लेकिन जब तक उसको ख़ुद को आनंद नहीं होता वह दूसरों को आनंदित नहीं कर सकता है। इन दिनों जो कुछ चल रहा है… पेपर में नाइंटी नाइन परसेंट नहीं पढ़ने की जैसी ही न्यूज़ बहुत रहती हैं। दिल को शांति देने वाली कोई बात नहीं।अच्छा काम करने के लिए थोड़ा कष्ट आना तो ज़रूरी है। बुरा काम करने में कोई देरी नहीं लगती। संगीत में अच्छा करने की शक्ति है।भगवान सबको अच्छी भावनाएं दे। किसी धर्म में किसी को मारने को नहीं कहा, बचाने को ज़रूर कहा है। भगवान भारतवर्ष में ही नहीं, भारतवर्ष से बाहर भी, सब दुनिया में शांति दे। सब एक होकर रहें, यही प्रार्थना हैऔर कुछ नहीं।
—वाह!
—फिर डागर साहब ने राग ललिता गौरी में ध्रुपद सुनाया, अमजद भाई ने अपना नया राग शांतना बजाया और पंडित जी ने एक रहस्य खोला कि ’मिले सुर मेरा तुम्हारा’ आधारित है उनके प्रिय भजन ’जो भजै हरि को सदा’ पर। आपको बीस साल पुराना कैसेट दूंगा, सुनना चचा!

Wednesday, January 26, 2011

वे अन्तर्मन से प्रसन्न होते थे

—चौं रे चम्पू, पंडित भीमसेन जोसी के जाइबे पै खूब दुखी भयौ होयगौ तू तौ?
—भारत का ऐसा कौन सा शास्त्रीय-संगीत-प्रेमी होगा जो दुखी न हुआ हो। ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की घन-गरज वाणी आज छब्बीस जनवरी पर भी गूंजेगी। सबके सुर मिलाने का आवाहन करने वाले गायक को कोई भुला नहीं सकता। शताब्दियां गुज़र जाती हैं तब कहीं ऐसा रत्न भारत को उपलब्ध होता है।
—तेरी कबहुँ उनते मुलाक़ात भई का?
—हाँ चचा, अनेक बार। धुर बचपन में लावनी-नौटंकी के कलाकारों के लोक-संगीत से तो परिचित हुआ था, लेकिन शास्त्रीय संगीत की वर्णमाला मुझे नहीं आती थी। यह श्रेय तो आपकी बहूरानी को जाता है, जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि शास्त्रीय संगीत की रही है। उनके भाई मुकेश गर्ग के साथ दिल्ली में बहत्तर से पिचहत्तर तक आईटीसी संगीत सम्मेलनों में जाता रहा। देश के महान संगीतकारों को सुनने का मौका मिला। पिचहत्तर में बागेश्री के साथ एक समारोह में गया था, जहाँ पंडित जी ने गाया था। उनकी वाणी में ऐसी गूँज थी जिससे अनुमान लगता था कि अनहद नाद कैसा हो सकता है। उनके सुरों में वह ताकत थी कि अगर आप जुड़ जाएँ तो पता ही न चलेगा कि कब आपकी कुण्डलिनी जागृत हो गई। चचा उनके जाने से कितने ही दिलों में बैठे सा रे गा मा सुर रो रहे होंगे। किसी महान कलाकार के जाने के बाद वह कला भी रोती है जिसका उस कलाकार ने संवर्धन किया हो। पिचहत्तर से पिचासी तक मैं उन्हें विभिन्न समारोहों में सुनता रहा। मेरे शास्त्रीय-संगीत-प्रेम में उनके गायन का बहुत योगदान है चचा।
—उन्ते बातचीत कौ मौकौ नायं मिलौ का?
—मिला चचा मिला। कई अवसर आए। सन पिचासी-छियासी की बात होगी, मैं पूना के एयरपोर्ट पर दिल्ली की उड़ान की प्रतीक्षा कर रहा था। अचानक पंडित जी सपत्नीक दिखाई दिए। ढीला पायजामा, सफ़ेद कुर्ता, देसी स्टाइल का एक ऐसा थैला, जैसा आमतौर से हवाई यात्री नहीं रखते। एक कोने में बैठे पति-पत्नी धीमी आवाज़ में बेतकल्लुफ़ी से बतिया रहे थे। मैंने सोचा मंच पर तो कभी व्यक्तिगत रूप से मिलने का मौका नहीं मिला, ये अच्छा अवसर है, प्रणाम करके आता हूँ। मैंने जाकर दोनों के पैर छुए और बिना किसी संवाद के अपनी कुर्सी पर लौट आया। उस पावन स्पर्श की मीठी अनुभूतियों का रस आँख मूँद कर ले रहा था कि तभी अपने कंधे पर एक वरदहस्त का कोमल स्पर्श महसूस किया। मेरे सामने आदरणीया खड़ी थीं। बड़े मीठे स्वर में उन्होंने पूछा, आप टीवी पर कविता सुनाते हैं न? मैंने कहा, जी हाँ! कहने लगीं मुझे आपकी बीयर वाली कविता बहुत पसंद आई। कमाल है पंडित जी ने आपको नहीं पहचाना। मैंने कहा, वे महान सुर-साधक हैं, दूरदर्शन के सारे कार्यक्रम देख पाने का समय कहाँ मिल पाता होगा। ख़ैर, वे ले आईं मुझे पंडित जी के पास। स्नेह से बिठाया। चचा, तुम्हारे चंपू की कुछ ज़्यादा ही तारीफ़ें करने लगीं। पंडित जी बोले, मैंने कभी आपकी कविता नहीं सुनी, पर जिस तरह से ये आपकी प्रशंसा कर रही हैं, और आपसे मिलकर इनके चेहरे पर चमक आई है, उसे देख कर आपका महत्व पता लग रहा है। ये आसानी से प्रशंसा नहीं करती हैं। चचा, मैं अपने रोमांच की हालत बता नहीं सकता। उन्होंने स्नेह से गले लगाया। थोड़ी देर साथ बैठे। आदरणीया ने थैले से निकाल कर पूरनपोली नाम की ललित दाल वाली रोटी वत्सलभाव से खिलाई। मेरे अंदर पंडित जी के प्रिय राग पूरिया और ललित गूंजने लगे। —और कोई खास मुलाक़ात भई?
—होती रहीं चचा, कभी दूरदर्शन में, कभी हवाईअड्डों पर, लेकिन जब भी होती थीं उन्हें पूना एयरपोर्ट की बात याद रहती थी। मैं उनके पैर छूता था, वे अन्तर्मन से प्रसन्न होते थे और कहते थे कि कि मुझे खेद है कि मैंने आपकी कविता आज तक नहीं सुनी पर मैं आपको पसंद करता हूँ। कई बार मन करता था कि अपनी कविता का एक तो नमूना दिखा दूँ, पर मुलाकातें व्यस्तताओं की अस्तताओं में हुईं प्राय:।
—तौ उन्नैं तेरी एक ऊ कबता नायं सुनी?
—सुनीं! दूरदर्शन पर सुनी होंगी शायद, लेकिन पहली बार साक्षात सुनीं, बारह अक्टूबर उन्नीस सौ इक्यानवै को, अयोध्या में। उसके बारे में फिर कभी बताऊंगा. अभी तो उनको विनम्र श्रद्धांजलि!

Wednesday, January 19, 2011

एकवचन बहुवचन

—चौं रे चम्पू, बडौ भासा-सास्त्री बनै है तू! जे बता कै भासा जानिबे के ताईं ब्याकरन सीखिबौ जरूरी ऐ का?
—चचा, मातृभाषा के लिए व्याकरण सीखना क़तई ज़रूरी नहीं है। मातृभाषा अपने आप आ जाती है। व्याकरण के नियमों से बच्चा बोलना नहीं सीखता। वह तो गोदी में लेटे-लेटे आमोदी स्टाइल में ऐसे ही सीख जाता है। दूसरी भाषाओं को सीखने के लिए व्याकरण देखनी पड़ें तो देखनी पड़ें। वैसे संसार की हर भाषा की व्याकरण में अपवादों का मवाद भरा हुआ है। वचन, लिंग और वर्तनी के मामले में इतने एक्सैप्शंस हैं कि नियम जानने से ज़्यादा ज़रूरी अपवादों को जानना होता है। जो व्यक्ति भाषाओं को विधिवत नहीं सीखता, जीवन-समाज या अंतरंगों के साथ बोलचाल से सीखता है, वह उस भाषा के मानक, स्वीकृत और परिनिष्ठित रूप से पूरी तरह से परिचित नहीं हो पाता। भले ही वह उसकी अपनी मातृभाषा ही क्यों न हो। जाने-अनजाने वह भाषा के फोड़ों से अपवादों के मवाद को निकालता रहता है और कई बार स्वयं नए शब्दों, शब्द-पदों या शब्द-रूपों का निर्माण करता है।
—तेरी जे गहरी बात मेरी समझ में नायं आई रे!
—चलिए उदाहरण देकर समझाता हूँ। चचा मैं गया था कानपुर एक कविसम्मेलन में। चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कार्यक्रम था। हर किसी का मन करता है कि अपनी भाषा को अच्छी तरह बोले। वे बड़ी संस्कृतनिष्ठ हिन्दी बोल रहे थे, भाषा से ही हम संस्कृति को जान पाते हैं और कविसम्मेलन की यह परम्परा हमारी संस्कृति को हमारे सामने लाती है। हमारे देश के महान कवि सामने बैठे हुए हैं। मैंने अगल-बगल बैठे ’महान’ कवियों को कनखियों से देखा और मुस्कुरा दिया। अपने आप पर भी मुस्कुराया कि कहां के ‘महान’ हो यार, ये कुछ ज्यादा ही भाव दे रहे हैं। फिर उन्होंने कहा कि क्या कारण है कि कविसम्मेलन में इतने श्रोते आते हैं।
—श्रोता का बहुवचन श्रोते!
—सुन कर हंसी आई। मेरी पहले वाली हंसी पर ये दूसरी वाली हंसी भारी पड़ गई। नियमों के हिसाब से देखा जाए तो बिल्कुल सही कह रहा है। जब तोता का बहुवचन तोते हो सकता है श्रोता का श्रोते क्यों नहीं। लेकिन भाषा-व्यवहार के हाथों से तोते उड़ गए। उसने बिना व्याकरण जाने नियमपूर्वक कार्य किया और श्रोता का श्रोते कर दिया। उसने तो एक ही बार श्रोते बोला था, लेकिन मैं मन ही मन श्रोते शब्द के विविध वाक्य-प्रयोग करने लगा। पंडाल में अभी श्रोते थोड़े कम हैं। श्रोते थोड़े बढ़ेंगे तो हम कार्यक्रम प्रारम्भ करेंगे। जो श्रोते खड़े हैं, कृपया बैठ जाएं। सारे श्रोते ताली बजाएं।
—श्रोते! प्रयोग तौ अच्छौ कियौ।
—चचा, उसी समय मुझे याद आया कि सन तिरानवै में राजीव कपूर के लिए मैं ‘वंश’ नाम का सीरियल लिख रहा था। आर.के.बैनर से राजीव कपूर की फिल्म ‘प्रेमग्रंथ’ उन दिनों निर्माणाधीन थी। उन्होंने फिल्म का एक मार्मिक सीन बताया कि माधुरी दीक्षित की गोदी में एक बच्चा है। मरा हुआ बच्चा। बस वाले लोग माधुरी को उतार देते हैं कि मरे बच्चे के कारण कहीं जर्म्स न फैल जाएं बस में। अंधेरी रात है, ब्लू लाइट्स, धुंआ-धुंआ-धुंआ और हवे चल रही हैं हवे।
—हवे चल रई ऐं!
—हां, हवाएं नहीं कहा उन्होंने। तवा का बहुवचन जब तवे हो सकता है, जवा का जवे हो सकता है, तो हवा का हवे क्यों नहीं हो सकता? दवा का भी दवे कर देना चहिए? क्यों कहते हैं दवाइयां? व्याकरण के नियम से चलें! भाषा प्रयोग से बनती है। व्यवहार से बनती है। एकवचन बहुवचन के नियम कई बार निरस्त भी हो जाते हैं। लड़का एकवचन है, लड़के बहुवचन, लेकिन लड़के शब्द एकवचन भी हो सकता है।
—सो कैसै?
—ए लड़के, क्या कर रहा है? रहा कि नहीं एकवचन? खैर छोड़ो चचा, ये बताओ दवे खाईं या नहीं?
—चम्पू, दवा कौ दवे मत कर, मेरे डाक्टर दवे नाराज है जांगे रे!

Wednesday, January 12, 2011

बर्फ़ पर खेलती तमन्नाएं

—चौं रे चम्पू! गजब की ठण्ड ऐ, तैनैं चिल्ला सीत में कछू अजब-गजब कियौ कै नायं?
—अरे चचा, रजाई में बैठे रहने के अलावा और कर ही क्या सकते थे! टीवी देखते रहे। रिमोट का इस्तेमाल करने के लिए रज़ाई से हाथ निकालने में भी परेशानी हो रही थी। एक न्यूज़ चैनल लगा के हाथ रिमोट समेत रज़ाई में कर लिए।
—टीवी पै का देखौ?
—कहां याद रहता है! हां, एक बताने लायक बात है। सुख-दुख में चेहरे पर समभाव रखने वाली एक न्यूज़वाचिका बोल रही थी, कश्मीर में मायनस तेरह डिग्री टैम्परेचर हो जाने के कारण डल झील सूख गई है।
—सूख गई कै जम गई?
—तभी तो मुझे भी हंसी आई चचा। झीलों का पानी कम हुआ करता है, वे सूखती कहां हैं! सूख गई तो झील कहां रही, तालाब हो गई! नदियां सूख जाती हैं, तालाब सूख जाते हैं, लेकिन झील कहां सूखती हैं!
—ठीक कहि रह्यौ ऐ रे। गल्ती ते बोलि गई, माफ कर छोरी ऐ।
—बिल्कुल माफ कर दिया चचा, क्योंकि अगले ही पल उसने मेरी कल्पना को दूसरी ओर का रास्ता दिखा दिया, जब वह बोली कि झील की सूखी हुई सतह पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। आगे वह क्या बोली मुझे सुनाई नहीं दिया। कल्पना दृश्यों में खो गया। बच्चे बर्फ पर क्रिकेट खेल रहे हैं। कैसे बाउंड्री बनाएंगे? विकेट कैसे गाड़ेंगे? पिच कैसे बनेगी? इतना तो तय है कि पिच पर रोलर फिराने की आवश्यकता न पड़ेगी क्योंकि कुदरत ने अपने आप झील को एक समतल मैदान बना दिया है। वहां कोई वाटर-लेवल पारा-मशीन नहीं रखनी पड़ेगी। बर्फ में खरोंच-खरोंच कर पिच को आकार दिया जा सकता है। बॉल कितनी भारी होगी? यहां तो बार-बार चौके लगाना बेहद आसान रहेगा क्योंकि उस फिसलनशील बर्फ पर बॉल रुकेगी कैसे? बच्चे भी बॉल के पीछे फिसलते-फिसलते ही जाएंगे। बॉल की गति बच्चों की फिसलन-गति से ज़्यादा तेज़ होगी। कैसे दौड़ेंगे बर्फ पर? स्कैट्स लगा लें तो शायद तेज़ी से दौड़ सकें! स्कैट्स कहां ख़रीद पाते होंगे कश्मीर के गरीब बच्चे। फिर बाउंड्री कैसे खींचते होंगे झील में? नियम-कायदे कौन से लागू होते होंगे। हमारी क्रिकेट का ही अनुसरण करते होंगे क्या? क्या सचिन-सौरभ ने कभी बर्फ पर क्रिकेट खेली है? मैं कल्पनाओं में बच्चों की आइस क्रिकेट देखने लगा।
-प्रबल तमन्ना होय, तौ का पानी का बरफ! खेलिबे की इच्छा कौ पानी नायं जम्यौ करै।
—डल झील पहले भी जमी होगी पर शायद इतनी कठोर न हुई होगी कि उस पर क्रिकेट खेली जा सके। दुनिया में बहुत सारे ऐसे देश हैं जहां झीलें जम जाती हैं। अंटार्कटिका में तो बर्फ ही बर्फ होती है। वहां किसी के मन में यह विचार क्यों नहीं आया कि क्रिकेट खेली जाए। जरूर कहीं न कहीं कुछ होता होगा। आइस क्रिकेट भी कहीं न कहीं खेली जाती होगी।
—पतौ निकार।
—लो अभी पता करता हूं। लैपटॉप खुला है। गूगल सर्च पर ये डाला, आइस क्रिकेट। एक मिनिट रुको। अरे चचा, ये तो निकल आया। आइस क्रिकेट का वर्ल्ड टूर्नामेंट बाईस जनवरी को होने जा रहा है। यह खेल सन दो हजार चार से एस्टोनिया की राजधानी ताल्लिन में हार्कू नाम की झील पर खेला जाता है जो बर्फ से ढक जाती है। आइस क्रिकेट में लाल रंग की विंड बॉल का इस्तेमाल होता है। नेट पर यूट्यूब खोल कर आपको नज़ारा भी दिखा सकता हूं। साक्षात देखना हो तो उसके लिए फ्लाइट के निजी खर्च के अलावा दो सौ साठ पाउंड की टिकिट है। चार दिन तक रुको और आइस क्रिकेट का मजा लो।
—अरे छोड़ लल्ला, इत्ते पइसा जोरिबे में तौ आंसू निकरि आमिंगे।
—तुम आंसू मत निकालो चचा। कल मैं काफी आंसू निकाल चुका हूं। कल अंतरराष्ट्रीय हास्य दिवस था। हास्य के नाम पर जो चीजें परोसी जा रही थीं उन पर मुझे ज़रा सी भी हंसी नहीं आई। परसों भी आंसू बहाए थे क्योंकि विश्व हिन्दी दिवस था और एक छोटे से सभागार में संपन्न हो गया। न व्यापक प्रचार, न उसकी कोई खबर लोगों को। ऐसे ही जैसे कश्मीर के बच्चे बर्फ पड़ने पर आइस क्रिकेट खेल लेते हैं। लोकप्रिय हो तभी आनन्द आता है न चचा। विश्व हिन्दी दिवस, हास्य दिवस या आइस क्रिकेट का डल झील टूर्नामैंट।
—सई कही सौ परसैंट!

Wednesday, January 05, 2011

वर्धा हुआ आनंदवर्धा

-- चौ रे रे चम्पू! तीन दिनां ते दिखाई नायं दियौ, कहां गायब है गयौ ओ रे?
—वर्धा गया था चचा! वहां के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का नाम आपने सुना होगा। उसके बारे में लोगों की धारणा थी कि वह सिर्फ कागज़ों पर चलता है। यह भी माना जाता रहा है कि उसको चलाने वाले शीर्ष व्यक्तित्व वहां बड़ी मुश्किल से जाते हैं, लेकिन मैंने तो देखा कि वह एक सुंदर आकार लेता हुआ दिव्य स्थान है। साहित्य में एक अलंकार जोड़ने का प्रस्ताव मैं आपके सामने पहले भी रख चुका हूं।
—कौन सौ अलंकार?
—भ्रांतिमान अलंकार! भ्रांति यह कि वह सिर्फ कागज़ी विश्वविद्यालय है, लेकिन यहां तो धरती की सतहों से अंगड़ाइयां लेते हुए सुरुचिपूर्ण स्थापत्य ने प्रकट होकर विश्वविद्यालय का रूप दिखाना शुरू कर दिया है। लगभग दो सौ एकड़ में फैला यह व्यापक परिसर हिन्दी के भविष्य और भविष्य की हिंदी का प्रमुख केंद्र बनने जा रहा है चचा।
—केंद्र कौ केंद्र पुरुस को ऐ रे?
—विभूति नारायण राय हैं। वहां के कुलपति। कुलाधिपति हैं डॉ॰ नामवर सिंह। उन्हीं के निमित्त बने कक्ष में रुका था चचा!
—अच्छा जी!
—वे तो मार्गदर्शन के लिए यदाकदा ही आते हैं, असल काम तो कुलपति का होता है। ....और आप तो जानते हैं कि जो आदमी काम करने लगे उसे विभूति मानने के बजाय उस पर भभूत चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। काम करने वाला कभी-कभी ग़लती भी कर जाता है और ग़लतियों से सीख भी लेता है। राही मासूम रज़ा ने कहा था, भले से हारे जो हारे, हमीं तो हार गए, लो आप जीत गए, कचकुलाह कर लीजे।
—जे कचकुलाह का भयौ रे?
—कचकुलाह का मतलब है टोपी टेढ़ी कर लीजिए। पुराने ज़माने में तीतर-मुर्गे लड़ाने वाले लोग ऐसा करते थे। जिसका मुर्गा या तीतर जीत जाता था वह बांकी अदा में अपनी टोपी तिरछी कर लेता था। कर ले भैया, टोपी तिरछी कर ले, पर बरछी तो मत चला। हम अपने काम में लगे हुए हैं। करने दे!
—का काम देखौ तैनैं?
—पंचटीला कहलाती थी ये जगह। अब इसे कहते हैं गांधी हिल। यहां महात्मा गांधी की प्रतिमाओं के चलन को एक नया रूप दिया गया है। गांधी जी तो खड़े ही हैं, लेकिन उनके साथ उनकी बकरी की भी बकरीकद प्रतिमा है। नकली गांधीवादियों ने जिस बकरी को खाद्य-वस्तु बनाया और व्यंग्यकारों ने जिसे विषय-वस्तु बनाया, वह यहां निर्भीक और निरे आनंद में है। चश्मा चश्माकद नहीं है। घड़ी घड़ीकद नहीं है। चप्पल चप्पलकद नहीं हैं। ये तीनों मूर्तियां विराट आकार में बनाई गई हैं। घड़ी की टिकी हुई प्रतिमा में ढाई आखर के प्रेम की टिक-टिक है, क्योंकि वह हर समय ढाई बजाते हुए दिखती है। यह मूर्ति स्थिर रहते हुए भी समय को गतिमयता दे रही है। गति दे रही है चप्पलों की प्रतिमा भी। गांधी-पथ पर गांधी-पाठ और पुनर्पाठ का न्यौता देते हुए। चश्मा अलौकिक है। इस चश्मे में से दिखती हैं वे पहाड़ियां जिन पर अभी इस परिसर का शेष निर्माण-कार्य होना है। इस चश्मे में से दिखती है एक विश्व-दृष्टि जो हिन्दी को वैश्विक भाषा बनाने का संकल्प रखती है। इस चश्मे से दिखाई देता है हिन्दी शिक्षा जगत में एक आमूलचूल नई दृष्टि लाने वाला एक बनता हुआ, आकार लेता हुआ, नया कुछ देता हुआ विश्वविद्यालय। हालांकि तेरह साल पुराना है, लेकिन पिछले दो ही साल में साकार हुआ है। अभी तक यह महाप्रभुओं का निराकार ब्रह्म था। अब यहां के साहित्य विद्यापीठ में साहित्य के साथ नाटक और फिल्म अध्ययन विभाग भी प्रकट हो गया है। प्रकट हो गया है, महापंडित राहुल सांकृत्यायन केंद्रीय पुस्तकालय। यहां निर्कुंठ भाव से नए-नए पाठ्यक्रम प्रकट हो रहे हैं। मैं तो चचा प्रसन्न हुआ एक और चीज़ देखकर।
—वो ऊ बताय दै!
—परिसर में प्रविष्ट होते ही हम देखते हैं कि सीमेंट की गऊ माता खड़ी हैं। लगता है गोदान उपन्यास से निकलकर सीधे सड़क के किनारे खड़ी हो गई हैं। उनकी पीठ पर लिखा है, प्रेमचन्द मार्ग। आगे बढ़ो तो मिलता है भारतेन्दु हरिश्चंद्र मार्ग। फिर बने हैं केदार संकुल, शमशेर संकुल और अज्ञेय संकुल। चित्त प्रसन्न हो गया वहां जाके। वर्धा तो आनंदवर्धा हो गया मेरे लिए। अगली बार चलना आप मेरे साथ।
—साथ में सेवाग्राम ऊ दिखाय तौ चलिंगे रे!