Tuesday, March 30, 2010

बाकी सब कोढ़ में खाज

—चौं रे चम्पू! आज भौत सारे सवाल पूछने ऐं, जवाब देगौ?
—क्यों नहीं चचा, लेकिन बलवीर सिंह ‘रंग’ ने कहा था— ‘बहुत से प्रश्न ऐसे हैं, जो सुलझाए नहीं जाते, मगर उत्तर भी ऐसे हैं, जो बतलाए नहीं जाते।’
—रंग जी की बात करकै अपनी रंगदारी मती ना दिखा। हां-ना में बात कर। जवाब देगौ कै नायं? बता चिकित्सक कौन ऐ?
—चिकित्सक होता है यमराज का भाई। यमराज तो सिर्फ प्राण लेता है। चिकित्सक प्राण के साथ पैसा भी खींच लेता है। कहावत है कि जो सौ को मारे सो वैद्य, हजार को मार दे सो चिकित्सक। वैसे, आधा चिकित्सक तो रोगी स्वयं ही होता है, क्योंकि वह अपने और अपने रोगों के बारे में जानता है। फिर भी चचा जो सही इलाज कर दे वो है भगवान जैसा। जिसकी नज़र में ना हो पैसा। इलाज के लिए तरह-तरह की पैथियां हैं। आयुर्वेदिक, यूनानी, एलोपैथी, होम्योपैथी। होम्योपैथी में हजार सवाल पूछे जाते हैं, तब एक दवाई निकाली जाती है। अंधेरे का तीर है, चलाने वाला अगर पृथ्वीराज चौहान हो तो आंखों पर पट्टी बांधने के बावजूद निशाना ठीक लगेगा, लेकिन चिकित्सक वही उत्तम है जो पट्टी तब बांधे, जब घाव हो। ऐसा न हो कि पट्टी के पैसे के लालच में घाव ही कर दे।
—ठीक, अब जे बता कै इंजीनियर कौन ऐ?
—इंजीनियर वह जो मनुष्य की छोटी-बड़ी ज़रूरतों के हिसाब से सुविधाओं का पहिया घुमाने में महारत रखता हो। पुल बनाए, मकान बनाए, बिजली लाए, सैंट बनाए, सीमेंट बनाए। भौतिक रासायनिक सुख-तत्त्व जुटाने में अपने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कौशल को लगाए।
—और ठेकेदार कौन?
—ठेकेदार वह प्रजाति है जो इंसान और इंजीनियर के बीच में लाभ कमाने के लिए आती है। काम पूरा करने की जिम्मेदारी लेती है, इनके बिना भी काम नहीं चल पाता। ठेकेदार हजार प्रकार के होते हैं, कहां तक गिनाऊँ?
—वकील कौन?
—वकील, वह कील जो ठुक जाए तो निकले नहीं। इसीलिए मुक़दमे को ठोकना कहते हैं। वकील सही हो तो सारे कील-कांटे दुरुस्त कर सकता है।
—अध्यापक कौन?
—जो अपने अनुभव, अध्ययन और विवेक को अपने छात्रों में स्थानांतरित कर दे। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है चचा। कोई कितना भी अर्जित कर ले, फिर भी कम।
—बुझी-बुझी सी बात करन लग्यौ लल्ला! चल छोड़, जे बता कै साहित्यकार कौन ऐ?
—इसका जवाब देना वाकई मुश्किल है। आजकल तो साहित्यकार वह है जो अपने आपको मान ले कि वह साहित्यकार है। वैसे, समीक्षक और.... अथवा सामाजिक जिसको मान लें, वह साहित्यकार होता है। समीक्षक देखते हैं कि उसने किसी समाज का इलाज किस तरह किया। शिल्प की इंजीनियरिंग का कौशल कैसे दिखाया। प्रतिबद्धता की ठेकेदारी करके इंसान को बेहतर बनाने में कोई भूमिका अदा की या नहीं, मेहनत से इंसानियत की वकालत की या नहीं।
—साहित्यकारन कौ कोई ग्रेड है का?
—डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक, वकील सबके ग्रेड हो सकते हैं, लेकिन साहित्यकार का ग्रेड बनाना बड़ा मुश्किल है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और सरकारी संस्थाओं के सामने भी यह समस्या है। अभिनेता और संगीतकार के ग्रेड होते हैं, ए ग्रेड, बी ग्रेड। उसी के हिसाब से उनकी फीस निर्धारित होती है, लेकिन साहित्यकारों-कवियों का कोई ग्रेड नहीं है। सबके लिए वही पांच सौ रुपए। अगर वह टैक्सी से आए तो भी पूरा न पड़े। बड़े-छोटे का कोई मानक नहीं है। संगीत में सही सुर मिलाओगे, दिलकश गाओगे तो ए ग्रेड मिलेगा। अभिनय में उतार-चढ़ाव दिखाओगे तब ए ग्रेड मिलेगा। यहां क्या मिलाएगा भाई। अगर तुक मिला दी तो स्वनामधन्य महान साहित्यकारों की नज़र में साहित्यकार कहां रहा? छंद बना दिया तो छल-छंदी मानेंगे तुझे। और अगर छंद न बनाया, तुक न मिलाई तो जनता तुझे साहित्यकार नहीं मानेगी। समीक्षक एकजुट हो जाएं तो किसी को भी महान बना दें। कुपित हो जाएं तो किसी को भी गिरा दें। साहित्यकार कौन है, मैं बता भी दूं तो महायान में इस हीनयानी की मानेगा कौन? लेकिन इतिहास गवाह है कि महायान टुइयां सा था और हीनयान बहुत विस्तृत-व्यापक, वही आगे विकसित भी हुआ, इसलिए बेहतर है मौन।
—चल छोड़। हम तोय ज्ञान की बात बतामैं। तोय मालूम ऐ कै चिकित्सकन कूं संसकिरित में कविराज कह्यौ करैं हैं। तू तौ समाज की चिकित्सा कर। जो कुशल ठेकेदारी, इंजीनियरिंग, वकालत, अध्यापकी के जरिए मनुष्य के तन मन कूं स्वस्थ करै, सो कविराज। जाकूं मानै सकल समाज। बाकी सब कोढ़ में खाज।

Monday, March 29, 2010

नासमझी की समझदारी

है बहुत पुरानी, बहुत पुरानी, बहुत पुरानी गाथा, जब किसी पहली अप्रैल को एथैंस नामक नगर में एक हादसा हुआ था। एथैंस में चार यार थे। उनमें से एक समझता था कि उसके अन्दर सबसे ज्यादा इंटेलिजैंस है। उसके अन्दर माइंड की सर्वाधिक प्रेजैंस है। बस अपनी एक्सिलैंस दिखाने का जुनून रहता था, लेकिन उसमें टॉलरैंस की कमी थी। इस कारण उसका अपने तीनों मित्रों से डिफरैंस और डिस्टैंस बना रहता था। ज्ञानाभिमान के कारण कॉन्फिडैंस से लबरेज़ होकर हर बात पर कांफ्रैंस करता था। डिफैंस उसका औज़ार होता था और तीनों यार डिस्टरबैंस के शिकार होते थे। जब वो बोलता था, तीनों साइलैंस की चादर ओढ़ लेते थे। वे तीनों मानते थे कि स्वयं को ज्ञानी समझना नॉनसैंस है। कॉमनसैंस का अभाव है। सुनते हैं कि उन तीन नासमझ यारों ने उसके दिमाग का बैलैंस ठीक करने के लिए एक योजना बनाई।
तीनों ने अपनी-अपनी तरह से उसे बताया कि रात में उनके सपनों में एक दिव्य रूप देवी प्रकट हुई। उसने हम तीनों को बताया कि एक अप्रैल की रात को पहाड़ की चोटी पर एक ऐसी दिव्य ज्योति प्रकट होगी जिससे तुम जो मांगोगे, मिलेगा। हम जानते हैं कि तुम सबसे ज्यादा बुद्धिमान हो, लेकिन यदि तुम और अधिक ज्ञान चाहते हो तो पहाड़ी पर चलो।
ज्ञानी अहंकारी था। जो मित्र ज्यादा बोल रहा था उससे उसने कहा— मैं सब कुछ जानता हूं। मुझसे कोई भी प्रश्न पूछ, उत्तर दूंगा। हवा पे पूछ या आग पे पूछ, बगिया पे पूछ या बाग पे पूछ, ताल पे पूछ तड़ाग पे पूछ, चिड़िया पे पूछ चिराग़ पे पूछ, काशी पे पूछ प्रयाग पे पूछ, सब्ज़ी पे पूछ या साग पे पूछ, फूल पे पूछ पराग पे पूछ, अजगर पे पूछ या नाग पे पूछ, धब्बे पे पूछ या दाग पे पूछ, साबुन पे पूछ या झाग पे पूछ, होली पे पूछ या फाग पे पूछ, गाने पे पूछ या राग पे पूछ, भीमपलासी विहाग पे पूछ, शादी पे पूछ सुहाग पे पूछ, उत्तर तुझको ना दे पाया तो अगले ही मिनट मुंड़ा मेरी मूंछ।
तीनों ने सोचा इसकी मूंछ मुंड़ाने का अच्छा मौका है। माना कि तुम परम ज्ञानी हो, पर हम तुम्हारे शुभचिंतक हैं, चाहते हैं कि तुम परमातिपरम ज्ञानी हो जाओ। वह परमाति-परमातिपरम महाज्ञानी महा अज्ञान के साथ चोटी पर पहुंच गया। तीनों यारों ने पूरे शहर को भी तमाशा देखने के लिए इकट्ठा कर लिया। रात आई, चांद आया। तारे आए, ख़ूब सारे आए। हवा चली, मस्ती में पेड़ झूमे। नदी का पानी बिना किसी बुद्धिमानी के अविरल गति से कल-कल ध्वनि करता बहता रहा। सब प्रकृति का आनन्द ले रहे थे और वह अहंकारी ज्ञानी परमातिपरम ज्ञानी होने के लिए दिव्य ज्योति के चक्कर में था। ज्योति कहां आनी थी, नहीं आई। पौ फटी तो वह भी फट पड़ा— झूठे हो तुम लोग! तीनों हंसे, तीनों के साथ शहर हंसा और समझदारी के सामने नासमझी हंसी और तब शायद पहली बार उससे कहा होगा कि तुम्हें अप्रैल फूल बनाया जा चुका है। मूंछ मुंड़ा लो। हम देखते हैं कि सारे रोमन चेहरे मूंछ विहीन दिखाई देते हैं। सबने मान लिया कि वे ज्ञानी नहीं हैं। इसीलिए उनकी संस्कृति महान मानी जाती है। हां, कुछ रोमन वृद्ध मूंछ दाढ़ी समेत जरूर दिखाई देते हैं पर वे समझदारी और नासमझी से ऊपर उठ चुके होंगे।
बहरहाल, अतिशय की समझदारी परास्त हो गई। दरअसल सारी समस्याओं की जड़ समझदारी ही होती है। ओढ़ी हुई समझदारी। बस समझ-समझ के हम भी समझ को कुछ समझ लें क्योंकि समझ को समझने में ही समझदारी है, लेकिन याद रखें कि समझदारी उसके पास है जिसकी नासमझी से यारी है।
तो एक अप्रैल कोई मूर्ख बनाने का दिन नहीं है, बल्कि नासमझी की समझदारी दिखाने का दिन है। नासमझी एक बहुत बड़ी समझ है जिसकी हम उपेक्षा करते हैं। सारी परेशानियां समझदारी से उत्पन्न होती हैं। जिन बच्चों ने मूर्खता में अपनी तरफ से समझदारी दिखाते हुए आत्महत्या का रास्ता अपनाया। कितना गलत किया। यही कामना रही होगी कि समझदारी की तलाश में और और अधिक अंक लाने के लिए पता नहीं हम और कितना पढ़ लें कि माता-पिता की इच्छाएं पूरी कर सकें। अरे बने रहते नासमझ जैसे तो बने तो रहते। जितनी समझ थी उसी के हिसाब से काम चलाते। न बन पाते इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक तो अपना कोई और हुनर दिखाते। ज़िंदगी के साथ ज्यादा समझदारी दिखाते हुए, ज़िंदगी का, समाज का और अपना नुकसान तो नहीं करते। जीवन में रेस करते, रेस को जीवन तो न बनाते।
भारत में अंग्रेज़ आए तो एक अप्रैल का विचार लाए। वे अपने घर-परिवार और क्लबों में एक अप्रैल का मजे का खेल खेलते रहे, लेकिन जितने समय भारत में रहे कुटिलता से हमें मूर्ख बनाते रहे। हमारे देश में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने देखा कि अंग्रेज़ लोग बहुत मूर्ख बना रहे हैं— ’अंग्रेज राज सुख साज, सजै सब भारी, पै धन विदेश चलि जात, यहै अति ख्वारी।’ अंग्रेज़ तो अंग्रेज़ हमारे अपने शहर बनारस में पंडे लोग तीर्थ-यात्रियों को मूर्ख बना रहे हैं, ठग रहे हैं। शायद अंग्रेज़ी के शब्दकोश में पहला हिन्दी शब्द ‘ठग’ ही आया होगा। ठग बनारस के प्रसिद्ध होते हैं। जहां तक सुनने में आया है, भारतवासियों के बीच किसी भारतवासी द्वारा पहली अप्रैल को व्यापक स्तर पर मनाने की शुरुआत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने बनारस में की थी। वे कई वर्ष तक पहली अप्रैल को कुछ न कुछ एथैंस जैसे प्रयोग करते रहे। तब लोग जानते नहीं थे कि उस दिन पहली अप्रैल है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के कुछ वाक़ये मैंने सुने हैं। एक बार हुआ यह कि उन्होंने शहर में पर्चा बंटवा दिया कि आज एक गोरी मेम खड़ाऊं पहन कर, जल पर चलते हुए गंगा पार करेगी। यह विलायती जादू देखना हो तो चले आओ गंगा के घाट पर। भोली जनता उमड़ पड़ी। एक साहित्यकार-कलाकार को चाहिए क्या? श्रोता और दर्शक। अपनी किसी अंग्रेज़ महिला मित्र को उन्होंने जनता के सामने प्रस्तुत भी कर दिया। वह खड़ाऊं पहन कर, घाट पर चार चक्कर लगाने के बाद, मूढ़े पर बैठ गई। मेम भी थी, उसके पैरों में खड़ाऊं भी थीं। दर्शक सोचते रहे कि अब यह जल पर चल कर जलवा दिखाएगी। खड़ाऊं पहन कर उस पार जाएगी, लेकिन बड़ी चतुराई से भारतेन्दु बाबू ने उसको गायब कर दिया। जनता में शोर मचा होगा, हाहाकार हुआ होगा। मेम कहां गई? भारतेन्दु बाबू ने धीरज बंधाया होगा— आएगी, आएगी, मेम जरूर आएगी! गंगा पार करके दिखाएगी। तब तक लो, मेरा यह नाटक देखो ‘अंधेर नगरी चौपट्ट राजा’। मेरा दूसरा नाटक देखो— ‘विषस्य विषमौषधम्’। उन्होंने अपनी कविताएं भी सुनाईं होंगी। किसी प्रलोभन में जनता को रोकना आसान होता है। लेकिन, न मेम आई, न खड़ाऊं-वॉक हुई। कहते हैं कि भारतेन्दु बाबू ने कहा— कुछ तो बुद्धि का उपयोग करो। तुम जान लो, मैंने तुम्हें अप्रैल फूल बनाया है। इतने सारे लोग एक साथ मूर्ख बने। अपनी नासमझी पर गर्व करते हुए हंसे होंगे और उन्होंने बड़े उल्लास और उत्साह के साथ मनाई होगी एक अप्रैल।
कहते हैं कि लोग अगले वर्ष तक भूल गए और फिर से एक अप्रैल आ गई। इस बार भारतेन्दु बाबू ने सोचा कि थोड़ा सा सबक़ पंडों को भी सिखाना चाहिए जो यहां आने वाले तीर्थ-यात्रियों को ठगते हैं। उन्होंने बड़े-बड़े पंडों को बजरे पर भोज का न्यौता दिया। बजरा प्रायः सभी जानते होंगे बनारस में दुमंज़िला नाव को कहते हैं। ऊपर की मंजिल पर रसिक लोग महफ़िलें सजाते हैं और नीचे चाकर लोग उनकी सेवा के उपादान सजाते हैं। पंडों से कहा गया कि भोर से लेकर सूर्यास्त तक आपको बजरे पर ही रहना है। आपका भरपूर आतिथ्य किया जाएगा। दिव्य भोजन दिया जाएगा। सूर्यास्त के बाद जब आप वापस जाएंगे तो अंगवस्त्र, दक्षिणा आदि से आपको सम्मानित भी किया जाएगा। पंडे अफरा-तफरी में चढ़ गए बजरे की ऊपर वाली मंजिल पर। प्रसन्न वदन, गोल तोंद, किलोल और आमोद। नाश्ते का समय बीत चुका था, लेकिन नीचे से पकवानों की सुगंधि आ रही थी। पंडितगण एक-दूसरे को सांत्वना देने लगे— भई बन रहा है, समय लगता है। धैर्य रखो, प्रतीक्षा करो। दोपहर होने को आई। भोजन नहीं लगा। अब तो पंडों की भूखी अंतड़ियां हाहाकार करने लगीं। किसी ने नीचे जाकर देखा तो पाया कि वहां न तो कोई पकवान था न कोई खाने-पीने का सामान था। एक भट्टी थी और एक पहलवान था। पहलवान एक लोटे से गर्म भट्टी के ऊपर घी के छींटे मार रहा था, जिसके कारण पकवानों जैसी सुगंध उठ रही थी। सारे के सारे कुपित। ये हमारे साथ क्या धोखा किया गया है? बजरा मोड़ो! मल्लाहों ने मना किया— बजरा सूर्यास्त से पहले नहीं मुड़ेगा। बाबू साहब की आज्ञा नहीं है। उन तोंदिल पंडों में से जो तैरना जानते रहे होंगे, कूद कर घाट पर पहुंच गए होंगे, लेकिन अधिकांश तो लूटना जानते थे, तैरना कहां जानते थे।
सूर्यास्त के समय भूखे ब्राह्मणों को जब घाट पर लाया गया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने उनके आगे दंडौती की और कहा कि आपने कभी ये सोचा है कि हमारे नगर में दूर-दूर से आने वाले यात्रियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। आप लोग उन्हें ठग लेते हैं। वे इस योग्य भी नहीं रहते कि वाहन का खर्च उठा सकें। उनके पास अन्न के दाने भी नहीं होते। भूखे दो-दो तीन-तीन दिन यात्रा करते हैं, क्योंकि उनके पास धन नहीं होता। आपको सोचना चाहिए। आप उनसे उतनी ही दक्षिणा लें कि वे लौट कर वापस घर तो सकुशल जा सकें। और क्षमा करिएगा, ये दुस्साहस मैंने इसलिए किया, क्योंकि आज एक अप्रैल है। उसके बाद धीरे-धीरे भारत में भी एक अप्रैल का दिन लोकप्रिय हुआ। फिल्मी गाने तक आए ‘एप्रिल फूल बनाया, तो उनको गुस्सा आया। मेरा क्या कुसूर, जमाने का क़ुसूर, जिसने दस्तूर बनाया।’ धीरे-धीरे दस्तूर बना। लोग एक अप्रैल मनाने लगे। लेकिन मेरे ख़्याल से एक अप्रैल पूरे साल मनाया जाना चाहिए। यह नासमझी की समझदारी दिखाने का दिन है। मूर्ख बनाने का नहीं, समाज सुधार का दिन है। अहंकार के परिहार का दिन है।
एक अप्रैल नए आर्थिक वर्ष को शुरू करता है। इकत्तीस मार्च तक हम सब चीजें समेट देते हैं, बही-खाते लपेट लेते हैं। नए सिरे से नए बजट के साथ, अपने नए फण्ड्स के लिए नए फण्डे शुरू कर देते हैं। जो लड़कियां ज़्यादा समझदारी दिखाते हुए शादी में विलम्ब कर रही हैं, जल्दी कर लें। लहंगे बहुत महंगे होने वाले हैं।
सारी परेशानियां होती हैं समझदारी से। ये राजनेता बहुत ज्यादा समझदारी दिखाते हैं। अमर सिंह ने जरूरत से ज्यादा समझदारी दिखा दी। उनकी समझदारी ने उनको कहीं का नहीं छोड़ा। मुलायम सिंह ने भी समझदारी दिखा दी। वे भी न दिखाते। नासमझी से काम लेते तो मौहब्बत की गलबहियां बनी रहतीं। न ये टूटते, न वे फूटते और न तुम्हें तीसरे मोर्चे वाले लूटते। कपिल सिब्बल को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने ज़्यादा समझदारी दिखाए बिना कह दिया कि देश को आठ सौ विश्वविद्यालय और पैंतीस हज़ार कॉलिज चाहिए। बजट देखें बजट देखने वाले, अपनी ज़रूरत बताने में क्या जाता है।
साहित्यकार समझदारी दिखाने लगते हैं तब भी दिक़्क़त होती है। भैया पुरस्कार मिल रहे हैं, ले लो। अब तुम ज्यादा ऊंची छोड़ोगे, पुरस्कार से बड़े बनोगे तो कौन तुम्हें बड़ा मानेगा? समझदारी के कारण छोटी-छोटी बातों पर बिदक जाते हो। अरे भैया अपनी नासमझी और प्रेम बनाए रखो। पहली अप्रैल को बदनाम मत करो। यह मूर्ख बनाने का नहीं, मूर्खता से बचने का दिन है। स्वतः उच्छ्वास जो दिल से निकलते हैं, जो हृदय की पुकार होती है, उसका दिन है। यह स्वयं से छेड़खानी का दिन है। चारों खाने चित्त होकर गिरने के बाद चौपट हो जाओ इससे अच्छा है अपने चित्त को चौखटे में रखो। चौखटा ठीक रहेगा, मुस्कराता रहेगा।
पड़ौस में एक-दूसरे से दुआ-सलाम नहीं होती। बातचीत नहीं होती, क्योंकि हर आदमी अपने आपको समझदार मानता है। मेरी गाड़ी तो यहीं पार्क होगी, दूसरे ने अगर यहां पार्क कर दी तो देख लूंगा। अरे भैया थोड़ी देर खड़ी रह लेने दे उसकी गाड़ी। अपनी नासमझी दिखा कि मैंने देखा ही नहीं कि तेरी गाड़ी मेरी पार्किंग में है। तू किसी दूसरी जगह पार्क कर ले। वह तो कह देगा कि जी आज पहली अप्रैल है। अब दो जवाब उसको। तुमने अगर जवाब में गुस्सा दिखाया तो मूर्ख कहलाओगे। मुस्कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। ठीक है, ठीक है, आज पहली अप्रैल है। खड़ी कर ले अपनी गाड़ी। कल दूसरी जगह लगा लेना। अब कल की कल देखी जाएगी। दो अप्रैल को भी तो एक अप्रैल मना सकते हैं। एक अप्रैल तो ऐसा दिन है जो पूरे साल मनाना चाहिए।

Tuesday, March 23, 2010

येन-केन-प्रकारेन तेन त्यक्तेन

चौं रे चम्पू! कह्यौ करैं कै कबी लोग पइसा कूं हाथ लगामैं, जे अच्छी बात नायं, तेरौ का खयाल ?
एक पुरानी घटना बताता हूं। मंच के कुछ कवियों के साथ कहीं जा रहा था। सामने से सकुचाया सा एक आदमी आया। कुछ बोले नहीं, बस जेबें टटोले। मैंने पूछाकिस संशय में खड़े हो? किस विषय पर बात करना चाहते हो? ये सब गुणी लोग हैं, पूछो! वह बोलाविषय-विषय कुछ नहीं है, मुझे तो ये पांच सौ का नोट भुनाना था। मुझे हंसी आई।
हंसी चौं आई रे?
आई तो आई! मैंने उससे कहा कि भैया ये सब मंच के कवि हैं, ये नोट नहीं भुनाते हैं, नोटों की ख़ातिर विषय भुनाते हैं। वह तो चला गया, लेकिन मेरा ती कवियों के दिल में ऐसा धंसा कि सब के सब नाराज़। क्या बात कर दी? ये हमारा अपमान है। अकिंचन जी ने आंखें रेरीं, पैसा लेने में क्या बुराई है? कौन नहीं लेता? किसने अतीत में नहीं लिया? कविगण राजसी जीवन बिताते थे। चन्दबरदाई, भूषण और ग़ालिब सम्मान और मेहनताना पाते थे। भारतेन्दु और प्रसाद रईसी महफ़िलें सजाते थे। निराला भी कविसम्मेलनों से पारिश्रमिक लाते थे और अपनी मर्ज़ी से लुटाते थे, पर कभी पैसों की ख़ातिर विषय नहीं भुनाते थे। जो लिखते थे डंके की चोट लिखते थे। विषय बनाते थे उनको, जो समाज में खोट दिखते थे। बिना डरे जो लिख दिया, सो लिख दिया। इस पर अनमोल जी बोले, सब कुछ सबको दिखता है, पर वह सही नहीं है जो दूसरों की मर्ज़ी से, दूसरों की शर्तों पर और दूसरों के कहे पर बिकता है।
अनमोल जी नैं अनमोल बात कही।
कवि पर दबाव बनाया जाता है चचा कि वह त्यागी रहे। पैसे से कोई सरोकार रखे। समाज का हर वर्ग तो पैसा कमाने के लिए बना है, तू भूखा मरने के लिए है। भूखा नहीं रहेगा तो भूख पर कविता कैसे लिखेगा। उसे ईर्ष्याओं के कारण त्याग सिखाया जाता है। जब मैंने गाड़ी ख़रीदी थी सब राख हो गए, मेरे मन को कष्ट हुआ। अब तो उन सबके पास गाड़ियां हैं। अब गाड़ी ईर्ष्या का कारण नहीं है, कुछ अन्य कारण बन गए हैं। कवि हृदय पर हमेशा से आघात होते आए हैं। केदार नाथ सिंह जी के शलाका सम्मान अस्वीकार करने के मामले को ही लीजिए।
अख़बार में पढ़ी तौ हती, का भयौ?
उन्होंने लिखित स्वीकृति देकर सम्मान स्वीकार किया। बाद में अस्वीकार कर दिया। उनसे फोन पर बात हुई। उन्होंने बताया कि इतने फोन आए कि वे दबाव में गए। वे अपनी बीमार वृद्धा मां की सेवा के लिए कोलकता गए हुए थे, और भाई लोग थे कि इधर से लगे हुए थे दबाव बनाने में और उन्हें भी बीमार बनाने में। कहा होगा कि तुम दो लाख रुपए में बिक गए। तुम्हें साहित्य माफ नहीं करेगा। तुम्हें समाज माफ नहीं करेगा। अब बेचारे केदार जी क्या जानें कि समाज उनको कितना चाहता है, समाज उनको सिर माथे उठाता है और कुछ लोग हैं जो फ़लीता लगाते हैं, दिमाग ख़राब करते हैं। उन्होंने फोन पर यह भी बताया कि जो पत्र उन्होंने हिन्दी अकादमी को भेजा है उसमें अकादमी के प्रति कहीं भी असम्मान का भाव नहीं है।
सो तौ ठीक लल्ला, पर दबाए में चौं आए?
चचा हर ज़माने में ऐसा होता आया है। कवि बस पैसा ले। पैसे के आधार पर उसको लानत, मलामत दी जाए। उसे भोगवादी बता दिया जाए। कवि हृदय विचलित हो जाता है। ईशावास्योपनिषद में कहा गया हैतेन त्यक्तेन भुंजीथा:’, मतलब कि त्यागपूर्वक भोग करो। भोग का आनन्द त्याग में है। केदार जी ने सोचा होगा कि त्याग कर दो तो शायद उसका भोग ज्यादा होगा। चचा गेन त्यक्तेन भुंजीथा:, गेन करके त्याग दो। येन-केन-प्रकारेन त्यक्तेन भुंजीथा: त्यक्तेन वाली मुद्रा बना ली, और स्वयं को गेन करने से वंचित करने लगे। होना चाहिए अगेन चिन्तयेन भुंजीथा: गेन-वेन की बात छोड़ कर अगेन सोचो केदार जी, सोचो! प्यार करने वाले लोग ज़्यादा बड़े हैं या अपनी मतलबपरस्ती के कारण दबाव में लाने वाले लोग ज़्यादा बड़े हैं। कौन बड़ा है?
तू चौं कहि रह्यौ ? खुद सोचैं केदार जी!

Wednesday, March 17, 2010

मौहब्बत कोई ठुकराने की चीज़ है

—चौं रे चम्पू! हमाई बगीची-कमैटी नै सोची ऐ कै तोय बगीचीसिरी की उपाधी दई जाय, तोय कोई आपत्ती तौ नायं?
—आपत्ति क्यों होगी चचा? लिख कर दिए देता हूं।
—लिखे कौ कोई भरोसा नायं रे! कल्ल कूं पलट जाय कै बगीची के पुरस्कार में का धरौ ऐ, मैं तौ उद्यान-पीठ कौ पुरस्कार लुंगो। हमाई बगीची की तौ थू-थू है जायगी।
—चचा, मैंने आज तक कोई सम्मान नहीं ठुकराया। मौहब्बत कोई ठुकराने की चीज है? आप बगीचीश्री बना कर मेरी अवहेलना तो नहीं कर रहे न! आपने मेरे प्रति अनास्था तो नहीं जताई! ज़िल्लत, तिरस्कार, तौहीन, मानहानि, अवमानना, बेअदबी और फ़जीहत तो नहीं कर रहे! मैं क्यों स्वीकार नहीं करूंगा? जो देंगे, सो सिर माथे! लेकिन इतना बता दूं चचा, सम्मान मैंने कभी ख़रीदा नहीं है। जो मान देता है, ज़िम्मेदारी भी बढ़ा देता है कि मेरे पास उस सम्मान के योग्य ज्ञान भी हो। आजकल लोग ख़ुद को सम्मानित कराने के लिए पचास तरह के गुंताड़े बिठाते हैं। आप तो आशीर्वाद दें कि जीवन में कभी ऐसा काम न करूं जो अपमान दे। मेरी पत्नी ने एक बार कहा था—
मैंने समझाया था, तुमने माना नहीं
अब सुनूंगी मैं कोई बहाना नहीं।
कुछ उठाने की ख़ातिर झुके ठीक है,
पर क़लम अपनी नीचे गिराना नहीं।
—बहूरानी समझदार ऐ! जे बता, तैनैं कबहुं कोई सम्मान लौटायौ ऊ ऐ का?
—ना चचा ना! मैंने कभी कोई सम्मान नहीं लौटाया। सम्मान देने वाला इसलिए सम्मान देता है कि उसके मन में आपके प्रति आदर-भाव है। वह आप में आस्था रखता है। आपकी इज़्जत करता है, लिहाज़ करता है। आपके प्रति श्रद्धा और समादर की भावना है उसके मन में। सारी भीड़ में से उन्हें आपका चेहरा दिखा। उन्होंने नवाज़ा, मैंने स्वीकार किया।
—तो लल्ला जे बता, सम्मान ठुकराइबे वारे की का मानसिकता होय?
—हवा और हंसी में अनीति घुसी हुई है। आदमी अपना लाभ-अलाभ देखता है। सम्मान अगर घोषित हो गया तो एक प्रकार से मिल ही गया, लेकिन यदि अस्वीकार कर दिया तो आप अपनी और अपने गढ़े हुए समाज की नज़र में और ज्यादा सम्मानित हो गए। दोहरा-तिहरा सम्मान हो गया। बहाने कुछ भी बना लो लेकिन मैं समझता हूं कि ठुकराने का निर्णय, अधिक लाभ उठाने की कामना से उत्पन्न होता है। ले भी लिया और नहीं भी लिया। लेकर बड़े हो गए, नहीं लेकर और बड़े हो गए।
—तेरे हिसाब ते हर सम्मान स्वीकार कन्नौ चइऐ?
—मैंने ऐसा नहीं कहा चचा। कुछ संस्थाएं योग्य और नामी व्यक्ति को सम्मानित करके खुद को सम्मानित करती रहती हैं। यह भी होता है। ऐसी संस्थाओं को चलाने वाले सोचते हैं कि साहित्यकार कलाकार सम्मान के भूखे होते हैं, दौड़े-दौड़े चले आएंगे।
—फिर ठुकराइबे में का हर्ज ऐ?
—अब यह तो ये लोकतंत्र है चचा! अपने-अपने विवेक की बात है। बहुतों ने पद्मभूषण ठुकरा दिया, पद्मश्री ठुकरा दी। पर मैं दूसरी बात कह रहा हूं। उन लोगों की जो अपनी नज़र में अपने आपको ज्यादा बड़ी संस्था मानते हैं और सम्मानों और सम्मान देने वालों का स्वीकृति देने के बावजूद अनादर करते हैं। वे उन भावनाओं रौंद देते हैं जो आपके प्रति शुद्ध पद्धति से जन्मीं। अरे, जिन्होंने आपको किसी भी रूप में पूजनीय, माननीय, मोहतरम, वन्दनीय, वरेण्य माना, आपके सत्कार्यों को सम्मान के योग्य पाया, आपकी स्तुति गाई, उनका अपमान कैसे कर सकते हो? एक बार ठुकरा दोगे तो दूसरे भी सौ बार सोचेंगे कि हमने अगर इसको महान बना दिया तो वह तुम्हें बौना सिद्ध करने पर आमादा हो जाएगा।
—कछू उकसाइबे वारे ऊ तौ हौंय लल्ला।
—बिल्कुल होते हैं चचा। निहित स्वार्थी लोगों के बहकावे में आकर उन लोगों के प्यार को ठुकरा देते हैं जिन्होंने आपको सिर माथे चढ़ाया। कहां तक रोओ। इसलिए सम्मान के लेने और देने की चिंता छोड़ कर आराम से बांह का तकिया बना कर सोओ। बाई-द-वे बगीचीश्री कब दे रहे हो? निश्चित तिथि बताओ। बहुत बिज़ी हूं आजकल। बगीचीश्री का कोई ड्रेस कोड हो तो वो भी बता दो। लंगोट पहन कर भी आ सकता हूं। उसे अश्लील तो नहीं मानोगे?

Wednesday, March 10, 2010

रोमन से मत रो मन

—चौं रे चम्पू! पिछली बात आगे बढ़ामैं का?
—कौन सी बात चचा?
—अरे यूनिकोड वारी। कोडिंग-एनकोडिंग का बताई तैनैं? यूनिकोड नै का कियौ?
—यूनिकोड ने सबसे बड़ा काम यह किया कि हर महत्वपूर्ण भाषा के लिए मानक निर्धारित करते हुए एक निश्चित एनकोडिंग प्रणाली विकसित की। यह एनकोडिंग प्रणाली कोई नई बात नहीं है। दस साल से चलन में है। लोगों को अभी तक इसका ज्ञान ही नहीं है कि यूनिकोड क्या है, और उसने क्या कर डाला है?
—तू ई समझा!
—ज़रूर चचा, ज़रूर। कितने अण्डे, कितने डण्डे यानी कितने ज़ीरो कितने एक, ये हुई कोडिंग और उनसे बनेगा क्या, ये हुई एनकोडिंग। मोटी-सी बात है। यूनिकोड की इस मानक एनकोडिंग प्रणाली से अगर मैं इंटरनेट पर किसी भी कीबोर्ड से हिन्दी में कुछ लिखता हूं तो संसार के सारे कम्प्यूटरों में हिन्दी ही खुलेगी। पहले ऐसा नहीं होता था। पहले हम ‘इस्की’ प्रणाली में विकसित किसी फ़ॉण्ट में कोई लेख भेजते थे तो हमें साथ-साथ वह फ़ॉण्ट भी भेजना पड़ता था। बिना उस फ़ॉण्ट के लेख खुलता नहीं था। कचरा दिखाई देता था। बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था, चचा। या फिर लेख को स्कैन करके या फ़ोटो खींच कर उसकी भारी इमेज फाइल बनाओ।
—जे इमेज फाइल का ऐ रे?
—चचा, कम्प्यूटर में हर चीज की बनती हैं फाइलें। जो पाठ की होती हैं उनको टैक्स्ट फाइल कहते हैं, जो चित्रों की होती हैं उन्हें इमेज फाइल कहते हैं, जो ध्वनियों की फाइल होती हैं, उन्हें ऑडियो फाइल कहते हैं। ये सब डण्डे और अण्डे का ही गणित है चचा। सब कुछ बनता उनसे ही है।
—कमाल है! डण्डा और अण्डा ते ई तस्वीर दिखै और डण्डा और अण्डा ते ई पाठ आ जाय!
—यही तो ठाठ है चचा! हम बात कर रहे थे अपनी हिन्दी की। सरकारी स्तर पर सीडेक नाम की कम्पनी ने ‘जिस्ट’ तकनीक से हिन्दी का काफी काम किया था। कुछ सरकारी कार्यालयों में अभी भी वह तकनीक प्रयोग में लाई जाती है, लेकिन अब तो सरकार ने भी यूनिकोड को अपनाने के आदेश दे दिए हैं। आज कम्प्यूटर और इंटरनेट पर स्थान की कोई कमी नहीं है। अनंत सूचनाओं के लिए अनंत स्थान है। नई पीढ़ी के बच्चे-बच्चियां जिन्हें प्राथमिक शालाओं में हिन्दी सीखने को नहीं मिली और वे लोग जो हिन्दी बोलते तो हैं, लेकिन हिन्दी लिखने से भागते हैं, उनके लिए यूनिकोड एक वरदान है। भारत में कम्प्यूटर का इस्तेमाल करने वाला लगभग प्रत्येक व्यक्ति रोमन कीबोर्ड को जानता है।
—सो तो है।
—हिन्दी टाइपिंग जानने वालों को रैमिंग्टन कीबोर्ड आता है और सरकारी कार्यालयों में हिन्दी में काम करने वाले रैमिंग्टन के अलावा इंस्क्रिप्ट कीबोर्ड भी जानते हैं, लेकिन आज हिन्दी के फोनेटिक कीबोर्ड से रोमन अक्षरों द्वारा भी देवनागरी प्राप्त की जा सकती है। जैसे आजकल मोबाइल पर लोग रोमन लिपि में अंग्रेजी वर्णों में हिन्दी लिखते हैं और पढ़ने वाले को रोमन लिपि में ही हिन्दी का संदेश समझ में आ जाता है। यूनिकोड ने उससे आगे का काम कर दिया।
—का मतलब?
—टाइप करो अंग्रेजी में और पाओ देवनागरी हिन्दी। हिन्दी ध्वन्यात्मक भाषा है न चचा! जैसी बोली जाती है, वैसी लिखी जाती है। आज यदि किसी को हिन्दी की पारंपरिक टाइपिंग नहीं आती है तो वह बड़े मज़े से रोमन कीबोर्ड पर देवनागरी लिपि में लिख सकता है। विदेशी कम्पनियों ने भारत के बाजार में हिन्दी को एक उपभोक्ता सामग्री के तौर पर देखा। अब गूगल, याहू, एमएसएन जैसे पोर्टलों पर और इंटरनेट ब्राउज़र्स पर हिन्दी आराम से लिखी जा सकती है।
—अंग्रेजी ते पिंड तौ नायं छूटौ ना!
—किसी भाषा से नफ़रत क्यों करें? अंग्रेज़ी भी हमारी है। यदि वह हिन्दी प्राप्त कराती है और व्यापक प्रचार-प्रसार में सहायक है तो उसे धन्यवाद देना चाहिए। असल बात तो यह है कि अंग्रेजी में टाइप करने के बावजूद स्क्रीन पर दिखाई तो हिन्दी ही दे रही है। अकेली हिन्दी नहीं भारत की सारी महत्वपूर्ण भाषाएं, यहां तक कि दाएं से बाएं दिशा में लिखी जाने वाली उर्दू भी। इसलिए रोमन से मत रो मन। कैसे भी लिख, हिन्दी लिख, उर्दू लिख। पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगू , उड़िया, बांग्ला कुछ भी लिख। तुझे अपनी भाषा और लिपि से प्यार है, तो आज यूनिकोड की मेहरबानी से संभावना अपार है।

Tuesday, March 09, 2010

टें बोल दो ना!

बच्चे ने रट लगा दी,
बार-बार कहे-
दादी!
तोते की तरह
टें बोलकर दिखाओ!

दादी भी अड़ गई-
क्यों बोलूं पहले ये बताओ?

आख़िरकार बच्चे ने राज़ खोला
बड़ी ही मासूमियत से बोला-
कल रात जब
मैं झूटमूट को सो रहा था,
तब पापा ने
मम्मी से कहा था
कि अम्मा जब
टें बोलेगी तो
ख़ूब सारे रुपए मिलेंगे,
फिर हम
ये घर बेच के
नया घर लेंगे।
दादी ने किसी तरह
रोक लिया रोना,
बच्चा ज़िद कर रहा था-
अब तो टें बोल दो ना!

देर कर दी

नदी में डूबते हुए एक आदमी ने
पुल पर चलते आदमी को देखकर
आवाज़ लगाई- बचाओ।

पुल पर चलते आदमी ने
नीचे रस्सी गिराई
और कहा- आओ।

लेकिन डूबता हुआ आदमी
रस्सी पकड़ नहीं पा रहा था,
रह रह कर चिल्ला रहा था-
मैं मरना नहीं चाहता
बड़ी मंहगी ज़िंदगी है,
कल ही तो
ए.बी.सी. कंपनी में
मेरी नौकरी लगी है।

इतना सुनते ही
ऊपर वाले आदमी ने
अपनी रस्सी खींच ली,
और उसे डूबकर मरता देख
अपनी आंखें मींच लीं।

और दौड़ता-दौड़ता
ए.बी.सी. कंपनी आया
हांफते-हांफते उसने
अधिकारी को बताया-
देखिए,
अभी-अभी आपका एक आदमी
डूबकर मर गया है
और इस तरह
आपकी कम्पनी में
एक जगह
ख़ाली कर गया है।
लीजिए, मेरी डिग्रियां संभालें,
बेरोज़गार हूं, मुझे लगा लें।

अधिकारी हंसते हुए बोला-
दोस्त, तुमने देर कर दी
अभी दस मिनिट पहले
हमने ये जगह भर दी।
और इस नौकरी पर हमने
उस आदमी को लगाया है,
जो उसे धक्का देकर
तुमसे पहले यहां आया है।

Tuesday, March 02, 2010

अण्डा, डण्डा और हिन्दी का फण्डा

—चौं रे चम्पू! तू भौत हल्ला मचायौ करै, यूनिकोड यूनिकोड। जे यूनिकोड है का बला?
—चचा, इसको बला मत कहना। ये कर रहा है, हमारा, हमारी हिन्दी का और हमारे भविष्य का भला। यूनिकोड भाषाओं के लिए एक महागोद है, जिसमें संसार भर की तमाम महत्वपूर्ण भाषाएं आमोद कर रही हैं।
—तो जे बनायौ कौन्नै? है का चीज़? कम्प्यूटर तौ अंग्रेजी में काम करैं।
—बहुत ग़लत सोचना है आपका। जानकारियों के अभाव में, जैसा आप सोचते हैं, ऐसा बहुत सारे लोग सोचते हैं। दरअसल, कम्प्यूटर कोई एक भाषा नहीं जानता। सिर्फ अंग्रेज़ी जानता हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है। वह तो केवल दो चीज़ें जानता है— एक अण्डा और एक डण्डा।
—अच्छा भैया! अण्डा और डण्डा! अब कछू खोल कै बता मेरे पण्डा।
—चचा! अण्डा माने शून्य, जिसका आविष्कार हमारे देश ने किया है, ऐसा बताया जाता है। डण्डा माने एक की संख्या। कम्प्यूटर केवल इन दो को जानता है। ज़ीरो और एक। इन्हीं के गणित से सारी चीज़ें बन जाती हैं। अण्डे कितने भी हो सकते हैं और डण्डे भी कितने ही हो सकते हैं। आगे-पीछे हो सकते हैं। चार अण्डे आए फिर एक डण्डा आया। दस डण्डे आए फिर एक अण्डा आया। ज़ीरो और वन के कॉम्बिनेशन से बनती हैं सारी चीज़ें। भाषाएं, चित्र, ध्वनियां और चलचित्र, सब कुछ। हर क्षेत्र के सारे काम करते हैं ये अण्डा और डण्डा, यही है कम्प्यूटर का बेसिक फण्डा।
—अच्छा जी! और यूनिकोड?
—यूनिकोड का संबंध भाषाओं से है। दरसल, यूनिकोड कन्सॉर्शियम नाम का एक स्वयंसेवी संगठन है जिसका इरादा फायदा कमाने का नहीं है। लगभग तेईस साल से कम्प्यूटर विशेषज्ञ भाषाओं से जुड़े अनुसंधान कार्य में लगे हुए हैं। यह संगठन चाहता है कि संसार की सभी महत्वपूर्ण भाषाओं के हर वर्ण के लिए अण्डों और डण्डों की संख्या निर्धारित कर दी जाए। यूनिकोड स्टैंडर्ड बना दिया जाए। भाषाओं का मानकीकरण कर दिया जाए। एक निश्चित एनकोडिंग प्रणाली विकसित कर दी जाए।
—सो तो ठीक ऐ, फ़ायदा नायं कमामैं, तौऊ कछू खर्चा तौ आतौ होयगौ। पइसा कहां ते आवै?
—संगठन के सदस्यों से। संसार भर में इसके सदस्य हैं। व्यक्ति भी और संस्थाएं भी। दुनिया की जितनी भी महत्वपूर्ण भाषाएं हैं उनके लिए उन्होंने एनकोडिंग प्रणाली विकसित की। कितने अण्डे और कितने डण्डे, इन्हीं के गणित से चलती है कोडिंग और एनकोडिंग प्रणाली। यह प्रारंभ से निश्चित है कि कितने अण्डे और कितने डण्डे से अंग्रेजी का ‘ए’ बनेगा। क्योंकि अंग्रेजी का कीबोर्ड वही का वही चला आ रहा है, जो पहले टाइपराइटर के साथ बना होगा। लेकिन यूनिकोड स्टैंडर्ड से पहले तक यह निश्चित नहीं था कि कितने अण्डे और कितने डण्डे से हिन्दी का ‘अ’ बनेगा। उससे पहले हमें आधारित रहना पड़ता था अंग्रेजी पर। इसीलिए लोगों को आज भी भ्रम रहता है कि कम्प्यूटर सिर्फ अंग्रेजी जानता है।
—अंग्रेजी पै आधारित कैसै रए?
—हम क्या करते थे कि अंग्रेजी के जो लिपि-चिन्ह थे उनके ऊपर अपनी भाषा के वर्णों को चिपका लिया करते थे। उसी तरह के टाइपराइटर रैमिंग्टन कम्पनी ने बना दिए।
—वाह रे अंग्रेज तेरौ टाइपराइटर! मारौ कहीं पर लगै वहीं।
—हां चचा! टाइपराइटर तो लोहे का था। अंग्रेजी वर्णों की जगह हिन्दी वर्ण ढाल लिए, लेकिन कम्प्यूटर जब कोई वर्ण छापता है तो टाइपराइटर या छापेखाने की तरह ठप्पा या छापा थोड़े ही मारता है, वहां तो सॉफ़्टवेयर काम करते हैं, जो अण्डे और डण्डे से बनते हैं। जिससे चलती है एनकोडिंग प्रणाली। कम्प्यूटर आया तो हमने अंग्रेजी वाली ही अपना ली। जिसे ऐस्की प्रणाली कहते हैं। भारतीय भाषाओं के लिए इसका नाम हमने रख दिया इस्की। यानी अगर हम अंग्रेजी में ‘डी’ टाइप करंगे तो ‘डी’ छपेगा, लेकिन हमने इस्की प्रणाली में कम्प्यूटर को हिन्दी के लिए यह आदेश दिए कि अगर हम ‘डी’ दबाएं तो ‘डी’ मत दिखाना, उसकी जगह ‘क’ दिखाना। ऐसी प्रोग्रामिंग कर दी। आ तो गई हिन्दी पर अंग्रेजी के जरिए आई। ये थी फॉण्ट पर आधारित इस्की प्रणाली।
—वाह रे तेरी इसकी, उसकी, जानै किस-किसकी प्रणाली?
—इसकी, उसकी, जाने किस-किसकी नहीं, चचा! उड़ाओ मत मेरी खिसकी। न इसकी न उसकी। ‘इस्की’ का मतलब है इंडियन स्टैंडर्ड कोड फ़ॉर इंफ़ॉर्मेशन इंटरचेंज। यह विकसित हुआ था ‘एस्की’ से। यानी, अमेरिकन स्टैंडर्ड कोड फ़ॉर इंफ़ॉर्मेशन इंटरचेंज से। यूनिकोड ने इस बंधन से आज़ादी दिला दी।
—जे बात थोरी-थोरी समझ में आई। आगे की बात रुक्कै करियो। चाय पीबैगौ?

Monday, March 01, 2010

होली पर विशेष

होरी पै महंगाई

दीखै उजलौ उजलौ अभी, निगोड़े पर र र र,
दूंगी सान कीच में कानµमरोड़े अर र र र।
कै होरी सर र र र।
बन गई महंगाई इक लाठी, तन पै कस कै मारी रे
बढि़ गए दाम सबहि चीजन के, म्हौं ते निकसैं गारी रे।
होरी पै महंगाई आज दुखी है घर र र र।
कै होरी सर र र र।
दूल्हा बेच, रुपैया खैंचे, जामें हया न आई रे,
छोरी बारे के बारे में, जामें दया न आई रे।
पीटौ खूब नासपीटे कूं, बोलै गर र र र।
कै होरी सर र र र।
डारौ जात-पात कौ जहर, भंग जो तैनें घोटी रे,
नंगे कू नंगौ का करैं, खुल गई तेरी लंगोटी रे।
नेता बन मेंढक टर्रायं, टेंटुआ टर र र र।
कै होरी सर र र र।
छेड़ै भली कली गलियन में, जानैं भली चलाई रे।
तोकूं छोड़ गैर के संग भज गई तेरी लुगाई रे,
डारै दूजी कोई न घास, धूर में चर र र र।
कै होरी सर र र र।
भूली मूल, ब्याज भई भूल, दई दिन दून कमाई रे,
लाला ये लै ठैंगा देख, कि दिंगे एक न पाई रे।
बही-खातौ होरी में डार, चाहे जो भर र र र।
कै होरी सर र र र।
सासू बहू है गई धांसू, आंसू मती बहावै री,
घर ते भोर भए की खिसकी, खिसकी तेरी उड़ावै री।
बल बच गए मगर रस्सी तौ गई जर र र र।
कै होरी सर र र र।
गारी हजम करीं हलुआ सी, ललुआ लाज न आई रे,
तोकूं बैठी रोट खबाय, बहुरिया आज न आई रे।
नारी सच्चेई आज अगारी, पिट गए नर र र र।
कै होरी सर र र र।. .

होली पर विशेष

तू भी रह और महंगाई को भी रहने दे

कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जो कभी बासी नहीं होते, अच्छे-ख़ासे बने रहते हैं। पैंतीस साल पहले जब मैं डीटीसी की बसों में, झोला कंधे पर टांगे, यात्रा किया करता था, उन दिनों भी महंगाई बढ़ रही थी। आज भी उसकी बढ़त जारी है। बस में चढ़ते समय एक विचार ज़ेहन में आया था और कुछ लाइनें मैंने बस में ही गढ़ ली थीं—
बड़ी देर के बाद जब बस आई,
तो सारी भीड़
दरवाजे की तरफ धाई।
सब कोशिश कर रहे थे
इसलिए कोई नहीं चढ़ पा रहा था,
और पीछे खड़े एक आदमी को
बड़ा गुस्सा आ रहा था।
बोला--
अरे क्यों शर्माते हो
लुगाई की तरह,
चढ़ जाओ
चढ़ जाओ
महंगाई की तरह।

बस में धक्के खाते और धकियाते हुए तेज़ी से चढ़ना उस समय एक कौशल हुआ करता था, और महंगाई भी बड़े कौशल से चढ़ रही थी। अलग-अलग समय पर अलग चीजों के दाम बढ़ते रहे। मुई प्याज के बढ़ते दामों के कारण तो दिल्ली में सरकार ही बदल गई थी। उन दिनों मैंने प्याज का एक पहाड़ा लिखा था—

प्याज़ एकम प्याज़,
प्याज़ एकम प्याज़।

प्याज़ दूनी दिन दूनी,
कीमत इसकी दिन दूनी।

प्याज़ तीया कुछ ना कीया,
रोई जनता कुछ ना कीया।

प्याज़ चौके खाली,
सबके चौके खाली।

प्याज़ पंजे गर्दन कस,
पंजे इसके गर्दन कस।

प्याज़ छक्के छूटे,
सबके छक्के छूटे।

प्याज़ सत्ते सत्ता कांपी,
इस चुनाव में सत्ता कांपी।

प्याज़ अट्ठे कट्टम कट्टे,
खाली बोरे खाली कट्टे।

प्याज़ निम्मा किसका जिम्मा,
किसका जिम्मा किसका जिम्मा।

प्याज़ धाम बढ़ गए दाम,
बढ़ गए दाम बढ़ गए दाम।

जिस प्याज़ को
हम समझते थे मामूली,
उससे बहुत पीछे छूट गए
सेब, संतरा, बैंगन, मूली।

प्याज़ ने बता दिया कि
जनता नेता सब
उसके बस में हैं आज,
बहुत भाव खा रही है
इन दिनों प्याज़।

प्याज के साथ घर में सब्जियों में भी कटौती होने लगी। पप्पू अपने टिफिन के लिए परेशान रहने लगा कि कहां तो मम्मी चार-चार तरह की चीजें रख कर स्कूल भेजा करती थी, अब अचार रखने में भी समस्या आने लगी। जो नजारा सामने आया वह एक कुंडलिया छंद में बदल गया—
मम्मी से कहने लगा, पप्पू हो लाचार,
तुमने मेरे टिफिन में रक्खा नहीं अचार।
रक्खा नहीं अचार, रोटियां दोनों रूखी,
उतरी नहीं गले से मेरे, सब्ज़ी सूखी।
होली पर मां की आंखों में आई नम्मी,
टिफिन चाट गई सुरसा, महंगाई की मम्मी।

जब-जब सरकार को नीचा दिखाना होता है या चुनाव आना होता है तब महंगाई ऐजेण्डे में कूद कर सबसे ऊपर जा बैठती है। बढ़ी महंगाई के कारण आम आदमी को राहत देने के लिए लुभावने बजट बनाए जाते हैं। वह मौका भी होली का था जब मैंने पिछली सरकार के रहते चुनावों और बजट के समय एक कुण्डलिया छंद बनाया था--

गाई सबने आरती, हो गई जय जय कार,
दोऊ हाथ उलीच कर, खूब किया उपकार।
खूब किया उपकार, बजट है वोट-बटोरू,
ढोल नगाड़ों में गुमसुम गरीब की जोरू।
क्या कर लेंगे यदि अपनी सरकार न आई,
अगली गवरमैंट ही झेलेगी महंगाई।

बहरहाल फिर होली आ गई है। किस तरह का रोना? होली का त्यौहार है कुछ ऐसी स्थितियों का होना, जिसमें दुःख में सुख मनाओ, रोते-रोते भी गाओ। मौका ऐसा है कि जिसे भी गरियाना हो गाते हुए गालियां सुनाओ। सर र र र करती हुई गालियां उसके कान में अर र र र कर देंगी। सोचने को मजबूर तो करेंगी। तो आइए, बैठ जाइए। गाइए हमारे साथ सर र र र। ये सर र र र कहीं जोगीड़ा के रूप में, कहीं कबीरा के रूप में पूरे हिन्दी अंचलों में गाई जाती है। उठाइए ढोलक और हो जाइए तैयार। समझिए स्वयं को नारी। चलिए गाते हैं--

दीखै उजलौ उजलौ अभी, निगोड़े पर र र र,
दूंगी सान कीच में कान-मरोड़े अर र र र।
कै होरी सर र र र।

बन गई महंगाई इक लाठी, तन पै कस कै मारी रे,
बढ़ि गए दाम सबहि चीजन के, म्हौं ते निकसैं गारी रे।
होरी पै महंगाई आज, दुखी है घर र र र।
कै होरी सर र र र।

महंगाई बढ़ती है तो बाई प्रोडक्ट के रूप में दूसरी चीजें भी बढ़ जाती हैं। दहेज के रेट अकल्पनीय रूप से बढ़ रहे हैं। हमारे पास तो गाली गाने का मौका है—

दूल्हा बेच, रुपैया खैंचे, जामें हया न आई रे,
छोरी बारे के बारे में, जामें दया न आई रे।
पीटौ खूब नासपीटे कूं, बोलै गर र र र,
कै होरी सर र र र।

महंगाई ही बढ़ाती है जात-पांत की भावना। आप पूछेंगे ऐसा कैसे? हम बताते हैं आपको कि ऐसे—
डारौ जात-पांत कौ जहर, भंग जो तैनें घोटी रे,
नंगे कू नंगौ का करैं, खुल गई तेरी लंगोटी रे।
नेता बन मेंढक टर्रायं, टेंटुआ टर र र र,
कै होरी सर र र र।

सामाजिक संबंधों के साथ-साथ प्रेम संबंध भी दरकने लगते हैं। कभी प्रेमिका तो कभी प्रेमी दूसरी तरफ सरकने लगते हैं। ऐसे सरकने वाले तू भी सुन ले—

छेड़ै भली कली गलियन में, जानैं भली चलाई रे,
तोकूं छोड़ गैर के संग, भग गई तेरी लुगाई रे।
डारै दूजी कोई न घास, धूर में चर र र र,
कै होरी सर र र र।

उधार लेना बन जाता है मजबूरी, लेकिन चुकाना थोड़े ही है जरूरी। होलिका दहन के समय लाला के बहीखाते किस काम आएंगे। पहले ही बता दिया है, लाला सुन ले—

भूली मूल, ब्याज भई भूल, दई दिन दून कमाई रे,
लाला ये लै ठैंगा देख, कि दिंगे एक न पाई रे।
बही-खातौ होरी में डार, चाहे जो भर र र र,
कै होरी सर र र र।

अब अकेले की आमदनी से काम नहीं चलता। घर की नारियों को भी काम पर जाना होता है। बहु घर से निकलती है तो सासू का मनुआ रोता है। सासू तेरे लिए भी कुछ मीठे बोल हैं—

सासू बहू है गई धांसू, आंसू मती बहावै री,
घर ते भोर भए की खिसकी, खिसकी तेरी उड़ावै री।
बल बच गए, मगर रस्सी तौ गई जर र र र,
कै होरी सर र र र।
नारी काम पर जाए और नर घर बैठ कर मौज करे, ऐसे नजारे भी कम नहीं हैं। ऐसे लोगों की गाली पाचन शक्ति बड़ी प्रबल होती है, फिर भी कहने में क्या हर्ज है—

गारी हजम करीं हलुआ सी, ललुआ लाज न आई रे,
तोकूं बैठी रोट खबाय, बहुरिया आज न आई रे।
नारी सच्चेई आज अगारी, पिट गए नर र र र।
कै होरी सर र र र।

महंगाई स्वयं एक नारी है, पिटेगी कैसे? महिला सशक्तीकरण के दौर में महंगाई से घबराना नहीं है। दो ही तरीके हैं या तो लड़ो या ज़्यादा काम करो।

जो मेहनत करी, तेरा पेशा रहेगा,
न रेशम सही, तेरा रेशा रहेगा।
अभी करले पूरे, सभी काम अपने,
तू क्या सोचता है, हमेशा रहेगा।

और प्यारे जब तू ही नहीं रहेगा तो महंगाई कहां रहेगी, इसलिए अच्छा ये है कि तू भी रह और महंगाई को भी रहने दे।

Sunday, February 28, 2010

होली पर विशेष

होली के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर

दुनिया पहले हर पल बदलती थी अब पल के हजारवें हिस्से में भी बदलने लगी है। बदलाव आया है हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में। पहले हम हर चीज़ को भाव पक्ष कला पक्ष या कथ्य और शिल्प में बांट कर देखा करते थे। आजकल हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के रूप में देखते हैं। और ये हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर हमारे नैनों के सामने नैनो गति से बदल रहे हैं।
होली के हार्डवेयर के नाम पर हमारे पास बांस की बनी हुई पिचकारी हुआ करती थी, जिसको स्वयं अपने उद्यम से बनाया जाता था। बांस का फिट दो फिट का खोखला टुकड़ा लिया, बांस की मोटी खपच्ची में कपड़ा फिट किया। बांस की पाइप में एक तरफ किया छेद और बन गई पिचकारी। ऐसी पिचकारी मैंने खुद अपने बचपन में बनाई हैं। और मैं कोई प्रागैतिहासिक जीवाश्म तो हूं नहीं। माना कि पिछली सदी में आया हूं लेकिन इतना पुराना तो नहीं हुआ। संपन्न लोगों के पास पीतल की या लोहे की पिचकारियां होती थीं। देखते-देखते पिचकारी प्लास्टिक की हो गईं। गुब्बारे में आते-आते इलास्टिक हो गईं। रंग धार बनाकर छोड़े जाते थे, फिर गुब्बारे फेंक कर मारे जाने लगे। अब तरह-तरह की पिचकारियां चीन से बन कर आ रही हैं। बच्चे उनसे भी बोर हो गए। होली गेम्स के सॉफ्टवेयर अपने कम्प्यूटर पर डाउनलोड करके अकेले खेलते हैं। सबसे गलत है होली अकेले खेलना।
पिचकारी के साथ रंग भी हार्डवेयर का ही हिस्सा होते हैं। हार्ड ड्राइव और रैम में कैमिकलीय कलर आ गए हैं। बचपन में हम लोग टेसू के सूखे फूलों को पानी में भिगोते थे। वसंती-पीला शानदार रंग बनता था। उसकी महक में भी बड़ा मजा आता था। ठिठोली हार्डवेयर में कुछ नुकीली चीजें भी हुआ करती थीं। जैसे, सेफ्टीपिन को मोड़ा जाता था, उसमें धागा बांधकर, तार पर लटका कर किसी की भी टोपी में अटकाकर खींच लिया करते थे। फिर रंगों के लिए पैसे ऐंठ कर टोपी वापस की जाती थी। बड़ा आसान सा घरेलू हार्डवेयर था, जिसके लिए हमें कोरिया, चीन, जापान पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था। अपना प्रोसेस अपना प्रोसेसर।
एक और ध्वनि उत्पादक उपकरण बनाया करते थे— ‘बबकन्ना’। टीन के डिब्बे में छेद करके, उसमें गांठ लगी सुतली फंसा कर बैरोजा लगाने के बाद रेगमाल से खींचते थे। बबका देने वाला हार्डवेयर। किसी के भी पीछे, नितम्बों के पास, सुतली पर रगड़ते हुए रेगमाल खींच दो तो बड़ी तेज आवाज आती थी। व्यक्ति बबक जाता था। जब तक पल्टे तब तक बच्चे शोर मचाते हुए भाग लेते थे।
एक होता था ठप्पा हार्डवेयर। आलू आधा काट कर बनाया जाता था। चाकू से आलू को दो भागों में काट लेते थे। बड़ी सफाई से उस पर उल्टी लिपि में गधा लिखते थे। बारीक नक्काशी करके ठप्पा बना लेते थे। तह किए हुए पुराने कपड़े से नीली या काली स्याही का स्टैम्प पैड बनाते थे। किसी गली में छिप कर आगंतुकों की प्रतीक्षा करते थे। बड़ा मजा आता था किसी की कमीज पर ‘गधा’ ठप्पा लगाने में। आज आलू काट कर कार्विंग की इतनी मेहनत कौन करेगा, जब बाजार में बने बनाए चालू हार्डवेयर मिल जाते हैं, जो एक मिनट में आदमी को भालू बना देते हैं। पहले कितना भी रंग जाए, लेकिन रंगों के बीच में लिखा गधा नजर आता था। अब कैमिकल के गाढ़े रंगों में होली वाले दिन आदमी को पहचानना ही कठिन हो जाता है कि पड़ौसी है या पति।
होली हार्डवेयर प्रोद्यौगिकी में सॉफ्टवेयर चलते हैं नौद्यौगिकी के। नौद्यौगिकी, यानी नौ प्रकार के रसों के सॉफ्टवेयर, जो हर किसी के दिल के बाजार में उपलब्ध हैं। यह सॉफ्टवेयर तेजी से बदल रहे हैं। हार्डवेयर का मसला उतना संगीन नहीं है, जितना इन बदलते हुए सॉफ्टवेयरों का है।
होली पर हास्य का सॉफ़्टवेयर सबसे अच्छा है। खुद हंसिए, दूसरों को हंसाइए। श्रृंगार की रति का भी एक सॉफ्टवेयर चलता है जो कुदरत ने अपने करिश्मे से बनाया है। कामदेव ने उस पर बहुत मेहनत की है। अनंत काल की रिसर्च के बाद, शिव के द्वारा भस्म होने के बावजूद, यह सॉफ्टवेयर लगातार अपडेट हो रहा है। इस सॉफ़्टवेयर को कितनी बार करप्ट किया गया, कितनी बार हैक किया गया, इसकी फाइलें उड़ाने की कोशिश की गईं, लेकिन सर्वाधिक वेबसाइट इसी सॉफ़्टवेयर में बन रही हैं। इंटरनल इंटरनेट वाला यह सॉफ्टवेयर नैसर्गिक है। इसमें स्वर्गिक आनन्द तभी है जब इसका एक सर्ग ही हो। एक नर-नारी युगल तक सीमित रहे तो अच्छा काम करता है। प्रेम चौदस यानी वेलंटाइन डे अभी होकर चुका है उसके बाद होली के अवसर पर जिससे प्रीति रखते हों उसको ये सॉफ्टवेयर जरूर दे दें। दूसरों को भी बताएं कि अंतरंग नैटवर्किंग से डाउनलोड किया जा सकता है।
इधर कुंठा नाम का सॉफ्टवेयर ज्यादा चल पड़ा है। रति सॉफ्टवेयर के साथ कुंठा सॉफ़्ट्वेयर यदि आपने अपने हार्डवेयर में डाल लिया तो जीवन-कम्प्यूटर क्रैश हो सकता है। शांत, भक्ति, करुणा, ममता आदि ऐसे निरापद सॉफ्टवेयर ऐसे हैं जो पुरानी संचालन प्रणालियों वाले किसी भी हार्डवेयर में चल सकते हैं।
होली के सॉफ्टवेयर्स में कई बार अति उत्साह, ओज और जुगुप्सा के वायरस आ जाते हैं। ये तीनों वायरस आपकी होली की हार्डड्राइव को बरबाद करने वाले होते हैं। आप ज्यादा पी जाएंगे, टुल्ल हो जाएंगे, अति उत्साह दिखाएंगे, कपड़े फाड़ेंगे किसी के और वह आपके कपड़े फाड़ेगा, डराएंगे, उल्टियां करेंगे तो जाहिर है परेशानी होगी।
कपड़ा फाड़ू होली बिहार में खूब चलती है। लालू जी उसे बड़े प्रेम से मनाते हैं। ऐसा न हो कि कुर्ता फाड़ होली के समय आप अंग-फाड़ हो जाएं, इसलिए ऐसे सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते समय आपको अतिरिक्त सावधानी बरतने की ज़रूरत है। आप होली-भय नामक सॉफ्टवेयर अपने मित्रों के दिल के कम्यूटर के फोल्डर से रिमूव कर दीजिए। जो अभी तक सूखे बैठे हैं उनके होली-भय सॉफ्टवेयर परिवर्तित करते हुए, उसकी जगह होली-हास्य सॉफ्टवेयर डालिए। घर में बैठे रहने से क्या होगा? होली मेल-मिलाप का त्यौहार है, अकेले विलाप का नहीं। वाद-विवाद मिटा कर संवाद बढ़ाइए, गले मिलते हैं आइए।



होली पर विशेष



मेल मिलाप कि अकेले विलाप


कॉलोनी की बहुमंज़िला इमारतों के बीच बने पार्क की एक बेंच पर बैठे दो बुज़ुर्गों में से पहले बुज़ुर्ग ने कहा— ‘आज हमारी बातचीत का विषय क्या होगा?’ दूसरे ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया— ‘विषय विकार मिटाओ, होली की बात करो होली की। पहला बुज़ुर्ग मायूस मुद्रा में बोला— ‘चलो होली पर ही चर्चा कर लेते हैं।’ दूसरे ने निराशा में कहा— ‘चर्चा क्या करते हैं, आजकल होली पर लोग खुलकर खर्चा ही नहीं करते। पहले हम पर्चा बनाया करते थे, अपने कस्बे के नामी-गिरामी लोगों को शीर्षक-टाइटल दिया करते थे। आजकल न चर्चा है, न खर्चा है, न पर्चा है। होली को हम मेल-मिलाप का त्योहार मानते थे। अब वह अकेले विलाप का होकर रह गया है।’
‘तुम बड़ी निराशा भरी बातें करते हो यार! होली पर हुलास की बातें करो, उल्लास की बातें करो।’
‘हुलास और उल्लास तो तब आए जब कोई हम पर रंग डाले! इतनी देर से बैठे हैं, मलाल तो इस बात का है कि न किसी ने रंग डाला न गुलाल मला।’
दोनो बुढ़ऊ घर से निकल आये थे, क्योंकि उनकी औलादें होली के दिन भी अपने कारोबार में लगी थीं, घर के नौजवान कम्प्यूटर में आंखें गड़ाए हुए थे। कॉलोनी में दस पॉकेट हैं, हर पॉकेट में चार-चार ब्लॉक हैं। हर ब्लॉक ने अपनी होली का अलग-अलग आयोजन किया था। थोड़ी देर के लिए घर से निकलेंगे, रंग-गुलाल मलेंगे और जलेबी-कचौड़ी खाकर पन्द्रह मिनट में घर लौट आएंगे। इस तरह होली मन जाएगी।
‘अरे भैया, ये भी कोई होली है? अपने-अपने परकोटे में मना ली? आज मौका है सबसे मिलने का, उन सबको सुनाओ गाली, जिन्होंने पिछले साल किसी भी रूप में तुम पर तानी थी दुनाली। घर पर रहो तो लोगों को बुलाओ और सजाओ गुलाल और गुंजिया की थाली। दूर करो गिले-शिकवे। सूखे-सूखे रहने में क्या है, गीले-गीले रहो!’
‘क्या वक्त आ गया है बरख़ुरदार कि आज आदमी आदमी से बात करने में डरता है। पहले पूरा गांव, पूरा कस्बा, ढोल नगाड़े, खड़ताल-मंजीरे लेकर गली-गली घूमता था। लेकिन अब मिज़ाज बदल गया है। सोसायटी के लोग फुल वॉल्यूम में फिल्मी गाने लगाते हैं। दूसरों को शरीक नहीं करते। तरंग आई तो घर में ही नाचते गाते हैं। मनाते तो हैं त्योहार, लेकिन बदल गये हैं आचार-व्यवहार। महंगाई की मार भी उल्लास को पंचर कर देती है।’
दूसरे बुज़ुर्ग ने कहा— ‘चलो विषय बदलते हैं।’
‘क्यों बदलें विषय? सीनियर सिटीजन हो गए तो क्या जरूरी है कि सिर्फ दुख की बात करें। दुःख जीवन का स्थाई भाव नहीं होता। होली सुख का त्योहार है। इस महानगरीय जीवन शैली में हम कितने संकुचित होते जा रहे हैं। पड़ोसी के साथ भी होली खेलने में घबराते हैं। हां कुछ लोग हैं जो दमदारी से होली मनाते हैं, वे रंग डालने के बज़ाय रंगदारी ज्यादा दिखाते हैं।’
पार्क के दूसरे कोने में दूसरी बेंच पर दो नौजवान बैठे थे। एक चुप था दूसरा बोले जा रहा था। उसका मानना था कि हमारे संबंधों को कोई एक ओज़ोन लेयर बचाती थी। हम सारे देशवासी उसके कवच में झूमते गाते थे, त्योहार मनाते थे। अब व्यक्ति से लेकर देश तक जितनी भी ओज़ोन लेयर हैं उनमें छेद हो गए हैं। मौहब्बत की ऐसी पिचकारी चाहिए जो हर ओज़ोन लेयर को रिपेयर कर दे। वह बोले जा रहा था—

पति-पत्नी में बिलकुल नहीं बनती है, बिना बात ठनती है। खिड़की से निकलती हैं आरोपों की बदबूदार हवाएं, नन्हें पौधों जैसे बच्चे खाद-पानी का इंतज़ाम किससे करवाएं? होते रहते हैं शिकवे-शिकायतों के कंटीले हमले, सूख गए हैं मधुर संबंधों के गमले। नाली से निकलता है घरेलू पचड़ों के कचरों का मैला पानी, नीरस हो गई है ज़िंदगानी। संबंध लगभग विच्छेद हो गया है, घर की ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है।
सब्ज़ी मंडी से ताज़ी सब्ज़ी लाए गुप्ता जी तो खन्ना जी मुरझा गए, पांडे जी कृपलानी के फ्रिज को आंखों ही आंखों में खा गए। जाफ़री के नए-नए सोफे को काट गई कपूर साहब की नज़रों की कुल्हाड़ी, सुलगती ही रहती है मिसेज़ लोढ़ा की ईर्ष्या की काठ की हांडी।
सोने का सैट दिखाया सरला आंटी ने तो कट के रह गईं मिसेज़ बतरा, उनकी इच्छाओं की क्यारी में नहीं बरसता है ऊपर की कमाई के पानी का एक भी क़तरा। मेहता जी का जब से प्रमोशन हुआ है, शर्मा जी के अंदर कई बार ज़बर्दस्त भूक्षरण हुआ है। बीहड़ हो गई है आपस की राम राम, बंजर हो गई है नमस्ते दुआ सलाम। बस ठूंठ जैसा एक मकसदविहीन सवाल है- 'क्या हाल है?' जवाब को भी जैसे अकाल ने छुआ है, मुर्दनी अंदाज़ में- 'आपकी दुआ है।'
अधिकांश लोग नहीं करते हैं चंदा देकर एसोसिएशन की सिंचाई, सैक्रेट्री प्रैसीडेंट करते रहते हैं एक दूसरे की खिंचाई। खुल्लमखुल्ला मतभेद हो गया है, कॉलोनी की ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है।
बरगद जैसे बूढ़े बाबा को मार दिया बनवारी ने बुढ़वा मंगल के दंगल में, रमतू भटकता है काले कोटों वाली कचहरी के जले हुए जंगल में। अभावों की धूल और अशिक्षा के धुएं से काले पड़ गए हैं गांव के कपोत, सूख गए हैं चौधरियों की उदारता के सारे जल स्रोत। उद्योग चाट गए हैं छोटे-मोटे धंधे, कमज़ोर हो गए हैं बैलों के कंधे। छुट्टल घूमता है सरपंच का बिलौटा, रामदयाल मानसून की तरह शहर से नहीं लौटा।
सुजलां सुफलां शस्य श्यामलां धरती जैसी अल्हड़ थी श्यामा। सब कुछ हो गया लेकिन न शोर हुआ न हंगामा। दिल दरक गया है लाखों हैक्टेअर, परती धरती की तरह श्यामा का चेहरा सफेद हो गया है, गांव की ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है।
जंगल कटे का सरमाया है, और बाक़ी सीमेंट की माया है कि इमारतें हो रही हैं हट्टी-कट्टी, उनसे अमरबेल जैसी लिपटी हैं झोंपड़पट्टी। गुमसुम गौरैया नहीं गाती है प्रभातियां, दफ्तरी वन्य-जीवन में दुर्लभ हो गई हैं ईमानदार प्रजातियां। एडल्ट मूवी देखता है चिरंजीवी, संस्कृति को चर रहा है केबिल टी.वी.। ए.सी. और कूलर में खुलती नहीं हैं खिडक़ियां, जलाऊ लकड़ी का संकट है इसलिए जलाई जाती हैं लडक़ियां। लीपापोती के लिए थाने की मेहरबानी है, म्युनिसपैलिटी के निजी नल में रिश्वत का पानी है। ईमानदारी का अकाल पड़ गया है, उन्माद के उद्योग के प्रदूषित कचरे से सद्भाव की नदी का पानी सड़ गया है। सदाचार, दुराचार, शिष्टाचार, भ्रष्टाचार, इन सारे शब्दों में अभेद हो गया है, शहर की ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है।
काग़ज़ों पर खुद गई हैं नहरें, ड्रांइग-रूम में उठ रही हैं लहरें। राजनीति में सदाशय अनाथ है, चिपको आंदोलन कुर्सी के साथ है। इतने खोदे, इतने खोदे कि खो दिए राष्ट्रीय मूल्यों के पहाड़, पनप रहे हैं मारामारी के झाड़-झंखाड़। लाल सुर्ख़ बहती है हिंसा की नदी, ऐसे चल रही है इक्कीसवीं सदी।
अरे, ये कैसा वक्त आया है, मीडिया में एकता के अकाल की छाया है। हो रही है राष्ट्रीय सपनों की गैरकानूनी चराई, चल रही है धर्म के ठेकेदारों की चतुराई। नफरत रेगिस्तान की तरह छाती पर चढ़ रही है, आबादी का आंतक बढ़ रहा है और आतंक की आबादी बढ़ रही है। भावनाओं का आवेग प्रदूषित हो गया है, आंखों तक का पानी दूषित हो गया है।
'हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई, आपस में हैं भाई-भाई।' सचमुच हैं भई, सचमुच हैं, लेकिन दिलों में दरारें आ गई हैं, आपस में भेद हो गया है, देश की ओज़ोन लेयर में छेद हो गया है।
वैसे घर की ओज़ोन लेयर है- कॉलोनी, मोहल्ला या गांव। गांव की ओज़ोन लेयर है- शहर। शहर की ओज़ोन लेयर है- देश। देश की ओज़ोन लेयर है- दुनिया। और मुझे इसी बात का ख़ेद है, कि हर ओज़ोन लेयर के छेद है। लाओ कोई ऐसी पिचकारी जो मदद करे हमारी। प्रांतीयता की हालत यहां तक आ गई है कि राष्ट्र से बड़ा महाराष्ट्र हो गया है।

तीसरी बेंच पर होने वाली बातचीत का मिजाज भी था तो तल्ख पर सुपर होली स्टाइल में था। एक युवा अपनी प्रेमिका को मोहक वाणी में बता रहा था— जैसे कि होली सेना के गुलाल ठाकरे को ही लो। अपनी होली को सबकी होली नहीं मानते! गुलाल ठाकरे का फ़रमान है कि कोई विदेशी हमारे आंगन के पिच पर होली नहीं खेल सकता। खास कर हमारा पड़ोसी देश और कंगारू। कंगारू इसलिए होली नहीं खेल सकते हैं क्योंकि उनकी पूंछ उनके पैर का काम करती है। गुलाल ठाकरे ने कहा है कि हम ऐसे किसी जंतु को नहीं चाहते जो पूंछ से पैर का काम लेता हो। पूंछ पर टिक कर खड़ा होता हो क्योंकि हमारे तो पूंछ है नहीं। जनता भी नहीं पूछ्ती है। गुलाल ठाकरे नहीं समझते कि होली तो रस की खान है। जनता ने भी ‘माई नेम इज रसखान’ फिल्म के प्रदर्शन के समय गुलाल ठाकरे की बातों को ठुकरा दिया। रसखान पर गुलाल ठाकरे कैसे पाबन्दी लगा सकते हैं। हमारे महान कवि हैं। राधा-कृष्ण के प्रेम पर उन्होंने कितने अच्छे सवैया लिखे।
होली के हुरियारों ने, पिचकारी पिचकारों ने, पिचकारों यानी पिच पर खेलने वालों ने गुलाल ठाकरे की बातों को सिरे से ख़ारिज कर दिया। तुम बहुत सूखे हो। तुम्हें रसखान में गोता लगाते हुए और पुरबिया भइयों के साथ फाग गाते हुए गीला होना पड़ेगा। तुम्हारा महत्व तभी तक है, जब तक रंगों का गीलापन बरकरार है। गीलेपन के साथ-साथ हे गुलाल ठाकरे, यदि अपने सूखेपन को बनाए रखोगे तभी लोग तुम्हें झेल पाएंगे। लेकिन तुम जिंदगी की गीली हलचल को खत्म कर दोगे तो होली का पिच मैच के योग्य किस तरह रह पाएगा। दिमागी घिचपिच मत बढ़ाओ।
बड़ी देर बाद लड़की बोली— तुम्हारी बातें मन से आधी ही समझ में आती हैं।
लड़का फिर शुरू हो गया— मनसे की समझ में तो बिल्कुल नहीं आतीं। गुलाल ठाकरे अभी भी अड़े हुए हैं, लेकिन होली के हुरियारों ने खेल के मैदान में सभी को आमंत्रित किया है। होली सभी को एक साथ मिलने-बैठने बतियाने का सुख देती है। गुलाल की तरह गुलाल ठाकरे का दबदबा बढ़ाने के लिए अभरक के चमकीले कण मनसे आ मिले हैं। राकापां भी कांपा गुलाल ठाकरे के सामने। दस मनपथ से आवाज आई कि भाई, ये बात अच्छी नहीं है कि इधर की खाओ मलाई, और उधर बढ़ाओ चिकनाई।
भैया गुलाल ठाकरे! एक बात का ख्याल रखना कि होली की शुरुआत ब्रज से हुई। भोजपुरी अंचल में होली गाई जाती है। बुंदेलखंड में ईसुरी के फाग जब ढोलक पर बजते हैं, तो आसमान भी झूमता है और धरती भी नाचती है। बनारस में होली गायन के दौरान गिरिजा देवी कजरी चैती गाती हैं तो गंगा का पानी हिलोरें लेता है। सबको बड़ी भाती हैं। लेकिन गुलाल ठाकरे! तुम्हारे महान राष्ट्र में जब ये पुरवैये प्रवेश करते हैं तो राष्ट्र से ज्यादा बड़ा महान-राष्ट्र हो जाता है तुम्हारा। तुम होली खेलने का मौका देने से वंचित कर देना चाहते हो। सबको होली मनाने दो। खइके पान बनारस वाला गाने दो। भंग का घोटा लगाने दो। ठुमका लगाने दो। क्या हुआ जो बिग एबीसीडी कुछ करना चाहते हैं! बिग ए से बिग जेड तक मस्ती जाए, गुलाल ठाकरे को न सताए।
होली में जितनी तरह के रंग प्रयोग में लाए जाते हैं, उतने ही रंग-गोत्र-वर्ण के लोग भारत में बसते हैं।
होली पर बरसाने में लुकाठी का प्रेमपूर्ण इस्तेमाल होता है। मान लो सचिन ने एक मन की सच्ची बात कह दी कि मैं तो होली के सब रंगों से मिलकर बनने वाले अपने देश का पहले हूं, प्रांतीय लुकाठी का बाद में, तो क्या गलत किया? हे गुलाल ठाकरे! होली पर सोच-समझ कर बयान देना।
गुलाल ठाकरे ने अपने सिंहासन पर बैठ कर रंग-बिरंगे हुरियारों की सारी बातें सुनीं और कहा कि अब मैं अपने सूखेपन के विरुद्ध लड़ूंगा। दरअसल जब से मातुश्री गईं हैं, होली मैं स्वयं नहीं खेल पाता हूं। गीलापन मेरे जीवन से चला गया है। मैं भारत के सभी रंगों को प्यार करता था, लेकिन लोग कहते हैं कि दंगों को प्यार करने लगा। दरअसल, यह मुझसे नहीं देखा जाता कि दूसरे जोड़े रस-रंग मनाएं और हम अकेले में आंसू बहाएं। इसलिए, मैं स्वयं से कहता हूं कि स्थितियों का सामना करो, सामना के जरिए किसी दूसरे का साम-दाम-दण्ड-भेद मत बिगाड़ो।
बाला बोली— उलझा-उलझा कर सुलझी-सुलझी बातें करने का कौशल तुम्हें खूब आता है, पर बाय-द-वे बता दूं कि पार्क में बिठाकर मुझे बोर कर रहे हो। होली मनानी है तो चलो यहां से। जितने तुम्हारे दोस्त हैं उनके यहां चलेंगे। फिर मैं ले चलूंगी अपनी सहेलियों के यहां।
बालक बोला— चलो, पहले तुम्हारी सहेलियों के यहां चलते हैं।

Thursday, February 25, 2010

कम्प्यूटर की डगर पर हिन्दी

इन दिनों हिंदी अकादमी के गतिविधियों में तेजी आई है और यह एक अच्छी बात हुई कि पिछले दिनों अकादमी ने 'कम्प्यूटर की डगर पर हिन्दी' विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया। प्रस्तुत है अजय कुमार शर्मा और महेश्वर की एक संक्षिप्त रिपोर्ट।











कम्प्यूटर से हिन्दी वैश्विक होगी

कम्प्यूटर के जरिए हिन्दी एक वैश्विक भाषा का रूप ले सकेगी और संसार की महत्वपूर्ण भाषाओं के समक्ष सर उठा कर खड़ी हो सकेगी'। यह निष्कर्ष 24 फरवरी 2010 को हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित संगोष्ठी 'कम्प्यूटर की डगर पर हिन्दी' से निकल कर सामने आए।
कार्यक्रम के आरम्भ में 'पावर प्वाईंट' प्रस्तुति के साथ प्रो. अशोक चक्रधर ने कम्प्यूटर और उसमें हिन्दी के प्रयोग का इतिहास प्रस्तुत किया। वर्तमान में कम्प्यूटरों में हिन्दी में अनुवाद, शब्द कोश, बोलकर लिखने की सुविधा की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अब कम्प्यूटर में हिन्दी के प्रयोग को लेकर शंकालू' न होकर 'जिज्ञासू' होने की जरूरत है।
इस संगोष्ठी में हिन्दी कम्प्यूटिंग से जुड़े सभी महत्वपूर्ण लोग प्रो. अशोक चक्रधर, विजय कुमार मल्होत्रा, डॉ. बालेन्दु दाधीच, आलोक पुराणिक, मीता लाल उपस्थित थे। अध्यक्षता डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा ने की।
प्रसिद्ध भाषाविद् अरविन्द कुमार की पुत्री मीता लाल ने उनके द्वारा तैयार किए जा रहे साफ्टवेयर 'अरविन्द लैक्सिकन' की प्रस्तुति दी जिसमें हिन्दी के छह लाख से ज्यादा शब्द हैं और जो अंग्रेजी-हिन्दी-रोमन तीनों कमाण्ड में काम करता है। इसके सहारे हम केवल अर्थ ही नहीं उनके वैश्विक अर्थ, अंर्तसांस्कृतिक संदर्भ, समानार्थी और विलोम शब्द भी ढूंढ सकेंगे। यह 'एन्साइक्लोपिडिया' का भी काम करेगा।
हिन्दी अकादमी के सचिव प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव 'परिचय दास' ने सभी को धन्यवाद देते हुए कहा कि कम्प्यूटर तकनीक के जरिए हम हिन्दी को भविष्य की भाषा बना सकते हैं। उन्होंने विश्वास दिलाते हुए कहा कि अकादमी 'यूनिकोड' के इस्तेमाल व अन्य सुझावों को पूरा करने की कोशिश करेगी। प्रो. श्रीवास्तव ने यह सूचना भी दी कि माइक्रोसाफ्ट के उत्पादों का सर्वाधिक उपयोग करने तथा हिंदी कम्प्यूटिंग के विकास हेतु उल्लेखनीय शोध-कार्यों के लिए प्रो. अशोक चक्रधर को पिछले तीन वर्षों से लगातार माइक्रोसाफ्ट का 'मोस्ट वैल्यूएबल प्रोफेशनल अवार्ड' मिल रहा है। ज्ञात हो कि इस वर्ष भी प्रो. अशोक चक्रधर, श्री विजय कुमार मल्होत्रा और श्री बालेन्दु दाधीच को मिला है
अजय कुमार शर्मा और हेश्वर

Wednesday, February 24, 2010

मेरी यह तस्वीर श्री रघुवीर चन्द्र ने बनाई है।

मेरी यह तस्वीर हैदराबाद के श्री रघुवीर चन्द्र ने बनाई है। उनको धन्यवाद और बधाई है। इससे क्या कि चित्र में उम्र थोड़ी-सी बढ़ाई है। दुख देते हुए भी चित्र सुखदाई है।

चौं रे चम्पू

इनायत हिदायत शिकायत न करना





—चौं रे चम्पू! भरपूर बुढ़ापौ आय गयौ, लेकिन मन अबहु दौरि कै पतंग लूटिबे कौ होय। हालत जे ऐ कै बिना बेंत के उठौई नायं जाय। का करैं लल्ला?
—बुढ़ापा भी कुदरत का एक वरदान है चचा, इसके भी मज़े लो। एक शायर ने कहा था— ‘सताता है क्या-क्या मुझे दर्दे घुटना, जो इक बार बैठूं तो मुश्किल है उठना।’
—उड़ाय लै मजाक, उड़ाय लै चम्पू! सवाल जे ऐ कै मन की बाल तरंगन्नै कैसै रोकें?
—माफ़ करना चचा, अपनी इसी बेंत से मुझे ख़राब शेर सुनाने के लिए पीट लीजिए, लेकिन अपनी बाल-तरंगों को मत रोकिए। पिछले दिनों ‘ओल्ड एज फाउंडेशन’ का एक जलसा हुआ। मुझे बनाया हुआ था चीफ़ गैस्ट। सारे श्रोता आपकी उम्र के या आपसे ज्यादा उम्र के ही रहे होंगे। यानी पिचहत्तर से ऊपर के। कार्यक्रम से पहले चाय-समोसे का इंतज़ाम था। मैं भी था उनके बीच। कई ने मुझे टीवी के कारण पहचान लिया। बताने लगे कि कब-कब उन्होंने मुझसे क्या-कया सुना। एक बुजुर्गवार कंपकंपाते हाथों में चाय का कप लिए हुए मेरी तरफ आए। कहने लगे आप तो हास्य के कवि हैं, उदासियों के इस जंगल में आपका क्या काम?
—जादा ई निरास होयगौ।
—मैं तो हर चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था चचा। मैंने उनसे हंसते हुए कहा कि लीजिए मैं भी उदास हो जाता हूं। इस पर वे मुस्कुरा दिए। फिर जी सारे बुजुर्ग लोग हॉल में आकर चुपचाप बैठ गए। संचालिका ने अपनी संस्था का ब्यौरा दिया कि वृद्धों के लिए क्या-क्या किया जा रहा है। फिर एक मनोविज्ञान विशेषज्ञ महिला ने तरह-तरह के तरीके बताए कि इस अवस्था का सामना किस प्रकार किया जाना चाहिए। सारे बुजुर्ग शांत भाव से सुनते रहे। अंत में आई मेरी बारी।
—तैंनैं का कही?
—मैंने कहा, कहते हैं कि वृद्ध व्यक्ति दुगुना बच्चा हो जाता है। तो मेरे प्यारे बच्चो। कविसम्मेलनों में जाते-जाते मेरी एक खराब आदत पड़ गई है, तालियों की आवाज सुनने की। यहां अब तक एक बार भी ताली नहीं बजी। तुम लोग डबल बच्चे हो तो डबल ताली बजाओ।
—तारी बजाईं?
—क्या पूछो चचा, तालियों की गूंज हॉल के बाहर दूर-दूर तक गई होगी। फिर मैंने कहा कि ये उम्र का मामला आक्रांत और अशांत होने वाला नहीं है। चालीस वर्ष पहले साठ वर्ष की उम्र में चले जाना बहुत स्वाभाविक माना जाता था। आप सत्तर से ऊपर वाले हैं। ये उम्र तो अब फोकट में मिली हुई उम्र है। मैं भी ग्यारह महीने बाद साठ का हो जाऊंगा। तो ये जो उम्र मिली है, किसलिए मिली है? दूसरों को कोसने के लिए या अपने आपको खुशियां परोसने के लिए। आपके अंदर अनुभवों का ख़जाना है। बांटिए, लेकिन ख़जाना उसी को देना जो लेना चाहे। भैया, तेरे पास वक्त नहीं है लेने का, तो मेरे पास भी वक्त नहीं है देने का। मैं जानता हूं डबल बच्चो! आपकी समस्या है अकेलापन, लोनलीनैस।




—बिल्कुल ठीक। बुद्ध के दिना तू बगीची पै नायं आवै तौ मन बड़ौ अकुलाय। हम है जायं लोनली।
—चचा, ये लोनली वाला मामला आजकल जवान लोगों में ज़्यादा है। पैसा कमाने की ललक में अठारह से बीस घंटे तक काम करते हैं। नई जीवन शैली ने पूरे के पूरे समाज को अकेला बना दिया है। लोनली वे ज्यादा हैं जिन्होंने वैभव भरी जिन्दगी की दौड़ में रकम लोन ली और फंस गए लेकर। मैंने उनसे आगे कहा कि आपको क्या फिक्र है? न लोन लेना है, न लोन देना है। इस पर बजीं ताली। मैंने कहा ये हुई न बात। याद रखिए, एक होती है उपेक्षा, एक होती है अपेक्षा। आप लोग क्योंकि डबल बच्चे हैं इसलिए उपेक्षा से रूठ जाते हैं। अपेक्षाएं पूरी न हों तो टूट जाते हैं।
—कोई कबता सुनाई?
—हां चचा, एक मुक्तक सुनाया। बातें उनकी समझ में आईं और डबल बच्चों ने ट्रिपल तालियां बजाईं—
मदद करना सबकी, इनायत न करना।
न चाहे कोई तो हिदायत न करना।
शिकायत अगर कोई रखता हो तुमसे,
पलट के तुम उससे शिकायत न करना।

Tuesday, February 23, 2010

संगोष्ठी

कम्प्यूटर की डगर पर हिन्दी
पर आयोजित विचार संगोष्ठी में आप सादर आमंत्रित हैं

अध्यक्षता : डॉ. विमलेश कांति वर्मा
सान्निध्य : प्रो. अशोक चक्रधर, उपाध्यक्ष, हिन्दी अकादमी, दिल्ली
वक्ता : श्री विजय कुमार मल्होत्रा, श्री आलोक पुराणिक, सुश्री मीता लाल एवं श्री बालेन्दु दाधीच

बुधवार, 24 फरवरी, 2010
सायं 5.30 बजे
त्रिवेणी सभागार, तानसेन मार्ग (निकट मंडी हाउस), नयी दिल्ली – 110001
चाय : 5.30 बजे

Monday, February 22, 2010

पुस्तक लोकार्पण

'कुछ कर न चम्पू' और 'चम्पू कोई बयान नहीं देगा' का विमोचन


8 फरवरी, 2010 को सुविख्यात लोकप्रिय कवि तथा आलोचक अशोक चक्रधर के दो व्यंग्य संग्रहों का विमोचन इंडिया हैबिटाट सेंटर के गुलमोहर सभागार में दिल्ली की मुख्यमंत्री सुश्री शीला दीक्षित ने किया। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित 'कुछ कर न चम्पू' और 'चम्पू कोई बयान नहीं देगा'--इन संग्रहों पर विचार रखते हुए सुश्री दीक्षित ने अशोक जी को 'कला से भरपूर व्यक्ति' के पद से नवाजते हुए कहा कि 'उनकी कविताएं या लेखन शुरू मे देखने में भले, हल्के-फुल्के लगें परंतु बाद में उसकी गहराई धीरे-धीरे खुलती है। इस पुस्तक की भाषा का आनंद मैं भी उठा सकती हूं, हालांकि मेरी सारी शिक्षा अंग्रेजी में हुई थी।' सुश्री दीक्षित ने पुस्तक संस्कृति की पैरवी करते हुए कहा कि 'इंटरनेट पर पुस्तक से वह संबंध नहीं बन पाता, जो पुस्तक को हाथ में लेकर बनता है, वह सीधे मन में उतर जाती है।

फूहड़ लतीफों और स्तरहीन स्त्री विरोध की तमाम मंचीय कविताओं के विपरीत अशोक चक्रधर को 'पॉपुलर' कविता में एक अलग स्कूल की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। हास्य को व्यंज्ञ में रचाने-बसाने वाले चक्रधर जी ने माना कि बात करने के लिए दो व्यक्तियों का होना जरूरी है। पुस्तक में मैंने यह दोनों अपने ही भीतर उत्पन्न किए चंपू और चाचा के रूप में यह पुस्तक प्रश्नोत्तर शैली में है। इन दोनों की बातचीत का आधार मूलभूत और सामाजिक समस्याएं हैं। यह पुस्तक हिन्दी पुस्तक संसार में यूनीकोड फॉण्ट में आने वाली पहली पुस्तक है।

सुधीश पचौरी ने लेखक के व्यक्तित्व और कृतित्व की यात्रा पर बात करते हुए कहा कि 'ऐसे आशुकवि बहुत कम हैं जो व्यंग्य की ऐसी पैनी धार बनाए रखते हैं।' उन्होंने लेखक को श्रमशील, मेधावी और रचनात्मक कहते हुए कहा कि 'हास्य को मैं जीवन के लिए अनिवार्य मानता हूं।' पुस्तक की भाषा को उन्होंने ब्रज और खड़ी बोली की मैत्री का गद्य कहा। 'चंपू' को उन्होंने अंग्रेजी के 'चैम्प' शब्द के समानार्थक स्वीकार करने की जरूरत बताया।
अन्य वक्ताओं में अरुण माहेश्वरी और उदय प्रताप सिंह रहे। 8 फरवरी का दिन, संयोग से, अशोक चक्रधर का जन्म दिवस भी है, अतः भारी संख्या में उनके मित्रों-शुभचिंतकों के मध्य उन्होंने केक काटने की रस्म भी अदा की। इस दिन के साथ ही वे 60वें वर्ष में प्रवेश कर गए। कार्यक्रम का संचालन युवा कवयित्री-चित्रकार गीतिका गोयल ने दक्षतापूर्वक किया। कार्यक्रम के अंत में काव्य-गोष्ठी भी आयोजित की गई। बागेश्वरी चक्रधर ने अपने संस्मरणों के साथ कुछ मुक्तक भी पढ़े।

हंस, मार्च 2010 से साभार

Friday, January 08, 2010

हवा, हंसी, हिम्मत और हौसले की हकदार

—चौं रे चम्पू! हमारी बगीची पै सबते जादा ताकतवर पहलवान कौन ऐ? चल छोड़, आसपास के इलाक़े मैं ई बता, सबते जादा ताकतवर इंसान कौन?
—इंसान की बात पूछ रहे हो न चचा?
—और का जिनाबर की पूछ रए ऐं!
—नहीं चचा, कुछ इंसान कहे जाने वाले लोगों में भी दरिंदे छिपे होते हैं, उनकी बात तो नहीं कर रहे न?
— दरिंदन ते हमें का मतबल!
—हां, अब मैं आपकी बात का जवाब दे सकता हूं। माफ करना, आपकी बगीची पर उससे बड़ा ताकतवर इंसान नहीं है, जितना ताकतवर इंसान मैं अभी देख कर आ रहा हूं। हरप्यारी के घर।
—अच्छा! हरप्यारी के घर कहां के पहलवान आए ऐं रे? का उमर होयगी उनकी?
—हरप्यारी की पोती हुई है चचा, उम्र है एक महीना।
—तू तौ पहलवान की बात कर रयौ ओ।
—चचा यकीन मानिए उससे ज्यादा ताकतवर इंसान पूरे इलाक़े में इस वक्त कोई नहीं है।
—मजाक मती ना कर।

—देखिए चचा, नन्हा बच्चा जिस भी उंगली को पकड़े, कस लेता है। और अपनी पकड़ की मजबूती का रस लेता है। आप कोशिश करिए अपनी उंगली छुड़ाने की। नहीं छुड़ा पाए न! वो आपकी नाकामयाबी पर फट से हंस देता है। ....और चचा अपनी पकड़ की मजबूती का भरपूर रस लेता है।
—वा भई वा! भौत बेहतर बात कही।
—इसीलिए मैंने सबसे पहले पूछा था कि इंसानों की बात कर रहे हैं या जानवरों की। अगर सच्चा इंसान होगा तो नहीं छुड़ा सकता, दरिंदे को एक पल नहीं लगेगा....
—अब का सोच मैं परि गयौ?
—सोचना क्या है चचा! एक चिंता सी होती है। इलाक़े की सबसे बड़ी पहलवान को हम इस सदी में क्या देने वाले हैं। अभी इतनी छोटी है कि उसे पता ही नहीं है कि उसके पास कितनी ताकत है, क्योंकि अभी विवेक नहीं है उसके पास। जिंदगी से संघर्ष करने के ये उसके सबसे मुश्किल दिन होंगे। दूध पिएगी, बतासा खाएगी, आशा जानेगी, निराशा भोगेगी। भाषा सीखेगी, शब्दों के अर्थों को जिज्ञासा से जानेगी। चचा जिज्ञासा या तो बचपन में होती है या फिर उद्भट प्रतिभा में। बचपन में जिज्ञासा हर किसी के पास होती है, लेकिन अच्छे खाद-पानी के अभाव में हमारे देश में बचपन की फसल पर वक्त से पहले ही पाला मार जाता है।

शुद्ध हवा, हंसी, हिम्मत और हौसले की हकदार बने, प्रतिभा के नए-नए द्वार खुलें उसके लिए, तो इसकी जिज्ञासा कभी नहीं मरेगी। फिर ये जैसे-जैसे बड़ी होगी, देश और समाज की समस्याओं के बारे में जिज्ञासाओं से भर उठेगी और निदान सोचेगी। अच्छी शिक्षा, अच्छी सेहत, अच्छा पर्यावास, अच्छा सांस्कृतिक घर-आवास अगर उसे दे सकें तो इस दुनिया को ये नन्हीं पहलवान बदल कर दिखा सकती है। पर आंकड़े निकालो हमारे देश के। देश में चौंतीस करोड़ बच्चे हैं। अस्सी लाख तो स्कूल ही नहीं जा पाते। पैंतीस लाख सड़कों पर रहते हैं। ज्यादातर ऐसे हैं जो कक्षा पांच तक भी नहीं पहुंच पाते। कितने कुपोषण से जूझ कर मर जाते हैं, आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। किसी तरह बच गए तो अमानवीय शोषण उनकी क्षमताओं को लील जाता है।
—ये तो धरती पर आ भी गई, हरप्यारी के खसम ने तो कह दिया था कि लड़की हो गई तो दावत नहीं करने का। चचा, अगर उसका मर्द अपनी पोती की दावत नहीं करता है तो अपन बगीची पर कर लेते हैं।
—हां बगीची फण्ड में तौ भौत पइसा धरौ ऐ ना? दावत! ...पर तू कहै तौ चल कर लिंगे। बेटी के होइबे की दावत तौ हौनी चइऐ।
—थैंक्यू चचा! कभी आपने ये बात सोची है कि बेटे के जन्म के तो कितने ही गीत और लोकगीत हैं, पर क्या कभी बेटी के जन्म का कोई गीत तुमने सुना है?
—तू सुना!
—सुनो, गाओ-गाओ बधाई लली आई,
घर की बगिया में कोमल कली आई ।
फर्क करना ही नहीं, हो लली या कि लला,
बेवजह इस तरह से, सास तू जी न जला।
मीठा मुंह कर सभी का, और तू संग में गा,
तू भी लड़की थी कभी, भूलती क्यों है भला?
जैसे मिश्री की झिलमिल डली आई।
गाओ-गाओ बधाई लली आई।
—रुक जा, रुक जा! ढोलक लाय रयौ ऊं भीतर ते।

Saturday, January 02, 2010

पिच और घिचपिच

चौं रे चम्पू


—चौं रे चम्पू! कहां ते आय रह्यौ ऐ रे? और हाथ में का ऐ?
—आ रहा हूं दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान से और हाथ में हैं बरमूडा की घास के ठूंठ।
—चौं गयौ ओ वहां पै?

—टिकिट के पैसे वापस मिल जाएंगे, यह सोच कर गया था। मैदान में सन्नाटा था। एक तरफ बोतलों, टोपियों, कागजों और चिप्स के खाली पॉलिथिनों का ढेर लगा हुआ था, जिस पर झुण्ड के झुण्ड कौवे बैठे हुए थे। वे भी गुस्से में चोंच न मार दें, यह सोच कर उस तरफ तो नहीं गया, लेकिन पिच पर काफी देर टहल कर आया। समझ में नहीं आया कि पिच में गड़बड़ी क्या थी? हज़ारों दर्शकों की तमन्नाओं पर क्यों पानी फेरा गया? पिच पर ही पानी फेर देते तो बॉल उछाल नहीं लेती। मैं तो समझता था कि क्रिकेट ऐसा खेल है जो कहीं भी, किन्हीं भी, स्थितियों में खेला जा सकता है— बल्ला भी है बॉल भी, संग में डंडे चार, अब देरी किस बात की, किरकिट खेलो यार। खेल ये ठुक ठुक वाला, बड़ा दिलचस्प निराला।

—खेल रोक दियौ, बुरी बात भई!
—बारिश के कारण रोक देते हैं तब भी बुरा लगता है। अरे भीगते-भीगते खेलो, कीचड़ में एकाध फिसल जाएगा और क्या होगा। दर्शकों को दुगुना मजा आएगा— बचपन में खेलें सभी, गली मुहल्ले बीच, पिच की चिन्ता ही नहीं, सूखा है या कीच। लगन यदि सच्ची जागे, फील्ड में दिनभर भागे। क्यों चचा?
—गली-मौहल्ला में जो किरकिट खेलौ करैं, नखरा थोड़े ई दिखामें!
—पर चचा खिलाड़ी लोग जितनी ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं उतने ही नखरे बढ़ जाते हैं। राधा अगर चाहे तो दूसरों को छछिया भर छाछ पर नचा ले, खुद नाचने की बारी आई तो नौ मन तेल चाहिए। उछलती बॉल को देखने के लिए परमात्मा ने दो आंखें दी हैं, पर खिलाड़ी आजकल रिस्क नहीं लेते। प्रसिद्धि पाने के बाद उन्हें तो नूरा कुश्ती रोज दिखानी है— डब्ल्यू डबल्यू एफ की, कुश्ती देखें आप। शीघ्र पता चल जाएगा, पहलवान का पाप। चित्त है चारों ख़ाने, भर लिए मगर ख़ज़ाने। लेकिन नूरा क्रिकेट में दर्शकों की जेब पर मार भले ही पड़े, पर खुद मार नहीं खानी— कर थोड़ी सी साधना, पा थोड़ी सी सिद्धि, मिल जाती आराम से चारों ओर प्रसिद्धि। बाद में गोलमाल है, क्रिकिट का यही हाल है। पिच तो दोनों टीमों के लिए एक ही थी। हम भी बड़ी जल्दी विदेशी नखरों की गिरफ्त में आ जाते हैं। बिना बात हल्ला मचा दिया, कोटला में क्रिकेट कलंकित हो गई, क्रिकेट में काला दिन आया। अरे पिच ऊबड़-खाबड़ है या सपाट, खेल के दिखाओ ऑन द स्पॉट। ये क्या कि साहब बरमूडा से घास आएगी, पिच पर लगाई जाएगी, फिर काटी जाएगी, फिर नखरा दिखा के दर्शकों की तमन्ना पर रोलर फिरा दिया जाएगा। वो तो हमारे दर्शक पानी की खाली बोतलें और कुछ कागज फेंक कर ही संतुष्ट हो गए वरना पिच के मिजाज से उनका मिजाज ज्यादा खतरनाक हो सकता था। पहले भी जयसूर्या की उपस्थिति में इसी तरह खेल रोका गया था। क्रिकेट के नाजुक मसीहा, नाजुक सी मामूली बात को कठोर किए दे रहे हैं, बड़े-बड़े सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं, नियम कड़े कर रहे हैं। दो हजार ग्यारह में इसी मैदान पर विश्व कप होना है, कहते हैं कि नहीं होने देंगे।
—भली चलाई! पिच की घिचपिच समझ में नायं आई।
—दो हजार ग्यारह से पहले तो दो हजार दस के राष्ट्रकुल के खेल होने हैं। जिस तरह की हमारी तैयारियां हैं उन्हें देखते हुए तो एक भी खेल न हो पाएगा।

जरा-जरा सी बात पर नुक्ताचीनी करेंगे तो खेल भावना कहां रही। देखना यह चाहिए कि सुविधा या असुविधा हर टीम को समान मिल रही है या नहीं। समान स्थितियों में सम्मान के साथ खेल कर दिखाओ। लंगड़ लड़ाओ, बतंगड़ मत बनाओ। दिल की पिच सही रहनी चाहिए— खेलों का उद्देश्य है, आपस का सद्भाव, ताव दिखाकर जो करें, दिल के पिच पर घाव, प्रेम सीखें कुछ अरसे।
—हां, भेज देओ उनैं मदरसे।

Thursday, December 03, 2009

आत्मा राम की टें टें

चौं रे चम्पू

—चौं रे चम्पू! तेरी हर हफ्ता की चम्पूगीरी कित्ती बार है चुकी अब ताईं?
—हमारा आपका मिलन लगभग दो साल से चल रहा है। हर हफ्ते बुध के दिन निन्यानवै बार चम्पूगीरी हुई है। अगले हफ़्ते शतक पूरा हो जाएगा। चचा, इस बीच पता नहीं कहां-कहां गया, भटका, भागा-दौड़ा। कहीं भी रहा, पर हर बुध को चम्पूगीरी और बगीचीबाज़ी के लिए ज़रूर आया। लोग समझते रहे कि निन्यानवै के फेर में है। चचा, तुम्हारे चम्पू के पीछे ही पड़ गए लोग। लेकिन तुम्हारा चम्पू भी चक्रधर वंश का है। निन्यानवै तक गाली सुन लेता है । शिशुओं का वध नहीं करता पर दुष्ट शिशुपालों को नहीं छोड़ता। बहुत सारे आत्माराम टें टें करने लगे हैं, अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के तीर फेंकते हैं। चम्पू को समझ लिया है चम्पी करने वाला। अब हम-तुम तो हैं ब्रजवासी, बगीचीबाज लोग, वे हैं हिन्दी-वाटिका के रखवाले। वाटिकाओं में इन्हें आत्माएं मिला करती हैं।

—तेरी बात उलझी हुई सी हैं लल्ला।
—अरे चचा, सौ साल पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी के ज़माने में भी टें टें काण्ड चला करते थे। किसी ने अपनी किताब का नाम ‘प्रेम-बगीची’ रख दिया। फिर तो पिल पड़े शुद्धतावादी लोग। ये भी कोई नाम है! ‘प्रेम वाटिका’ होना चाहिए। बगीची शब्द तो फारसी के बाग़ीचा से आया है। बड़े-बड़े बागी तेवर दिखाई दिए बगीची के मामले में। चचा, ये वाटिका के लोग बगीची से डरते हैं। बगीची में शरीर पर मिट्टी लगती है और वाटिका में रूमाल रख के बैंच पर आत्माओं को बुलाया जाता है। प्लैंचिट के सहारे। कैरमबोर्ड की गोटी पर उँगली रख कर जिधर चाहो आत्मा को खिसका लो। हिन्दी की सारी आत्माएं तुम्हारी उँगली के इशारे पर ही तो नाचती है। चचा, इन्हें रास नहीं आता कि कोई बगीचीबाज़ इनकी वाटिका में प्रवेश कर जाए। इन्हें सब कुछ अनस्थिर दिखाई देता है। अनस्थिर पर भी पंगा हुआ था, मालूम है?
—बता।
—द्विवेदी जी ने ‘भाषा की अनस्थिरता’ नाम का एक लेख लिखा । विवाद ‘अनस्थिरता’ शब्द पर हुआ,। बालमुकुन्द गुप्त रूपी आत्माराम ने कहा कि ‘स्थिर’ का उल्टा होता है ‘अस्थिर’, ये ‘अनस्थिर’ क्या हुआ? वाटिकाबाजों ने हालत खराब कर दी एक बगीचीबाज की।। लगातार उकसाते रहे। बगीचीबाज ने निन्यानवै दिन चुप लगाई और सौवें दिन ठोक दिया एक लम्बा सा लेख सरस्वती में। उन्होंने कहा कि कुछ ज्यादा अस्थिर होते हैं, कुछ कम अस्थिर होते हैं, यानी कुछ ज्यादा हिलते हैं, कुछ कम हिलते हैं। ऐसे दोनों लोगों के लिए हम अस्थिर नहीं कह सकते, उनके लिए ‘अनस्थिर’ कहा जाएगा। आज भी वाटिकाबाज लोग स्थिर को अस्थिर और अनस्थिर बनाने के लिए तथ्यविहीन कुचर्चाएं कर रहे हैं। मनुष्यों से सरोकार नहीं, सीधे आत्माएं आती हैं डायलॉग करने के लिए, वाटिका में। चचा, तुम्हारी आत्मा क्या बोलती है? लेख तो तुमने भी पढ़ा होगा?
—लल्ला, जो आदमी अबू आज़मी के बारे में जे कहै कै हिन्दी बोलिकै वानै गल्ती करी, वो अस्थिर ऊ ऐ और अनस्थिर ऊ ऐ।
—ये बात तो खैर व्यंग्य की आड़ में कही, पर कुछ भी जाने बिना संस्थानों की आत्माओं से बात करते हैं। कोई काम करे तो राजनीतिक उद्देश्य से कर रहा है, पुराने जिस आदमी ने काम किया, उसकी राजनीति कुछ और थी, इसकी राजनीति कुछ और है। संस्थानों के शरीर से इन्हें कुछ मतलब नहीं, आत्माओं का रुदन सुनते हैं। टें टें तो अब से सौ साल पहले हुआ करती थी, अब टें टें की जगह भें भें हो गई है। ये किशोर मानसिकता के लोग हैं और हिन्दी पर राज करना चाहते हैं, हिन्दी की आत्मा के ठेकेदार बनकर। पता नहीं कौन से अली का नूर है इनमें? दूसरे को ही गलत मानते हैं और सब्र का इम्तिहान लेते हैं।
—चल सौवीं बैठक में देखिंगे कै तेरौ गुस्सा कित्तौ बचौ।