Tuesday, January 06, 2009

कटाई छंटाई बुरशाई कुतराई की चतुराई

—चौं रे चम्पू! फसल कटाई-छंटाई के अबसर पै गाम में दस-पंद्रै कबीन कूं लै कै एक अखिल भारतीय कविसम्मेलन करायं तौ कित्ते पइसा लगिंगे?
—चचा, भूल जाओ अखिल भारतीय। लाख-दो-लाख से कम में नहीं होते आजकल कविसम्मेलन।
—अच्छा! इत्ते रुपइया! इत्ते की तो फसल ऊ न होयगी। टैक्टर गिरवी धरनौ पड़ैगौ।
मैंनै सोची दो-तीन हजार में है जायगौ। संग में देसी घी के साग-पूरी की दावत और रायते में सन्नाटौ कर दिंगे। चल पांच हज़ार सई। बस कौ किरायौ अलग ते।
—अखिल पंचायती कविसम्मेलन भी नहीं होगा चचा। ऐसा करो, मेरा एकल काव्य-पाठ रख लो। फोकट-फण्ड में। गन्ने का रस पिला देना और ताज़ा गुड़ खिला देना।
—अरे हट्ट रे! तेरी कौन सुनैगौ? कबियन की लिस्ट में छंटनी कर लिंगे। तब तौ है जायगौ?
—तुम्हें भी छंटनी की महानगरीय बीमारी लग गई चचा।
—चल छोड़ कविसम्मेलन! खिच्चू आटे वारे के चेला रसिया गा दिंगे। तू छंटनी की बता।
—बड़ी-बड़ी कम्पनियां वैश्विक मंदी के नाम पर मोटी और छोटी-मोटी तनख़्वाह वाले कर्मचारियों को धकाधक निकाल रही हैं। महानगरों में नौकरी के भरोसे भारी कर्ज़ लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले नौजवानों में हड़कम्प मच गया है। छंटनी की तलवार हर किसी पर लटकी हुई है। तुम कटाई-छंटाई का उल्लास मनाना चाहते हो और महानगरों में कटाई-छंटाई का मातम चल रहा है। जो छंटनी से बच गए उनकी कटाई चल रही है। तनख़्वाह, पैंशन और इन्क्रीमैंट में कटाई। ग्रामीण और शहरी संस्कृति में यही अंतर है चचा! गांव में खुशी के कारण शहर तक आते-आते दुःख के कारण बन जाते हैं। छंटनी शब्द वैसे आया गांव से ही है।
—सुद्ध भासा में कहते तौ का कहते?
—उसको कहते कृंतन या कर्तन। जैसे वाल काटने-छांटने वाले कई भाइयों ने दुकान के आगे लिखवा रखा है ‘केश कर्तनालय’। जब से इन दुकानों पर केश के साथ फेस पर भी काम होने लगा तब से सब के सब ब्यूटी पार्लर हो गए हैं। जो एग्ज़िक्यूटिव हर हफ्ते ब्यूटी पार्लर जाया करते थे उन्होंने अपने बजट में कटाई करते हुए पार्लर जाना बन्द कर दिया। वहां बटुआ कर्तन होता था। चचा, एक शब्द और है— बुरशाई। मुद्रण जगत के लोग जानते हैं कि किताबों की बाइंडिंग के बाद बुरशाई की जाती है। बुरशाई, कटिंग मशीन पर कागज़ को बहुत मामूली सा काटने की प्रक्रिया को कहते हैं। आड़े-तिरछे निकले हुए फालतू कागज़ कट कर इकसार हो जाते हैं। किताब चिकनी कटी हाथ में आती है। कुछ कम्पनियों ने छंटाई की जगह अपने खर्चों में बुरशाई शुरू की है। ये ठीक है! आदमी मत निकालो, फालतू के खर्चे कम करो। कई एयरलाइंस कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों को बिज़नेस क्लास की जगह इकॉनोमी क्लास में सफर करने की हिदायत दी हैं। कुछ कहती हैं कि जाते क्यों हो, टेलिकांफ्रैंसिंग से काम चलाओ। यात्रियों के नाश्ते-पानी में भी कतराई-बुरशाई हुई है। कुछ सॉफ्टवेयर कम्पनियों ने कर्मचारियों को फोकट की चाय-कॉफी पिलाना बंद कर दिया है। फालतू की फोटोकॉपी बाज़ी और कम्प्यूटर-प्रिंटर के इस्तेमाल में चतुराई से कुतराई की है।
—कुतराई?
—हां चचा! कम्पनी के मालिकों की चेतना जब चूहों से मेल खाए तो वे अपने खर्चों को कुतरने लगते हैं। एक आइडिया है, आप तो जानते हैं कि कविता का जन्म करुणा से होता है। जिनकी पिछले दिनों छंटनी हुई है वे ज़रूर कवि बन चुके होंगे। एक छंटनीग्रस्त कवियों का सम्मेलन करा लीजिए। करना ये होगा कि बस एक-एक पोस्टर बड़ी-बड़ी कम्पनियों के दरवाज़े के बाहर लगा दिया जाए, जिस पर लिखा हो— ’छंटनीग्रस्त कवियों को कविता-पाठ का खुला निमंत्रण’। दस-बीस नहीं हज़ारों में मिलेंगे। बड़ी-बड़ी दर्दनाक, मर्मस्पर्शी कविताओं का मौलिक सृजन सामने आएगा। नाम रखेंगे ‘कटाई-छंटाई-बुरशाई कुतराई कविसम्मेलन’। अखिल भारतीय कविसम्मेलन के नाम पर होने वाले लतीफा सम्मेलनों से भी मुक्ति मिलेगी। कैसी रही?
—तौ जे बता, मैं अब पांच हजार में ते कित्ते की कटाई-छंटाई-बुरशाई-कुतराई की चतुराई दिखाऊं?

13 comments:

Irshad said...

क्या बात है. गुरूजी तो आखिर गुरूजी ही है.

विनय said...

गुरु जी को चरणस्पर्श,

जय गुरुदेव आपकी की छटा तो निराली है
अबकि कलम के साथ फोटो भी खींच डाली है

सप्रेम बधाई!

---मेरा पृष्ठ
गुलाबी कोंपलें

रंजना said...

वाह ! यथार्थ का सुंदर सटीक सार्थक व्यंग्य.साधुवाद !

Raag said...

I hate to say it, but this Champu series hurts my head.

It's another thing that I am otherwise a fan of Chakradhar Jee.

Ashok Chakradhar said...

प्रिय अनुराग जी मेरा चम्पू आपका सिर भारी करता है, या चाचा? इसकी ब्रजभाषा या इसके विचार? या कुल मिला कर यह शृंखला? खुल (मिला) कर बताइए।
लवस्कार
अशोक चक्रधर

Raag said...

श्री चक्रधर जी, आपने मेरी बात का जवाब दिया, बहुत आभार। मैं आपको बचपन से सुनता और पढ़ता आ रहा हूँ।

शुरू में तो चम्पू और चाचा के व्यंग्य रोचक लगे, मगर अब उबाऊ हो गए हैं। अब मैं कोई बहुत बड़ा साहित्यकार तो हूँ नहीं जो एक एक चीज की नुक्ताचीनी कर सकूं।

भाषा तो खैर एक समस्या है ही। लिखा हुआ पढ़ने में ही इतनी मेहनत लगती है की बात समझना मुश्किल हो ही जाता है। जहाँ तक विचार की बात है, व्यंग्य में तीखापन और नयापन कम हो जाता है कई बार, और १००-२०० फीड सब्सक्राइब करने वाले समय में थोड़ी से देर भी बोर चीज भटका देती है। बस।

yogesh samdarshi said...

आज फुर्सत में बैठा बैठा पता नही किस नसेब से आपके ब्लोग पर पहुंच गया... आप का पंक्खा हूं यह कहना तो बेमानी होगा मै तो आपका पाठक हूं... आपकी यह रचना पढ कर दिल बाग बाग हो गया.. बहुत अच्छी रचना लिखी है आपने.. आधुनिक अर्थ जगत की उठापटक पर इतने तीखे और सुंदर प्रहार करने वाले मेरी जानकारी में आप पहले मंचीय कवि है... मैं आप ग्रामीण संस्क्रति से पगी रचनाओ को पढ कर आशा से भर जाता हूं दो अर्थ व्यवस्था हैं एक गांव के और एक शहर की गांव की अर्थ व्यव्स्था में आदमी मूल मे है और शहर की अर्थ व्यवस्था मे आदमी ना मूल मे है और न सिरे पर वह तो बस धन का वाहक है,,, यानि कि गधा माया को ढो रहा है ना काट रह है बो रहा है.... और इस काटने के चक्कर में अब खुद भी कसाई की दुकान के आगे आ खडा हुआ है जहां उसकी कटाई होनी है... छंटाई होनी है... और साहब इसकी तो साले की बुरशाई भी नहीं हो सकती क्योंकी यह तो किसी निश्चित साईज में पाया ही नहीं जाता कोई दो का तो कोई नो का सब करते हैं घोटाला... शहर की अर्थव्यवस्था का आधार ही घोटाला है जनाब... अब आज ही कि खबर ले लो सत्यम वाले भाईसाहब ने पूरी मौज लूट ली और अब कहते है कि मुझे माफ कर दो.... लो कर लो बात अबे साले ५५ हजार लोगों को बेघर कर दिया और माफी मांग रहे हो... खैर चम्पू और चाचा सत्यम से जरूर निपटेंगे ऐसी कामना के साथ मैं आपको बधाई देता हूं भविषय मे रोज आऊंगा एक बार इन चाचा भतीजों से मिलनी ... बधाई स्वीकार करें.....

Amit Mathur said...

परनाम गुरुदेव, बहुत हैरानी हुयी देख कर की आपके अनुराग मियां कि टिप्पणी पर त्वरित उत्तर दिया. मगर जब उनका प्रोफाइल देखा तो पता चला कि वो तो विदेश में हिन्दी का प्रचार कर रहे हैं. और एक सज्जन विदेश में रहकर आपके ब्लॉग से अनुराग रखता है ये शायद आपके लिए गौरव का विषय होगा. हम पता नहीं कबसे आपके लेखों और विचारों पर टिप्पणिया दे रहे हैं. आपकी इस कलम कि नदिया में अपनी छोटी सी विचारो कि नेहर जोड़ रहे हैं तो आप उसे एक 'साधारण' सी प्राकर्तिक घटना समझ कर उत्तर नहीं देते. सचमुच आपके इस विदेश प्रेम ने कम से कम मुझे तो बहुत व्यथित किया है. इसी व्यथा में आज मैं आपको ये अन्तिम टिप्पणी लिख रहा हूँ. मेरी टिप्पणिया नहीं होंगी तो शायद आपके ब्लॉग पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर आपका ब्लॉग में लगातार पढता रहूँगा. सादर चरणस्पर्श सहित अमित माथुर (saiamit@in.com)

Raag said...

Dear Mr. Mathur,

I have commented on Mr. Chakradhar's blog before on the things I liked. I think he replied this time, just because I was being critical. I do not think there is any foreign love in this matter.

I would hate to see such a blame on Mr. Chakradhar.

Thanks,
~Anurag

Anurag said...

PRANAM KAVIVAR!

Aapka yeh vyangya maine bhi padha. hamesha ki tarah ath se iti tak rochak laga.

VIRGINIA, USA vaale Anurag ji ki comments bhi padhi aur SHIRDI, MAHARASHTRA vaale Mr. Amit Mathur ji ki narajgi bhi.

Comments par comments karna utna theek nahin par itna zaroor kahoonga ki ye aapki hi rachnayen hain jinme ek-ek shabd rochak aur SWADISHT hota hai. phir hazam na hone ka prashna hi nahin uthta. On the other hand, sabhi ki comments par kuchch likh paane ki asamarthata aap JAYAJAYAVANTI SANGOSHTHI mein jaahir kar chuke hai. to Amit Mathur Ji se mein ummeed karta hoon ki Aapke blog par aage bhi comments likhenge.

Ashok Chakradhar said...

प्रिय अमित, योगेश, अनुराग, रंजना, विनय और इरशाद!
प्रतिक्रियाओं के लिए धन्यवाद!
लेखक अपनी रचना-प्रक्रिया को लगातार परिमार्जित करता रह सकता है। सीखने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होना चाहिए। मैं ऐसा मानता हूं। दक्षिण के कवि तिरुवल्लुवर ने लिखा था कि मुट्ठी जितना ज्ञान अर्जित किया है, धरती जितना शेष है। मैंने तो इतना भी नहीं सीखा। हां, उनका मुट्ठी बराबर रहा होगा तो अपना भी चुटकी बराबर तो होगा ही। मैंने लिखा--
जो सीखा चुटकी भर सीखा धरती भर है बाकी,
उस पर अहंकार दिखलाना है ये सीख कहां की। इल्मों के मयख़ाने से जितना चाहो पी डालो,
हर पल रहता खुला और हर दम तत्पर है साकी।

बात आगे बढ़ाने के लिए नया चम्पू कल पोस्ट करूंगा। सत्यम कांड पर एक कुंडलिया आप के लिए हाज़िर है—

सत्यम के संग शिव नहीं,
शिव संग सुन्दर नाहिं,
धन अंसुअन की झील में,
शेयर पड़े कराहिं।
शेयर पड़े कराहिं,
बचा नहिं एक अधन्ना,
बजे तड़पती ताल,
ताक धन धन धन धन्ना।
चक्र सुदर्शन,
हवस खोपड़ी करती धम धम,
हाय असत्यम,
हाय असत्यम,
हाय असत्यम।

कल मेरे ब्लॉग पर आना, और अपनी राय बताना।

लवस्कार
अशोक चक्रधर

सुमित प्रताप सिंह said...

वाह गुरुदेव
सादर ब्लॉगस्ते व
इस लेख के लिए शुभकामनाएं...

sandesh-dixit said...

Bahut khoob !!!