Friday, January 08, 2010

हवा, हंसी, हिम्मत और हौसले की हकदार

—चौं रे चम्पू! हमारी बगीची पै सबते जादा ताकतवर पहलवान कौन ऐ? चल छोड़, आसपास के इलाक़े मैं ई बता, सबते जादा ताकतवर इंसान कौन?
—इंसान की बात पूछ रहे हो न चचा?
—और का जिनाबर की पूछ रए ऐं!
—नहीं चचा, कुछ इंसान कहे जाने वाले लोगों में भी दरिंदे छिपे होते हैं, उनकी बात तो नहीं कर रहे न?
— दरिंदन ते हमें का मतबल!
—हां, अब मैं आपकी बात का जवाब दे सकता हूं। माफ करना, आपकी बगीची पर उससे बड़ा ताकतवर इंसान नहीं है, जितना ताकतवर इंसान मैं अभी देख कर आ रहा हूं। हरप्यारी के घर।
—अच्छा! हरप्यारी के घर कहां के पहलवान आए ऐं रे? का उमर होयगी उनकी?
—हरप्यारी की पोती हुई है चचा, उम्र है एक महीना।
—तू तौ पहलवान की बात कर रयौ ओ।
—चचा यकीन मानिए उससे ज्यादा ताकतवर इंसान पूरे इलाक़े में इस वक्त कोई नहीं है।
—मजाक मती ना कर।

—देखिए चचा, नन्हा बच्चा जिस भी उंगली को पकड़े, कस लेता है। और अपनी पकड़ की मजबूती का रस लेता है। आप कोशिश करिए अपनी उंगली छुड़ाने की। नहीं छुड़ा पाए न! वो आपकी नाकामयाबी पर फट से हंस देता है। ....और चचा अपनी पकड़ की मजबूती का भरपूर रस लेता है।
—वा भई वा! भौत बेहतर बात कही।
—इसीलिए मैंने सबसे पहले पूछा था कि इंसानों की बात कर रहे हैं या जानवरों की। अगर सच्चा इंसान होगा तो नहीं छुड़ा सकता, दरिंदे को एक पल नहीं लगेगा....
—अब का सोच मैं परि गयौ?
—सोचना क्या है चचा! एक चिंता सी होती है। इलाक़े की सबसे बड़ी पहलवान को हम इस सदी में क्या देने वाले हैं। अभी इतनी छोटी है कि उसे पता ही नहीं है कि उसके पास कितनी ताकत है, क्योंकि अभी विवेक नहीं है उसके पास। जिंदगी से संघर्ष करने के ये उसके सबसे मुश्किल दिन होंगे। दूध पिएगी, बतासा खाएगी, आशा जानेगी, निराशा भोगेगी। भाषा सीखेगी, शब्दों के अर्थों को जिज्ञासा से जानेगी। चचा जिज्ञासा या तो बचपन में होती है या फिर उद्भट प्रतिभा में। बचपन में जिज्ञासा हर किसी के पास होती है, लेकिन अच्छे खाद-पानी के अभाव में हमारे देश में बचपन की फसल पर वक्त से पहले ही पाला मार जाता है।

शुद्ध हवा, हंसी, हिम्मत और हौसले की हकदार बने, प्रतिभा के नए-नए द्वार खुलें उसके लिए, तो इसकी जिज्ञासा कभी नहीं मरेगी। फिर ये जैसे-जैसे बड़ी होगी, देश और समाज की समस्याओं के बारे में जिज्ञासाओं से भर उठेगी और निदान सोचेगी। अच्छी शिक्षा, अच्छी सेहत, अच्छा पर्यावास, अच्छा सांस्कृतिक घर-आवास अगर उसे दे सकें तो इस दुनिया को ये नन्हीं पहलवान बदल कर दिखा सकती है। पर आंकड़े निकालो हमारे देश के। देश में चौंतीस करोड़ बच्चे हैं। अस्सी लाख तो स्कूल ही नहीं जा पाते। पैंतीस लाख सड़कों पर रहते हैं। ज्यादातर ऐसे हैं जो कक्षा पांच तक भी नहीं पहुंच पाते। कितने कुपोषण से जूझ कर मर जाते हैं, आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। किसी तरह बच गए तो अमानवीय शोषण उनकी क्षमताओं को लील जाता है।
—ये तो धरती पर आ भी गई, हरप्यारी के खसम ने तो कह दिया था कि लड़की हो गई तो दावत नहीं करने का। चचा, अगर उसका मर्द अपनी पोती की दावत नहीं करता है तो अपन बगीची पर कर लेते हैं।
—हां बगीची फण्ड में तौ भौत पइसा धरौ ऐ ना? दावत! ...पर तू कहै तौ चल कर लिंगे। बेटी के होइबे की दावत तौ हौनी चइऐ।
—थैंक्यू चचा! कभी आपने ये बात सोची है कि बेटे के जन्म के तो कितने ही गीत और लोकगीत हैं, पर क्या कभी बेटी के जन्म का कोई गीत तुमने सुना है?
—तू सुना!
—सुनो, गाओ-गाओ बधाई लली आई,
घर की बगिया में कोमल कली आई ।
फर्क करना ही नहीं, हो लली या कि लला,
बेवजह इस तरह से, सास तू जी न जला।
मीठा मुंह कर सभी का, और तू संग में गा,
तू भी लड़की थी कभी, भूलती क्यों है भला?
जैसे मिश्री की झिलमिल डली आई।
गाओ-गाओ बधाई लली आई।
—रुक जा, रुक जा! ढोलक लाय रयौ ऊं भीतर ते।

Saturday, January 02, 2010

पिच और घिचपिच

चौं रे चम्पू


—चौं रे चम्पू! कहां ते आय रह्यौ ऐ रे? और हाथ में का ऐ?
—आ रहा हूं दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान से और हाथ में हैं बरमूडा की घास के ठूंठ।
—चौं गयौ ओ वहां पै?

—टिकिट के पैसे वापस मिल जाएंगे, यह सोच कर गया था। मैदान में सन्नाटा था। एक तरफ बोतलों, टोपियों, कागजों और चिप्स के खाली पॉलिथिनों का ढेर लगा हुआ था, जिस पर झुण्ड के झुण्ड कौवे बैठे हुए थे। वे भी गुस्से में चोंच न मार दें, यह सोच कर उस तरफ तो नहीं गया, लेकिन पिच पर काफी देर टहल कर आया। समझ में नहीं आया कि पिच में गड़बड़ी क्या थी? हज़ारों दर्शकों की तमन्नाओं पर क्यों पानी फेरा गया? पिच पर ही पानी फेर देते तो बॉल उछाल नहीं लेती। मैं तो समझता था कि क्रिकेट ऐसा खेल है जो कहीं भी, किन्हीं भी, स्थितियों में खेला जा सकता है— बल्ला भी है बॉल भी, संग में डंडे चार, अब देरी किस बात की, किरकिट खेलो यार। खेल ये ठुक ठुक वाला, बड़ा दिलचस्प निराला।

—खेल रोक दियौ, बुरी बात भई!
—बारिश के कारण रोक देते हैं तब भी बुरा लगता है। अरे भीगते-भीगते खेलो, कीचड़ में एकाध फिसल जाएगा और क्या होगा। दर्शकों को दुगुना मजा आएगा— बचपन में खेलें सभी, गली मुहल्ले बीच, पिच की चिन्ता ही नहीं, सूखा है या कीच। लगन यदि सच्ची जागे, फील्ड में दिनभर भागे। क्यों चचा?
—गली-मौहल्ला में जो किरकिट खेलौ करैं, नखरा थोड़े ई दिखामें!
—पर चचा खिलाड़ी लोग जितनी ऊंचाई पर पहुंच जाते हैं उतने ही नखरे बढ़ जाते हैं। राधा अगर चाहे तो दूसरों को छछिया भर छाछ पर नचा ले, खुद नाचने की बारी आई तो नौ मन तेल चाहिए। उछलती बॉल को देखने के लिए परमात्मा ने दो आंखें दी हैं, पर खिलाड़ी आजकल रिस्क नहीं लेते। प्रसिद्धि पाने के बाद उन्हें तो नूरा कुश्ती रोज दिखानी है— डब्ल्यू डबल्यू एफ की, कुश्ती देखें आप। शीघ्र पता चल जाएगा, पहलवान का पाप। चित्त है चारों ख़ाने, भर लिए मगर ख़ज़ाने। लेकिन नूरा क्रिकेट में दर्शकों की जेब पर मार भले ही पड़े, पर खुद मार नहीं खानी— कर थोड़ी सी साधना, पा थोड़ी सी सिद्धि, मिल जाती आराम से चारों ओर प्रसिद्धि। बाद में गोलमाल है, क्रिकिट का यही हाल है। पिच तो दोनों टीमों के लिए एक ही थी। हम भी बड़ी जल्दी विदेशी नखरों की गिरफ्त में आ जाते हैं। बिना बात हल्ला मचा दिया, कोटला में क्रिकेट कलंकित हो गई, क्रिकेट में काला दिन आया। अरे पिच ऊबड़-खाबड़ है या सपाट, खेल के दिखाओ ऑन द स्पॉट। ये क्या कि साहब बरमूडा से घास आएगी, पिच पर लगाई जाएगी, फिर काटी जाएगी, फिर नखरा दिखा के दर्शकों की तमन्ना पर रोलर फिरा दिया जाएगा। वो तो हमारे दर्शक पानी की खाली बोतलें और कुछ कागज फेंक कर ही संतुष्ट हो गए वरना पिच के मिजाज से उनका मिजाज ज्यादा खतरनाक हो सकता था। पहले भी जयसूर्या की उपस्थिति में इसी तरह खेल रोका गया था। क्रिकेट के नाजुक मसीहा, नाजुक सी मामूली बात को कठोर किए दे रहे हैं, बड़े-बड़े सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं, नियम कड़े कर रहे हैं। दो हजार ग्यारह में इसी मैदान पर विश्व कप होना है, कहते हैं कि नहीं होने देंगे।
—भली चलाई! पिच की घिचपिच समझ में नायं आई।
—दो हजार ग्यारह से पहले तो दो हजार दस के राष्ट्रकुल के खेल होने हैं। जिस तरह की हमारी तैयारियां हैं उन्हें देखते हुए तो एक भी खेल न हो पाएगा।

जरा-जरा सी बात पर नुक्ताचीनी करेंगे तो खेल भावना कहां रही। देखना यह चाहिए कि सुविधा या असुविधा हर टीम को समान मिल रही है या नहीं। समान स्थितियों में सम्मान के साथ खेल कर दिखाओ। लंगड़ लड़ाओ, बतंगड़ मत बनाओ। दिल की पिच सही रहनी चाहिए— खेलों का उद्देश्य है, आपस का सद्भाव, ताव दिखाकर जो करें, दिल के पिच पर घाव, प्रेम सीखें कुछ अरसे।
—हां, भेज देओ उनैं मदरसे।

Thursday, December 03, 2009

आत्मा राम की टें टें

चौं रे चम्पू

—चौं रे चम्पू! तेरी हर हफ्ता की चम्पूगीरी कित्ती बार है चुकी अब ताईं?
—हमारा आपका मिलन लगभग दो साल से चल रहा है। हर हफ्ते बुध के दिन निन्यानवै बार चम्पूगीरी हुई है। अगले हफ़्ते शतक पूरा हो जाएगा। चचा, इस बीच पता नहीं कहां-कहां गया, भटका, भागा-दौड़ा। कहीं भी रहा, पर हर बुध को चम्पूगीरी और बगीचीबाज़ी के लिए ज़रूर आया। लोग समझते रहे कि निन्यानवै के फेर में है। चचा, तुम्हारे चम्पू के पीछे ही पड़ गए लोग। लेकिन तुम्हारा चम्पू भी चक्रधर वंश का है। निन्यानवै तक गाली सुन लेता है । शिशुओं का वध नहीं करता पर दुष्ट शिशुपालों को नहीं छोड़ता। बहुत सारे आत्माराम टें टें करने लगे हैं, अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के तीर फेंकते हैं। चम्पू को समझ लिया है चम्पी करने वाला। अब हम-तुम तो हैं ब्रजवासी, बगीचीबाज लोग, वे हैं हिन्दी-वाटिका के रखवाले। वाटिकाओं में इन्हें आत्माएं मिला करती हैं।

—तेरी बात उलझी हुई सी हैं लल्ला।
—अरे चचा, सौ साल पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी के ज़माने में भी टें टें काण्ड चला करते थे। किसी ने अपनी किताब का नाम ‘प्रेम-बगीची’ रख दिया। फिर तो पिल पड़े शुद्धतावादी लोग। ये भी कोई नाम है! ‘प्रेम वाटिका’ होना चाहिए। बगीची शब्द तो फारसी के बाग़ीचा से आया है। बड़े-बड़े बागी तेवर दिखाई दिए बगीची के मामले में। चचा, ये वाटिका के लोग बगीची से डरते हैं। बगीची में शरीर पर मिट्टी लगती है और वाटिका में रूमाल रख के बैंच पर आत्माओं को बुलाया जाता है। प्लैंचिट के सहारे। कैरमबोर्ड की गोटी पर उँगली रख कर जिधर चाहो आत्मा को खिसका लो। हिन्दी की सारी आत्माएं तुम्हारी उँगली के इशारे पर ही तो नाचती है। चचा, इन्हें रास नहीं आता कि कोई बगीचीबाज़ इनकी वाटिका में प्रवेश कर जाए। इन्हें सब कुछ अनस्थिर दिखाई देता है। अनस्थिर पर भी पंगा हुआ था, मालूम है?
—बता।
—द्विवेदी जी ने ‘भाषा की अनस्थिरता’ नाम का एक लेख लिखा । विवाद ‘अनस्थिरता’ शब्द पर हुआ,। बालमुकुन्द गुप्त रूपी आत्माराम ने कहा कि ‘स्थिर’ का उल्टा होता है ‘अस्थिर’, ये ‘अनस्थिर’ क्या हुआ? वाटिकाबाजों ने हालत खराब कर दी एक बगीचीबाज की।। लगातार उकसाते रहे। बगीचीबाज ने निन्यानवै दिन चुप लगाई और सौवें दिन ठोक दिया एक लम्बा सा लेख सरस्वती में। उन्होंने कहा कि कुछ ज्यादा अस्थिर होते हैं, कुछ कम अस्थिर होते हैं, यानी कुछ ज्यादा हिलते हैं, कुछ कम हिलते हैं। ऐसे दोनों लोगों के लिए हम अस्थिर नहीं कह सकते, उनके लिए ‘अनस्थिर’ कहा जाएगा। आज भी वाटिकाबाज लोग स्थिर को अस्थिर और अनस्थिर बनाने के लिए तथ्यविहीन कुचर्चाएं कर रहे हैं। मनुष्यों से सरोकार नहीं, सीधे आत्माएं आती हैं डायलॉग करने के लिए, वाटिका में। चचा, तुम्हारी आत्मा क्या बोलती है? लेख तो तुमने भी पढ़ा होगा?
—लल्ला, जो आदमी अबू आज़मी के बारे में जे कहै कै हिन्दी बोलिकै वानै गल्ती करी, वो अस्थिर ऊ ऐ और अनस्थिर ऊ ऐ।
—ये बात तो खैर व्यंग्य की आड़ में कही, पर कुछ भी जाने बिना संस्थानों की आत्माओं से बात करते हैं। कोई काम करे तो राजनीतिक उद्देश्य से कर रहा है, पुराने जिस आदमी ने काम किया, उसकी राजनीति कुछ और थी, इसकी राजनीति कुछ और है। संस्थानों के शरीर से इन्हें कुछ मतलब नहीं, आत्माओं का रुदन सुनते हैं। टें टें तो अब से सौ साल पहले हुआ करती थी, अब टें टें की जगह भें भें हो गई है। ये किशोर मानसिकता के लोग हैं और हिन्दी पर राज करना चाहते हैं, हिन्दी की आत्मा के ठेकेदार बनकर। पता नहीं कौन से अली का नूर है इनमें? दूसरे को ही गलत मानते हैं और सब्र का इम्तिहान लेते हैं।
—चल सौवीं बैठक में देखिंगे कै तेरौ गुस्सा कित्तौ बचौ।

Saturday, October 31, 2009

जैसे उनके दिन फिरे

चौं रे चम्पू

—चौं रे चम्पू! कहीं जाइबे कौ मन ऐ, कहां जायं? तू चलैगौ मेरे संग?
—एक साथ दो सवाल कर दिए, चचा। जवाब में दो सवाल सुन लीजिए। पहला यह कि किस उद्देश्य से जाना चाहते हैं और दूसरा यह कि वहां मेरे साथ की क्या ज़रूरत है?
—देस की भलाई के ताईं कहीं भी…. और तू रहैगौ मेरौ सलाहकार।
—ठीक है, समझ गया चचा! दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, पड़ोस के किसी गांव की दलित बस्ती की कोई झोंपड़ी ढूंढ लीजिए, वहां अपनी बगीची की कुछ सब्जियां और गैया के घी का एक डिब्बा लेकर पहुंच जाइए। अपने आपको उनका दूर का रिश्तेदार बताइए। सामान देखते ही वे आपको बहुत निकट का समझेंगे। परिवार के नौजवानों और बहू-बेटियों की दुख-तकलीफ सुनिए। मौसम अच्छा है, न एसी की ज़रूरत है न हीटर की। वहां रह कर गरीबी को समझने की कोशिश कीजिए।
—जे का बात भई? हम गरीबी के सबते करीबी रिस्तेदार ऐं। हम का गरीबी ऐ जानैं नाऐं?
—चचा पूरी बात तो सुनो। आप गरीबी को अच्छी तरह जानते हैं, पर गरीब अपनी गरीबी को नहीं जानता। आपको उसके लिए निदान सोचने हैं। गरीब को अपने श्रम का प्रतिदान नहीं मिलता। कुछ कृपानिधान क़िस्म के लोग कभी कभी दान दे देते हैं और सरकार अनुदान दे देती है। स्थाई कल्याण फिर भी नहीं हो पाता। मेरी योजना है कि किसी तरह श्री राहुल गांधी को उस झोंपड़ी तक लाया जाए। वे इन दिनों दलितों के घर जाकर पूरे मन से गरीबी को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
—विचार नेक ऐ, तू चलैगौ मेरे संग?
—ना, ना चचा। लोग मुझे पहचानते हैं। मेरी काया का शहरीकरण हो चुका है। आप गरीबी में नहाए-धोए लगते हैं। मैं नहीं जाऊंगा, मोबाइल पर आपके साथ रहूंगा। राहुल जी को वहां लाने का काम मेरा है।
—आगे बता।
—जब वे दलित की उस झोंपड़ी में आ जाएं तो वहां सत्यनारायण भगवान की कथा कराइए। कथा में लीलावती-कलावती की गरीबी की व्यथा बताइए। कथा के बीच में जब-जब सत्यनारायण की जय बोली जाय तब –तब कहिए कि आज इस कुटिया में राहुल भैया खुद सत्यनारायण दरिद्रनारायण बनकर आ गए। अब लीलावती-कलावती के पूरे परिवार के दिन फिरेंगे। बीच-बीच में कीर्तन भी कराते रहना।
—कौन सौ कीर्तन?
—जय राहुल भैया, स्वामी जय राहुल स्वामी। तुम पूरे सौ पइसा लाए, नब्भै पइसा लुक्कन खाए। हैं बिचौलिए बड़े कसइया, करौ इंतजामी। स्वामी जय राहुल स्वामी। आगे का कीर्तन भी बना दूंगा। राहुल भइया बड़े कृपालु हैं। जहां ठहरते हैं उसके आस-पास कोई कारखाना या पावर-प्लांट लगवा देते हैं। हालांकि ये बात वे जानते हैं और उनके पिताजी भी कहते थे कि केन्द्र से सौ पैसे भेजे जाते हैं, लेकिन विकास के लिए पन्द्रह पैसे ही पहुंच पाते हैं। चचा, आज भी पिच्चासी, नब्भै या पिचानवै पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं। घाट-घाट का पानी पिए घुटे हुए घोटालेबाज़ जब विकास के नए घाट पर ऐय्याशी करते दिखाई देते हैं, बेशर्म रंगरेलियां मनाते दिखाई देते हैं, तो वहां फनफनाते हुए आ जाते हैं नक्सलवादी। असल समस्या घाट-घाट के इन घुटे घोटालुओं की है। आपका काम होगा इलाके के घोटालुओं का उन्हें सही-सही ब्यौरा देना। आप झोंपड़ी में उनके साथ होंगे, बातचीत का पूरा मौका मिलेगा। सारे रहस्य उनके कान में बताना। क्योंकि जिन लोगों के साथ वे आएंगे, उनमें से एक-दो सफेद खादी का खोल पहने हुए घोटालू भी हो सकते हैं। यों राहुल भैया को अच्छे बुरे की गहरी पहचान है पर हर घुटा हुआ घोटालू तिकड़मबाज़ी में महान है। कुछ तो रेलिंग के बाहर माला लेकर खड़े होंगे। आप उस झोंपड़ी के मुखिया के तौर पर उन्हें सारी पोलपट्टी बता देना। बताना कि गरीब इसीलिए पिचा हुआ है, क्योंकि पिचासी-पिचानवै प्रतिशत पचाने वाले उस झोंपड़ी से बहुत दूर नहीं हैं। जो बताना, आत्मविश्वास के साथ बताना। लीलावती-कलावती के व्यापक परिवार की परम व्यापक ग़रीबी का वस्तुवादी ब्यौरा देना। वे अपने सचिव को निर्देश देंगे कि लीलावती-कलावती इलाके को केन्द्र से विकास का कौन सा पैकेज दिलवाना है। मौका देखकर उस परमानेंट डायलॉग से कथा खत्म करा देना।
—कौन सौ डायलौग?
—जैसे इनके दिन फिरे, वैसे हर किसी के फिरें।

Friday, October 23, 2009

ट्रैक्टर शाह द्वारा कुचली हुई ग़रीबी

—चौं रे चम्पू! मिठाई की जगै नमकीन दै गयौ, तोय सरम नायं आई?
—तुमने सुना नहीं चचा, अधिकांश मिठाइयां सिंथैटिक दूध और सिंथैटिक खोये से बनाई जा रही हैं? बगीची पर रह कर जो सेहत आपने बनाई है उसे बिगाड़ने का मुझे कोई अधिकार नहीं। मावे में गैया मां का दूध नहीं है। उसमें है पाउडर, सूजी, मैदा, वनस्पति या चर्बी वाले तेल, और तो और ब्लॉटिंग पेपर भी। मावे की मिठाइयां चार-पांच दिन में खराब हो जाती हैं। नमकीन चलेगी महीने भर।
—नमकीन कौन से तेल में तली ऐ, जाकौ ज्ञान है तोय? मिलावट तौ नए जमाने कौ उपहार ऐ, दूध की नदियन के देस में दूध-दही कौ अकाल! कमाल है गयौ भइया।
—चचा पिछले दिनों एक रेल यात्रा में कवि उदय प्रताप सिंह जी ने दूध की कमी के दो दिलचस्प कारण बताए। पहला ट्रैक्टर और दूसरा फर्टिलाइजर।
—सो कैसै भैया?
—देखिए खेती-बाड़ी का सारा काम बैलों के भरोसे होता था। जुताई, बुवाई, बिनाई, बरसाई, सिंचाई और अनाज की सप्लाई, सारा काम बैल करते थे। हल, रहट और गाड़ी, बैल रहते थे इनके अगाड़ी। घर में गैया न हो तो बैल कहां से आएं? ट्रैक्टर ने बैल, गैया और बछिया की ज़रूरत ख़त्म कर दी। इन्हीं से मिलता था खाद के रूप में गोबर, उसकी जगह आ गए यूरिया जैसे फर्टिलाइजर। हमारे देश में गोवध को पाप भी माना जाता है। सो लोगों ने पालना ही बन्द कर दिया। अब दूध के लिये निहारो, सिंथैटिक पाउडर की तरफ और होने दो पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे धड़ल्ले से मिलावट का कारोबार।
—तेरे उदय प्रताप की बात में दम ऐ। लाला भगवान दीन नै गैया पै एक कवित्त लिखौ ओ। हमेसा अपनी सुनायौ करै, आज हम तेऊ सुनि लै … ‘थोरे घास पानी में अघानी रहै रैन दिन, दूध, दही, माखन मलाई देत खाने को। / पूतन तें खेती करवाय देत अन्न-वस्त्र, जाके धड़ चाम आंत गोबर ठिकाने को। ऐसी उपकारी की कृतज्ञता बिसारि अब, भारत निवासी मारे फिरें दाने-दाने को।’
—यानी समस्या सौ साल पहले भी थी, लेकिन तब तक ट्रैक्टर, फर्टिलाइजर नहीं आए थे। अब के ‘भारत निवासी’ उपभोक्ता में बदल गए हैं चचा। बाज़ार की चीजें ज़रूरतों को व्यर्थ ही बढ़ा रही हैं। पहले दीपावली-दूज पर खांड-बताशे बांटे जाते थे। ज्यादा हुआ तो बेसन-बूंदी के लड्डू! अब देखिए, एक से एक फ़ैंसी मिठाई बाज़ार में आई। मिलावटी हवा-पानी के सेवन से हम हर प्रकार की मिलावट को पचाने में समर्थ होते जा रहे हैं। माना कि दवाइयां आदमी की उम्र बढ़ा रही हैं, पर साथ में मिलावट का ज़हर भी पिला रही हैं। लाला भगवान दीन होते तो देखते कि भगवान की कृपा से भारत में लाला भी बढ़े हैं और दीन भी। एक अरब सत्रह करोड़ की आबादी वाले देश में लगभग दो तिहाई लोग गांव में रहते हैं और गावों में घुसता जा रहा है शहर। शहर हमारे ग्रामीण-जन को उपभोक्ता में तब्दील कर रहा है। दांतुन, रीठा, मुल्तानी मिट्टी और रेह के दिन अब लद गए। अब वहां टूथपेस्ट, शैम्पू, डिटर्जैंट और कॉस्मैटिक्स पहुंच चुके हैं, क्योंकि इनसे पहले पहुंच चुका था टी.वी.। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के लिए धंधे का भविष्य गावों में ही है। शहर के उपभोक्ता अपनी ज़रूरतों की चीज़ें कर्ज़ ले लेकर खरीद चुके हैं। अब दुपहिए, चौपहिए, गांवों की मांग बन रहे हैं। गांवों में कारों की खरीदारी में दस प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है। महिन्द्रा स्कोर्पिओ पहले बीस प्रतिशत जाती थी, अब पैंसठ प्रतिशत। मोबाइल इस्तेमाल करने वाले दस करोड़ लोग गांवों में रहते हैं। गांवों में गाय नहीं मिलती तो क्या, पॉप गायन मिलने लगा है। गांव हो या शहर, अमीरी जी भर कर नाच रही है और गरीबी ट्रैक्टर शाह के द्वारा कुचली हुई हालत में खेत की मेंड़ पर पड़ी है। एक ओर उपभोक्ता के सामने मिलावटी माल का शानदार पोषण है तो दूसरी ओर अन्न का अभाव और कुपोषण है। आज भारत का उपभोक्ता-बाज़ार विश्व में बारहवां स्थान रखता है, बाज़ार के ग्लोबल गुरू कहते हैं कि यह दो हज़ार पच्चीस तक नम्बर वन के आस-पास आ जाएगा।
—आंकड़े दिखाय कै डरा मती! मोय तौ अपनी गैया की सानी कन्नी ऐ और पानी दैनौ ऐ। खालिस दूध की खीर खाइबे आ जइयो, मोय नमकीन खाय कै गमगीन नायं हौनौ।

Monday, September 28, 2009

रावण से नाभिनालबद्ध रावण

रावण ‘दुष्ट-दुराचारी-अधर्मी’ था, ऐसा वाल्मीकि ने बताया और ‘अहंकारी’ था ऐसा बताया तुलसी बाबा ने। हर अहंकारी दुष्ट-दुराचारी-अधर्मी नहीं होता और हर दुष्ट-दुराचारी-अधर्मी अहंकारी हो यह आवश्यक नहीं। राम के चरित्र को खूब उजला बनाने के लिए तुलसी बाबा ने रावण को इतना बुरा नहीं बनाया, जितना बाकी ग्रंथ बताते हैं। उससे राम का कद कम होता। तुलसी ने रावण का क़द बढ़ाया। उसे विद्वान और धर्म पर चलने वाला बताया। रावण जैसा भी था पर उसका क़द आज भी बढ़ रहा है। रामलीलाओं में तो पुतलों की ऊंचाई बढ़ रही है, पर पुतलियों को न दिखाई देने वाले अदृश्य रावणों का क़द गगनचुम्बी होता जा रहा है। रावण यदि दिखाई भी देता है तो मायावी टैकनीक से राम का भेष धार लेता है।

कूर्मपुराण, रामायण, महाभारत, आनन्द रामायण, दशावतारचरित, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण आदि ग्रंथों में रावण का उल्लेख तरह-तरह से मिलता है। एक बात सभी में स्वीकारी गई है कि रावण अपनी दानवी शक्तियों को बनाए रखने के लिए तपस्यानुमा चापलूसी द्वारा महान देवताओं को खुश करना जानता था। ब्रह्मा जी से उसने वरदान मांगा कि गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिए अवध्य हो जाऊं। ब्रह्मा जी ने तपस्या से प्रसन्न होकर ‘तथास्तु’ की मोहर लगा दी। फिर तो रावण की बन आई। उसने कुबेर को हराकर पुष्पक विमान छीन लिया जो मन की रफ्तार से भी तेज़ चलता था। जिसकी सीढ़ियां स्वर्ण और मणि-रत्नों से बनी हुई थीं। एक ग्रंथ बताता है कि उसका पुष्पक विमान एक बार भगवान शंकर के क्रीड़ा-स्थल पर्वत शिखर के ऊपर से जा रहा था। अचानक विमान की गति अवरुद्ध हुई, डगमगाने लगा। अहंकारी रावण हैरान रह गया। उसे विमान उतारना पड़ा। शंकर के पार्षदों ने भगवान शंकर की महिमा बताई तो क्रोधित होते हुए बोला कि कौन है ये शंकर? मैं इस पर्वत को ही समूल उखाड़ फेंकूंगा। शंकर के नंदी उसे रोकते, उससे पहले ही रावण ने पर्वत को उखाड़ना शुरू कर दिया। पर्वत हिला तो शंकर ज़्यादा हिल गए। आवेश में आकर उन्होंने अपने पैर का अगूंठा पर्वत पर रखा तो रावण के हाथ बुरी तरह दब गए। पीड़ा से रावण चिल्लाने लगा। भयानक ‘राव’ यानी आर्तनाद किया। तीनों लोकों के प्राणी भयभीत होकर रोने लगे। तभी से उसका नाम रावण भी पड़ गया। मज़े की बात यह है कि उसने शंकर भगवान को भी अपनी तपस्या से प्रसन्न कर लिया और जारी रखा अपने अत्याचारों और अनाचारों का सिलसिला।

रावण के बारे में यह कहानियां सब जानते हैं। इन दिनों देश भर में जितनी रामलीलाएं चल रही हैं, लोगों का मनोरंजन कर रही हैं। मनोरंजन राम नहीं कर पाते, रावण कर रहा है। उसके डायलॉग पर ज़्यादा तालियां पिटती हैं। उसके मेकअप और कॉस्ट्यूम पर ज़्यादा पैसे खर्च होते हैं। रावण राम से ज़्यादा पारिश्रमिक लेता है। अंत सबको मालूम है कि पुतला फुकेगा। सवाल यह उठता है कि एक अधर्मी-अहंकारी के मरने में इतनी देर क्यों लगती है। मिथक प्रतीकों को देखें तो निष्कर्ष निकलता है कि अधर्म के पास धार्मिक मुखौटे होते हैं और अपने अहंकार को ऊँचाई देने के लिए अपने से किसी न किसी बड़े का अहंकार पोषित करना पड़ता है। रावण ने ब्रह्मा जी के अहंकार का पोषण किया और वरदान पाया। भगवान शंकर के अहंकार का पोषण करके उसे वरद हस्त मिला। उसने अपने स्वेच्छाचार जारी रखे।

तीसरा नेत्र रखने वाले शंकर को क्या पता नहीं था कि मुझसे वरदान लेकर यह दुष्ट निरीहों और सज्जनों को सताएगा। ब्रह्मा जी की क्या मति मारी गई थी जो रावण को वरदान दिया। कहानी से नतीजा यही निकलता है कि अच्छे लोगों के अहंकार का पोषण करके बुरे लोग अपने अहंकार का क़द बढ़ाते हैं और सत्कर्मियों और निरीहों को सताते हैं।
हाईकमान को प्रसन्न करके रावण अपना कद बढ़ाता जाता है। इतना बढ़ा लेता है कि एक वक्त पर हाईकमान को भी भारी पड़ने लगता है। वह क्लोन-कला में भी निष्णात है। अपने दस क्लोन तो वह त्रेता युग में ही बना चुका था। आज उसके हज़ारों क्लोन समाज में फैले हुए हैं। वोट की ताकत रखने वाली जनता उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।

मुक्तिबोध ने एक कविता लिखी थी— ‘लकड़ी का बना रावण’। जब तक जनता सोई रहती है, तब तक सत्ता का लकड़ी का बना रावण स्वयं को नीचे के समाज से अलगाता हुआ, जनता को जड़-निष्प्राण कुहरा-कम्बल समझता हुआ, उस कुहरे से बहुत ऊपर उठ, शोषण की पर्वतीय ऊर्ध्वमुखी नोक पर स्वयं को मुक्त और समुत्तुंग समझता है और सोचता है कि मैं ही वह विराट पुरुष हूं— सर्व-तंत्र, स्वतंत्र, सत्-चित्। वहां उसके साथ शासन-प्रशासन का शून्य भी है, जो उस छद्म सत्-चित् के अहंकार का पोषण करता है। मुक्तिबोध ने एक जगह लिखा है— "बड़े-बड़े आदर्शवादी आज रावण के यहां पानी भरते हैं, और हां में हां मिलाते हैं। जो व्यक्ति रावण के यहां पानी भरने से इंकार करता है, उनके बच्चे मारे-मारे फिरते हैं।"
उनकी कविता में जैसे ही अकस्मात कम्बल की कुहरीली लहरें हिलने-मुड़ने लगती हैं, सत्ता का लकड़ी का बना रावण और उसके शून्य का 'सर्व-तंत्र' सतर्क हो जाते हैं।



पहले तो जनता का यह विद्रोह, उसे 'मज़ाक' दिखाई देता है लेकिन जनतंत्री नर-वानरों को देखकर भयभीत भी होता है। वह आसमानी शमशीरों, बिजलियों से भरपूर शक्ति से प्रहार करवाता है, किंतु जनता ऊपर की ओर बढ़ती ही जाती है। लक्ष-मुख, लक्ष-वक्ष, शत-लक्ष-बाहु रूप था पर अकेला होते ही रावण शक्तिहीन हो जाता है। आदेश व्यर्थ जाते हैं, और अब गिरा, तब गिरा....। मुक्तिबोध की फैंटैसी आज साकार होती नहीं दिख रही। आज रावण घबराता नहीं है, चाटुकारिता के लिए अपने से बड़ा रावण ढूंढ लेता है और निरीह के ऊपर सताने का तम्बू ताने रहता है। राम को मालूम है कि नाभि में तीर मारा जाए तो रावण मर जाएगा लेकिन आज के रावण से ‘नाभिनालबद्ध’ कितने ही रावण हैं। राम के तरकश में सबके लिए तीर नहीं हैं।

Friday, September 25, 2009

हिन्दी के शुतुरमुर्ग और चतुर मुर्ग

—चौं रे चम्पू! का चल रह्यौ ऐ इन दिनन?

—रमज़ान का महीना खत्म हुआ, चाँद की नूरानियों से मुहब्बतें जगमगा उठीं, ईद का गले-मिलन हो चुका। इन दिनों नवरात्र के समारोह चल रहे हैं, रामलीलाएं चल रही हैं। दशहरा पर रावण के मरने का इंतज़ार है। हां, ...और चल रहा है हिन्दी पखवाड़ा।

—हिन्दी पखवाड़े में भासान कौ गले-मिलन है रह्यौ ऐ कै अंग्रेजी की ताड़का के मरिबै कौ इंतजार?

—क्या बात कह दी चचा! मैं तो गले-मिलन सम्प्रदाय का हूं। हिन्दी की भलाई इसी में है कि भारत की विभिन्न भाषाएं उससे गले मिलें। अपने-अपने भावों और अनुभावों का आदान-प्रदान करके अभावों के घावों को भरें। हिन्दी को अपनी सहोदरा और सहेली भाषाओं से ईदी मिले। और चचा, अंग्रेज़ी की ताड़का रावण की तरह कभी मर नहीं सकती। उसे ताड़का कहना भी ग़लत है अब। पूरा विश्व उसकी ओर ताड़ रहा है और वह ताड़ की तरह ऊंची होती जा रही है। भारत में उस ताड़ पर लटके हिन्दी के नारियल धरती पर हरी घास की तरह फैलती अपनी भाषा के विस्तार को देखते हुए भी अनदेखा करते हैं। वे मानने को तैयार नहीं हैं कि हिन्दी को आज पूरी दुनिया से ईदी मिल रही है। हिन्दी के अख़बार देश में सबसे ज़्यादा पढ़े जाते हैं। हिन्दी फिल्मों और टेलिविज़न धारावाहिकों ने अपनी पहुंच न केवल देश में बल्कि विदेशों तक में बढ़ा ली है। बोलने वाले लोगों की संख्या की दृष्टि से हिन्दी अगर नम्बर एक पर नहीं है तो नम्बर दो पर तो अवश्य है। अंग्रेज़ी के ताड़ पर चढ़े लोगों को हिन्दी के विस्तार के आंकड़े पसन्द नहीं आते।

—कौन लोग ऐं जिनैं पसन्द नायं आमैं?

—चचा क्या बताएं? दोस्त लोग ही हैं। जैसे मैं अड़ जाता हूं, वैसे वे भी अड़े हुए हैं। वे पूर्ण यथार्थ से आंखें मूंदकर अपने अनुमानों और खंड-यथार्थ पर आधारित आंकड़े पेश करते हैं। जिस देश का जनतंत्र अस्सी प्रतिशत हिन्दी बोलने-समझने वालों पर टिका है उसे पाँच प्रतिशत अंग्रेज़ी बोलने वाले चला रहे हैं। माना कि अंग्रेज़ी बड़ी समृद्ध भाषा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका प्रभाव है। वह चीन, जापान, रूस जैसे देशों द्वारा भी अपनाई जा रही है, जिन्होंने अपनी भाषा में ज्ञानोत्पादन और उच्चस्तरीय शिक्षा-साहित्य का न केवल प्रबंध कर लिया था, बल्कि उसके ज़रिए उपलब्धियां पाकर भी दिखा दी थीं। चचा, आज हिन्दी भी बढ़ रही है और अंग्रेज़ी भी। हिन्दी को मुहब्बत की ईदी मिल रही है और अंग्रेज़ी को औपनिवेशिक लंका की स्वर्ण मुद्राएं। अंग्रेज़ी पैसा कमा कर दे रही है और हिन्दी मुहब्बत। ज़ाहिर है कि दोनों की अपनी-अपनी ताक़त हैं। मुहब्बत हार भी सकती है और पैसे को हरा भी सकती है।

—मुहब्बत कभी नायं हार सकै लल्ला। मुहब्बत के रस्ता में कौन आड़े आय रए ऐं जे बता?

—ज़्यादा नहीं बहुत थोड़े लोग हैं। लेकिन जब वे बात करते हैं तो उसमें दम नज़र आता है। ऐसे लोग जाने तो हिन्दी के कारण जाते हैं, लेकिन अपनी धाक अंग्रेज़ी के कारण जमाते हैं। अंग्रेज़ी का हौआ दिखाकर घनघोर निराशावादी बात करते हैं कि हिन्दी सिर्फ ग़रीबों-गुलामों की भाषा बनकर रह जाएगी। उनके सामने अगर कह दो कि हिन्दी फैल रही है तो उनके चेहरे फूल जाते हैं। वे हिन्दी अख़बारों, हिन्दी चैनलों से ही उदरपूर्ति करते हैं पर इधरपूर्ति करने के बजाए उधरपूर्ति करते हैं। ऐसे ही एक अंतरंग मित्र का कहना है कि हिन्दी वालों की हालत शुतुरमुर्ग जैसी है जो खतरा देखकर अपनी गर्दन रेत में घुसा देता है।

—तैनैं का जवाब दियौ?

—मैंने कहा दोस्त प्रवर हिन्दी में चतुर मुर्ग भी बढ़ते जा रहे हैं, जो हिन्दी के शुतुरमुर्ग की चोंच को रेत से निकालने में लगे हुए हैं। उसे बता रहे हैं कि अंग्रेज़ी हमला नहीं कर रही है शुतुरमुर्ग, सहयोग दे रही है। हिन्दी के शब्दकोश को निरंतर शब्द प्रदान कर रही है। अभी तक अंग्रेज़ी ने भाषाई मुर्ग़ों को लड़ाया है। अब वक्त आया है कि हम मुर्ग़े अपनी कलंगी ऊपर करके शुतुरमुर्ग को दिखाएं और उसे बताएं कि तू पक्षियों में सबसे बड़ी प्रजाति का है। तेरी गर्दन और पैर सबसे लंबे हैं। तू वृहत है और आवश्यकता पड़ने पर बहत्तर किमी प्रति घंटे की गति से भाग सकता है जो इस पृथ्वी पर पाये जाने वाले किसी भी अन्य पक्षी से अधिक है।

—और कोई फंडा?

—शुतुरमुर्ग से मिलता है सबसे बड़ा अंडा।