चक्रधर की चकल्लस
चक्रधर के मस्तिष्क के ब्रह्म-लोक में एक हैं बौड़म जी। बौड़म जी भी एक नहीं हैं, अनेक रूप है उनके। सब मिलकर चकल्लस करते हैं, जिसमें कभी जीवन-जगत की समीक्षाई हो जाती है तो कभी कविताई हो जाती है। यहां आपको जीवंत चकल्लस पढ़ने को मिलेगी। घर के बेलन से लेकर हिन्दी विश्व हिन्दी सम्मेलन तक, जीवन-मरण से लेकर उनके संस्मरण तक, सब कुछ मिलेगा। कभी-कभी कुछ विदुषी नारियां अनाड़ी चक्रधर से सवाल करती हैं, उनके जवाब भी इस चकल्लस में आपको मिलेंगे। यह चकल्ल्स आपको रस देगी, चाहें तो आप भी इसमें कूद पड़िए। लवस्कार!
Saturday, May 10, 2008
Tuesday, April 29, 2008
भज्जी की गांधीवादी संतई
—चौं रे चम्पू! कोई हल्लेदार बात बता?
—चचा गांधी के देश में लोग गांधीवादी सिद्धांतों को भूल गए। आम आदमी गलती करे तो कोई बात नहीं अब तो संत लोग भी गलती करने लगे।
--खुलासा बताऔ, कौन से संत की बात है रई ऐ?
--श्रीसंत की। गाल पर एक थप्पड़ खाने के बाद दूसरा आगे कर देना चाहिए था। मार ले। पर चूक गया। गांधीवाद आहत हुआ। उससे बड़ा गांधीवादी तो हरभजन सिंह है। माना कि उसने थप्पड़ मारा पर वो ज़्यादा बड़ा गांधीवादी है। मैं तो कहूंगा कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म का अनुयायी।
--सो कैसे?
--चचा, वो क्षमा मांगना जानता है। जैसे ही उसे पता चलता है कि गलती हो गई। माफी मांग लेता है। गांधी जी ने ये नहीं कहा कि गलती मत करो, करो, जानबूझ कर मत करो। हो जाए तो चरण पकड़ लो। चचा हरभजन हरि का भजन करने वाला शांतिप्रिय प्राणी है। क्रोध तो उसका आभूषण है। ज़रा देर के लिए आता है और चला जाता है। माफी उसका औज़ार है।
--यानी के वाके पास हर बार गलती करिबे कौ लैसंस ऐ। बहुत खूब भईया। तौ माफी कब-कब मांगी वाने?
--दारू कम्पनी रॉयल स्टैग के एक विज्ञापन में भज्जी ने बाल खोल के फोटो खिंचवा लिया। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने विरोध जताया। कहा कि सिखों की भावनाएं आहत हो रही हैं। भज्जी बोला अपना पुत्तर मानते हो तो सीधे बताते कमेटी तक क्यों गए। पट्ठे ने माफी मांग ली।
--ठीक कियौ।
--गुरु चैपल के ख़िलाफ़ गांगुली के फेवर में कुछ ऐसी कह दी कि गुरु हो गए गरम। भज्जी पैंतरा बदल के नरम। माफ कर दो गुरु। बात खतम। फिर आस्ट्रेलिया में साइमंड्स को “बिग मंकी” बोल दिया। हालांकि ये गाली नहीं है, पर कंगारूओं को लग गई। भज्जी फौरन माफी मांगने को तैयार, पर मामला देश की इज्जत का था। हमारी टीम ने कहा, भज्जी माफी नहीं मांगेगा। कंगारू भी अड़ गए। तीन मैच के लिए पाबंदी लगा दी। माफी मांगने देते तो मामला दब जाता, पर बेचारे गांधीवादी की सौम्यता को सामने नहीं आने दिया। उल्टे उन्हीं को धमकी दे दी- साइंमड्स को निकालो, वरना हम वापस जाते हैं। कंगारूओं ने हथियार डाल दिए। पैसा तो विज्ञापनों के ज़रिए हिन्दुस्तान से ही आता है, सो लगाया बैन उठा लिया। चचा अगर याद हो तो गांधी जी ने भी साइमन कमीशन के समय ‘निकालो’ का नारा दिया था। इससे पता चलता है कि हमारा भज्जी तो गांधी जी से भी ज़्यादा बड़ा गांधीवादी है। उसने ऐसा कहा ही नहीं। अब हल्ला हो रहा है श्रीसंत के मामले का।
--जे सिरीसंत कहां के संत ऐं?
--काहे के संत हैं? रो दिए। कबड्डी में खो-खो में गुल्ली-डंडा में कितनी ही बार हम भी पिटे हैं। खेल के मैदान की मारा-मारी तो खेल का हिस्सा है। पर मीडिया अपना घिस्सा लग
ाए बिना थोड़े ही मानेगी। भज्जी ने संत से माफी मांग ली। संत ने भी आंसू पोंछ के कहा कि भज्जी मेरे ‘पा’ यानी बड़े भाई। बात हो जाती आई-जाई पर मीडिया ने नहीं पचाई। नौबत ये कि भज्जी पा फिर से बाहर हो सकते हैं। माफी नहीं है काफी। खेलते तुम ज़रूर हो लेकिन मैदान हमारा है। मार-पिटाई अगर कैमरा के सामने आई तो खेल में पड़ जाएगी खटाई।
--खेल में खटाई पडैगी कै खेल खटाई में पड़ जांगे?
--एक ही बात है चचा।
Friday, March 28, 2008
दूध का पानी और पानी का दूध
--हां चचा, नाश्ता-पानी हो गया।
--पानी तौ ठीक ऐ, नास्ता में का पायौ?
--चचा, तुम्हारी तरह जलेबी कचौड़ी तो दबा नहीं सकते। तुम तो इस उमर में भी चकाचक गुंजिया-पेड़े पचाते हो, अपन ठहरे नए ज़माने के अधेड़। बीमारियों के पुलिंदे। ये खाओ तो ये बीमारी वो खाओ तो वो बीमारी। पानी के अलावा थोड़ा सा दूध पिया, कटोरी भर अंकुरित चने, और बस तुम्हारे पास आ गए।
--तौ दूध पियौ और पानी पियौ! नास्ता में दूध कौ दूध कियौ और पानी कौ पानी! वाह राजा जानी!
--चचा दूध का दूध और पानी का पानी तो पाकिस्तान में हुआ है। अब बताओ, न्याय देने वालों को भी अगर तुम बंद कर दोगे तो इस राजसत्ता में कैसा जनतंत्र? तानाशाही इंसाफ से डरती है चचा! पर वाह रे गिलानी, तूने आते ही खुश कर दिए पाकिस्तानी।
--लल्ला, बात खुलासा करौ।
--चचा प्रधान मंत्री बनते ही यूसुफ रज़ा गिलानी ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी और साठ अन्य जजों को तत्काल आदेश से बरी करा दिया। इसको कहते हैं दूध का दूध और पानी का पानी।
--सब कहिबे की बात ऐ। दूध चौबीस घंटा में खराब है जायौ करै। पहलै ऐसौ होतौ ओ, भोर में कोई अपराध भयौ, सांझ ढले पंचायत बैठी। बताय दियौ कित्तौ दूध, कित्तौ पानी।
--क्या बात कह दी चचा! देर हो जाए तो दूध फट जाता है या जम जाता है। जनतंत्र की न्यायपालिका मठा से न्याय का मक्खन निकालती हैं। दूध का पानी कर देती हैं और पानी का दूध बना देती हैं। विलंब से मिला न्याय अन्याय के बराबर है। न्यायालयों में सालों तक मुकदमे घिसटते रहते हैं लेकिन इन्हें तो चार महीने ही हुए थे। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चौधरी साहब
बाल्कनी से जनता को दर्शन दे रहे हैं। समर्थन के लिए धन्यवाद दे रहे हैं। अरे न्यायाधीश कभी जनता से मिलते हैं? अकेले रहते हैं। न्यायाधीश न धन्यवाद दे सकता है और न किसी का धन्यवाद ले सकता है। समर्थन के लिए धन्यवाद देगा तो फिर न्याय कैसे कर पाएगा। न्याय एकांत में हृदय से होता है और विचारक का काम करती है आत्मा। चचा, पास्कल ने कहा था कि बलरहित न्याय असमर्थ होता है और न्यायरहित बल अत्याचार होता है। क्या किया मुशर्रफ ने? अब मुशर्रफ मियां अपनी खैर मनाएं उनका दूध फटने वाला है।--चम्पू! न्याय तौ जनता करै है। पाकिस्तान की जनता नै न्याय कर दियौ, अब न्यायाधीस कानून की लकीर पीटौ करें, वाते का?।
--चचा! न्याय बड़ी पेचीदा चीज़ है। मेरे नाना कहा करते थे कि तुम उसको क्या सज़ा दोगे जो ऊपर से देखने में तो ईमानदार है लेकिन मन का चोर है, तुम उसे क्या सज़ा दोगे, जो बाहर सिर्फ एक हत्या करके रोज़ अपनी आत्मा को मारता है। तुम उसे क्या सज़ा दोगे जिसके अपराध कम और पश्चाताप ज़्यादा हैं। चचा, कानून लकीर का फकीर है और लकीर न तो पानी पर टिकती है न दूध पर। कैसे करोगे दूध का दूध और पानी का पानी। कैसे करोगे दूध पानी के बीच में लकीर।
जनता का समर्थन पाए हुए जज अब जीती हुई जनता का पक्ष लेंगे, न्याय का पक्ष न भी लें तो चलेगा। लो एक ताजा कवित्त सुन लो--ओ रे मुश अभिमानी, तूने करी मनमानी,
अब याद कर नानी, तेरा सिर है दुनाली पे।
दांव पे है ज़िन्दगानी, बुश करे आनाकानी,
तेरी कुर्सी चूहेदानी, लात लगी तेरी थाली पे।
उठ चुका दाना-पानी, ख़त्म होगी सुल्तानी,
आरी जिसपे फिरानी, तू तो बैठा उस डाली पे।
वाह रे गिलानी, तेरा काम है तूफ़ानी
खुश हुए पाकिस्तानी, साठ जजों की बहाली पे।
Monday, March 10, 2008
औरों को भी बुद्धि आनी चाहिए
--चौं रे चंपू! जमाने में आजकल्ल अच्छे काम जादा है रए ऐं कै बुरे?
--चचा, काम तो अच्छे ही ज़्यादा होते हैं, पर नज़र में आने की बात है। अच्छे कामों पर लोगों की नज़र कम जाती है बुरे कामों पर ज़्यादा जाती है, इसलिए ऐसा लगता है कि बुरे काम ही ज़्यादा हो रहे होंगे। और चचा, बुरी चीज़ देखने में, बुरी बात सुनने में बड़ा मज़ा आता है। अच्छी बात एक कान में घुसकर दूसरे कान से निकल जाती है। बुरी बात कान में जाने के बाद किसी दूसरे के सामने मुंह से निकलती है। दूसरे के मुंह से तीसरे के कान में, तीसरे के मुंह से चौथे के कान में... एंड सो ऑन। बात चौथे से चार हज़ार चार सौ चौथे कान तक चली जाती है।
ग़ैरों की बुराई जो करे सामने तेरे,
तेरी भी बुराई वो सरेआम करेगा।
बुराई में बड़ा मज़ा आता है चचा। अच्छाई की चर्चा में क्या रक्खा है? बताओ किसकी बुराई करूं?
--छोड़ बुराई। कोई ऐसी अच्छी बात सुना, जाय सुनिबे में मज़ा आवै।
--चचा, दिल्ली में आर. के. पुरम के सैक्टर पाँच में एक पार्क है, उसका नाम रख दिया गया है— 'काका हाथरसी उद्यान', ये एक बढ़िया काम हुआ है।
--अरे जि तौ सच्ची भौत भड़िया काम भयौ।
--हां चचा, पार्क में जाओ। घुसते ही जब काले संगमरमर पर काका हाथरसी का
नाम खुदा हुआ देखोगे तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान खिल जाएगी। क्या जलवे हुआ करते थे काका हाथरसी के। जिधर से निकलते थे काई-सी फट जाती थी। दूर से देखते ही लोग चिल्लाने लगते थे-- वो देखो काका। देखो, वो जा रहे काका। बहुत सारे लोग काका को पहचानते थे। वो भी चचा उस ज़माने में जब टेलीविज़न नहीं आया था। आवाज़ रेडियो से पहचानते थे और पत्र-पत्रिकाओं में छपे फोटो से चेहरा। 'धर्मयुग' 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' जैसी पत्रिकाएं जनसंचार का सबसे बड़ा माध्यम होती थीं। आज एक चौखटा टी.वी. पर सौ बार भी आ जाए तब भी न पहचानें।--मोऊऐ लै चल काऊ दिना वा उद्यान में।
--क्यों नहीं चचा। पर वहां भाँग घोटने का जुगाड़ नहीं होगा, सिलबट्टा नहीं मिलेगा तुमको। महानगर का पार्क है चचा।
--कबितन कौ नसा का कम होय। नांय पींगे भाँग। काका की कबिता सुनइयो और संग टहलियो।
--पार्क में एक नज़ारा देख कर डर मत जाना चचा। आजकल लाफ्टर क्लब खुल गए हैं। लोग झुंड के झुंड हंसते हैं और बावले से दिखाई देते हैं।
--अरे तौ हम उनैं देखि-देखि कै हंस लिंगे। ऐसौ नजारौ देखिबे कूं मिलै कै लोग बिनाई बात के हंस रए ऐं तौ जाते भड़िया हंसी और का बात पै आयगी रे? और काका के नाम कौ उद्यान! फिर तौ और जादा आयगी।
--बिलकुल ठीक चचा! होना ये चाहिए कि वहां के लोग हर दिन बारी-बारी से काका की कोई कविता सुनाएं और नकली हंसी हंसने की बजाय असली का आनन्द लें।
--पर जे भयौ कैसै? हमारे देस में तौ महात्मा गांधी पार्क, अंबेडकर पार्क और नेतान के नाम के पार्कन कौ चलन ऐ?
--चचा, ये बहुत ही अच्छा हुआ है। नाम रखने का काम सरकारों का होता है। सरकार में कोई एक आदमी भी साहित्यिक रुचि वाला हो और लग जाय इस काम के पीछे, तो बात बन जाती है। दिल्ली की एक विधायिका बरखा सिंह स्वयं कवयित्री हैं, लग गईं इस अभियान पर। अपने क्षेत्र की एक सड़क का नाम 'कैफ़ी आज़मी मार्ग' रखवा दिया और पार्क का नाम रखवा दिया 'काका हाथरसी उद्यान'। अगल-बगल के विधायकों को भी बुद्धि आनी चाहिए कि वे भारतेन्दु हरिश्चंद्र उद्यान, निरा
ला उद्यान, हरिशंकर परसाई मार्ग, शरद जोशी उद्यान, रमई काका उद्यान, साहिर लुधियानवी मार्ग और ऐसे लोगों के नाम पर सड़कों और पार्कों के नाम रखवाएं जिनकी स्मृति से ही जीवन खिल उठे। हजारी प्रसाद द्विवेदी पार्क बने तो चित्त में हजारी गुलदस्ता खिल जाए और पार्क में हर ऋतु में बसंत रहे। दक्षिण भारत के राज-नेताओं ने इस दिशा में पहल की थी पर हिन्दी के साहित्यकारों को कौन पूछता है?--ठीक कही लल्ला! बरखा सिंह तक हमारौ असीस पहुंचाय दइयो। Wednesday, January 23, 2008
भारत-रत्न कबीर को दो

--चौं रे चम्पू! दुनिया जहान की का खबर ऐ रे?
--ख़बर ये है चचा कि बाज़ार में अचानक भारत-रत्न के शेयर बहुत नीचे आ गए। बुरी तरह लुढ़क गए। ऐसी गिरावट अभी तक देखी नहीं गई। रिकार्ड गिरावट, कोई दो टके नहीं पूछ रहा इस शेयर को। दिल्ली की दल-दल दलाल-स्ट्रीट में मायूसी का माहौल है। इतना सस्ता हो गया शेयर कि चतुर लोग इस उम्मीद के साथ ख़रीदारी में लग गए, शायद आगे चल कर मंहगा बिके। चित्रकार हुसैन के साथ बाबा रामदेव भी लाइन में आ गए हैं। खरीद लो, खरीद लो। भारत-रत्न खरीदने का यही गोल्डन चांस है। लोकप्रियता का सिक्का चलाओ और भारत-रत्न पाओ। पांचजन्य अख़बार कहता है कि शहीद भगत सिंह को मरणोपरांत भारत-रत्न दिया जाए। अब अटल जी का नाम लेना बन्द कर दिया उन्होंने। जैसे ही देखा कि शेयर बाज़ार बहुत नीचे आ गया है तो सोचा कि अपने प्रोडक्ट की रक्षा करो। ऐसा नाम लाओ जो चल जाए। लाइन बहुत लम्बी होती जा रही है। चचा, बाइ द वे तुम क्यों नहीं ले लेते भारत-रत्न?
-- अरे चम्पू हमें भारत-रतन ते का लैनों-दैनों? सेरो-साइरी के सौकीन ऐं। लै दै कै अपने पास एक इज्जत ऐ, वाऊऐ सेअर बजार में दाव पै लगाय दैं, ऐसी मति नांय फिरी रे। मगन मन भांग घोटौ, आँख मूंद खटिया पै लोटौ। चकाचक पियौ, चकाचक जियौ।
-- अरे नहीं चचा! तुमने जो महान काम किए हैं इतिहास ने उनकी अनदेखी करी है। रामदेई का जापा हुआ तो आधी रात में उसे कंधे पर उठा कर अस्पताल कौन ले गया? हमारा चाचा। जब कबड्डी में भोलू की टाँग टूटी तो मौके पर पलस्तर किसने चढ़ाया? चाचा ने। जमुना में बाढ़ आई तो किसने दो दिन तक, अपनी जान जोखिम में डाल कर, घाट पर लगाया लोगों को? हमारे चाचा ने। चौरासी के दंगे में सरदार रतन सिंह की ट्यूब-टायर की दुकान किसने बचाई? हमारे चाचा ने। अपनी पैंशन के पैसे से गंगाराम का इलाज किसने कराया? स्कूल से भागे बच्चों की बगीची पे क्लास किसने लगाई। तुम्हें भारत-रत्न ज़रूर मिलना चाहिए, चचा।
-- चौं रे चम्पू! तैंनै तौ हमारे निरे कारनामे गिनाय दिए लल्ला। पर अबी तौ भौत काम कन्ने ऐं रे। भारत कौ कछू ऐसौ उद्धार होय कै न कोई बच्चा अनपढ़ रहै, न कोई बीमार। सब सुखी हों, सब सुन्दर हों। भारत-रतन में का धरौ ऐ? जे भारत ई रतन की तरियां चमकै, तब ऐ असली मजा चम्पू!
-- अरे परसों के सैंसैक्स जितने ऊंचे विचार और ऐसी बिन्दास सादगी। अब तो मेरा विश्वास प्रगाढ़ होता जा रहा है चचा कि तुम्हें तो भारतरत्न मिलना ही चाहिए। चचा, अपने चरण दिखाओ। मैं उन्हें फ़ौरन छूना चाहता हूं। बस इतना सा निवेदन मेरा भी मान लेना कि जब तुम्हें भारत-रत्न मिले तो अपने इस चम्पू को कम से कम पद्मश्री तो दिलवा ही देना। तुम्हारे इस चम्पू ने भी कम काम नहीं किए हैं। लगा हुआ है चालीस बरस से। कभी फिल्म बनाता है, कभी कविताएं लिखता है, कभी कम्प्यूटर के विकास पर काम करता है। चचा ध्यान रखोगे न?
-- अरे धत्त! जहां स्वारथ आयौ वहीं सब गलत। हमें नाएं चइयै भारत-रतन और चम्पू तौउऐ नाएं लैन दिंगे पदमसिरी। बजार में सेयर के भाव गिर गए तू मत गिर। भगत सिंह के तांई शहीद ते बड़ी कोई उपाधि नाएं है सकै। मरणोपरांत दैनौ ऐ तौ भारतरतन देऔ कबीरदास कूं जानैं भेद-भाव भुलाय कै इंसान की खोपड़ी पै अक्कल कौ ढक्कन लगायौ। जो कुप्रबृत्ति कूं कोसै वाऐ देओ। जो बुद्धी कूं परोसै वाऐ देओ। जो माल ढकोसै वाते का मतलब!
-- चचा ये आइडिया भी ख़ूब लाए तुम। बाज़ार में उछालने के लिए ये नाम भी चमकदार है। कबीर का नाम, वाट ऐन आइडिया सर जी।
-- पर चम्पू कैसौ लगैगौ— भारत-रतन कबीर। वाके नाम के अगाड़ी तौ ‘अनपढ़’ लगायौ करें-- अनपढ़ कबीर। जो बात अनपढ़ कबीर में हतै, सो भारत-रतन कबीर में कहां ऐ रे। भारत-रतन कबीर ते भौत ऊंचौ ऐ-- अनपढ़ कबीर। तेरे बाप नैं चार लाइन सुनाई हतीं। रोज तू सुनावै, आज मोते सुन लै चम्पू--
अनपढ़ कबीर के बोल अभी भी ज़िंदा हैं
हर पढ़े-बे-पढ़े पर उनका जादू समान,
थे शांति निकेतन में पढ़ते उनको रवीन्द्र
खेतों में उनका अर्थ समझता है किसान।
(23-01-08 को राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)
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