Friday, December 24, 2010

कलश के पीछे हिलते गांधी

—चौं रे चम्पू! पिछले दिनन में कौन सी खास चीज देखी?
—चचा मैंने एक यात्रा का अंत देखा और एक अंतिम यात्रा का अंत देखा।
—तोय बात घुमाइबे में भौत मजा आवै। खुलासा कर।
—मुझे मालूम था कि तुम ऐसा ही कोई डायलॉग मारोगे चचा। अभी तीन-चार दिन पहले एक चलते-फिरते फिल्म महोत्सव की यात्रा का अंत हुआ। बड़ा अच्छा आइडिया निकाला है चचा! फिल्म महोत्सव आमतौर से महानगरों में होते हैं। जेएफएफ एक ऐसा फिल्म महोत्सव था जिसमें श्रेष्ठ फिल्में ऐसे तेरह शहरों मे दिखाई गईं जहाँ आमतौर से फिल्म महोत्सव आयोजित नहीं होते। फिल्मों की यात्रा सात महीने पहले लखनऊ से शुरू हुई थी और दिल्ली के सीरीफ़ोर्ट ओडिटोरियम में समाप्त हुई। ये फिल्में उन हजारों दर्शकों ने देखीं जो शायद कभी इन्हें देखने सिनेमा हॉल न जाते।
—ठीक! बात समझ में आई। अब दूसरी यात्रा बता। अंतिम यात्रा कौ अंत। जाकौ का मतलब भयौ?
—अनुराग कश्यप की ’गुलाल’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला और सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए ’रोड टु संगम’ के निर्देशक अमित राय को। अनुराग कश्यप के बारे में तारीफ करते हुए किसी ने कहा कि इस देश के लिए एक ही अनुराग कश्यप पर्याप्त है, दो नहीं चाहिए। जूरी के अध्यक्ष ने कहा कि यदि एक अनुराग कश्यप पर्याप्त है तो एक अमित राय भी आवश्यक है। अमित राय को विशेष जूरी सम्मान भी दिया गया।
—अंतिम यात्रा के अंत कौ का भयौ?
—चचा, तुममें धीरज नहीं है। अमित राय की फिल्म ’रोड टु संगम’ में गांधीजी की भस्म के अंतिम कलश की अंतिम यात्रा का दृश्य दिखाया गया था। इतिहास मरी हुई मछलियों का कोई झुण्ड नहीं है जो समुद्र की तलहटी में पड़ा हो। इतिहासकार उन मछलियों को बाहर लाता है, पटरे पर रखता है, सजाता है और वे मृत समझी जा चुकी मछलियां फिर से अपनी पूंछ हिलाने लगती हैं। प्राणवंत, जीवंत, गतिमय दिखाई देने लगती हैं।
—फिलम की कहानी बता।
—फिल्म ‘रोड टू संगम’ की कहानी तो आपको बताऊंगा नहीं पर एक दृश्य ने मेरा ध्यान खींचा। पुष्पसज्जित पुरानी फोर्ड गाड़ी पर गांधी जी का अंतिम अस्थिकलश रखा हुआ है। उसके पीछे गांधी जी की एक कांस्य प्रतिमा रखी है। हमने पिछले बासठ साल में गांधी जी की ऐसी प्रतिमाएं देखी हैं जो जड़वत थीं, स्थिर एकदम। कई बार उन पर कौवा भी बैठ जाता है, चिड़िया भी कुछ कर जाती है। हम साफ करने कभी जाते हैं, कभी नहीं भी जा पाते हैं। गांधी हर जगह हमें मूर्तिवत दिखाई देते हैं, लेकिन इस फिल्म में गांधी हिल रहे थे। हिल इसलिए रहे थे कि वे सीमेंट में गड़े हुए नहीं थे। वे रखे हुए थे और हिल रहे थे। फिल्म के दौरान वे हिल रहे थे हम सबके अन्दर। अमित ने उनको हमारे अन्दर हिला दिया था। हमें लगने लगा था कि वह विचारधारा जिसको हम माने बैठे हैं कि मूर्तिमंत होकर समाप्तप्राय और जड़ हो गई थी, उसकी जड़ता तोड़ दी फिल्म ने। इस फिल्म में कहीं भी गांधीवाद का दार्शनिक-सैद्धांतिक पक्ष नहीं दिखाया गया। गांधी जी की कथनियों और करनियों का कोई लेखा-जोखा नहीं!
—फिर गांधी कैसै हिलन लागे?
—हशमत भाई और कसूरी साहब के चरित्रों के ज़रिए। एक अदद मोटर-इंजन है, जो इस फिल्म में दिल की तरह धड़कता है, लेकिन मुहब्बत के तेल के बिना नहीं चल पाता। धड़धड़ाते हुए बताता है कि कैसे धर्म और राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थों के साथ लिपटकर पूरी कौम को गलत निहितार्थों तक पहुँचा देते हैं।
—अमित राय कौ पतौ बता। एक पोस्टकार्ड लिख दिंगे।
—पोस्टकार्ड से ही फिल्म शुरू होती है। अमित राय एक ऐसे निर्देशक के रूप में हमारे सामने आते हैं जिनके अन्दर शोध की प्रवृत्ति है, अध्ययनजन्य तार्किकता है, सुलझी हुई दृष्टि के साथ देश के प्रति प्रेम है, समय के सच को नापने का एक बैरोमीटर है। आज जब विचारधाराएँ धीरे-धीरे गायब हो रही हैं, आतंकवाद के ओर-छोर पकड़ में नहीं आते, हशमत मियाँ बच्चों को विचारों की पतंगों की डोर थमा देते हैं। हसमत मियां पतंग बांट रहे हैं। हशमत मियां पोस्टकार्ड और मुस्कानों से काम चला रहे हैं।
—फिलम चलैगी?
—इसी बात का तो रोना है। सांस्कृतिक कुपोषण के शिकार दर्शक टिकिट खिड़की तक मुश्किल से आएँगे। हाँ, पंकज दुबे, प्रशांत कश्यप जैसे लोग, चलते-फिरते फिल्म महोत्सवों के ज़रिए अच्छी फिल्मों को लोगों तक ले जाएँ तो बात दूसरी है।

3 comments:

cmpershad said...

—फिलम चलैगी?

KAISE CHALEGI CHACHA? NA WAHAN MUNNIBAI HAI NA SHEELA :)

mridula pradhan said...

manoranjak tareeke de likha lekh ,padhne me bahut achcha laga.

डॉ टी एस दराल said...

अफ़सोस कि ऐसी फ़िल्में समीक्षाओं में ही सिमट कर रह जाती हैं ।
वैसे भी भूखे लोगों को रोटी की ज़रुरत होती है न कि उपदेशों की ।
यही हमारी विडम्बना है ।