Sunday, November 16, 2008

न तो लूलू है न हवाई बातें करता है

--चौं रे चम्पू! तोऐ ओबामा के बारे में कछू पतौ ऐ कै नांय?
--चचा, सरसरी तौर पर अख़बार पढ़ने वालों को जितना पता होता है उतना तो मुझे भी पता है।
--तौ बता ख़ास-खास बात!
--चचा, होनूलूलू में पैदा हुआ, इसका मतलब ये नहीं है कि वह कोई लूलू है। होनूलूलू है हवाई में। इसका मतलब यह भी नहीं है कि वो सिर्फ हवाई बातें करता है। ख़ानदानी विरासत लेकर ऊपर से नहीं उतरा है वो, नीचे से उगा है। माली-रक्षित क्यारी में नहीं उगा, ख़राब माली हालात की दुनियादारी में उगा है। अंकुर की तरह धरती फोड़ते ही निकल कर उसने भदमैला आसमान देखा है और आसपास की श्वेत-अश्वेत परस्पर विरोधी हवाओं को झेला है। उसे अंदर की ताकतों ने मज़बूत बनाया है। वो छियालीस साल का बूढ़ा बच्चा है चचा, बूढ़ा बच्चा।



--चौं! बूढ़ौ बच्चा कैसै है गयौ रे?
--देखिए! माता-पिता के विवाह-संबंध के छ: महीने बाद ही धरती पर आ गया। संबंधों की मजबूरी और मजबूरी के संबंधों के बारे में अभिमन्यु की तरह गर्भ में ही सब कुछ जान गया। पिता केनियाई श्यामवर्णी, माता अमरीकन गौरांग, दोनों में ज़्यादा निभी नहीं। न निभ पाने का कारण रंग भेद था कि ढंग भेद था, क्या पता, पर अंतरंग जलतरंग ज़्यादा नहीं बजा। पिता के प्यार से विहीन, मां के दामन से लिपटा, सौतेले पिता और नाना-नानी के साए में पला। बचपन में ही बहुत कुछ देख लिया उसने। गोरों से नफ़रत नहीं की लेकिन धरती मां के काले लालों के कसालों को क़रीब से देखा उसने। उसकी जीत पर अमरीका के काले लोगों को आंसू बहाते देखा आपने? खुशी के आंसू थे।
--वोऊ तौ रोय रई हती... का नाम ऐ वाकौ... ओफरा बिन फ्री!
--क्या कहने हैं चचा। अबोध होने का ढोंग करते हो और जानते सब कुछ हो। ओफ्रा विन फ्री को भी जानते हो! वाह। उसके आंसू तो आपके कलेजे में अभी तक रिस रहे होंगे?
--आगे बोल!
--आगे क्या बताऊं चचा! जीवन में घिस्से बहुत खाए उसने। मां ने दूसरा ब्याह कर लिया और दूसरे ब्याह के बाद इंडोनेशिया में बस गई। तो एक तरफ ओबामा ने पहली दुनिया यानी अमरीका का सुपर वैभव देखा तो दूसरी तरफ तीसरी दुनिया के इंडोनेशिया की चतुर्थ श्रेणी की गरीबी में गुज़र करती ज़िंदगी के कुचले रंग भी देखे। अंधेरी निम्न कक्षाओं में मानवीय संबंधों का विस्तार भी देखा और अति विलास का मस्तिष्क-शून्य होना भी देखा। बच्चा माता और पिता की संयुक्त कृति होता है। मां-बाप भले ही अलग हो जाएं, एक दूसरे के लिए मर चुके हों, लेकिन बच्चे के अन्दर न तो बाप मरता है, न मां। अब वो पहली दुनिया का पहला नागरिक होने जा रहा है। अमरीका का चौवालीसवां राष्ट्रपति।
--मैक्कैन की तौ नानी मर गई होयगी। इत्ते बोटन ते जीतौ।
--मैक्कैन को छोड़ो चचा, तुम्हें मालूम है कि ओबामा की नानी अपना वोट डाल कर इलैक्शन के रिज़ल्ट आने से एक दिन पहले ही मर गई। जीत की आहट पाकर खुशी से चली गई होगी। ओबामा को याद आई होंगी नानी की कहानियां। कहानियां अन्याय की, भुखमरी की, प्रवंचना की, गरीबी की, विडम्बनाओं की। जिनके कारण इस बूढ़े बच्चे ने तय किया होगा कि लड़ेगा। लड़ेगा लड़ाई के खिलाफ। बुश से उसका विरोध इस बात को लेकर था कि ईराक के युद्ध के दौरान पैदा हुए अमानवीय हालात को रोका जाए। वो इंसानों की सोशल सीक्योरिटी की बात करता है। विश्व भर के स्वास्थ्य की चिंता करता है। कहता है— ‘हम न लिबरल अमरीका में रहते हैं न कंज़र्वेटिव अमरीका में रहते हैं, हम युनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमरीका में रहते हैं। हम युनाइटेड हैं’। ठीक बात है। लिबरल कहलाना भी ढोंग है। बहुत उदारता दिखाने वाले लोग सिंहासन पर बैठकर कृपाएं लुटाया करते हैं। युनाइटेड हैं तो भेदभाव गैरज़रूरी है। चचा! ओबामा को इलैक्शन के लिए जनता ने दिल खोल कर चंदा दिया। सौ पचास डॉलर देने वालों की तादाद ज़्यादा थी। उन्होंने पैसा दिया जिनके बीच उसने काम किया। वो डी.सी.पी. यानी डवलपिंग कम्यूनिटीज़ प्रोजैक्ट का डायरैक्टर था। उसने अल्पसंख्यकों के लिए आवाज़ उठाने से पहले कानून की पढ़ाई की। उनके बारे में किताबें लिखीं। कई साल तक युनिवर्सिटी में लैक्चरर बन कर कानून पढ़ाता रहा।
--पइसा तौ कम ना ऐ वाऊ पै।
--माना कि उसके पास भी मिलियनों में पैसा है, पर उसे किताबों की रॉयल्टी से मिला है। भारत में कभी ऐसा हो सकता है? एक फटीचर आदमी, जिसने कानून की पढ़ाई की हो, लैक्चरर बन जाए, फिर सीनियर लैक्चरर.... और किताबें लिखे, और जी राष्ट्रपति बन जाय।
--तू ऊ तौ प्रोफेसर रह चुकौ ऐ। तो ऊ ऐ तौ रॉयल्टी मिलै किताबन की?
--उससे तो चचा कॉलोनी का इलैक्शन भी नहीं लड़ा जा सकता। पता नहीं भारत में ऐसे दिन कब आएंगे जब हमारी वोटर जनता राजनीति के सारे खोटरों को रिजैक्ट करके अपने सही शुभचिंतकों को उनकी कोटरों से निकाल कर लाएगी।

9 comments:

sunil manthan sharma said...

wah kya bat hai.

अल्पना वर्मा said...

bahut achcha laga aap ke lekh ko padh kar :)-
Mr.obama ke baare mein aur jaankari bhi mil gayee
-khadi boli ka tadka bhi khuub laga hai--:)--enjoyed it!
-पता नहीं भारत में ऐसे दिन कब आएंगे जब हमारी वोटर जनता राजनीति के सारे खोटरों को रिजैक्ट करके अपने सही शुभचिंतकों को उनकी कोटरों से निकाल कर लाएगी।-sach baat kahi hai -



[Sir,aap ka blog pahli baar dekha yahan--bahut hi prasnnta hui]

अनूप शुक्ल said...

अच्छा है। आप इसे चंपू संवाद में न लिखकर अपनी तरफ़ से लिखते तो शायद और अच्छा लगता!

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

छियालीस साल का बूढ़ा बच्चा है चचा, बूढ़ा बच्चा।

हर वाक्य को अद्भुत बना दिया है आपकी लेखनी ने...

कंचन सिंह चौहान said...

मां-बाप भले ही अलग हो जाएं, एक दूसरे के लिए मर चुके हों, लेकिन बच्चे के अन्दर न तो बाप मरता है, न मां।

sach....! ye to vahi jaanta hoga, jo jeeta hoga is sach ko

सुमित प्रताप सिंह said...

आदरणीय गुरुदेव!

सादर ब्लॉगस्ते!

ओबामा के ऊपर अपुन की कुछ पंक्तियाँ आपके चरणों में समर्पित हैं।

एक सुना था ओसामा

उससे अलग है ओबामा

विरोधियों को दे पटकनी

गाता है जो सारेगामा

हंस के बोले छज्जू लाला

गोरों पर भारी पड़ गया काला।

PRASHANT JAIN said...

good information given in this article

PRASHANT PASHU JAIN said...

good article about obama which probides us more information

sanny said...

ashokji me aapke sanchalan me vah vah me padhna chahta tha sailesh ke snachan me mujhe nahi padhna tha so nahi gaya ab pata nahi mera sapna kab pura hoga kuch karo sir YAVANKAR HASYA KAVI SUNIL VYAS