Friday, April 16, 2010

संकल्प लेने वाले लोगों ने काश…

—चौं रे चम्पू! बता आज के दिन की महत्ता का ऐ रे?
—महत्ता ये है चचा कि आज चौदह अप्रैल को बाबा साहब भीम राव अंबेडकर का जन्मदिन है।
—संविधान के जनक अंबेडकर जी कौ!
—हां चचा! लेकिन वे स्वयं को जनक नहीं मानते थे। वे तो बड़ी सौम्यता से कहते थे कि मैं प्रारूप समिति का अध्यक्ष हूं। जो मुझसे कहा गया मैंने लिख दिया। संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद हैं। चचा, दो सौ चौरासी सदस्यों को संविधान बनाने में दो वर्ष, ग्यारह महीने और सत्रह दिन लगे। वक़्त ज़्यादा लग रहा था तब एक नजीरुद्दीन अहमद साहब ने तो यहां तक कह दिया कि इस कमेटी का नाम ड्रिलिंग कमेटी रख दो, ड्रिल कर रही है। पता नहीं कब बन पाएगा। आलोचनाएं तो हर काम की होती हैं चचा। अंबेडकर साहब ने अपने भाषण में विलम्ब के कारण बताए और साथ में कह दिया कि मैं समझता हूं कि संविधान चाहे जितना अच्छा हो, वह बुरा साबित हो सकता है, यदि उसका अनुसरण करने वाले लोग बुरे हों। एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। यानी चचा, फर्क इससे पड़ता है कि चलाने वाले लोग कौन हैं, कैसे हैं, उनकी नीयत कैसी है।
—ठीक बात। लेकिन हमारे लोगन कूं कोई खास जानकारी है नायं संविधान के बारे में।
—जानकारी कैसे हो? मूल तो अंग्रेजी में बनाया गया। हिन्दी अनुवाद हुआ तो मुश्किल भाषा में हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की तो पीड़ा ही यह थी कि इसका मूल प्रारूप हिन्दी में क्यों नहीं बना। अब कुछ लोग कहते हैं कि पुराना हो गया है, नई ज़रूरतों के अनुसार इसको बदल देना चाहिए। दरसल, हमारे संविधान की बुनियाद इतनी मज़बूत रखी गई है कि बदलना आसान नहीं है। दो तिहाई बहुमत दोनों सदनों में हो तब कुछ हो सकता है। सरकारें खुद बैसाखियों के सहारे चल रही हैं, बैसाखी के दिन ऐसा कैसे हो सकता है कि सब कुछ आपकी इच्छा के अनुरूप हो जाए।
—जे बात तौ है।
—चचा, मेरे एक मित्र हैं गोरखनाथ जी। उन्होंने मुझे संविधान की अंग्रेजी में हस्तलिखित मूल प्रति की एक प्रतिलिपि भेंट की। हर पृष्ठ पर शानदार बौर्डर बना हुआ है। कलात्मक संरचना है। एक फुट बाई सवा फुट की होगी। मोटी किताब है। वज़न भी तीन-चार किलो से कम नहीं होगा। मैंने यह सोच कर कि कोई मार न ले जाए, उसके पहले ख़ाली पृष्ठ पर ‘मेरा आस्था ग्रंथ’ लिख कर नीचे अपने हस्थाक्षर कर दिए। फिर पन्ने पलटने लगा, अंतिम पृष्ठ पर कुछ हस्ताक्षर थे, जिनमें अंतिम हस्ताक्षर फ़ीरोज गांधी का था।
—कुल्ल कित्ते दस्कत हते?
—दो सौ चौरासी। पहला हस्ताक्षर ससुर जी का यानी पंडित नेहरू का था और अंतिम दामाद जी यानी फ़ीरोज गांधी का था। पहला हस्ताक्षर अध्यक्ष जी का होना चाहिए था लेकिन कहते हैं कि सबसे पहले नेहरू जी ने कर दिए। भाषाओं की सूची के नीचे जरा सी भी जगह नहीं थी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उनसे ऊपर भाषाओं की सूची के सामने एक टेढ़ी लाइन खींच कर पहले हिन्दी में हस्ताक्षर किए और उसके नीचे अंग्रेज़ी में। मैं घंटों तक उन हस्ताक्षरों को देखता रहा। हस्ताक्षरों में अतीत झांक रहा था। मुझे सारे के सारे सदस्य सैंट्रल हॉल में बैठे हुए नज़र आने लगे। दो सौ चौरासी में से पैंतीस लोगों ने हिन्दी में हस्ताक्षर किए और पांच ऐसे थे जिन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किए। पर एक चीज देखने में बड़ी मजेदार लगी।
—बता!
—जहां-जहां हिन्दी के हस्ताक्षर आते थे, आमतौर से चार-पांच एक साथ आते थे। यानी हिन्दी के पक्षधर, एक साथ बैठते थे। हिन्दी वाले थे दो सौ चौरासी में से केवल चालीस। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का संकल्प लेने वाले सारे लोगों ने काश हिन्दी में हस्ताक्षर किए होते तो हिन्दी देश में एकता की भाषा बन जाती। उस समय दिल से कोई भी उन्हें सलाह देता तो शायद सब मान जाते चचा।
—दो सौ चौरासी में ते कौन-कौन चौरासी योनीन में कहां-कहां भटक रह्यौ ऐ, का पतौ?

6 comments:

मिहिरभोज said...

का पता यहीं घूमि रहे होंगे....भूत बनकर...और हम घूम रहें हैं नेहरू और गांधींयों के बीच....उन्होंने आनंद भवन जो दिया था उसका किराया चुकाते हुए....शायद ताजिंदगी चुकाना पङे और हो सकता है...हमारी आगे आने वाली पीढियों को भी.....प्रतिष्ठा के अनुरूप सारगर्भित.....आपका आलेख

ARVIND said...

अब बनाने वाले तो बना गए और बदलने वालों ने 90 से ज्यादा बार बदल-बदल कर उसका रंग रूप ही बदल दिया है । यदि वे देख भी रहे है तो क्या कर लेंगें ? जब हम आप यहां बैठे कुछ नहीं कर सकते ।

आपके लिखे की प्रशंसा में टिप्पणी लिखने की योग्यता नही रखता । फिर भी यह तो कह सकता हूँ कि इसे न पढ़ने के शौकीनों को भी पढ़ना चाहिए ।

अरविन्द
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अनिल कान्त : said...

जाते कैहत हैं लेखु
मज़ा आइ गओ...बोत बढ़िया लिखो है

陽峰 said...

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Rishabh Jain said...

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