Friday, September 03, 2010

बाबा ते काका दी हट्टी

—चौं रे चम्पू! और बता ना, चुप्प चौं है गयौ? नागार्जुन जन्म-सती समारोह की योजना आगै बढ़ा।
—चचा, मैं तो बता रहा था, आप ही उठकर चले गए।
—बता, बता और का का इंतजाम कन्ने परिंगे?
—का का इंतजाम! काका हाथरसी जी को भी बुलाना पड़ेगा! वे आ गए तो रौनक लग जाएगी। बहुत कम लोगों को पता होगा कि बाबा और काका की मुलाकातें उत्तरी दिल्ली के टैगोर पार्क में हुआ करती थीं। कामरेड ज़हूर सिद्दीक़ी की छत पर बाबा ते काका दी हट्टी लगती थी। बाबा रहते थे सुधीश पचौरी के फ़ौट्टी एट टैगोर पार्क में और काका रहते थे मुकेश गर्ग के टू फ़ौट्टी टू में। दोनों पैदल चलने के शौकीन। काका स्वास्थ्य के लिए नियमित रूप से सुबह शाम टहला करते थे। बाबा का तो वाहन ही उनके दो पैर थे। कोई बस न मिले तो ग्यारह नंबर की बस ज़िंदाबाद। काका को अपने स्वास्थ्य पर बड़ा गुरूर था। बाबा को छोटे-मोटे रोग घेरे रहते थे। दाढ़ी-मूंछ दोनों रखते थे। काका थोड़ी लंबी दाढ़ी रखते थे, बाबा की हल्की रहती थी। दोनों के बाल खिचड़ी थे। दोनों को निशात जी के हाथ की बनी काली दाल की खड़ी खिचड़ी पसंद थी।
—चल बगीची पै खीचरी ऊ बनवाय लिंगे। और बता!
—बाबा जो ओवरकोट पहनते थे उसकी डिजायन भी काली खिचड़ी जैसी ही थी। काका आमतौर से गरम शॉलों से बने कुर्ते पहनते थे। काका को सर्दी ज्यादा नहीं लगती थी जबकि बाबा की दुश्मन थी सर्दी।
—बगीची पै एक ओवरकोट और एक गरम कुर्ता टांग दिंगे।
—चचा, एक बात बताऊँ! बाबा ने जो सलेटी से रंग का ओवरकोट अंत तक पहना उसे जामा मस्जिद से खरीद कर आपका चम्पू लाया था, पच्चीस रुपए में। पैसे सुधीश या करण ने दिए होंगे। काफी दिन तक मेरे और बाबा के बीच में समझौता रहा कि कभी तुम पहन लो, कभी मैं पहन लूँ। कड़ाके की ठंड में जो बाहर जाएगा वो पहनेगा। बाबा को कमरे के अंदर भी कड़ाके की ठंड लगती थी। जब उन्होंने उतारकर टाँगना बंद कर दिया तो ओवरकोट उन्हीं का हो गया।
—बात चल रही है बाबा और काका की तू बीच में अपनी कहाँ ते ले आयौ?
—काका को दूसरों की उम्र पूछने का बड़ा शौक था। ज़हूर साहब की छत पर काका ने बाबा से भी उनकी उम्र पूछी थी। जब उन्हें पता चला कि बाबा चार साल छोटे हैं तो वे बच्चों की तरह खुश हुए। देखा, हो तो छोटे, पर काका से बड़े लगते हो। बाबा सहजता से उत्तर देते कि लोगों ने बाबा कहना शुरू कर दिया है तो बड़ा तो लगूँगा ही। दरअसल दोनों ही बड़े थे। दोनों शीर्षस्थ। दोनों कड़ियल और अपने-अपने सोच में अड़ियल। बाबा जनकवि थे काका जन-प्रिय कवि। काका को बाबा की महत्ता का बोध नहीं था और बाबा को काका की लोकप्रियता का अधिक अंदाज़ा नहीं था, लेकिन बातचीत दिलचस्प रहती थीं।
—बातचीत बता!
—काका कहते थे कि रोज़ नहाया करो तो कम उम्र के लगोगे बाबा। अच्छी सेहत के लिए साफ-सुथरा रहना जरूरी है। बाबा को साफ-सुथरा सोच अच्छा लगता था। काका कांग्रेसी थे, बाबा मार्क्सवादी। बाबा समझ जाते थे कि काका की जानकारी कितनी है और काका समझ जाते थे कि बाबा का हास्यबोध जनता वाला नहीं है। बातचीत साहित्येत्तर विषयों पर ही अधिक हो पाती थी। असहमति के मुद्दे बढ़ने लगते थे तो बातचीत पर विराम लगा दिया जाता था। दोनों के बीच विचारधाराओं की एक गहरी खाई थी, लेकिन एक चीज जो दोनों के अन्दर समान थी, वह था दोनों का मानवीय दृष्टिकोण और आम आदमी के प्रति गहरी सहानुभूति। इस बात पर दोनों सहमत हो जाते थे कि ‘चाहे दक्षिण हो या वाम, जनता को रोटी से काम’। काका दाद देते, ये तुमने लाख टके की बात कह दी बाबा। बाबा कहते थे कि चलो हमारी कोई बात तो पसन्द आई। काका कहते, हमारी तुम्हारी शक्ल मिलती है बाबा! साफ रहना शुरू कर दो तो हम सगे भाई लगें। बाबा आक्रामक मुद्रा में कुछ बोलें इससे पहले काका अपनी छड़ी उठाकर चल देते थे। लेकिन एक बात थी, एक-दूसरे के पीठ पीछे दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा करते थे।
—जेई बात तौ बगीची पै सिखानी ऐ!

9 comments:

cmpershad said...

" दोनों के बीच विचारधाराओं की एक गहरी खाई थी, लेकिन एक चीज जो दोनों के अन्दर समान थी, वह था दोनों का मानवीय दृष्टिकोण और आम आदमी के प्रति गहरी सहानुभूति"

आज कितने लोग [साहित्यकार] हैं जो ऐसा दृष्टिकोण रखते हैं !!!

डॉ टी एस दराल said...

काका हाथरसी और बाबा नागार्जुन के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारी प्राप्त हुई । आभार आपका ।

ALOK KHARE said...

वाह वाह क्या समां बांधा हे आपने बाबा और काका कि जुगल बंदी का
इतनी नजदीकी जानकारी से परिचय करवाने के लिए दिलसे आभार,
मजा आया, इसी उम्मीद में कि आगे भी ऐसी ही जानकारी आप उपलब्ध करबाते
रहेंगे,
मुझे हमेशा ही इन्तजार रहता हे

सुमित प्रताप सिंह said...

nice post guru ji!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

चम्पू और बगीची का सन्दर्भ सर के ऊपर से गुज़र गया..शायद देर से आने का नतीजा है ये.

शरद कोकास said...

बढ़िया चर्चे है बाबा और काका के ।

दीपक 'मशाल' said...

आपके ब्लॉग को आज चर्चामंच पर संकलित किया है.. एक बार देखिएगा जरूर..
http://charchamanch.blogspot.com/

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

bahut hi rochak aur achchi jaankari hetu aabhaar.
-GyanChand Marmagya.

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

bahut hi rochak aur achchi jaankari hetu aabhaar.
-GyanChand Marmagya.