Wednesday, September 15, 2010

हिन्दी में देश की एकता का रस

—चौं रे चम्पू, कल्ल बिग्यान भबन में हिन्दी दिबस कौ समारोह भयौ, तू ग्यौ के नायं?
—गया था चचा! और आनन्दित नहीं परमानन्दित हो गया।
—इत्ती खुसी की का बात है गई रे?
—सबसे ज़्यादा ख़ुशी की बात ये रही चचा कि हमारे गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने अपना भाषण हिन्दी में शुरु किया। पूरा एक पैराग्राफ हिन्दी में बोला। क्या शुद्ध उच्चारण था चचा! ‘मैं राजभाषा को अंगीकार करने वाले कार्यालयों में उत्कृष्ट कार्यों के लिए सभी कार्मिकों को आभार ज्ञापित करता हूं।’ कुछ ऐसा सा बोल रहे थे। शब्दशः तो नहीं बता सकता पर एक कुशल हिन्दी ज्ञाता जैसा उच्चारण था। पिछले साल उन्होंने हिन्दी के समर्थन में अंग्रेज़ी में भाषण दिया था। पूरे सभागार में मायूसी छा गई थी। एक ओर तो हिन्दी का प्रयोग करने के लिए अनेक हिन्दीतर क्षेत्र से आए कर्मचारियों को पुरस्कृत किया गया दूसरी ओर अध्यक्ष महोदय बोल रहे थे अंग़्रेजी। किसी को यह बात पच नहीं रही थी कि वे ज़रा सी भी हिन्दी नहीं बोल सकते।
—बोलिबे में हिंचक रही होयगी लल्ला! समझ तौ पाते ई हुंगे! राजनीति कौ दबाब ऊ है सकै।
—कैसी भी हिचक क्यों न हो। हिन्दी दिवस पर हिन्दी न बोलना एक अपराध जैसा लगा था चचा। आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में संयुक्त राष्ट्र संघ के बान की मून ने हिन्दी बोल कर सबका मन जीत लिया था। इतनी तालियां बजीं थी कि शायद संयुक्त राष्ट्र संघ के उस सभागार में कभी न बजी हों। सच बताऊं चचा, पिछले साल कार्यक्रम के बाद विज्ञान भवन का भोजन अच्छा नहीं लगा। सभी के चेहरे पर एक कसक थी। वहां अधिकांश सरकारी कर्मचारी थे। खुलकर बोल नहीं सकते थे लेकिन गुपचुप चर्चा यही थी कि कम से कम एक वाक्य तो बोल देते हिन्दी में। हिन्दी दिवस की मर्यादा रह जाती। आपकी दूसरी बात मुझे ठीक लग रही है चचा। राजनीतिक मजबूरियां भी होती हैं। दक्षिण के अपने जनाधार की चिंता रही होगी। हालांकि उन्होंने गत वर्ष बातें हिन्दी के पक्ष में ही कही थीं, कही भले ही अंग्रेज़ी में हों। फिर भी चचा बातें मन को ठुकी नहीं। कार्यक्रम के बाद सरकारी कर्मचारी खाने में लग गए, यानी खाने की लाइनों में लग गए और मैं बिना खाए ही निकल आया।
—पिछली छोड़, अबकी बता!
—इस बार तो संयुक्त राष्ट्र संघ का सभागार याद आ गया। अपने अध्यक्षीय भाषण में जब चिदम्बरम जी ने कहा— मानयीय उपराष्ट्रपति महोदय! ’माननीय’ और ’महोदय’ सुनकर ही लोग झूम उठे। क्या तालियां बजीं चचा, बता नहीं सकते। अगले संबोधनों का मौका ही नहीं दे रहे थे। दे ताली और दे ताली। चिदमबरम सिर झुकाए मुस्कराते रहे। संबोधन श्रृंखला का पूरा वाक्य हिन्दी में सम्पन्न हुआ तो फिर से तालियों का ज्वार।
—दाबत उड़ाय कै आयौ कै नायं?
—चकाचक चचा! मीठे पर पाबंदी है लेकिन दो गुलाबजामुन खाईं और आइसक्रीम भी सपोट गया।
—पूरौ भासन हिन्दी में नायं दियौ न?
—पूरा भाषण तो हिन्दी में नहीं दिया। बीच में अंग्रेज़ी भी बोली। उतने भर के लिए हिन्दी के लोग बड़े उदार होते हैं। अंग्रेज़ी भी हमारे देश की भाषा है। उससे वैर थोड़े ही है। लेकिन भाषण का अंत फिर से हिन्दी बोल कर किया। दिल जीत लिया उन्होंने। मेरा दिल तो एक दूसरे कारण से भी जीत लिया।
—दूसरौ कारन बता!
—अपनी दुखती रग है चचा! यूनीकोड एंकोंडिंग प्रणाली। दस साल हो गए कम्प्यूटर पर इस प्रणाली को आए लेकिन हिन्दी है कि इसे हृदय से लगा नहीं पाई। उन्होंने यूनीकोड को सरकारी कार्यालयों में जब अनिवार्य रूप से अपनाने की बात कही तो जी खुश हो गया। गृहराज्य मंत्री अजय माकन द्वारा दिए गए आंकड़े भी पिछले वर्ष की तुलना में उत्साह बढ़ाने वाले थे। हिन्दी निरंतर बढ़ रही है चचा, लेकिन कुछ लोग हैं जो अंग्रेज़ी का हउआ दिखाने से बाज नहीं आते हैं। खाते हिन्दी की हैं, बजाते अंग्रेज़ी की हैं। खत्म हो जाएगी हिन्दी, खत्म हो जाएगी हिन्दी। कैसे खत्म हो जाएगी हिन्दी। लोग खत्म हो जाएंगे, आपस की लड़ाइयां खत्म हो जाएंगी, हिन्दी कहीं नहीं जाने वाली।
—और का अच्छी बात भई?
—अच्छी बातें तो बहुत हुई। एक बात अजय माकन ने कही मार्के की। वे बोले— जैसे फूल में छिपा रहता है मकरन्द उसी तरह हिन्दी में छिपा है देश की एकता का रस।
—बस्स! आगै मत बोल। मोय अजय की बात को रस लैन दै रे।

11 comments:

वीना said...

बहुत सटीक कहा है अशोक जी...

मौका मिले तो यहां जरूर आइए...आपका स्वागत है

http://veenakesur.blogspot.com/

cmpershad said...

‘आंकड़े भी पिछले वर्ष की तुलना में उत्साह बढ़ाने वाले थे।’

केवल आंकडों से ही खुश हो जा लल्ला :)

Parul said...

sir aapki baat se 100% sehmat hoon!

anshumala said...

आपने सही कहा कि लोग ख़त्म हो जायेंगे हिंदी ख़त्म नहीं होगी | हिंदी के ख़त्म होने का सिर्फ हो हल्ला ज्यादा मचाया जा रहा है वर्ना उसके लिए बने विभाग बंद नहीं हो जाएगी |

सुमित प्रताप सिंह said...

गुरु जी हिन्दी और अंग्रेजी एक-दूजे के हाथ थामे यू ही आगे चलती रहेंगी. चिदम्बरम जी को हिन्दी बोलने व आपको यह लेख लिखने के लिये साधुवाद...

डॉ टी एस दराल said...

हिंदी में छुपा है देश की एकता का रस ---बहुत सही कहा ।
अच्छा लगा जानकर कि इस बार चिदाम्बरम जी हिंदी में बोले ।
आप जैसे हिंदी प्रेमियों की वज़ह से हिंदी प्रगति के पथ पर है ।
लवस्कार ।

रचना दीक्षित said...

सच ही कहा है अशोक जी हिंदी न ख़तम होने वाली. चिदमबरम जी ने हिंदी बोली इसका मतलब बोल तो सकते हैं पर बोलना नहीं चाहते

पश्यंती शुक्ला. said...

कई बार आपसे रिपोर्टिंग के दौरान मिलना हुआ अच्छा लगा देखकर आज की आपका ब्लाग भी है..अब तो जान पहचान कायम रहेगी

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

बिल्कुल सही ......हिंदी कहीं नही जाने वाली, हिंदी यही रहेगी हर भारतीय की जबान पर और दिल में| आपकी यूनिकोड वाली बात सुनकर भी बहुत अच्छा लगा|
ब्रह्माण्ड

ALOK KHARE said...

Guru ji ko pranaam, (gustakhi maf ho guru ji), kyunki Hindi charcha he, lekin tipaddi roman hindi me dene pad rahi he, maja aa gaya kasam se,
ye jo champu hate na aapko, bahut hi shatir he guru ji, andar tak ki khoj ke lave he, lekin hame bahut hi anand aaya ,