Wednesday, January 12, 2011

बर्फ़ पर खेलती तमन्नाएं

—चौं रे चम्पू! गजब की ठण्ड ऐ, तैनैं चिल्ला सीत में कछू अजब-गजब कियौ कै नायं?
—अरे चचा, रजाई में बैठे रहने के अलावा और कर ही क्या सकते थे! टीवी देखते रहे। रिमोट का इस्तेमाल करने के लिए रज़ाई से हाथ निकालने में भी परेशानी हो रही थी। एक न्यूज़ चैनल लगा के हाथ रिमोट समेत रज़ाई में कर लिए।
—टीवी पै का देखौ?
—कहां याद रहता है! हां, एक बताने लायक बात है। सुख-दुख में चेहरे पर समभाव रखने वाली एक न्यूज़वाचिका बोल रही थी, कश्मीर में मायनस तेरह डिग्री टैम्परेचर हो जाने के कारण डल झील सूख गई है।
—सूख गई कै जम गई?
—तभी तो मुझे भी हंसी आई चचा। झीलों का पानी कम हुआ करता है, वे सूखती कहां हैं! सूख गई तो झील कहां रही, तालाब हो गई! नदियां सूख जाती हैं, तालाब सूख जाते हैं, लेकिन झील कहां सूखती हैं!
—ठीक कहि रह्यौ ऐ रे। गल्ती ते बोलि गई, माफ कर छोरी ऐ।
—बिल्कुल माफ कर दिया चचा, क्योंकि अगले ही पल उसने मेरी कल्पना को दूसरी ओर का रास्ता दिखा दिया, जब वह बोली कि झील की सूखी हुई सतह पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। आगे वह क्या बोली मुझे सुनाई नहीं दिया। कल्पना दृश्यों में खो गया। बच्चे बर्फ पर क्रिकेट खेल रहे हैं। कैसे बाउंड्री बनाएंगे? विकेट कैसे गाड़ेंगे? पिच कैसे बनेगी? इतना तो तय है कि पिच पर रोलर फिराने की आवश्यकता न पड़ेगी क्योंकि कुदरत ने अपने आप झील को एक समतल मैदान बना दिया है। वहां कोई वाटर-लेवल पारा-मशीन नहीं रखनी पड़ेगी। बर्फ में खरोंच-खरोंच कर पिच को आकार दिया जा सकता है। बॉल कितनी भारी होगी? यहां तो बार-बार चौके लगाना बेहद आसान रहेगा क्योंकि उस फिसलनशील बर्फ पर बॉल रुकेगी कैसे? बच्चे भी बॉल के पीछे फिसलते-फिसलते ही जाएंगे। बॉल की गति बच्चों की फिसलन-गति से ज़्यादा तेज़ होगी। कैसे दौड़ेंगे बर्फ पर? स्कैट्स लगा लें तो शायद तेज़ी से दौड़ सकें! स्कैट्स कहां ख़रीद पाते होंगे कश्मीर के गरीब बच्चे। फिर बाउंड्री कैसे खींचते होंगे झील में? नियम-कायदे कौन से लागू होते होंगे। हमारी क्रिकेट का ही अनुसरण करते होंगे क्या? क्या सचिन-सौरभ ने कभी बर्फ पर क्रिकेट खेली है? मैं कल्पनाओं में बच्चों की आइस क्रिकेट देखने लगा।
-प्रबल तमन्ना होय, तौ का पानी का बरफ! खेलिबे की इच्छा कौ पानी नायं जम्यौ करै।
—डल झील पहले भी जमी होगी पर शायद इतनी कठोर न हुई होगी कि उस पर क्रिकेट खेली जा सके। दुनिया में बहुत सारे ऐसे देश हैं जहां झीलें जम जाती हैं। अंटार्कटिका में तो बर्फ ही बर्फ होती है। वहां किसी के मन में यह विचार क्यों नहीं आया कि क्रिकेट खेली जाए। जरूर कहीं न कहीं कुछ होता होगा। आइस क्रिकेट भी कहीं न कहीं खेली जाती होगी।
—पतौ निकार।
—लो अभी पता करता हूं। लैपटॉप खुला है। गूगल सर्च पर ये डाला, आइस क्रिकेट। एक मिनिट रुको। अरे चचा, ये तो निकल आया। आइस क्रिकेट का वर्ल्ड टूर्नामेंट बाईस जनवरी को होने जा रहा है। यह खेल सन दो हजार चार से एस्टोनिया की राजधानी ताल्लिन में हार्कू नाम की झील पर खेला जाता है जो बर्फ से ढक जाती है। आइस क्रिकेट में लाल रंग की विंड बॉल का इस्तेमाल होता है। नेट पर यूट्यूब खोल कर आपको नज़ारा भी दिखा सकता हूं। साक्षात देखना हो तो उसके लिए फ्लाइट के निजी खर्च के अलावा दो सौ साठ पाउंड की टिकिट है। चार दिन तक रुको और आइस क्रिकेट का मजा लो।
—अरे छोड़ लल्ला, इत्ते पइसा जोरिबे में तौ आंसू निकरि आमिंगे।
—तुम आंसू मत निकालो चचा। कल मैं काफी आंसू निकाल चुका हूं। कल अंतरराष्ट्रीय हास्य दिवस था। हास्य के नाम पर जो चीजें परोसी जा रही थीं उन पर मुझे ज़रा सी भी हंसी नहीं आई। परसों भी आंसू बहाए थे क्योंकि विश्व हिन्दी दिवस था और एक छोटे से सभागार में संपन्न हो गया। न व्यापक प्रचार, न उसकी कोई खबर लोगों को। ऐसे ही जैसे कश्मीर के बच्चे बर्फ पड़ने पर आइस क्रिकेट खेल लेते हैं। लोकप्रिय हो तभी आनन्द आता है न चचा। विश्व हिन्दी दिवस, हास्य दिवस या आइस क्रिकेट का डल झील टूर्नामैंट।
—सई कही सौ परसैंट!

7 comments:

मनोज भारती said...

कड़ाके की ठंड में टीवी के न्यूज चैनल की हालत से लेकर आइस क्रिकेट और अंत में विश्व हिंदी दिवस तक का अवलोकन कराने के लिए आभार !!! न्यूज चैनल पर न्यूज बची ही कहाँ है...सब फिल्म,क्रिकेट या अपराध कथाओं को महिमामंडित कर रहें हैं और विश्व हिंदी दिवस जैसे मुद्दे नजर अंदाज कर दिए जाते हैं ।

एक अच्छी पोस्ट !!!

Harshkant tripathi"Pawan" said...

अजी हम कुछ कहने जाएँ तो यह कर चुप करा दिया जायेगा की ये आधुनिक हिन्दी है,या फिर यहाँ ये सब चलता है. समझ नहीं पाता यहाँ और क्या-क्या चलेगा????????????????
हिन्दी दिवस पर भी हिन्दी की उपेक्षा, क्या कहूँ????????

Rajesh Kumar 'Nachiketa' said...

बहुत बढ़िया. जब मैं सातवीं कक्षा में था तब पढ़ा था की नदियाँ जम जाने पे वहाँ पे मछलियाँ ज़िंदा रहती हैं क्योकि नदी पूरी गहराई तक नहीं जमती. जब Canada आया तब बिलकुल पास में Saskatchewaan नदी को पहली बार करीब से जमी देखी. आपकी कहानी से ये सोच के अच्छा लगा की उसपर क्रिकेट खेला जा सकता है.
आपके लेखन से सब दृश्यमान हो जाता है.
ice cricket की बात मजेदार और रोचक.

क्षितिजा .... said...

आदरणीय अशोक जी बहुत अच्छा लेख .... ये इतेफ़क की बात है की मेरे ब्लॉग पर भी है .."एक बर्फ-ज़दा समंदर".... अगर कुछ पल निकल पाएं तो ज़रूर पधारियेगा ... आभार

cmpershad said...

`एक न्यूज़ चैनल लगा के हाथ रिमोट समेत रज़ाई में कर लिए।'

अच्छा किया, वर्ना रिमोट भी ठंड से अकड जाता :)

JOURNALIST SUNIL said...

hmm

रचना दीक्षित said...

क्या बात?? क्या बात?? क्या बात??