Sunday, June 10, 2007

पोल-खोलक यंत्र


(एच०जी० वेल्स ने तरह-तरह के यंत्रों की कल्पना की थी। ऐसे यंत्र जिनका अभी तक अविष्कार ही नहीं हुआ। उन्होंने ऐसे ही एक यंत्र के बारे में लिखा कि यदि वह यंत्र किसी के पास हो तो उसके सामने वाला आदमी क्या सोच रहा है, ये उसे पता लग जाएगा। .....और अब इसे हमारा सौभाग्य कहिए या दुर्भाग्य कि एक दिन जब हम अपनी श्रीमती जी के साथ बाज़ार जा रहे थे तब हमारा पांव किसी चीज़ से टकराया और हमने जब उस चीज़ को उठाया तो पाया कि ये तो वही यंत्र है।)



ठोकर खाकर हमने
जैसे ही यंत्र को उठाया,
मस्तक में शूं-शूं की ध्वनि हुई
कुछ घरघराया।
झटके से गरदन घुमाई,
पत्नी को देखा
अब यंत्र से
पत्नी की आवाज़ आई-
मैं तो भर पाई!
सड़क पर चलने तक का
तरीक़ा नहीं आता,
कोई भी मैनर
या सली़क़ा नहीं आता।
बीवी साथ है
यह तक भूल जाते हैं,
और भिखमंगे नदीदों की तरह
चीज़ें उठाते हैं।
....इनसे
इनसे तो
वो पूना वाला
इंजीनियर ही ठीक था,
जीप में बिठा के मुझे शॉपिंग कराता
इस तरह राह चलते
ठोकर तो न खाता।
हमने सोचा-
यंत्र ख़तरनाक है!
और ये भी एक इत्तेफ़ाक़ है
कि हमको मिला है,
और मिलते ही
पूना वाला गुल खिला है।

और भी देखते हैं
क्या-क्या गुल खिलते हैं?
अब ज़रा यार-दोस्तों से मिलते हैं।
तो हमने एक दोस्त का
दरवाज़ा खटखटाया
द्वार खोला, निकला, मुस्कुराया,
दिमाग़ में होने लगी आहट
कुछ शूं-शूं
कुछ घरघराहट।
यंत्र से आवाज़ आई-
अकेला ही आया है,
अपनी छप्पनछुरी,
गुलबदन को
नहीं लाया है।
प्रकट में बोला-
ओहो!
कमीज़ तो बड़ी फ़ैन्सी है!
और सब ठीक है?
मतलब, भाभीजी कैसी हैं?
हमने कहा-
भा...भी....जी
या छप्पनछुरी गुलबदन?
वो बोला-
होश की दवा करो श्रीमन्‌
क्या अण्ट-शण्ट बकते हो,
भाभीजी के लिए
कैसे-कैसे शब्दों का
प्रयोग करते हो?
हमने सोचा-
कैसा नट रहा है,
अपनी सोची हुई बातों से ही
हट रहा है।
सो फ़ैसला किया-
अब से बस सुन लिया करेंगे,
कोई भी अच्छी या बुरी
प्रतिक्रिया नहीं करेंगे।

लेकिन अनुभव हुए नए-नए
एक आदर्शवादी दोस्त के घर गए।
स्वयं नहीं निकले
वे आईं,
हाथ जोड़कर मुस्कुराईं-
मस्तक में भयंकर पीड़ा थी
अभी-अभी सोए हैं।
यंत्र ने बताया-
बिल्कुल नहीं सोए हैं
न कहीं पीड़ा हो रही है,
कुछ अनन्य मित्रों के साथ
द्यूत-क्रीड़ा हो रही है।
अगले दिन कॉलिज में
बी०ए० फ़ाइनल की क्लास में
एक लड़की बैठी थी
खिड़की के पास में।
लग रहा था
हमारा लैक्चर नहीं सुन रही है
अपने मन में
कुछ और-ही-और
गुन रही है।
तो यंत्र को ऑन कर
हमने जो देखा,
खिंच गई हृदय पर
हर्ष की रेखा।
यंत्र से आवाज़ आई-
सरजी यों तो बहुत अच्छे हैं,
लंबे और होते तो
कितने स्मार्ट होते!
एक सहपाठी
जो कॉपी पर उसका
चित्र बना रहा था,
मन-ही-मन उसके साथ
पिकनिक मना रहा था।
हमने सोचा-
फ़्रायड ने सारी बातें
ठीक ही कही हैं,
कि इंसान की खोपड़ी में
सैक्स के अलावा कुछ नहीं है।
कुछ बातें तो
इतनी घिनौनी हैं,
जिन्हें बतलाने में
भाषाएं बौनी हैं।

एक बार होटल में
बेयरा पांच रुपये बीस पैसे
वापस लाया
पांच का नोट हमने उठाया,
बीस पैसे टिप में डाले
यंत्र से आवाज़ आई-
चले आते हैं
मनहूस, कंजड़ कहीं के साले,
टिप में पूरे आठ आने भी नहीं डाले।
हमने सोचा- ग़नीमत है
कुछ महाविशेषण और नहीं निकाले।

ख़ैर साहब!
इस यंत्र ने बड़े-बड़े गुल खिलाए हैं
कभी ज़हर तो कभी
अमृत के घूंट पिलाए हैं।
- वह जो लिपस्टिक और पाउडर में
पुती हुई लड़की है
हमें मालूम है
उसके घर में कितनी कड़की है!
- और वह जो पनवाड़ी है
यंत्र ने बता दिया
कि हमारे पान में
उसकी बीवी की झूठी सुपारी है।
एक दिन कविसम्मेलन मंच पर भी
अपना यंत्र लाए थे
हमें सब पता था
कौन-कौन कवि
क्या-क्या करके आए थे।

ऊपर से वाह-वाह
दिल में कराह
अगला हूट हो जाए पूरी चाह।
दिमाग़ों में आलोचनाओं का इज़ाफ़ा था,
कुछ के सिरों में सिर्फ
संयोजक का लिफ़ाफ़ा था।

ख़ैर साहब,
इस यंत्र से हर तरह का भ्रम गया
और मेरे काव्य-पाठ के दौरान
कई कवि मित्र
एक साथ सोच रहे थे-
अरे ये तो जम गया!

26 comments:

कच्चा चिट्ठा said...

वाह सर!
बाई द वे क्या ये यंत्र उधार मिल सकता है? :-)

manya said...

अरे! यही तो वो कविता है . जो स्कूल में elecoution में मेरे हाउस की तरफ़ से पढी गयी थे.. और दूरदर्शन पर इसका वीडियो भी देखा थ मैंने.. कल यही कविता याद की थी सब्से पहले.. आपको यहां देख्कर..

sunita (shanoo) said...

अच्छा यंत्र है मगर इस यंत्र के फ़ायदे कम नुकसान ज्यादा है...इंसान इस उम्मीद में जीता है कि उसे सभी प्यार करते होंगे,सभी दोस्त उसकी इज्जत करते होंगे,मगर जब सच्चाई का पता चलता है तो पाँव तले जमीन खिसक जाती है,और दुख ज्यादा होता है,क्यूँ कि ९० प्रतिशत लोग प्रत्यक्ष में कुछ और हकिकत में कुछ और होते है...

सुनीता(शानू)

अरुण said...

दादा कहा आप खुद ऐसी कैसी चीजे उठा लाते हो टंशन वाली और दूसरो को आप राय देते हो मस्त रहो,फ़ेको ऐसी चीज को नही तो मस्ति का आलम ढूढे नही मिलेगा

Jitendra Chaudhary said...

जितनी बार सुनते है उतनी ही बार मजा आता है।
झकास है।

कृपया चुम्बन और तमाचा वाली भी प्रकाशित करिए।

संगीता said...

कविता में से पुराने चावलों की खुश्बू आ रही है अशोक जी।

Hindustani said...

पुराना ज़माना याद आ गया। कालजयी रचना है ये आपकी। भरपूर आनंद देती है, खुलकर गुदगुदाती है। इस पोस्टिंग के लिए सचमुच शुक्रिया।

Suresh Chiplunkar said...

यह कविता मैंने बरसों पहले आपके मुँह से ही साक्षात आपके सामने कवि सम्मेलन में सुनी थी,, आज पुरानी यादों को ताजा कर दिया आपने जब कवि सम्मेलनों में वाकई मजा आता था...

Sagar Chand Nahar said...

बहुत पहले सुनी थी पर आज भी पढ़ने पर अच्छी लगती है।

Valley of Truth said...

अशोक जी, इस रचना को मैने ओशो की किताब सांच सांच सो सांच में पढ़ा। ये इतना अच्छा लगा कि इसका ज़िक्र मैंने अपने ब्लाग http://valleyoftruth.blogspot.com पर भी किया। तभी आलोक पुराणिक जी की टिप्पणी के ज़रिए पता चला कि ये तो आपकी रचना है और ओशो की किताब में बिना आपका नाम लिए बिना इस्तेमाल किया गया है। अपनी अल्पज्ञता पर मैं शर्मिंदा हूं।

सही में ये है ही इतनी बेहतरीन की कोई भी चुरा लेना चाहे। ऐसी और आपकी रचना के इंतज़ार में

उमाशंकर सिंह

राजीव रंजन प्रसाद said...

अशोक जी..
आपको जानने वालों में शायद ही एसा कोई होगा जिसने यह कविता सुनी/पढी न हो। प्रकट हास्य और उसके भीतर छुपे हुए व्यंग्य का अध्भुत संगम है आपकी यह रचना। आज भी पुरानी नहीं हुई..

*** राजीव रंजन प्रसाद

ravish said...

पोल खोलक यंत्र की मार्केंटिंग करती ये कविता लाजवाब है। वैसे भी हम कितनी मेहनत करते हैं यह पता लगाने में कि फलां हमारे बारे में सोचता क्या है। इस यंत्र से तो ये काम भी आसान हो गया। मगर आपकी कविता ने थोड़ा डरा दिया। यह सबके हाथ लगा तो सबकी पोल खुल जाएगी।

मजा आ गया। अब इस यंत्र का निर्माण कीजिए। हम कविता का प्रसार करते हैं।

Vishal said...

sir, media se juda hoon yantra ek din ke liye denge kya. kaiyon ki kholni hai???????????????

Udan Tashtari said...

हमें भी चाहिये!! यह यंत्र...नहीं तो हल्ला मचायेंगे.. :)

Shrish said...

वाह वाह सुंदर कविता, सचमुच मजा आ गया।

वैसे आप को युंत्र की तकनीक समझ आई तो एक हमारे लिए भी बना सकते हैं क्या? :)

कच्चा चिट्ठा said...

प्रणाम सर!
यंत्र की मांग बहुत बढ़ गई है। ज़रा संभल कर! वैसे लाइन में मैं भी हूं। दो-चार दिन के लिए मिलेगा क्या?

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

कविता तो बीसियों वर्ष पहले सुन रखी थी.
एक (शायद निदा फाज़ली का) शेर याद आ गया. अर्ज़ है:
'हर आदमी मेँ होते हैं दस बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो कई बार देखना'

यदि देखें नही तो अपने यंत्र से नाप लें.

अरविन्द चतुर्वेदी
भारतीयम्

शब्द-सृष्टी said...

दादा ...मंच पर आपकी हस्ताक्षर रचना मानता हूं इसे.सुना बहुत आपको इस रचना के गले में हाथ डाले पर जब चिठ्ठे पर आ गई..निगाहों में समा गई ...वाह..क्या बात है...दिल में उतर गई.एक भाई ने पूछा है कि क्या ये यंत्र उधार मिल सकता है ..हद हो गई..भगवान को उधार मांग लीजियेगा किसी दिन...इस यंत्र को उधार तो क्या नक़द भी नहीं ख़रीदा जा सकता...मुकेश अंबानी भी नहीं ख़्ररीद सकते जानी.(उनके पास हँसने की आज़ादी कहाँ ?)

शब्द-सृष्टी said...

ऐसी और आपकी रचना के इंतज़ार में....ये कहा है भाई उमाशंकर जी ने...(घृष्टता माफ़ ...अशोक भाई आपकी ओर से जवाब देने के लिये और उमा भाई से मुँहजोरी करने के लिये)सनद रहे.... ऐसी रचनाएं लिखी नहीं जाती ...(उर्दू वाले जैसे बड़ी विनम्रता से कहते है...ग़ज़ल हो गई)वैसे ही अशोक जी से ये कविता हो गई है ...

Dr. Ajit Kumar said...

अहा!जिंदगी में पढा ..... जाना ....
अपनी अल्पज्ञता पर क्षोभ भी हुआ....
आज पता चला ... चक्रधर जी भी जाल (नेट) में फँस ही गए....
तभी उनके पोल खोलक यन्त्र का नया version ....
मेरे computer पर spyware की भांति आ धमका.
मैंने सोचा , लगता है ब्लॉग पढाकुओं की जोरदार फरमाइश पर...
चक्रधर जी ओरिजनल की पायरेटेड virsion फ्री बाँट रहे हैं ....
खुद तो कभी अमृत कभी जहर का घूंट तो पिया ही,
हमे भी करेले का रस चखा रहे हैं....

Shastri JC Philip said...

कविता में निहित हास्य एवं नीतिदर्शन दोनों ही भा गये. आपकी अन्य रचनायें भी यहा पर प्रकाशित करें तो हमारा भला हो जायगा -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

मीनाक्षी said...

काश हम भी ठोकर खाते
और पोल-खोलक यंत्र पाते !
भलमानस का अंर्तमन सुन पाते
जनमानस का परिवर्तन कर पाते !

Ankit said...

wah wah kya baat kahi hai...kaash yeh pol kholak yantra har neta ke paas hota...to hume apni zubaan kharab nahi karni padti..bas sochte aur transmission ho jaata..

सतीश सक्सेना said...

अशोक भाई !
इसी यन्त्र के कारण बरसों पहले हमारी आपसे दोस्ती हुई थी, और इसके ही कारण आपने याद करना ही बंद कर दिया ! आशा है थोड़ा समय निकाल कर हमारे ब्लॉग पर भी तशरीफ़ लाईये !
आदर सहित
सतीश सक्सेना
नॉएडा
satish-saxena.blogspot.com

manju said...

प्रणाम सर,
पहली बार बचपन में आपको होली के हास्य कवि सम्मेलन में दूरदर्शन पर सुना था। तभी से आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ। हँसाने की कला तो बहुत से लोग जानते हैं,सरकस का जोकर भी लोगों को हँसा देता है। पर हँसाते हुए जीवन की कड़वी सच्चाई का दर्शन कराना, लोगों को अपने भीतर झाँकने को मज़बूर करना ये आपकी ही विशेषता है और मैं इसकी कायल हूँ।

Chetana.gemini said...

A great fan of your's and other great poets like - Hullad Muradabadi, Pradeep Choubey, Shail Chaturvedi. Used to read your poems in Dharmayug Magazine. Can you guide me where I can get a collection of comedy poems by you all. I used to recite your poems in school and now am teaching my daughter. She too is a fan of you all now.