Thursday, December 18, 2008

हाथ भी नहीं बचेंगे मलने के लिए मलाल में

—चौं रे चम्पू! पाकिस्तान कूं कत्थ,ई चावल चौं नांय पच रए?
—इसलिए नहीं पच रहे क्योंकि इंसान के खून में पकाए गए हैं। लेकिन चचा, कत्थई चावल कौन से हुए? हमारे यहां से तो बासमती चावल जाते हैं| हालांकि, वे इस लायक नहीं हैं कि हमारे सुवासित बासमती चावल का लुत्फ उठा कर आतंकवाद की बास इधर भेजते रहें। निर्यात फौरन बंद कर देना चाहिए।
—ठीक कही लल्ला! पर ....कमाल ऐ, तोय कत्थई चावल कौ कछू पतौ नांय!
—माफ करना चचा। मैंने गुलाबी चना तो सुना लेकिन कत्थरई चावल के बारे में वाकई नहीं जानता।
—अरे हट्ट पगले! हम कै रए ऐं ब्राउन और राइस के बारे में। ब्राउन और राइस उन्हेंा पचे नईं।


—कमाल कर दिया चचा तुमने भी! दूर की कौड़ी फोड़ कर लाने लगे हो, चूरन बनाके। मैं शब्दों में निहित स्वाद, गंध और नाद पर गया, अनुवाद तक नहीं जा पाया। शब्दों से खेलने लगे हो। अरे, अब हम कहां के कवि रहे? कवि की पदवी तुम्हेंन मिल जानी चाहिए। शब्दों से नए-नए अर्थों का जलवा बिखरा रहे हो।
—आजकल्ल सब्दवन कौ खेल तौ अखबार कर रए ऐं। नाम एक ऐ, पर तीन तरह ते लिख्यौ जा रह्यौ ऐ। वा आतंकवादी कूं कोई कासब कहै, कोई कसब, कोई कसाब।



—हां चचा! हम इसको ‘कस अब’ भी पढ़ सकते हैं। अंग्रेज़ी में तो स्पेलिंग एक ही है, उसे हिन्दी में कैसे भी पढ़ लो। नर्मदा प्रसाद नर मादा प्रसाद हो जाते हैं। चचा, जैसे ही कासब को कसा गया, उगल दिया उसने। विडम्बना ये है कि पुलिस की हिरासत में जो भी बोलेगा, कहा जाएगा कि कसाब के ऊपर कसाव बनाकर कहलवाया गया है। पर उनके अपने टी.वी. ने स्टिंग ऑपरेशन करके जो पूरी दुनिया को दिखा दिया उसे थोड़े ही झुठला सकते हैं। गांव वालों ने सच्चा-सच्चा बोल दिया कि अपना ही बच्चा है। पाकिस्तानी प्रशासन को चेत आया तो गांव की ज़बान पर ताला लगा दिया गया। फरीदकोट में फर का कोट ओढ़ा-ओढ़ा कर सबको मौन कर दिया गया। लेकिन देर कर दी उन्होंने। बात तो पूरी दुनिया तक पहुंच ही गई कि आतंकवाद के शिविर-अड्डे और इंसानियत के लिए गड्ढे, पाकिस्ताआन में सबसे ज़्यादा हैं। ….इतना भी समझ लो चचा कि मुम्बई के मामले में ब्राउन और राइस का पाकिस्तान जाकर डांटना सिर्फ़ इसलिए नहीं हुआ है कि भारत के साथ उनकी कोई ख़ास हमदर्दी है, इसलिए हुआ है कि आतंकवाद की मार उन्हों ने खुद भी झेली है। ब्राउन के खुफिया-तंत्र का मानना है कि उनके यहां हुई आतंकवादी घटनाओं में तीन-चौथाई हाथ तो पाकिस्ताुन के प्रकांड आतंकवादियों का ही रहा है। अमरीका पहले ही एक तगड़ा झटका झेल चुका है। ब्राउन और राइस के बाद अमरीका के सीनेटर जॉन कैरी के हस्तक्षेप से भी पाकिस्ता न अब सहम गया है चचा। कुछ महीने हम निश्चिंत रह सकते हैं कि आतंकवाद की कोई बड़ी घटना होगी नहीं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी साहब को भी गिलानी हो रही है।
सारा दोष ग़रीबी के मत्थे मढ़ रहे हैं। मीडिया के सामने संभल कर बोल रहे हैं।
—मीडिया में बड़ी ताकत ऐ।
—हां चचा, मीडिया ने अपनी ताकत का जलवा दिखा दिया। ये जो कासब कसब कसाब का राइफल के कसाव के साथ फोटो छपा है, कमाल कर दिया। तगड़ा टेली लैंस लगा कर जिस भी छायाकार ने वह चित्र लिया है, उसे थैंक्यूा, धन्य वाद, शुक्रिया देना चाहिए। चचा, लेकिन मीडिया भी टी.आर.पी. के तवे पर समाचार सेंकता है। हां, इतना है कि पड़ोसी देश का मीडिया झूठ का जो विस्तालर करता है उसका सौंवा हिस्सा भी हमारे यहां नहीं होता। कितना भी हम मीडिया को कोसें लेकिन तस्वीररें हक़ीकत के आसपास बनी रहती हैं।
—सरसंघ चालक सुदरसन जी तौ कह रए ऐं कै कर देओ आक्रमन! हौन देओ परमानु युद्ध।
—कोई ज़िम्मेदारी तो है नहीं, कुछ भी बोल सकते हैं। पड़ौसी देश में ऐसे ही वक्तव्यों को देश का नज़रिया मान लिया जाता है। सुदर्शन जी को यह नहीं मालूम कि परमाणु युद्ध के परिणाम अब वैसे नहीं होंगे जैसे हिरोशिमा-नागासाकी में थे। अब तबाही ऐसी होगी कि त्राहि-त्राहि भी मुंह से नहीं निकल पाएगा। इसलिए दोनों देशों के युद्ध भड़काऊ नेताओं को भी कसकर रखना होगा। अच्छां है कि पाकिस्तांन में इन दिनों जैसी भी है डैमोक्रैसी तो है। अगर कहीं होता सैनिक शासन, तो भड़काऊ तक़रीरों के प्रभाव में आकर युद्ध-युद्ध खेलने को मचलने लगता। दबाव में सही, धीरे-धीरे सही, पर वहां के चुने हुए नेता मान तो रहे हैं कि गड़बड़ उनके यहां है। वहां के जनतांत्रिक नेताओं की समझ में यह बात आ रही है कि अगर हम फंस गए परमाणु आयुधों के जंजाल में, तो हाथ भी नहीं बचेंगे मलने के लिए मलाल में।

4 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत जबरद्स्त पोस्ट लिखी है।आभार।

विनय said...

बहुत बढ़िया जी!

अभिनव said...

वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह

Amit Mathur said...

प्रणाम गुरुदेव, सच कहा आपने अगर परमाणु युद्ध हुआ तो हाथ भी नहीं बचेंगे मलने के लिए. मगर पाकिस्तान जैसा भूखा और लाचार देश युद्ध के अलावा और कर भी तो कुछ नहीं सकता. वहां तो भूख का बस एक ही इलाज है 'जेहाद' के नाम पर युद्ध करना. वहां के रहने वालो में इतनी समझ नहीं है की खाली पेट पर सिर्फ़ एक रोटी ही खाई जा सकती है उसके बाद पेट खाली ही कहाँ रह जाता है. मेरे विचार से तो अब इंसानियत को मलाल है क्यंकि बस एक रोटी का सवाल है. जहाँ तक पाक पोषित आतंकवाद का सवाल है कहीं न कहीं चूक हमसे भी हुयी है, हमने भड़कावे में आकर आतंकवादियो को इस्लाम और मुसलमान कॉम से जोड़ दिया. आज भारत के ख़िलाफ़ जो ये विशाल सुरसा रुपी आतंक खड़ा है उसमे आतंकवादियो को मजलूम मुसलमान मजबूरी में सहयोग दे रहे हैं. और सच कहूँ तो इस सुरसा की सुर्सी में कुर्सी भी काफ़ी हद तक जिम्मेदार है. खैर, मेरे विचार से तो हमे दुआ करनी चाहिए की हमारे देश और पाकिस्तान में जंग न हो. -अमित माथुर, saiamit@in.com