Friday, December 26, 2008

सूमो टिंगो हमारे सूम को नहीं पछाड़ सकता

—चौं रे चम्पूस! कोई ऐसी बात हतै तेरे पास जाते मन खुस है जाय?
—क्यार दोगे अगर ऐसी कोई बात बताई?
—आसीरवाद दिंगे और का!
—बड़े कंजूस हो चचा! चलो एक खुशी की बात बताता हूं कि अंग्रेज़ी की एक किताब में ‘कंजूस मक्खीडचूस’ शब्दच को आदरपूर्वक स्थांन दिया गया है।
—कौन-सी किताब ऐ?
—बड़ा हल्लाच है किताब का। ब्रिटिश राइटर एडम जाको द बोइनोद ने बनाई है।
—बड़ौ बिचित्र नाम ऐ।
—विचित्र तो किताब है चचा। तीस साल श्रम करके उसने पूरी दुनिया की विभिन्नय भाषाओं से ऐसे शब्दत तलाश किए जो अनोखे हैं और ऐसा अर्थ देते हैं जिन्हें सुन कर झुरझुरी-सी आ जाए, जुगुप्साि हो या भय का कंपन व्या प्तस हो जाए, शरीर में। किताब का नाम है— ताउजोर्स टिंगो।
—किताब कौ नाम ऊ बिचित्र ऐ। मतलब का भयौ?
—एस्टबर आईलैंड में प्रचलित एक शब्दा है ‘टिंगो’। टिंगो एक प्रवृत्ति है। आप अपने पड़ोसी से कुछ मांगने जाओ, मिल जाए तो फिर कुछ मांगने जाओ और तब तक मांगते रहो जब तक कि उसका घर ख़ाली न हो जाए। देखा, शब्दा ज़रा-सा है और अर्थ सोचने बैठो तो कितनी ही कहानियां जन्म ले सकती हैं। मांगने वाले से कोई दुःखी हो जाए तो हमारे यहां कहते हैं— ‘आंती आना’। होते हैं कुछ लोग ऐसे, जो मांगते ही रहते हैं। देने वाला आंती आ जाता है, पर अपने दानशील स्वेभाव के कारण देने से मना नहीं करता। पर चचा, भाषाएं कभी आंती नहीं आतीं। वे उदार होती हैं। अफसोस है कि एडम ने हिंदी से केवल दो शब्द-युग्मा लिए। अगर उसका टिंगोनुमा इरादा होता और हमसे हमारे मुहावरे और हमारी कहावतें मांगता, हम देते जाते, देते जाते, फिर भी हमारा घर खाली नहीं होता। हमारी भाषाओं के पास लोकोक्तियों, मुहावरों और कहावतों का अथाह भंडार है। ताउजोर्स टिंगो का हल्ला हो गया। ऐमेज़ॉन डॉट कॉम पर धकाधक बिक रही है। इधर हमारे अरविंद कुमार के थिज़ारस की मामूली-सी चर्चा होकर रह गई। शब्दोंह का जितना शोध अरविंद कुमार ने किया है आधुनिक युग में उतना संसार के कुछ गिनेचुने भाषा-शास्त्रियों ने ही किया होगा। वे भी चालीस साल से समांतर कोश बनाने में लगे हुए हैं। कंजूस के कितने ही पर्यायवाची प्रसंग उनके कोश में मिल जाएंगे। संसार का सबसे बड़ा थिज़ारस है। इसी तरह डा. भोलानाथ तिवारी ने हिंदी का बृहत लोकोक्ति कोश बनाया। शब्दों के अनुसंधान पर ज़िंदगी खर्च‍ कर दी। हिंदी के दिग्गलज लोग भोलानाथ का भाषा-विज्ञान के लिए ‘भाषा नाथ का भोला-विज्ञान’ कहकर मज़ाक बनाते रहे। हमारे यहां प्रशंसा में बेहद कंजूसी बरती जाती है।
—एडम कूं कंजूस-मक्खींचूस में का खास बात दिखी भैया?
—ख़ास बात हमें नहीं दिखती, क्यों कि हम बचपन से सुनते-सुनते इसके आदी हो गए हैं, लेकिन कोई विदेशी अगर अपनी भाषा में मक्खी चूस का अनुवाद पढ़ेगा तो मक्खी के चूसने की कल्पवना से ही उसे ज़बरदस्ती झुरझुरी आ जाएगी। कंजूस के लिए एक शब्दे है सूम। सूम की कहानी दो दोहों में सुनो चचा— ‘जोरू बोली सूम की, क्यों् कर चित्त मलीन। का तेरौ कछु गिर गयौ, का काहू कछु दीन?’ सूम जवाब देता है— ‘ना मेरौ कछु गिर गयौ, ना काहू कछु दीन। देतौ देखौ और कूं, तांसू चित्त मलीन’। कोई किसी को कुछ दे रहा है, इसी से सूम दुःखी हो जाता है। कितना भी सूमो जितना बलशाली टिंगो हो हमारे सूम को नहीं पछाड़ सकता। वह सूम से कुछ लेकर तो दिखा दे। बहरहाल, एडम की किताब तो टिंगो-टैक्नीक से बन ही गई।
—हिंदी कौ दूसरौ कौन सौ सब्दर लियौ?
—ये कहानी भी दिलचस्पस है चचा। दो दिन पहले एक टी.वी. चैनल से मेरे पास एक फोन आया, इस खुशखबरी का कि हमारे दो शब्दर लंदन में आदर पा रहे हैं। कंजूस-मक्खीैचूस तो उनकी समझ में आ गया था, दूसरा रोमन में लिखा होने के कारण समझ में नहीं आया। और जैसा उनकी समझ में आया, वैसा मेरी समझ में नहीं आ पाया। वे पूछने लगे— ‘काती कहरी’ क्याज होता है? मैंने कहा कि भैया ‘काती कहरी’ मैंने तो सुना नहीं। वे कहने लगे— शेर की खाल से काती हुई किसी चीज़ को नापने जैसा कोई भाव है। मैंने दिमाग दौड़ाया। व्यांघ्र-चर्म तो सुना था पर शेर की खाल का धागा…. वह तो बनता नहीं, जिसे कात-बुन कर नापा जाए। और दिमाग दौड़ाया। सोचने लगा कि ‘काती कहरी’ को रोमन में कैसे लिखा गया होगा? झट से समझ में आ गया। शब्दे रहा होगा ‘कटि-केहरी’। शेर की कमर को नापने का संदर्भ रहा होगा। सोचो चचा, शेर की कमर को नापने का काम किसी को सौंपा जाए तो उसे झुरझुरी आएगी कि नहीं? ऐसे ही हज़ारों शब्दोंन का संकलन किया है एडम साहब ने।
—किताब कित्ते रुपैया की ऐ?
—भारतीय मुद्रा में केवल पाँच सौ कुछ रुपए की।
—इत्ते रुपैया खर्च करिबे ते अच्छौौ ऐ कै कटि-केहरी नाप कै आ जायं, तुम भलेई हमें कंजूस मक्खीतचूस बताऔ। का फरक परै?

11 comments:

cmpershad said...

बडी टिंगो रचना है - भई वाह, हम तो मक्खीचूस नहीं जो दिल खोल कर प्रशंसा भी न कर सके। आपको शत-शत नमन इस सुमो रचना के लिए।

विनीता यशस्वी said...

Ashok ji apka blog dekh ke mai bata nahi sakti kitni khush hui.

mai bachpan mai apko TV pe dekhti thi. apke sath aur bhi kai HASHYA KAVI aate the us samay,

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इत्ते रुपैया खर्च करिबे ते अच्छौौ ऐ कै कटि-केहरी नाप कै आ जायं, तुम भलेई हमें कंजूस मक्खीतचूस बताऔ। का फरक परै?

बहुत अच्छे!

विनय said...

बहुत ख़ूब, गुरु जी

---
तख़लीक़-ए-नज़र
http:/vinayprajapati.wordpress.com

jaidev jonwal said...

Guru ji Parnaam
bahut acchi rachna hai
apne shishye jaidev jonwal
ki bhadhai savikaar
kare

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

वाह! आपके शब्दों के प्रयोग के हम पुराने कायल हैं। धन्यवाद।

sanjaygrover said...

इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूंऽऽऽऽऽऽऽ
और बधाई भी देता चलूं...

Anurag said...

Har shabd, jo aapke dwara likha aur bola gaya ho,
Aisa agta hai jaise taraju se tola gaya ho,
Phir usme hasya aur vyangya ka baarood ghola gaya ho,
Tabhi to uska asar aisa hota hai jaise kaan ke paas se nikal kar koi top ka gola gaya ho.

Bahut achchi rachna hai. Please likhte rahiye aur is nacheejon ki rachna par bhi ashirvaad ka jal chhidakte rahiye. MERA BLOG HAI- `anuragi-anurag.blogspot.com'

----ANURAG

Amit Mathur said...

परनाम गुरुदेव, वाकई रचना तो बहुत टिंगो है. बहुत मुश्किल से एक बात समझ में आती है तो लीजिये दूसरी पहेली तैयार है. सच कहूँ गुरूजी हिन्दी में अपनी उड़ान इत्ती नईं है की इस एडम साहब की किताब पर लिखा आपका ये गद्य समझ सकूं मगर पढ़ा ज़रूर है और महसूस भी कर रहा हूँ. बस समझिये उस भक्त की तरह से जो अनपढ़ होकर भी भगवद गीता के संस्कृत संस्करण को देखकर आंसू बहा रहा था. किसी ने पूछा 'अरे मूरख! कुछ समझ नहीं आ रहा तो रो क्यूँ रहा है?' इस पर वो भक्त बोला 'मैं तो ये देखकर रो रहा हूँ की ये शब्द मेरे भगवान् के मुख से निकले हैं.' इसी प्रकार मैं भी इस गद्य से अभिभूत ज़रूर हूँ मगर समझने में अक्षम हूँ. और सच कहूँ तो आप जैसे गुरुदेव के आगे सक्षम होने इच्छा भी नहीं है क्यूंकि असमर्थता ही हृदय में करुणा और प्रेम को मरने नहीं नहीं देती, ऐसा मैंने सुना है. आपके शब्दों को पढ़कर आनंद मिलता है और टिप्पणी लिखने में सुकून. -अमित माथुर

Dev said...

नव वर्ष की आप और आपके समस्त परिवार को शुभकामनाएं....

विनय said...

आपको नववर्ष की हार्दिक बधाई।