Thursday, December 04, 2008

प्राइमरी से लेकर हाईमरी तक

--चौं रे चम्पू! भारत कौ सुभाव नरमाई कौ ऐ कै गरमाई कौ?
--गरमाई का होता चचा, तो एक भी आतंकवादी इस तरह नचा नहीं सकता था, और अगर नरमाई का होता तो कोई भी आतंकवादी बचता कैसे? लेकिन ये बात सच है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ हमारा रुख़ इतना कड़ा नहीं है, जितना कि होना चाहिए। कानून में अनुच्छेद कम छेद ज़्यादा हैं। इन्हीं छेदों में से आतंकवादी अन्दर आ जाते हैं, इन्हीं से बाहर निकल जाते हैं।
--तौ छेद छोड़े ई चौं ऐं?
--अब इसका क्या जवाब दूं चचा! संविधान बनाने वाले ज़्यादातर लोग ऊपर चले गए। कोई रास्ता भी नहीं छोड़ गए कि आसानी से छेद मूंदे जा सकें। संसद में एक पार्टी का वर्चस्व हो तो कानून भी बदले। यहां तो मिली-जुली सरकार में बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं। कोई दिल बदले, कोई दल बदले। बदलने की भावना की जगह बदले की भावना! फिर कानून कैसे बदले?
--जनता साथ दे तौ सब कछू बदल सकै।
--जनता का ज़िक्र करके चचा, तुमने मेरी दुखती रग पर उंगली रख दी। कौन सी जनता? रंग, वर्ण, सम्प्रदाय, जाति, गोत्र, धर्म में बंटी जनता! अल्पसंख्यक जनता या बहुसंख्यक जनता! आरक्षित जनता या अनारक्षित जनता! निरक्षर, अनपढ़, गंवार जनता या पढ़ी-लिखी तथाकथित समझदार जनता! शोषित जनता या शोषक जनता! हमारे यहां हंसोड़ संता और बंता की पहचान तो है पर जनता की कहां है?
ऐसी बिखरी हुई जनता के बलबूते कानून नहीं बदले जा सकते।
--सरकार है कै नईं ऐ? वाऊ की कछू जिम्मेदारी हतै कै नांय?
--ये दूसरी दुखती नस है। सरकार है भी और नहीं भी है। होती तो अपने वोटरों की फ़िक्र करती। ये वोटर पाँच साल बाद काम में आते हैं! फिर क्या? दरअसल, सरकार को अपने बचने-बचाने की फ़िक्र ज़्यादा रहती है। इस एक अरब की आबादी में सौ, दो सौ, हज़ार, दो हज़ार मर भी जाएं तो फ़र्क क्या पड़ता है? मुम्बई में अगर फ़र्क पड़ा है, तो इस कारण क्योंकि मामला ताज नामक फाइव स्टार होटल का है और मीडिया मुंह खोले खड़ा है। पल-पल की ख़बर मिल रही है कि लोकतंत्र की इमारत दस सिरफिरों के कारण बुरी तरह हिल रही है। सच पूछो चचा, तो हमारे नेताओं में आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति है ही नहीं। न उपायों को खोजने का कोई संकल्प है।
--अच्छा तू सरकार मैं होतौ तो का करतौ, जे बता?
--फंसा लिया न चचा! पहला काम तो ये करता कि प्राइमरी से लेकर हाईमरी तक.....।
--हाईमरी?
--हां ये मरी हाई ऐजुकेशन। सब जगह पाठ्यक्रम में ‘आतंकवाद’ एक विषय बना देता। बच्चों से लेकर चच्चों तक सबको सिखाया जाता कि ये कैसे ये फलता-फूलता-फैलता है और कैसे इसे टोका-रोका जा सकता है और कैसे दिया जा सकता है धोखेबाज़ों को धोखा। आतंकवादी आसमान से नहीं उतरते। कॉलोनी हो या होटल, किराए पर कमरा लेते हैं। पैसा मुंह पर मार के विश्वास ख़रीदते हैं। जिस बोट में बैठकर समंदर से चंद लोग आए, उसका किराया था अठारह हज़ार प्रति घंटा। बोट वाले ने पैसा लिया, उसे क्या टंटा? जहां वी.आई.पी. हों और ग़रीब जनता सुनने जाए, वहां तो होगी तलाशी की भरपूर इंतज़ामी, पर फाइव स्टार होटल में विदेशी कार से उतरो तो मिलेगी ताल ठोक सलामी। प्यार लाए हो या हथियार कौन देखेगा? सुरक्षा में बड़े लोचे हैं चचा।
--अमरीका तौ चाक-चौबंद हतो, वहां कैसे घुस गए?
--ग्यारह सितंबर के बाद आतंकवाद वहां कोई सितम कर पाया क्या? उन्होंने अपनी सुरक्षा इतनी मज़बूत कर ली कि अब वहां कोई आतंकवादी गतिविधि असंभव नहीं तो मुश्किल तो हो ही गई है। भारत में बहुत आसान है। तुमने ठीक कहा था कि भारत नरम है और ये भी सही है कि अमरीका गरम है। आतंकवाद रूपी राहु भारत को रोज़-रोज़ ग्रस सकता है, अमरीका को नहीं। माघ ने ‘शिशुपाल वध’ के एक श्लोक में कहा था...
--फिर संसकिरत छांटैगौ का?
--तो तुम अनुवाद ही सुन लो। श्लोक का सार ये है कि अपराध समान होने पर भी राहु सूर्य को चिरकाल बाद और चन्द्रमा को जल्दी-जल्दी ग्रसता है। यह चन्द्रमा की कोमलता, शीतलता और नर्मी का साक्षात प्रमाण है। भारत की नर्मी अच्छी है पर आतंकवाद के सामने गर्मी दिखानी पड़ेगी चचा।
--जेई तौ अपनी तमन्ना ऐ।

2 comments:

Anil said...

वाह अशोक जी वाह! कील ऐसी ठोकी है कि बिलकुल भीतर जाके घुसी है. "कौनौ नेता-वेताओं को भी अपना बिलागवा पढवाई दियो"

Amit Mathur said...

गुप्तचर संस्थाओ में हो रहे लाखो छेद / पाए तो पाए कहाँ गुनाहगार का भेद / गुनाहगार का भेद पा नहीं सकते ऐसे / आतंक की पौकेट में जब तक भरे हैं पैसे ... गुरुदेव को प्रणाम, अरज कुबूल करने के लिए हार्दिक धन्यवाद. -अमित माथुर