Tuesday, March 23, 2010

येन-केन-प्रकारेन तेन त्यक्तेन

चौं रे चम्पू! कह्यौ करैं कै कबी लोग पइसा कूं हाथ लगामैं, जे अच्छी बात नायं, तेरौ का खयाल ?
एक पुरानी घटना बताता हूं। मंच के कुछ कवियों के साथ कहीं जा रहा था। सामने से सकुचाया सा एक आदमी आया। कुछ बोले नहीं, बस जेबें टटोले। मैंने पूछाकिस संशय में खड़े हो? किस विषय पर बात करना चाहते हो? ये सब गुणी लोग हैं, पूछो! वह बोलाविषय-विषय कुछ नहीं है, मुझे तो ये पांच सौ का नोट भुनाना था। मुझे हंसी आई।
हंसी चौं आई रे?
आई तो आई! मैंने उससे कहा कि भैया ये सब मंच के कवि हैं, ये नोट नहीं भुनाते हैं, नोटों की ख़ातिर विषय भुनाते हैं। वह तो चला गया, लेकिन मेरा ती कवियों के दिल में ऐसा धंसा कि सब के सब नाराज़। क्या बात कर दी? ये हमारा अपमान है। अकिंचन जी ने आंखें रेरीं, पैसा लेने में क्या बुराई है? कौन नहीं लेता? किसने अतीत में नहीं लिया? कविगण राजसी जीवन बिताते थे। चन्दबरदाई, भूषण और ग़ालिब सम्मान और मेहनताना पाते थे। भारतेन्दु और प्रसाद रईसी महफ़िलें सजाते थे। निराला भी कविसम्मेलनों से पारिश्रमिक लाते थे और अपनी मर्ज़ी से लुटाते थे, पर कभी पैसों की ख़ातिर विषय नहीं भुनाते थे। जो लिखते थे डंके की चोट लिखते थे। विषय बनाते थे उनको, जो समाज में खोट दिखते थे। बिना डरे जो लिख दिया, सो लिख दिया। इस पर अनमोल जी बोले, सब कुछ सबको दिखता है, पर वह सही नहीं है जो दूसरों की मर्ज़ी से, दूसरों की शर्तों पर और दूसरों के कहे पर बिकता है।
अनमोल जी नैं अनमोल बात कही।
कवि पर दबाव बनाया जाता है चचा कि वह त्यागी रहे। पैसे से कोई सरोकार रखे। समाज का हर वर्ग तो पैसा कमाने के लिए बना है, तू भूखा मरने के लिए है। भूखा नहीं रहेगा तो भूख पर कविता कैसे लिखेगा। उसे ईर्ष्याओं के कारण त्याग सिखाया जाता है। जब मैंने गाड़ी ख़रीदी थी सब राख हो गए, मेरे मन को कष्ट हुआ। अब तो उन सबके पास गाड़ियां हैं। अब गाड़ी ईर्ष्या का कारण नहीं है, कुछ अन्य कारण बन गए हैं। कवि हृदय पर हमेशा से आघात होते आए हैं। केदार नाथ सिंह जी के शलाका सम्मान अस्वीकार करने के मामले को ही लीजिए।
अख़बार में पढ़ी तौ हती, का भयौ?
उन्होंने लिखित स्वीकृति देकर सम्मान स्वीकार किया। बाद में अस्वीकार कर दिया। उनसे फोन पर बात हुई। उन्होंने बताया कि इतने फोन आए कि वे दबाव में गए। वे अपनी बीमार वृद्धा मां की सेवा के लिए कोलकता गए हुए थे, और भाई लोग थे कि इधर से लगे हुए थे दबाव बनाने में और उन्हें भी बीमार बनाने में। कहा होगा कि तुम दो लाख रुपए में बिक गए। तुम्हें साहित्य माफ नहीं करेगा। तुम्हें समाज माफ नहीं करेगा। अब बेचारे केदार जी क्या जानें कि समाज उनको कितना चाहता है, समाज उनको सिर माथे उठाता है और कुछ लोग हैं जो फ़लीता लगाते हैं, दिमाग ख़राब करते हैं। उन्होंने फोन पर यह भी बताया कि जो पत्र उन्होंने हिन्दी अकादमी को भेजा है उसमें अकादमी के प्रति कहीं भी असम्मान का भाव नहीं है।
सो तौ ठीक लल्ला, पर दबाए में चौं आए?
चचा हर ज़माने में ऐसा होता आया है। कवि बस पैसा ले। पैसे के आधार पर उसको लानत, मलामत दी जाए। उसे भोगवादी बता दिया जाए। कवि हृदय विचलित हो जाता है। ईशावास्योपनिषद में कहा गया हैतेन त्यक्तेन भुंजीथा:’, मतलब कि त्यागपूर्वक भोग करो। भोग का आनन्द त्याग में है। केदार जी ने सोचा होगा कि त्याग कर दो तो शायद उसका भोग ज्यादा होगा। चचा गेन त्यक्तेन भुंजीथा:, गेन करके त्याग दो। येन-केन-प्रकारेन त्यक्तेन भुंजीथा: त्यक्तेन वाली मुद्रा बना ली, और स्वयं को गेन करने से वंचित करने लगे। होना चाहिए अगेन चिन्तयेन भुंजीथा: गेन-वेन की बात छोड़ कर अगेन सोचो केदार जी, सोचो! प्यार करने वाले लोग ज़्यादा बड़े हैं या अपनी मतलबपरस्ती के कारण दबाव में लाने वाले लोग ज़्यादा बड़े हैं। कौन बड़ा है?
तू चौं कहि रह्यौ ? खुद सोचैं केदार जी!

5 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बढ़िया रही. आप की एक नई कविता का इंतजार है.

Amitraghat said...

"त्यागपूर्वक भोग करों " ...बहुत बढ़िया जनाब और आपको रामनवमी की शुभकामनाएँ....."
प्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com

jaidev jonwal said...

Guru ji ko parnaam
Ram Navmi ki Dhero Shubhkaamnaye
bahut accha or sparsht likha aapne

shubh kaamnayein

jaidev Jonwal

सुरेश यादव said...

वाह चक्रधर जी वाह ,किस अंदाज में सब कुछ कह गए .केदार जी जरुर खुश हो जायेंगे ,सवाल है क्या मान भी जायेंगे. 09818032913

kunwarji's said...

raam raam ji,


kunwar ji,